कैसे करें सब्जियों की पौध तैयारी

Table Of Content

  • सब्जियों की पौध तैयार करना
  • कैसे करें तैयारी

Search

सब्जियों की पौध तैयार करना
कैसे करें तैयारी
सब्जियों की पौध तैयार करना

अधिकतर सब्जी फसलें जैसे कि टमाटर, गोभी व प्याज जिनके बीज छोटे व पतले होते है उनकी स्वस्थ व उन्नत पौध तैयार कर लेना ही आधी फसल उगाने के बराबर होता है|स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए पौधशाला के स्थान का चयन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है इससे जुडी हुई अन्य बाते निम्नलिखित हैं :-

1. स्थान ऊंचाई पर होना चाहिए जहां से पानी का निकास उचित हो |

2. भूमि दोमट बलुई होनी चाहिए जिसका पीएच मान लगभग 6.5 हो |

3. स्थान पानी के स्रोत के समीप होना चाहिए |

4. स्थान खुले में होना चाहिए जहाँ सूर्य की पहली किरण पहुंचे |

5. स्थान देखरेख की दृष्टि से भी निकट होना चाहिए |

6. स्थान खेत के किनारे पर होना चाहिए ताकि कृषि कार्यों मे रुकावट न आए |

कैसे करें तैयारी

  • यदि भूमि का पहली बार उपयोग किया जा रहा है तो इसे फफूंद रहित करने के लिए इसका फारमेल्डिहाइड नामक रसायन से उपचार करना आवश्यक है इसका 25 मि.लि. से 1 लिटर पानी मे घोल बनाएं तथा पौधशाला के लिए चुने गए स्थान पर अच्छी तरह छिडकाव कर भिगोएँ  तत्पश्चात इस स्थान को पॉलिथीन चादर से अच्छी तरह ढँक दें | लगभग एक सप्ताह पश्चात् पॉलिथीन चादर हटाकर इस जगह की अच्छी तरह 3 – 4 बार जुताई व खुदाई कर खुला छोड़ दें जिससे रसायन का असर समाप्त हो जाए  इसके पश्चात् भूमि को अच्छी तरह भुरभुरा बनाएं तथा लगभग उपचार के 15 दिन पश्चात् बुवाई के लिए तैयार करें | यह उपचार कमरतोड़ तथा क्लेदगलन  (डैपिंग ऑफ) नामक बीमारी की रोकथाम में सहायता करेगा | क्यारी बनाते समय यह ध्यान रखे की प्रति 10 वर्ग मीटर के लिए लगभग 20 से 25 कि.ग्रा. सड़ी गली गोबर की खाद ट्राईकोडर्मा हाजिॅएनम के साथ 1:50 के अनुपात में मिलाकर 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 15 -25 ग्राम इंडोफिल एम 45 नमक फफूंदनासक और कोई भी उपलब्ध धूल कीटनाशक मिलाएं |
  • क्यारियाँ 15 -20 से. मी. ऊँची उठी होनी चाहिए | 
  • इनकी चौङाई लगभग 1 मीटर तथा लम्बाई 3 मीटर होनी चाहिए जो कि सुबिधा के अनुसार घटाई – बढाई जा सकती है |
  • बीज का उपचार बुवाई से पहले 2 – 3 ग्रा./कि. ग्रा. बीज की दर से कैप्टन, थीरम, बैवीस्टीन इत्यादि फफूंदनाशकों या ट्राईकोडर्मा हाजिॅएनम से करें जिससे डैपिंग ऑफ नामक बीमारी का प्रकोप कम होगा |
  • बुवाई 5 सें.मी. दूर पंक्तियाँ में 1 सें.मी. गहराई पर करें तथा पतली मिटटी की परत से ढकें | क्यारियों को सूखी घास से ढँक दें तथा फव्वारे से हल्की सिंचाई करें |
  • अंकुरण होने पर घास हटा दें तथा फव्वारे से हलकी सिंचाई से नमी बनायें रखें |
  • कीटों व कमरतोड़ रोग से बचाव के लिए 0.25 प्रतिशत इंडोफिल एम 45 या 2 ग्राम ट्राईकोडर्मा हाजिॅएनम प्रति लिटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें तथा 2 मि. लि. प्रति लिटर पानी के हिसाब से मेलाथीयोन या एण्डोसल्फान का छिडकाव समय-समय पर करते रहें|
  • जब पौधे 8 – 10 सें.मी. ऊँचे हो जायें तो 0.3 प्रतिशत यूरिया का छिडकाव करे. ताकि बढवार अच्छी हो |
  • खरपतवार का नियंत्रण हल्की निराई – गुडाई से प्रति सप्ताह करें तथा अवांछनीय पौधे भी निकाल दें |
  • 4 – 6 सप्ताह आयु वाले पौधे 12 – 15 से.मी. ऊँचे तथा रोपाई योग्य हो जाते हैं |
  • रोपाई से 3-4 दिन पूर्व सिंचाई रोक दें तथा उखाड़ने से एक घंटा पहले हलकी सिंचाई करें ऐसा करने से जड़ें नहीं टूटँगीं |
  • स्वस्थ पौध का रोपण सांयकाल में ही करें तथा हलकी सिंचाई करें |
  • एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पौध तैयार करने के लिए विभिन्न फसलों की बीज मात्रा व क्यारियों का आकार (वर्ग मी.) निम्नवत होगा :-

