घर पर परवल का पौधा कैसे उगाएं(How to grow Parwal plant at home)

Table Of Content

  • परवल के पौधे के अन्य नाम
  • परवल का पौधा उगाने सम्बंधित जानकारी
  • परवल प्लांट उगाने का सही समय क्या है?
  • परवल का पौधा उगाने के लिए आवश्यक सामग्री
  • घर पर परवल का पौधा उगाने के लिए गमला
  • परवल का पौधा उगाने के लिए मिट्टी
  • घर पर परवल का पौधा लगाने की विधियाँ
  • परवल के बीज लगाने की विधि
  • कटिंग से परवल का पौधा कैसे लगाएं
  • परवल की कटिंग लगाने की विधि
  • रूट सकर्स द्वारा परवल कैसे उगाएं
  • परवल के पौधे की देखभाल कैसे करें
  • बेल के लिए सहारा
  • कीट व रोग
  • परवल के फल कब और कैसे तोड़ें

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परवल (Pointer gaurd), जिसका वानस्पतिक नाम ट्राइकोसैंथेस डायोइका (Trichosanthes dioica) है, यह कुकुरबिटेसी परिवार (Cucurbitaceae) का बारहमासी पौधा हैं। पॉइंटेड लौकी या परवल एक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय बेल वाली सब्जी का पौधा है, जिसे बढ़ने के लिए सहारे की आवश्यकता होती है। परमल, परवल, पॉइंटेड लौकी, परोरा, पोटोल आदि कई नामों वाली यह सब्जी, पोषकतत्वों और खनिजों से भरपूर होने के कारण और ताज़ा तथा स्वादिष्ट खाने के लिए लोग इसे अपने घरों में उगाना पसंद करते हैं। यदि आप भी इस सब्जी को अपने घर या गार्डन में उगाना चाहते हैं, तो  इस आर्टिकल में आप जानेंगे, कि घर पर कटिंग से या बीज से परवल कैसे उगाएं, परमल की बेल को उगाने का सही समय और परवल के पौधे की देखभाल कैसे करें? घर पर परवल के पौधे उगाने की जानकारी पाने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें।

परवल के पौधे के अन्य नाम

बेल वाली सब्जी परवल को पोटोल (Potol), परोरा (Parora), परमल, Kambupudalai आदि नामों से भी जाना जाता है।

परवल का पौधा उगाने सम्बंधित जानकारी

  • वानस्पतिक नाम – ट्राइकोसैंथेस डायोइका (Trichosanthes dioica)
  • फैमिली – कुकुरबिटेसी परिवार (Cucurbitaceae)
  • बीज लगाने का समय – फरवरी से सितंबर तापमान – 20-35 डिग्री सेल्सियस
  • मिट्टी – 5 से 6.7 ph वाली पॉट साइज़ – 15 इंच की लम्बाई और चौड़ाई वाला पॉट
  • सूर्य का प्रकाश – पूर्ण सूर्य प्रकाश
  • पौधे का प्रकार – बेल वाला बारहमासी पौधा
  • हार्वेस्टिंग टाइम – कटिंग से लगाने पर 4-5 महीने और बीज से उगाने पर 5 महीने से अधिक का समय

परवल प्लांट उगाने का सही समय क्या है?

यदि आप जानना चाहते हैं, परवल कब लगाएं? तो हम आपको बता दें, कि परवल एक मध्यम गर्म और आर्द्र जलवायु वाला पौधा है, जो कि ठंडे तापमान में ग्रो नहीं कर पाता है। परवल के पौधे के बीज वसंत से गर्मी के मौसम अर्थात फरवरी-जुलाई के महीने के बीच लगाने का समय सबसे अच्छा होता है। आप परवल की कटिंग को फरवरी से सितंबर माह के बीच किसी भी समय अपने होम गार्डन में लगा सकते हैं।

परवल का पौधा उगाने के लिए आवश्यक सामग्री

घर पर परवल का पौधा उगाने के लिए आपको निम्न चीजों के आवश्यकता होगी:-

  • परवल के बीज या परवल के पौधे की कटिंग
  • सीडलिंग ट्रे या स्माल पॉट
  • ग्रो बैग
  • पॉटिंग मिक्स
  • वॉटर कैन
  • जैविक खाद या गोबर की खाद
  • बागवानी उपकरण

घर पर परवल का पौधा उगाने के लिए गमला

पॉइंटेड लौकी या परवल का पौधा बेल के रूप में बढ़ता है, इसलिए इस पौधे की लम्बाई अधिक होती है। घर पर इस पौधे को उगाने के लिए आपको एक ऐसे पॉट या ग्रो बैग की आवश्यकता होगी, जो पौधे को ठीक तरह सहारा दे सके। परवल के पौधे पर्याप्त जल निकासी वाले, 15 इंच चौड़ाई और गहराई वाले पॉट या ग्रो बैग में अच्छी तरह से उग सकते हैं।

इस वेजिटेबल प्लांट को उगाने के लिए आप निम्न साइज़ के ग्रो बैग चुन सकते हैं;-

  • 15 x 15 इंच (W x H)
  • 18 x 15 इंच (W x H)
  • 18 x 15 इंच (W x H)
  • 24 x 15 इंच (W x H)
  • 30 x 15 इंच (W x H)