फसल

क्यारियां

बीज की मात्रा प्रति क्यारी (ग्रा.)

टमाटर

10

35-40

बैंगन

15

35-40

शिमला मिर्च

12

115-120

मिर्च

12

125-150

फूल गोभी अगेती

मध्यम व

पछेती

10

10

10

60-70

40-50

35-40

ब्रोंकली

10

50-60

बंदगोभी

10

50-60

चाइनीज़ गोभी

10

60-75

गांठ गोभी

20

50-60

लैटट्यूस

10

40-50

प्याज

50

175-200

Posts

दूध का बुखारदुग्ध ज्वर, या हाइपोकैल्सीमिया, कैल्शियम की कमी है। इस बीमारी का क्लिनिकल और सबक्लिनिकल रूप होता है और यह तब प्रभावित करता है जब गायें सबसे अधिक असुरक्षित होती हैं – संक्रमण अवधि के दौरान..Click Hereगलघोटू रोग के लक्षण बचाव एवं निदानगलघोटू (Hemorrhagic Septicemia ) एक घातक संक्रामक बीमारी है जो मुख्यत: गाय भैंस में मानसून के मौसम के दौरान होती है साधारण भाषा में गलघोटू रोग “घुरखा” , ” घोटुआ ” , ” डहका ” आदि के नाम से जाना जाता है…Click Here खुरपका मुँहपका रोगखुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है, खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसान दायक होती है…Click Here
Previous slide
Next slide

Read More

चाय की फसल

Table Of Content

  • चाय का परिचय
  • चाय की खेती हेतु मृदा, जलवायु एवं तापमान कैसा होना चाहिए
  • जानें चाय की उन्नत किस्में कौन-कौन सी हैं
  • चाय कितने तरह की होती है
  • चाय की खेती के लिए भूमि की तैयारी एवं खाद
  • चाय के पौधों को प्रभावित करने वाले रोग और उनका नियंत्रण कैसे करें
  • चाय की खेती से कितनी आमदनी होती है

Search

चाय का परिचय

भारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है दरअसल साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती की जाती है। इससे पूर्व चाय की खेती सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों में ही की जाती थी लेकिन अब यह पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर मैदानी इलाकों तक पहुंच चुकी है। दुनिया में भारत चाय उत्पादन के संदर्भ में दूसरे स्थान पर है। विश्व की लगभग 27 फीसद चाय का उत्पादन भारत के अंदर ही किया जाता है इसके साथ ही 11 फीसद चाय उपभोग के साथ भारत सबसे बड़ा चाय का उपभोगकर्ता भी है। चाय को पेय पदार्थ के तौर पर उपभोग में लाया जाता है अगर चाय का सेवन सीमित रूप में करते है तो आपको इससे विभिन्न लाभ मिलते हैं।

भारत में चाय का सर्वाधिक सेवन किया जाता है। विश्व में भी जल के उपरांत यदि किसी पेय पदार्थ का सबसे ज्यादा उपयोग किया जाता है उसका नाम चाय है। चाय में कैफीन भी काफी ज्यादा मात्रा में विघमान रहती है। चाय प्रमुख तौर पर काले रंग में पाई जाती है जिसे पौधों और पत्तियों से तैयार किया जाता है। गर्म जलवायु में चाय के पौधे अच्छे से प्रगति करते है। यदि आप भी चाय की खेती करना चाहते हैं तो आइए हम इस लेख में आपको चाय की खेती से जुड़ी अहम जानकारी देंगे।

चाय की खेती हेतु मृदा, जलवायु एवं तापमान कैसा होना चाहिए

चाय की खेती करने के लिए हल्की अम्लीय जमीन की जरूरत होती है। इसकी खेती के लिए बेहतर जल निकासी वाली भूमि होना अति आवश्यक है क्योंकि जलभराव वाली जगहों पर इसके पौधे काफी शीघ्रता से नष्ट हो जाते हैं । चाय की खेती अधिकांश पहाड़ी इलाकों में की जाती है। चाय की खेती हेतु जमीन का P.H. मान 5.4 से 6 के बीच रहना चाहिए।

चाय की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु को उपयुक्त माना जाता है। चाय के पौधों को गर्मी के साथ-साथ वर्षा की भी जरुरत पड़ती है। शुष्क और गर्म जलवायु में इसके पौधे अच्छे से विकास करते हैं। इसके अतिरिक्त छायादार स्थानों पर भी इसके पौधों को विकास करने में सहजता होती है। अचानक से होने वाला जलवायु परिवर्तन फसल के लिए नुकसानदायक होता है। इसके पौधों को शुरुआत में सामान्य तापमान की जरूरत पड़ती है। चाय के पौधों को विकास करने के लिए 20 से 30 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है। चाय के पौधे कम से कम 15 डिग्री और ज्यादा से ज्यादा 45 डिग्री तापमान ही झेल सकते हैं।

जानें चाय की उन्नत किस्में कौन-कौन सी हैं

चीनी जात चाय

चाय की इस किस्म में पौधों का आकार झाड़ीनुमा होता है जिसमें निकलने वाली पत्तियां चिकनी और सीधी होती हैं । इसके पौधों पर बीज काफी शीघ्रता से निकल आते हैं और इसमें चीनी टैग की खुशबू विघमान होती है। इसकी पत्तियों को तोड़ने के दौरान अगर अच्छी पत्तियों का चयन किया जाता है तो चाय भी उच्च गुणवत्ता वाली अर्जित होती है।

असमी जात चाय

चाय की यह प्रजाति विश्व में सबसे बेहतरीन मानी जाती है। इसके पौधों पर निकलने वाली पत्तियों का रंग थोड़ा हरा होता है जिसमें पत्तियां चमकदार एवं मुलायम होती हैं। इस प्रजाति के पौधों को फिर से रोपण करने के लिए भी उपयोग में लिया जा सकता है ।

व्हाइट पिओनी चाय

चाय की यह व्हाइट पिओनी प्रजाति सर्वाधिक चीन में उत्पादित की जाती है । इस प्रजाति के पौधों पर निकलने वाली पत्तियां कोमल एवं बड्स के जरिए से तैयार की जाती हैं साथ ही चाय में हल्का कड़कपन भी पाया जाता है। इसको जल में डालने पर इसका रंग हल्का हो जाता है।

सिल्वर निडल व्हाइट चाय

सिल्वर निडल व्हाइट प्रजाति की चाय को कलियों के जरिए से तैयार किया जाता है। इस प्रजाति की कलियां चहुं ओर से रोये से ढक जाती हैं। इसके बीज पानी में डालने पर हल्के रंग के पड़ जाते हैं। सिल्वर निडल व्हाइट किस्म का स्वाद मीठा एवं ताजगी वाला होता है।

चाय कितने तरह की होती है

चाय की उन्नत प्रजातियों से चाय प्रमुख तौर पर काली, सफेद और हरे रंग की अर्जित हो जाती है। इसकी पत्तियों, शाखाओं एवं कोमल हिस्सों को प्रोसेसिंग के जरिए से तैयार किया जाता है।

सफेद चाय white tea

सफेद चाय को तैयार करने के लिए पौधों की ताजा एवं कोमल पत्तियों को उपयोग किया जाता है। इस प्रकार की चाय का स्वाद मीठा होता है। इसमें एंटी-ऑक्सिडेंट की मात्रा ज्यादा और कैफीन की मात्रा काफी कम पाई जाती है।

हरी चाय हरी चाय

हरी चाय की पत्तियों से विभिन्न प्रकार की चाय बनाई जाती है। इसके पौधों में निकलने वाली कच्ची पत्तियों से हरी चाय को तैयार करते है। इस चाय में एंटी-ऑक्सिडेंट की मात्रा सर्वाधिक होती है।

काली या आम चाय हरी चाय

यह एक साधारण चाय होती है, जो कि प्रमुख तौर पर हर घर में मौजूद होती हैं। इसके दानों को विभिन्न तरह की चाय को बनाने हेतु इस्तेमाल में लाया जाता है परंतु सामान्य तौर पर इसको साधारण चाय के लिए उपयोग में लाते हैं। इस प्रजाति की चाय को तैयार करने के लिए पत्तियों को तोड़के कर्ल किया जाता है जिससे दानेदार बीज भी मिल जाते हैं।