परवल का पौधा उगाने के लिए मिट्टी

परोरा सब्जी प्लांट या परवल की बेल को उगाने के लिए अधिक उपजाऊ, खादयुक्त रेतीली दोमट मिट्टी, जिसका पीएच स्तर 5.5 से 6.7 ph के बीच हो सबसे अच्छी होती है। यदि आप पॉट या कंटेनर में परवल के पौधे उगा रहे हैं तो अच्छी जल निकासी वाली कार्बनिक पदार्थों से युक्त ढीली मिट्टी का उपयोग करें।

घर पर परवल का पौधा लगाने की विधियाँ

परवल के पौधे उगाने की प्रमुख विधियाँ निम्न है:-

  • बीज द्वारा
  • कटिंग द्वारा
  • रूट सकर्स द्वारा

परवल के बीज लगाने की विधि

यदि आप घर पर बीज से परवल का पौधा उगाना चाहते हैं तो हम आपको बतायेंगे कि परवल के पौधे को बीज से कैसे उगाएं गमले में परवल के बीज लगाने की विधि निम्न है:-

  • सबसे पहले परवल की अच्छी किस्म के बीजों को चुनें।
  • अब चुनें हुए गमले को कार्बनिक पदार्थों से युक्त मिट्टी से भरें, मिट्टी भरते समय ध्यान रहे कि गमला ऊपर से 3-4 इंच खाली हो।
  • गमले के बीचों बीच परवल के बीजों को 1 इंच की गहराई पर बोयें।
  • बीज लगाने के बाद गमले में वॉटर पंप या वॉटरिंग कैन की मदद से पानी डालें।
  • बीज लगे हुए गमले को धूप वाले स्थान पर रखें।
  • परवल के बीज को अंकुरित होने के लिए कम से कम 20 डिग्री सेल्सियस या इससे अधिक  तापमान की आवश्यकता होती है, उचित तापमान मिलने पर 10-14 दिनों में  बीज अंकुरित हो जायेगा।
  • बीज अंकुरण के पश्चात जब पौधे 4-6 बड़े हो जाएँ, तब इन परवल के पौधों को एक दूसरे के बीज लगभग 50 सेमी की दूरी बनाते हुए प्रत्यारोपण कर दें। ध्यान रहे परवल के पौधे अधिक फैलते हैं, इसलिए पौधों को अधिक दूर-दूर लगाएं और बेल को बढ़ने के लिए सहारा दें।

कटिंग से परवल का पौधा कैसे लगाएं

परवल के पौधे को कटिंग से उगाना काफी आसान होता है। इस विधि में सबसे पहले नर्सरी से या 1-2 साल पुराने परवल के पौधे की कटिंग प्राप्त करके उसे किसी पॉट या गमले में लगाया जाता है।

परवल की कटिंग लगाने की विधि

होम गार्डन में परवल के पौधे को कटिंग से उगाने की विधि निम्न प्रकार है :-

  • सबसे पहले कम से कम 1 साल पुरानी परमल की परिपक्व बेल से 1-2 फीट की कटिंग काट लें या फिर नर्सरी से कटिंग प्राप्त करें।
  • कटिंग लेते समय यह सुनिश्चित करें कि कटिंग में कम से कम 8-10 लीफ नोड हों।
  • परवल की कटिंग के निचले हिस्से से पत्तियों को हटा दें।
  • अब चुने हुए गमले या पॉट में पॉटिंग मिक्स या तैयार की हुई मिट्टी भरें।
  • कटिंग लगाने से पहले यह सुनिश्चित करें, कि मिट्टी नमी युक्त हो।
  • गमले के बीचों बीच कटिंग की 3-4 नोड को मिट्टी के अन्दर लगभग 2 इंच गहरा दबाएँ। या गमले में कटिंग हो रखकर, ऊपर से 2 इंच मिट्टी से ढक दें।
  • इसके बाद गमले में वाटर पंप की मदद से पानी डालें।
  • कटिंग लगे हुए गमले को धूप वाले स्थान पर रखें।
  • लगभग 1-2 सप्ताह में आपकी कटिंग में जड़ें विकसित हो जायेंगी, और परवल की बेल बढ़ने लगेगी।

रूट सकर्स द्वारा परवल कैसे उगाएं

परवल के पौधे में रूट सकर्स पाए जाते हैं जिनके द्वारा भी इस बेल वाले पौधे को लगाया जा सकता है। इस विधि से परवल के पौधे को लगाने के लिए शुरूआती वसंत के समय पुराने पौधे से रूट सकर्स को खोदकर मिट्टी से बाहर निकालें फिर उसे किसी गमले या ग्रो बैग में लगाएं और पर्याप्त पानी देकर उस पौधे की देखभाल करें।

परवल के पौधे की देखभाल कैसे करें

यदि आपने घर पर बेल वाले परवल के पौधे को उगाया है तो उस बेल को पूरी तरह विकसित होने और उसमें फल लगने के लिए आपको उसकी देखभाल करनी होगी। परवल के पौधे की देखभाल करने के तरीके निम्न हैं:-