चाय की खेती के लिए भूमि की तैयारी एवं खाद

चाय के पौधे एक बार तैयार हो जाने के पश्चात विभिन्न सालों तक पैदावार देते हैं इसलिए इसके खेत को बेहतर ढ़ंग से तैयार कर लिया जाता है। भारत में इसका उत्पादन अधिकांश पर्वतीय इलाकों में ढलान वाली भूमि में किया जाता है इसके लिए भूमि में गड्डों को तैयार कर लिया जाता है यह गड्डे पंक्तिबद्ध ढ़ंग से दो से तीन फीट का फासला रखते हुए तैयार किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त पंक्तियों के बीच भी एक से डेढ़ मीटर का फासला रखा जाता है।

इसके उपरांत तैयार गड्डों में जैविक खाद के तौर पर 15 KG पुरानी गोबर की खाद व रासायनिक खाद स्वरूप 90 KG पोटाश, 90 KG नाइट्रोजन और 90 KG सुपर फास्फेट की मात्रा को मृदा में मिश्रित कर प्रति हेक्टेयर में तैयार गड्डो में भर दिया जाता है। यह समस्त गड्डे पौध रोपाई से एक महीने पूर्व तैयार कर लिए जाते हैं इसके पश्चात भी इस खाद को पौधों की कटाई के चलते साल में तीन बार देना पड़ता है।

चाय के पौधों को प्रभावित करने वाले रोग और उनका नियंत्रण कैसे करें

बतादें कि अन्य फसलों की भांति ही चाय के पौधों में भी विभिन्न प्रकार के रोग लग जाते है जो पौधों पर आक्रमण करके बर्बाद कर देते हैं। अगर इन रोगों का नियंत्रण समयानुसार नहीं किया जाता है तो उत्पादन काफी प्रभावित होता है। इसके पौधों में मूल विगलन, चारकोल विगलन, गुलाबी रोग, भूरा मूल विगलन रोग, फफोला अंगमारी, अंखुवा चित्ती, काला मूल विगलन, भूरी अंगमारी, शैवाल, काला विगलन कीट और शीर्षरम्भी क्षय जैसे अनेक रोग दिखाई पड़ जाते हैं जो कि चाय के उत्पादन को बेहद प्रभावित करते हैं। इन रोगो से पौधों का संरक्षण करने हेतु रासायनिक कीटनाशक का छिड़काव समुचित मात्रा में किया जाता है।

चाय की खेती से कितनी आमदनी होती है

चाय के पौधे रोपाई के एक साल पश्चात पत्तियों की कटाई के लिए तैयार हो जाते है इसके उपरांत पत्तियों की तुड़ाई को एक वर्ष में तीन बार किया जा सकता है। बतादें कि इसकी प्रथम तुड़ाई मार्च के महीने में की जाती है वहीं अतिरिक्त तुड़ाई को तीन माह के समयांतराल में करना होता है। चाय की विभिन्न तरह की उन्नत प्रजातियों से प्रति हेक्टेयर 600 से 800 KG की पैदावार हांसिल हो जाती है। बाजार में चाय का भाव बेहद अच्छा होता है जिससे किसान भाई चाय की एक साल की फसल से डेढ़ से दो लाख तक की आमदनी सहजता से कर सकते हैं।

Posts

खुरपका मुँहपका रोगखुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसानदायक होती है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु से होता है यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलने वाला रोग है तथा कुछ समय में एक झुंड या पूरे गाँव के अधिकतर पशुओं को संक्रामित कर देता है…Click Hereथनैला रोगथनैला रोग (Garget) दुधारू पशुओं में होने वाली एक बीमारी है। यह बीमारी मुख्यतः गाय, भैंस,भेड़ ,बकरी सुअर आदि में होती है। जिसमे प्रभावित पशुओं के थन गर्म हो जाते है एवं सूजन बढ़ जाती है । शारीरिक तापमान बढ़ जाता है । दूध देने की क्षमता कम हो जाती है । जानवर खाना पीना बंद कर देता है …..Click Here दूध का बुखारदुग्ध ज्वर तब उत्पन्न होता है जब गायें ब्याने के समय पर्याप्त कैल्शियम एकत्र करने में असमर्थ होती हैं। इस पृष्ठ का उद्देश्य डेयरी किसानों के लिए (उप)नैदानिक ​​दूध बुखार को नियंत्रित करने की चुनौती की बेहतर समझ प्रदान करना है। निदान और सलाह के लिए हमेशा अपने पशुचिकित्सक से परामर्श लें…Click Here
Previous slide
Next slide

Read More

घर में उगने वाली सब्जियां और उनके तरिके

Table Of Content

  • परिचय
  • टमाटर
  • बीन्स
  • बैंगन
  • प्याज
  • पत्ता गोभी

Search

परिचय
टमाटर
बीन्स
बैंगन
प्याज
परिचय

आप अपने होम गार्डन या टेरिस गार्डन के गमलों में आगे बताई गई सब्जियां आसानी से लगा सकते हैं।
आइये जानते हैं, गमले या ग्रो बैग में उगने वाली सब्जियां कौन-कौन सी हैं तथा गमले में उगाई जाने वाली वेजिटेबल्स के नाम क्या हैं :-