  1. पानी :–परवल के पौधे को गर्मियों और शुष्क मौसम के दौरान नियमित रूप से पानी दें। हालांकि यह पौधा कुछ हद तक सूखे को भी सहन कर सकता है। सर्दियों के मौसम में परवल के पौधे को पानी की आवश्यकता कम होती है लेकिन जब पौधे में फूल और फल आने लगे तो मिट्टी को हर दूसरे दिन पानी दें। परवल के पौधे की मिट्टी को समान रूप से नम बनाएं रखें लेकिन मिट्टी में जलभराव न होने दें।
  2. सूर्य का प्रकाश :–  परवल मध्यम गर्म और शुष्क वातावरण वाला पौधा है जो पूर्ण सूर्य के प्रकाश में तेजी से बढ़ता है हालांकि यह पौधा आंशिक छाया में भी वृद्धि कर सकता हैं लेकिन उस स्थिति में पौधे पर फल नहीं लगते। परवल के पौधे की अच्छी वृद्धि और अधिक फल-फूल लाने के लिए 5-6 घंटे की धूप आवश्यक होती है।
  3. तापमान :–परवल का पौधा उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण जलवायु को पसंद करता है। इस पौधे को अच्छी तरह से बढ़ने और अधिक मात्रा में फल लगने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 20-35 डिग्री सेल्सियस है। परवल का पौधा कम या ठंडे तापमान को सहन नहीं कर पाता है, इसलिए ठण्ड के समय इस बेल वाले पौधे की प्रूनिंग की जानी चाहिए, जिससे पौधा ठण्ड के बाद दोबारा वृद्धि कर पाए।
  4. उर्वरक :–परवल का पौधा लगाते समय मिट्टी में गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट मिलाएं यदि परमल के पौधे में अच्छी तरह से वृद्धि नहीं हो रही है या आपका पौधा कमजोर है तो आप इस पौधे की मिट्टी में नियमित समयांतरल से जैविक खाद डाल सकते हैं जिससे पौधे में अधिक फल भी लगेंगे। परवल के पौधे फूल आने और अधिक फल लगने के लिए आप पोटाश, बोनमील, मस्टर्ड केक जैसे फास्फोरस रिच ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर डाल सकते हैं।

बेल के लिए सहारा

परवल का पौधा बेल के रूप में विकसित होता है और इस पौधे को जमीन से उचित ऊंचाई पर रखने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता होती है क्योंकि यदि पत्तियां मिट्टी को स्पर्श करेंगीं तो पौधे में फंगस या कवक जैसे संक्रमण रोग हो सकते हैं इसलिए इस पौधे को अच्छी तरह बढ़ने के लिए रस्सी, क्रीपर नेट, ट्रेली या बांस का सहारा लेना होता है।

कीट व रोग

दो सबसे प्रमुख कीट जो परवल के पौधे को प्रभावित करते हैं :-

  • ब्लिस्टर बीटल (Blister Beetle)
  • रेड बिटर बीटल (Red Bitter Beetle)

परवल के पौधे में होने वाले रोग :-

  • डाउनी मिल्ड्यू (Downy Mildew)
  • मोज़ेक वायरस (Mosaic Virus)
  • रूट-नॉट निमेटोड (Root-Knot Nematode)
  • फ्रूट रॉट (Fruit Rot)

इन कीटों और रोगों से छुटकारा पाने के लिए, परवल के पौधे पर जैविक कीटनाशक तेल या नीम के तेल का छिड़काव करें और पौधे की नियमित रूप से जाँच करें। पानी देते समय परवल के पौधे को गीला न करें।

परवल के फल कब और कैसे तोड़ें

यदि आपने परवल का पौधा कटिंग से लगाया है तो इस पौधे में फल लगने में लगभग 3 से 4 महीने अर्थात 90-120 दिनों का समय लग सकता है और यदि आपने बीज से परवल का पौधा उगाया है तो इस पौधे में फल लगने में 5 महीने से भी अधिक समय लग सकता है। यदि आपने वसंत के मौसम अर्थात फरवरी के महीने में इस पौधे को लगाया है तो मई-जून के समय आप इस पौधे से परमल के फलों की हार्वेस्टिंग कर सकते हैं। परवल मध्यम गर्म तापमान वाला पौधा है, जिसमें बरसात के मौसम में अधिक फल आते हैं। परवल के फल को पूरी तरह पकने से पहले काट लें अन्यथा उनका स्वाद खराब हो सकता है।

परवल के पौधे में सफेद धारियों वाले 2-4 इंच छोटे या लंबे हरे फल होते हैं जो मोटे या गोल होते हैं और जाली पर उगते हैं। हार्वेस्टिंग के बाद परवल के फल ज्यादा देर तक न रखें नहीं तो खराब हो सकते हैं। आप इन्हें फ्रिज में 2-3 दिन तक स्टोर करके रख सकते हैं।

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सहजन का पौधा की जानकारी: इतिहास, पहचान, फायदे, नुकसान

Table Of Content

  • सहजन क्या है ?
  • सहजन का इतिहास
  • सहजन की पहचान
  • सहजन के प्रकार 
  • पुरुषों के लिए सहजन (मोरिंगा) के फायदे
  • सहजन का पौधा कैसे लगाये ?
  • मोरिंगा के पौधे की कटाई कैसे करें
  • सहजन के पेड़ के फायदे
  • सहजन पेड़ के नुकसान (Disadvantages Of Moringa Tree)
  • सहजन का औषधि में उपयोग
  • बीज से सहजन (मोरिंगा ) का पेड़ कैसे उगाएं?
  • सहजन के पेड़ के मुख्य तथ्य
  • सहजन के पेड़ की देखभाल युक्तियाँ (Moringa Tree Care Tips)
  • सहजन का पौधा कहाँ उगता है (Where Does The Moringa Plant Grow)
  • सहजन से बने व्यंजन

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नमस्कार पाठकों ! क्या आपने सहजन के पौधे के बारे में सुना है ? यह एक ऐसा पौधा है जिसमें सेहत के लिए अनगिनत फायदे छुपे होते हैं। सहजन को ‘मोरिंगा’ या ‘ड्रमस्टिक’ भी कहा जाता है। इस पौधे के हर हिस्से का उपयोग हमारे खान-पान और औषधियों में किया जाता है। यहां हम आपको सहजन के पौधे की जानकारी देंगे जैसे कि इसके फायदे, इतिहास और अन्य रोचक तथ्य। आपको यह जानकार अच्छा लगेगा कि इस पौधे को नेचर का ‘फार्मेसी’ भी कहा जाता है। 

सहजन क्या है ?

सहजन एक प्रकार का पौधा है जो हमारे खान-पान और सेहत में बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसे ‘मोरिंगा’ या ‘ड्रमस्टिक’ नाम से भी जाना जाता है। सहजन का पौधा लगभग 10 मीटर तक ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां हरी-भरी और फलियां लंबी होती हैं। 

यह पौधा धूप में अच्छी तरह से उगता है और इसके हर हिस्से को खाने या औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। सहजन का तेल, पत्तियां, फूल और फलियां – सभी का उपयोग किया जाता है और इसमें सेहत के लिए कई फायदे होते हैं। इसलिए, सहजन को ‘नेचर की फार्मेसी’ कहा जाता है। इसके अलावा ये आसानी से भारत के अधिकांश भागों में पाया जाता है।

सहजन का इतिहास

सहजन, जिसे ‘मोरिंगा’ भी कहा जाता है, का इतिहास बहुत प्राचीन है। इसे विश्व भर में एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा माना जाता है अनुमान लगाया जाता है कि सहजन की खेती और इसका उपयोग प्राचीन समय से ही हुआ करता था।

वेदों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी सहजन का उल्लेख है। इसे भारत में औषधीय गुणों के लिए प्रयोग किया जाता था जैसे की त्वचा की समस्याओं, संक्रमण, और पाचन संबंधित समस्याओं के लिए।

भारत के अलावा अफ्रीका, अरब, और फिलीपींस में भी सहजन का पौधा उगाया जाता है और उसके फायदों का लाभ उठाया जाता है। आजकल वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से भी सहजन के अनेक औषधीय गुणों की पुष्टि हुई है।

सहजन के तेल, बीज, पत्तियों, और फलियों का उपयोग खाद्य और औषधीय प्रयोजनों के लिए होता है। इसके अलावा यह पौधा भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों में।

इस प्रकार सहजन अपने औषधीय गुणों और विविध उपयोग के लिए प्रसिद्ध है और इसका इतिहास हमें यह बताता है कि इस पौधे को कैसे प्रयोग में लाया गया और इसका महत्व क्या है।

सहजन की पहचान

सहजन जिसे वैज्ञानिक रूप में ‘मोरिंगा’ भी कहते हैं, एक विशेष प्रकार का पौधा है जिसे पहचानना काफी आसान है।

  • आकार और रंग: सहजन का पेड़ 10 से 12 फीट तक उंचा होता है। 
  • पत्तियाँ: इसकी पत्तियाँ हरी रंग की होती हैं। इसकी पत्तियाँ बारीक और छोटी होती हैं, जिसे ‘फेथर-लाइक’ भी कहा जाता है। ये पत्तियाँ एक खास पैटर्न में लगी होती हैं।
  • फूल: सहजन के फूल सफेद या सुनहरे रंग के होते हैं और वे छोटे गुच्छों में आते हैं।
  • फल: सहजन का फल लंबा और हरा होता है, जिसे ‘ड्रमस्टिक’ भी कहते हैं। यह फल खाद्य और औषधीय दोनों रूप में प्रयोग होता है।
  • बीज: सहजन के बीज बड़े और गोलाकार होते हैं। इन्हें तेल निकालने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
  • तना: सहजन का तना ठोस और मजबूत होता है।
  • जड़ें: इसकी जड़ें भी मजबूत होती हैं जो पौधे को सहारा प्रदान करती हैं।

सहजन का पौधा उसकी विशेषताओं, फल, फूल और पत्तियों की स्थिति से आसानी से पहचाना जा सकता है। यह पौधा अपने औषधीय गुणों के लिए भी प्रसिद्ध है।

सहजन के प्रकार 

सहजन एक आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है जिसे ‘मोरिंगा’ भी कहा जाता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है लेकिन इसकी खासियत है कि यह अलग-अलग प्रकार की जलवायु में भी उग सकता है। सहजन के कई प्रकार हैं जो उसके उपयोग, आकार और रंग के हिसाब से भिन्न होते हैं।

1. मोरिंगा ओलीफेरा (Moringa Oleifera):

यह सहजन का सबसे आम प्रकार है इसे ‘ड्रमस्टिक ट्री’ भी कहा जाता है। इसके पत्ते, फूल, फल और बीज सभी खाद्य और औषधीय उपयोग के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

2. मोरिंगा स्टेनोपेटला (Moringa Stenopetala):

इसे ‘आफ्रिकन मोरिंगा’ भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से अफ्रीका में पाया जाता है। इसके पत्ते भी खाद्य औषधीय उपयोग के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

3. मोरिंगा कोंसिग्ना (Moringa Concigna):

इसे ‘जंगली सहजन’ भी कहा जाता है। यह प्रमुख रूप से ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है।

4. मोरिंगा पेरिग्रिना (Moringa Peregrina):

इसका मुख्य उपयोग तेल के रूप में होता है। इस पौधे का तेल त्वचा और बालों के लिए भी उपयोगी होता है।

5. मोरिंगा हाइल्डेब्रांड्टीई (Moringa Hildebrandtii):