  1. टमाटर (Tomato)
  2. बीन्स (Beans)
  3. बैंगन (Eggplant)
  4. सलाद पत्ता (Lettuce)
  5. प्याज (Onion)
  6. मिर्च (Chili)
  7. मूली (Radish)
  8. पालक (spinach)
  9. भिन्डी (okra)
  10. पत्ता गोभी (cabbage)

टमाटर

 

वानस्पतिक नाम – सोलनम लाइकोपर्सिकम (Solanum Lycopersicum)

टमाटर गमले में आसानी से उगाई जाने वाली सब्जी है, जिसे लोग कच्चा या पका दोनों रूपों में खाना पसंद करते हैं। घर पर लगाने के लिए आपको टमाटर की कुछ बौनी अर्थात छोटे पौधे वाली किस्मों को चुनना होगा, जो कि छोटे पॉट में ठीक तरह से उग जाएं। टमाटर के पौधे को पूर्ण सूर्य प्रकाश में, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में लगाना चाहिए। इस पौधे को अच्छी तरह उगने के लिए नियमित रूप से पानी तथा खाद दें।

गमले का आकार :- 

  • 12 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

टमाटर की वैरायटी :-

पॉट या गमलों में आसानी से उगने वाली टमाटर की कुछ किस्में निम्न हैं :-

  • CHERRY TOMATO
  • TOMATO PLUM
  • GRAPES TOMATO
  • HEIRLOOM TOMATO
  • TOMATO PEAR

बीन्स

 

वानस्पतिक नाम – फेजोलस वल्गेरिस (Phaseolus Vulgaris)

बीन्स गमले में उगाई जाने वाली सब्जियों में से एक है। बीन्स का पौधा बेल या लता के रूप में बढ़ता है, जिसको सहारे की आवश्यकता होती है, अतः आप पौधे को सहारे देने के लिए लकड़ी, क्रीपर नेट आदि का इस्तेमाल कर सकते हैं। घर पर बीन्स को शुरूआती बसंत या ठण्ड के मौसम में पूर्ण सूर्य प्रकाश में आसानी से लगाया जा सकता है। यह पौधे अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में नाइट्रोजन युक्त खाद और नियमित रूप से पानी देने पर ठीक तरह से उगते हैं।

गमले का आकार :-

कम से कम 15 इंच चौड़ाई और ऊंचाई वाला गमला

बीन्स की प्रमुख किस्में :- 

गमले में उगाई जाने वाली बीन्स की कुछ किस्में निम्न हैं :-

  • CLIMBING BEANS
  • POLE BEANS
  • FRENCH BEANS

बैंगन

 

वानस्पतिक नाम – सोलनम मेलोंगेना (Solanum Melongena)

ब्रिंजल या बैंगन, जिसे एगप्लांट (Eggplant) भी कहा जाता है, को पॉट में आसानी से ग्रो किया जा सकता है। इस पौधे की कई ऐसी किस्में हैं, जिनके पौधे आकार में बहुत बड़े और भारी हो सकते हैं, इसलिए पॉट में उगाने के लिए आपको कुछ ऐसी किस्मों को चुनना होगा, जो कि स्वादिष्ट, सुन्दर और पॉट में आसानी से उगने वाली हों। बैंगन के पौधे को वसंत ऋतु में, पूर्ण सूर्य प्रकाश में, समान रूप से नम तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में उगाया जा सकता है।

गमले का आकार :-

  • 12 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

बैंगन की किस्में :- 

गमलों में लगाने के लिए बैंगन की कुछ किस्में इस प्रकार हैं :-

  • GREEN BRINJAL
  • BRINJAL BLACK
  • LONG BRINJAL
  • BRINJAL WHITE

प्याज

 

वानस्पतिक नाम- एलियम सेपा (Allium Cepa)

प्याज अधिकतर व्यंजनों में उपयोग की जाने वाली सब्जी है, जिसे कच्चा व पकाकर दोनों रूपों में खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। प्याज की कुछ किस्मों के बल्व (जड़) व कुछ किस्मों के पत्तों को खाने के रूप में उपयोग किया जाता हैं। ताज़ी और केमिकल फ्री स्वादिष्ट प्याज प्राप्त करने के लिए आप इसे गमले की मिट्टी में आसानी से लगा सकते हैं। प्याज को अतिरिक्त जल निकासी वाली गमले की मिट्टी में लगाएं तथा पौधों को नियमित रूप से पानी व कुछ समयांतराल में आवश्यकता अनुसार जैविक खाद देते रहें।