यह प्रकार भी मुख्य रूप से अफ्रीका में पाया जाता है और इसे भी औषधीय उपयोग में लिया जाता है।

सहजन का पौधा अब विश्व भर में अपने औषधीय और पौष्टिक गुणों के लिए प्रसिद्ध है। यह विटामिन, मिनरल और अन्य पौष्टिक तत्वों से भरपूर है। भारत में भी इसकी खेती की जाती है और इसके विभिन्न उपयोग हैं, जैसे की खाद्य, औषधीय और भी कई अन्य।

इस प्रकार सहजन न केवल अपने औषधीय गुणों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे खाद्य प्रणाली में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी विविधता और उपयोगिता ने इसे विश्वभर में लोकप्रिय बना दिया है।

पुरुषों के लिए सहजन (मोरिंगा) के फायदे

सामान्य ऊर्जा की वृद्धि मोरिंगा उन पुरुषों के लिए उपयोगी है जो अक्सर थकावट महसूस करते हैं। इसमें विटामिन, मिनरल और एमिनो एसिड होते हैं जो ऊर्जा को बढ़ावा देते हैं।

  1. मांसपेशीयों की मजबूती :- इसमें प्रोटीन और अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्व होते हैं, जो शारीरिक प्रश्रम में सहायक होते हैं और मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करते हैं।
  2. प्रतिरोधक क्षमता :- मोरिंगा इम्यून सिस्टम को मजबूती प्रदान करता है जिससे विभिन्न रोगों और संक्रमण से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
  3. हड्डियों की मजबूती :- मोरिंगा में कैल्शियम और फॉस्फोरस अधिक मात्रा में होते हैं, जो हड्डियों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
  4. सेक्स ड्राइव में सुधार :- कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि मोरिंगा टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के स्तर को बढ़ा सकता है, जिससे पुरुषों में सेक्स ड्राइव में सुधार होता है।
  5. स्ट्रेस और चिंता से राहत :- मोरिंगा तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है और मानसिक स्थिति को सुधारता है।
  6. डायबिटीज का प्रबंधन :- मोरिंगा रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे डायबिटीज के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

सहजन का पौधा कैसे लगाये ?

सहजन, जिसे मोरिंगा या ड्रमस्टिक भी कहा जाता है भारत में आम तौर पर उगाया जाता है और इसके अनेक फायदे होते हैं। सहजन का पौधा लगाने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करें:

  • जगह का चयन :- सहजन का पौधा अधिकतम धूप में अच्छी तरह से विकसित होता है। इसलिए ऐसी जगह चुनें जहाँ पौधे को प्रतिदिन 6-8 घंटे तक सीधी धूप मिल सके।
  • मिट्टी :- अच्छी नलीकरण वाली जलोद या मिट्टी में सहजन का पौधा अच्छी तरह से बढ़ता है। अत्यधिक बालूमय या चिपचिपी मिट्टी से बचें।
  • बीजों का चयन :- स्थानीय नर्सरी से अच्छे गुणवत्ता वाले बीज खरीदें। बीजों को पानी में 24 घंटे भिगोकर रखें।
  • रोपण :- भिगोए हुए बीजों को 1 इंच गहराई में मिट्टी में बोएं।
  • सिंचाई :- रोपण के समय पौधों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जब पौधा विकसित हो जाता है, तो हर सप्ताह एक बार सिंचाई करें।
  • उर्वरक और कीट प्रतिरोध :- पौधे को मजबूती प्रदान करने के लिए नियमित अवसरों पर उर्वरक दें। कीटों से बचाव के लिए प्राकृतिक कीटनाशक का उपयोग करें।

यदि आप बल्कि अंकुरण के माध्यम से पौधा लगा रहे हैं, तो उसे प्रत्येक दिन सिंचें और पूरी तरह से स्थिर होने पर इसे मुख्य जगह पर लगाएं।

सहजन का पौधा तेजी से बढ़ता है और शीघ्र ही फूल और फल पैदा करता है। इसका उपयोग भोजन और औषधियों में किया जाता है, इसलिए इसे सही तरीके से देखभाल करना महत्वपूर्ण है।

मोरिंगा के पौधे की कटाई कैसे करें

मोरिंगा या सहजन का पौधा एक तेजी से बढ़ने वाला पौधा है और इसे समय-समय पर छटाई करने से उसकी उत्तम वृद्धि सुनिश्चित होती है। छटाई से पौधे का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और फलों की अच्छी पैदावार होती है।

  1. सही समय पर छटाई :- मोरिंगा के पौधे को अधिकतम फायदा पहुँचाने के लिए जब पौधा 1 से 1.5 मीटर लंबा हो जाए तब उसकी पहली छटाई करें।
  2. तरीका :- पौधे के शिखर भाग को कटकर निकाल दें ताकि नई डालियाँ बढ़ सकें।
  3. सतही छटाई :- अगर पौधे में बहुत सारी डालियाँ हैं तो उनमें से कुछ को हटा दें ताकि अधिक उर्जा मुख्य शाखाओं में जा सके।
  4. बीमार या मरे हुए डालों को हटाएं :- किसी भी प्रकार की बीमारी या कीट प्रादुर्भाव से प्रभावित डालों को तुरंत काट दें।
  5. सामग्री :- छटाई के लिए तेज़ और साफ़ गार्डन शीयर्स का उपयोग करें, और इसे प्रत्येक बार काटने से पहले साफ़ करें।
  6. पोषण :- छटाई के बाद पौधे को अधिक पोषण की जरूरत होती है। छटाई के तुरंत बाद उर्वरक डालें।

सहजन की छटाई से पौधे में नई जीवनशक्ति आती है और इसे सेहतमंद बनाए रखने में मदद मिलती है। छटाई से पौधे की उत्तम पैदावार भी सुनिश्चित होती है।

सहजन के पेड़ के फायदे
सहजन जिसे मोरिंगा या ड्रमस्टिक भी कहा जाता है भारत में प्राचीन समय से ही उसके औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है। इसके पेड़ के विभिन्न हिस्से खाने और औषधीय उपयोग के लिए इस्तेमाल होते हैं।

1. पोषक तत्व से भरपूर :- सहजन के पत्ते प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और अन्य मौलिक विटामिन और मिनरल्स से भरपूर होते हैं।

2. चर्बी कम करने में मदद :- सहजन पेड़ के पत्तों का सेवन वजन कम करने में भी मदद करता है, क्योंकि इसमें फाइबर अधिक होता है जो पेट को भरा हुआ महसूस कराता है।

3. शुगर को नियंत्रित करता है :- सहजन शुगर के मरीज़ों के लिए भी लाभदायक है क्योंकि यह रक्त शुगर को नियंत्रित करने में मदद करता है।

4. हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है :- सहजन में सीसा, कैल्शियम और फास्फोरस होते हैं जो हड्डियों को मजबूती प्रदान करते हैं।

5. प्रदूषण से बचाव :- सहजन पेड़ प्रदूषण को अवशोषित करने में मदद करता है और हवा को शुद्ध करता है।

6. त्वचा के लिए :- सहजन के पत्तों और फूलों का पेस्ट त्वचा पर लगाने से त्वचा की समस्याओं में राहत मिलती है।

7. बालों के लिए :- सहजन के तेल का उपयोग बालों में किया जाता है, जो बालों को मजबूती प्रदान करता है और उन्हें चमकीला बनाता है।

इस तरह, सहजन का पेड़ हमें कई फायदे प्रदान करता है और इसे हमारे दैनिक जीवन में शामिल करना चाहिए।
सहजन पेड़ के नुकसान (Disadvantages Of Moringa Tree)

जैसा कि हर चीज़ के साथ होता है, सहजन का पेड़ भी कई सारे फायदे प्रदान करता है, परंतु इसके कुछ नुकसान भी होते हैं जो निम्नलिखित हैं:

  • अत्यधिक सेवन :- सहजन के पत्तों या बीज का अत्यधिक सेवन से पेट दर्द, दस्त और अन्य पाचन संबंधित समस्याएँ हो सकती हैं।
  • गर्भवती महिलाओं के लिए :- गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाएँ सहजन के बीज और जड़ का सेवन नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह गर्भपात का कारण बन सकता है।
  • ड्रग्स और दवाओं के साथ प्रतिक्रिया :- सहजन का सेवन कुछ दवाओं जैसे कि एंटी-डायबिटिक ड्रग्स के साथ इंटरएक्शन कर सकता है जिससे रक्त शर्करा का स्तर अत्यधिक कम हो सकता है।
  • स्किन रैशेस :- कुछ लोगों में सहजन का तेल या उसके पत्तों का पेस्ट लगाने से त्वचा में खुजली या रैश हो सकता है।
  • सहजन के तेल का सेवन :- अधिक मात्रा में सहजन के तेल का सेवन करने से ज्यादा कैलोरी और चर्बी की खपत होती है जिससे वजन में वृद्धि हो सकती है।

इस प्रकार सहजन के पेड़ के फायदे होते हैं, परंतु इसके सेवन को सीमित और संतुलित रखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को सहजन से संबंधित कोई समस्या होती है, तो वह तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

सहजन का औषधि में उपयोग

सहजन, जिसे ‘मोरिंगा’ या ‘ड्रमस्टिक’ भी कहते हैं, भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद में अपने औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है। इस पौधे के लगभग सभी हिस्से औषधीय गुणों से भरपूर हैं।

1. पोषक तत्व से भरपूर :- सहजन के पत्ते में प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।

2. रक्तशुद्धि :- सहजन की पत्तियों का सेवन रक्त को शुद्ध करता है और अनेक प्रकार की त्वचा संक्रमण से बचाव करता है।

3. हड्डियों के लिए :- सहजन में कैल्शियम और फास्फोरस अच्छी खासी मात्रा में होता है जो हड्डियों के विकास और मजबूती के लिए जरूरी है।

4. प्रतिरोधक शक्ति :- सहजन की पत्तियों में उपस्थित एंटीऑक्सिडेंट शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाते हैं।

5. डायबिटीज पर नियंत्रण :- सहजन मधुमेह के रोगियों के लिए भी लाभकारी है, क्योंकि यह रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में मदद करता है।

6. जोड़ों का दर्द :- सहजन में मौजूद विटामिन E और एंटीऑक्सिडेंट जोड़ों के दर्द में राहत पहुंचाते हैं।

7. आँखों के लिए :- सहजन में विटामिन A की उचित मात्रा होती है जो आँखों के लिए अच्छा है।

8. अन्य फायदे :- यह हृदय के लिए भी फायदेमंद है उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है और अंत में आयरन की कमी को दूर करता है।

सहजन के इन फायदों के बावजूद किसी भी औषधीय पौधे का सेवन करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए।

बीज से सहजन (मोरिंगा ) का पेड़ कैसे उगाएं?