गमले का आकार :-

  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 24 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

प्याज की किस्में :-

प्याज (onion) के गमले में लगाई जाने वाली प्रमुख किस्में निम्न हैं जैसे :-

  • SPRING ONION
  • RED ONION
  • ONION YELLOW
  • WHITE ONION

पत्ता गोभी
पत्ता गोभी

 

वानस्पतिक नाम – ब्रैसिका ओलेरासिया (Brassica oleracea)

घर पर गमले में उगाई जाने वाली पत्ता गोभी प्रमुख सब्जियों में से एक है, जिसे कच्चा और पका दोनों रूपों में खाया जाता है। कम कैलोरी वाली इस सब्जी को ताज़ा खाने के लिए घर पर पॉट या ग्रो बैग की मिट्टी में लगाया जाता है। पत्ता गोभी वेजिटेबल को उचित मात्रा में पानी देकर, जैविक खाद युक्त गमले की रेत में आसानी से ग्रो किया जा सकता है।

गमले का आकार :-

  • 12 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

पत्ता गोभी की प्रमुख किस्में :-

गमले (pot) या ग्रो बैग में लगाई जाने वाली पत्ता गोभी की कुछ किस्में निम्न हैं जैसे :-

  • CHINESE CABBAGE
  • RED CABBAGE
  • SAVOY CABBAGE
  • CABBAGE HYBRID

Posts

एकीकृत बाग़वानी विकास मिशनएकीकृत बाग़वानी विकास मिशन फलों, सब्जियों, जड़ और कंद फसलों, मशरूम, मसालों,फूलों, सुगंधित पौधों, नारियल, काजू, कोको और बांस को कवर करने वाले बागवानी क्षेत्र….Click Here मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजनाबागवानी फसलों में प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाओं के कारण से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा सरकार द्वारा मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना की शुरुआत की गई है..Click Here चाय की फसलभारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है दरअसल साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती…Click Here
Previous slide
Next slide

Read More

सेब के लिए कटाई के बाद का प्रबंधन

Table Of Content

  • परिचय
  • सेब की कटाई के बाद का प्रबंधन

Search

परिचय

 

मैलस पुमिला सेब का अर्जित वैज्ञानिक नाम है लेकिन इंटीग्रेटेड टैक्सोनोमिक इंफॉर्मेशन सिस्टम के अनुसार इसे मालुस डोमेस्टिका, मालुस सिल्वेस्ट्रिस, मालुस कम्युनिस और पाइरस मालुस के नाम से भी जाना जाता है।

वैज्ञानिक रूप से मैलस पुमिला के नाम से जाना जाने वाला सेब अपनी कुरकुरी बनावट और मीठे-तीखे स्वाद के लिए पसंद किया जाता है। भारत में, सेब की खेती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है इसके अतिरिक्त इसे कुछ हद तक अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, पंजाब और सिक्किम में उगाया जाता है। ये बहुमुखी फल न केवल स्वादिष्ट हैं बल्कि पोषक तत्वों और आहार फाइबर से भी भरपूर हैं। हालाँकि बगीचे से हमारी मेज तक की यात्रा एक जटिल है, जिसमें कई चुनौतियाँ हैं जो सेब की ताजगी और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं यहीं पर फसल कटाई के बाद की तकनीक काम में आती है।

सेब की कटाई के बाद की तकनीक में तरीकों और प्रथाओं की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है जिसका उद्देश्य कटाई के बाद सेब की गुणवत्ता, स्वाद और शेल्फ जीवन को बनाए रखना है। जिस क्षण से ये फल पेड़ से तोड़े जाते हैं, वे एक यात्रा शुरू करते हैं जिसमें सावधानीपूर्वक रखरखाव, भंडारण और पैकेजिंग शामिल होती है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सेब उपभोक्ताओं तक अपनी अच्छी स्थिति में पहुंचे। यह महत्वपूर्ण क्षेत्र न केवल भोजन की बर्बादी को कम करता है,जिससे यह हमारी मेज पर साल भर पसंदीदा बन जाता है। इस लेख में, हम कटाई के बाद की तकनीकों की व्याख्या करेंगे जो इसे संभव बनाती हैं।


सेब की कटाई के बाद का प्रबंधन

उत्तम सेब प्राप्त करने के लिए फसल कटाई के बाद की सावधानीपूर्वक प्रक्रियाओं की एक श्रृंखला शामिल होती है। नीचे फसल कटाई के बाद के प्रबंधन के महत्वपूर्ण चरण बताए गए हैं, जो यह गारंटी देते हैं कि सेब ताजा दिखने में आकर्षक और बाजार में वितरण के लिए तैयार है ।