  • बीज चुनाव :- सहजन के स्वस्थ और पूरे बीज को चुनें। अच्छे बीज से ही स्वस्थ पौधे की उम्मीद होती है।
  • बीज को भिगोकर रखें :- बीजों को एक रात के लिए पानी में भिगोकर रख दें। यह उन्हें अंकुरित होने में मदद करेगा।
  • मिट्टी का चयन :- अच्छे नलीकरण वाली मिट्टी का चयन करें। सहजन के पौधे के लिए उपयुक्त मिट्टी वह होती है जो पानी को अच्छे से सोख ले।
  • बुआई :- भिगोए गए बीजों को मिट्टी में 1-2 इंच गहराई में बो दें।
  • सिंचाई :- बीज बोने जाने के बाद उसे हल्का पानी दें।
  • धूप और पानी :- सहजन के पौधे को प्रतिदिन सुबह की धूप और नियमित सिंचाई चाहिए।
  • अंकुरण :- आमतौर पर 5-12 दिनों में अंकुराण हो जाता है।
  • स्थल परिवर्तन :- जब पौधा ठोस और मजबूत हो जाए तो आप उसे एक बड़े गमले या ज़मीन में स्थानांतरित कर सकते हैं।
  • नियमित देखभाल :- पौधे को नियमित रूप से पानी दें और उसे साफ रखें।

सहजन के पेड़ के मुख्य तथ्य

उत्तरजीवी :- सहजन का पौधा एक उत्तरजीवी है जिसका अर्थ है यह अधिक समय तक जिंदा रहता है।

ऊंचाई :- सहजन का पेड़ 10-12 मीटर तक ऊंचा हो सकता है।

पत्ते :- इसके पत्ते हरे रंग के और पोषण से भरपूर होते हैं।

फूल और फल :- सहजन के पौधे पर सुंदर फूल आते हैं और फिर बाद में लंबे और पतले फल बनते हैं जिसे सहजन की फलियाँ कहते हैं।

औषधीय गुण :- सहजन पौधे में से तेल निकाला जाता है और इसका इस्तेमाल औषधियों में किया जाता है।

पोषण :- सहजन के पत्ते, फलियाँ और बीज बहुत ही पोषण से भरपूर हैं।

जल संचारण :- सहजन का पौधा कम पानी में भी जीवित रह सकता है इसलिए यह सूखा प्रदेशों में भी अच्छा रहता है।

इस प्रकार सहजन का पेड़ एक बहुत ही महत्वपूर्ण पौधा है जो अपनी औषधीय गुणों, पोषण और अन्य उपयोगों के लिए जाना जाता है।

सहजन के पेड़ की देखभाल युक्तियाँ (Moringa Tree Care Tips)

 

  1. सिंचाई :- सहजन को प्रारंभिक चरण में नियमित रूप से पानी देना चाहिए, लेकिन जब वह बढ़ जाए तो इसे सूखने का समय देना होता है।
  2. स्थल :- धूप में अच्छा विकसित होता है, इसलिए ऐसी जगह चुनें जहाँ पूरी दिन धूप पड़े।
  3. मिट्टी :- अच्छी ड्रेनेज वाली मिट्टी में यह अधिक विकसित होता है।
  4. ताजगी बनाए रखें :- जब पत्ते सुखने लगें या पीले हो जाएं, तो उन्हें काट दें।
  5. उर्वरक :- प्रति वर्ष कॉम्पोस्ट या जैविक उर्वरक का उपयोग करें।
  6. रोग और कीट :- सहजन के पत्तों पर प्राकृतिक रसायन लगाकर कीट और बीमारियों से बचाव कर सकते हैं।
  7. प्रुनिंग :- सहजन का पौधा ज्यादा उचाई तक बढ़ सकता है, इसलिए उसे समय-समय पर प्रुनिंग करके आकार में रखना चाहिए।

सहजन एक उत्तरजीवी पौधा है और अगर इसे सही तरीके से देखभाल की जाए तो यह सालों-साल तक रह सकता है। उपर दी गई युक्तियों का पालन करके आप अपने सहजन पौधे को स्वस्थ और मजबूत बनाए रख सकते हैं।

सहजन का पौधा कहाँ उगता है (Where Does The Moringa Plant Grow)

सहजन का पौधा (Moringa oleifera) मुख्य रूप से उच्च तापमान और सूखा प्रतिस्थानीय जलवायु में उगता है। यह पौधा विशेष रूप से दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है, जैसे कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, और अफ्रीका के साहेली क्षेत्र में।

सहजन अब विश्व भर में अनेक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय प्रदेशों में उगाया जा रहा है जहां वह अपने पोषक तत्वों और औषधीय गुणों के लिए प्रशंसित है।

सहजन का पौधा सूखने के प्रतिस्थानीय जलवायु में भी अच्छा होता है और यह कम पानी में भी विकसित हो सकता है। इसे जल संकट के समय में भी उगाया जा सकता है। वहाँ जहाँ जमीन में नमकीनता अधिक है, वहाँ भी यह पौधा अच्छा विकसित होता है।

सहजन से बने व्यंजन

सहजन या मोरिंगा (Moringa) पूरे भारत में अपनी उपयोगिता और पौष्टिकता के लिए जाना जाता है। सहजन की फलियाँ, पत्तियाँ और बीज तीनों ही खाद्य प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होते हैं यहाँ कुछ प्रमुख व्यंजन हैं जिनमें सहजन का उपयोग होता है :-