प्री-कूलिंग प्रक्रिया :-

कटाई के तुरंत बाद सेबों को प्री-कूलिंग प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें ताजे तोड़े गए सेबों को अच्छी तरह हवादार और तापमान नियंत्रित वातावरण में रखना शामिल है। यहां प्राथमिक लक्ष्य कटाई के दौरान फलों में जमा होने वाली अवशिष्ट गर्मी को हटाना है। सेब को समय से पहले पकने से रोकने और ताजगी बनाए रखने के लिए पर्याप्त पूर्व-शीतलन आवश्यक है इसके अलावा यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि ग्रेडिंग, रैपिंग और डिब्बों में पैक करने के अगले चरण पर आगे बढ़ने से पहले सेब की सतहें नमी मुक्त रहें।
ग्रेडिंग :- 
सेब को उनके आकार, रूप और समग्र गुणवत्ता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। ग्रेडिंग प्रक्रिया में छह अलग-अलग आकार श्रेणियों में मैन्युअल रूप से छंटाई शामिल है। इसके अतिरिक्त सेबों का मूल्यांकन उनके रंग, आकार, गुणवत्ता और सामान्य उपस्थिति के आधार पर किया जाता है, जिससे तीन या अधिक गुणवत्ता ग्रेड प्राप्त होते हैं। इन गुणवत्ता ग्रेडों को AAA, AA, A; A,B, C या अतिरिक्त फैंसी, फैंसी क्लास।
भंडारण :-
सेब कई अन्य फलों की तुलना में अपने विस्तारित शेल्फ जीवन के लिए प्रसिद्ध है । कटाई के बाद उन्हें चार से आठ महीने तक की लंबी अवधि के लिए संग्रहीत किया जा सकता है । कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं सेब की ताजगी को संरक्षित करने के लिए इष्टतम वातावरण प्रदान करती हैं। इन भंडारण इकाइयों को विशिष्ट तापमान पर सावधानीपूर्वक बनाए रखा जाता है, आमतौर पर -1.1° से 0°C तक, आर्द्रता का स्तर 85-90% बनाए रखा जाता है। इस तरह की नियंत्रित स्थितियाँ पकने की प्रक्रिया में देरी करने, खराब होने से बचाने और यह सुनिश्चित करने में मदद करती हैं कि सेब लंबे समय तक बाजार के लिए तैयार रहें।
पैकिंग :-
सेबों के सुरक्षित परिवहन और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें आमतौर पर मजबूत लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता है। इन बक्सों में लगभग 10 या 20 किलोग्राम फल रखने की क्षमता है । इसके अतिरिक्त नालीदार फाइबर बोर्ड के डिब्बों का उपयोग पैकिंग उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है।

Posts

कपास की फसल में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीट एवं उनका प्रबंधनकपास संपूर्ण भारत के किसानों के लिए एक नकदी फसल मानी जाती है। इसकी खेती केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्वभर में की जाती है, लेकिन कपास के उत्पादन में भारत का स्थान सबसे पहले आता है। चूँकि कपास एक नकदी फसल है, इसलिए इसकी खेती किसानों की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है…Click Here कृषि उड़ान योजनाजैसे की आप लोग जानते है की ज्यादातर कृषि पर ही निर्भर रहते है ।कृषि ही उनकी आय का साधन होती है ।किसानो की फसल की पैदावार की अच्छी कीमत प्रदान करने के लिए ही सरकार ने इस योजना को शुरू किया गया है ।
इस योजना के ज़रिये किसानो की आय को दुगुना करना ।
PM Kisan Krishi Udaan Scheme 2023 के जरिए किसानों की उत्पादकों को सीधे बाजार तक पहुंचाने में उपयोग किया जाएगा…Click Here
किसान क्रेडिट कार्डकिसान क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी। किसानों की ऋण आवश्‍यकताओं (कृषि संबंधी खर्चों) की पूर्ति के लिये पर्याप्‍त एवं समय पर ऋण की सुविधा प्रदान करना, साथ ही आकस्‍मिक खर्चों के अलावा सहायक कार्यकलापों से संबंधित खर्चों की पूर्ति करना। यह ऋण सुविधा एक सरल कार्यविधि के माध्‍यम से यथा- आवश्‍यकता के आधार पर प्रदान की जाती हैClick Here
Previous slide
Next slide

Read More

हरियाणा में आलू के पौधे पर लगे टमाटर: चरखी दादरी का किसान खुद भी हैरान, कृषि विशेषज्ञ बोले- यह टमाटर नहीं आलू

Table Of Content

  • परिचय
  • कृषि विशेषज्ञ ने बताया पोटेटो

Search

परिचय
कृषि विशेषज्ञ ने बताया पोटेटो
परिचय

 

चरखी दादरी के रानीला बास गांव में आलू के पौधे पर ऊपर टमाटर और नीचे आलू की फसल उगी मिली।

हरियाणा के चरखी दादरी में हेरान कर दें ने  वाला मामला सामने आया है | खेत में आलू के पोधे पर नीचे आलू और ऊपर टमाटर उग आये हैं । जिसको भी पता लगा वो रानीला बास गांव के खेत को देखने  के लिए पहुंच रहा है। ठंड के चलते आलू के पौधों के पत्ते जलने शुरू हो चुके हैं, जिसके चलते किसान ने ऊपर से पौधों को काटकर वहां से हटाने व आलू की खुदाई करने के बारे में सोचा। जब किसान ने पौधों की कटाई शुरू की तो वह आलू के इन पौधों के ऊपर गुच्छों में टमाटर लगे देख हैरान हो गया। उसके बाद उसने दूसरे किसानों को बताया तो किसी को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। बाद में जब वह खेत पहुंचे और टमाटर तोड़कर उन्होंने स्वयं खाकर इसका स्वाद चखा तो उन्हें इस पर विश्वास हुआ। ग्रामीणों ने पौधों को बारिकी से देखा तो पौधों के नीचे आलू मौजूद हैं, जबकि ऊपर टमाटर लगे हुए है। किसान ने सब्जी में टमाटर डाला तो स्वाद भी बिल्कुल वैसा ही मिला। वहीं किसान ओमकार व रणबीर सिंह ने बताया कि उसने बीते साल भी आलू की खेती की थी, लेकिन इस प्रकार का नजारा देखने को नहीं मिला और सब कुछ सामान्य था। उसने करीब दो साल पहले पास के गांव से आलू का बीज लिया था और पिछले साल कुछ बीज तैयार करके आधा एकड़ में घर का बीज और दो एकड़ में बाजार से लाये बीज की रोपाई की थी। आधा एकड़ में आलू के अधिकांश पौधों पर टमाटर लगे हैं। उसने सब्जी में भी डालकर देखा तो टमाटर जैसा ही स्वाद मिला।  कृषि विशेषज्ञो का मानना है कि ये करिश्मा नहीं बल्कि टमाटर के बीज के साथ आलू को सर्वाइव करने का रिजल्ट है। 2010  मैं भिवानी के जुई इलाके में भी ऐसा मामला आ चूका है।

कृषि विशेषज्ञ ने बताया पोटेटो

कृषि विशेषज्ञ डा. चंद्रभान श्योराण से बात की तो उन्होंने बताया कि ये टोमेटो नहीं पोटेटो हैं। इसका आकार व स्वाद बिल्कुल टमाटर की तरह ही होता है या यू कहें कि ये एक किस्म से टमाटर ही होता है। डॉ. चंद्रभान ने बताया कि कई बार टमाटर के बीज आलू के साथ सर्वाइव कर जाते हैं। ऐसे में वे आलू से खुराक प्राप्त करते हैं और तना आलू का ही होता है. जबकि ऊपर फल टमाटर का होता है। पहले भी इस प्रकार की घटनाएं सामने आई हैं ।

Posts

Termite(दीमक)दीमक एक सामाजिक कीट है। दीमक हल्के पीले या भूरे रंग के कोमल कीट होते हैं। चींटी की जाति का एक छोटा कीड़ा जो समूह में रहता है और कागज़, लकड़ी, पौधों आदि को खा जाता है। इसको सफेद चींटी भी कहा जाता है | दुनिया भर में लगभग 2,750 से अधिक प्रजातियां है, यह उष्णकटिबंधीय व शीतोष्ण क्षेत्रों सबसे ज्यादा पाये जाते है…Click Here Mealybug (मिलीबग)मिलीबाग Pseudococcidae फैमिली का insect है , यह गरम और नमी वाले जलवायु में पाया जाता है । मिलीबग की 200 से भी ज्यादा प्रजातियाँ पायी जाती हैं पर ज़्यादातर एक जैसी ही दिखती हैं । मादा मिलीबग और नर मिलीबग की बनावट में पर्याप्त अंतर पाया जाता है Click Here कद्दू (Pumpkin)कद्दू की खेती को करने के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है | कद्दू की फसल की अच्छी वृद्धि के लिए गर्म और आद्र दोनों ही जलवायु को उपयुक्त माना जाता है | इसकी फसल में अधिक पानी की आवश्यकता होती है, किन्तु अधिक जलभराव वाली भूमी ..Click Here
Previous slide
Next slide

Read More