  1. सहजन की सब्जी :- सहजन की फलियाँ को काटकर मसालों के साथ पकाकर एक स्वादिष्ट सब्जी तैयार की जाती है।
  2. सहजन के पत्तियों की भुर्जी :- इसमें सहजन की पत्तियाँ को बारीक़ काटकर प्याज, टमाटर, अदरक, लहसुन और मसालों के साथ पकाया जाता है।
  3. सहजन और चने की दाल :- इस व्यंजन में सहजन की फलियाँ और चने की दाल को मसालों के साथ पकाकर तैयार किया जाता है।
  4. सहजन के पत्तियों का सूप :- इसमें सहजन की पत्तियाँ, प्याज़, लहसुन, अदरक और अन्य सब्जियाँ डालकर एक पौष्टिक सूप तैयार किया जाता है।
  5. सहजन की पत्तियों के पराठे :- पत्तियों को पिसकर पराठे के आटे में मिला कर ताजगी और पौष्टिकता बढ़ाई जाती है।
  6. सहजन के बीजों का अचार :- सहजन के बीज को अचार बनाने के लिए भी उपयोग किया जाता है।

ये सभी व्यंजन स्वाद में उत्तम होते हैं और साथ ही साथ उनमें सहजन की पौष्टिकता भी समाहित होती है। सहजन की पत्तियाँ और फलियाँ विटामिन, मिनरल्स और अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं।

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कटहल (Jackfruit): उपयोग, फायदे, न्यूट्रिशनल

Table of Contents

  • परिचय
  • कटहल (Jackfruit) की न्यूट्रिशनल वैल्यू
  • कटहल (जैकफ्रूट) के गुण
  • कटहल (जैकफ्रूट) के साइड इफेक्ट
  • अन्य दवाओं के साथ इंटरेक्शन (परस्पर क्रिया)
  • कटहल के खाने का तरीका

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परिचय

कटहल (जैकफ्रूट) के पेड़ भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों में बहुत बड़ी मात्रा में उगते हैं। कटहल का वैज्ञानिक नाम आर्टोकार्पस हेटेरोफिलस है और यह मोरेसी परिवार से संबंधित है। यह एक मध्यम आकार का पेड़ होता है जिसे सभी मौसमों में उगाया जा सकता है। कटहल (जैकफ्रूट) कई पोषक तत्वों और विटामिनों से भरपूर है इसलिए इस विशाल फल को सुपरफूड कहा जाता है ।

एक कटहल (जैकफ्रूट) का वजन औसतन 3.5 किलोग्राम से 10 किलोग्राम तक हो सकता है और यह 25 किलोग्राम तक बड़ा हो सकता है। कटहल (जैकफ्रूट) का पेड़ टिम्बर इंडस्ट्री के लिए लकड़ी का एक अच्छा स्रोत है। इसके अलावा दवाइयां बनाने में भी कटहल (जैकफ्रूट) के पेड़ के कई हिस्सों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कटहल (जैकफ्रूट) पीले-भूरे रंग का होता है और इसका बाहरी हिस्सा हेक्सागोनल बिंदुओं से बना होता है।

कटहल (Jackfruit) की न्यूट्रिशनल वैल्यू

कटहल (जैकफ्रूट) कई विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर है, जिसकी जानकारी नीचे प्रदान की गई है –

पोषक तत्व वैल्यू
एनर्जी 95 कैलोरी
कार्बोहाइड्रेट 23.2 ग्राम
डाइटरी फाइबर 1.5 ग्राम
प्रोटीन 1.72 ग्राम
फैट 1.5 ग्राम
फ्रुक्टोज 9.19 ग्राम
ग्लूकोज़ 9.48 ग्राम
सुक्रोज 0.42 ग्राम
कैल्शियम 24 मिलीग्राम
आयरन 0.23 मिलीग्राम
मैग्नीशियम 29 मिलीग्राम
फास्फोरस 21 मिलीग्राम
जिंक 0.13 मिलीग्राम
कॉपर 0.076 मिलीग्राम
मैंगनीज 0.043 मिलीग्राम
पोटैशियम 448 मिलीग्राम
सोडियम 2 मिलीग्राम
विटामिन C 13.7 मिलीग्राम
राइबोफ्लेविन 0.055 मिलीग्राम
नियासिन 0.92 मिलीग्राम
विटामिन B-6 0.329 मिलीग्राम
फोलेट 24î1⁄4 ग्राम

कटहल (जैकफ्रूट) के गुण

कटहल (जैकफ्रूट) में कैरोटीनॉयड, फेनोलिक कंपाउंड, फ्लेवोनोइड्स, टैनिन और स्टेरोल्स जैसे फाइटोकेमिकल्स होते हैं। ये फाइटोकेमिकल्स कई गुण दिखा सकते हैं। कटहल (जैकफ्रूट) के कुछ गुण नीचे दिए गए हैं।

  • यह एंटी-माइक्रोबियल (रोगाणुरोधी) एजेंट के तौर पर काम कर सकता है
  • इसमें ऐंटिफंगल गुण हो सकते हैं
  • यह घाव भरने में मदद कर सकता है
  • इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण हो सकते हैं
  • यह ब्लड शुगर को कम करने में मदद कर सकता है 
  • इसमें कैंसर रोधी गुण हो सकते हैं
  • यह ब्लड प्रेशर कम करने में मदद कर सकता है
  • इसमें एंटी-अल्सर गुण हो सकते हैं
  • इसमें एंटी-एजिंग गुण हो सकते हैं
  • इसमें दमा-रोधी गुण हो सकते हैं
  • इसमें एंटी डायरिया गुण हो सकते हैं
  • यह बुखार कम करने में मदद कर सकता है
  • यह नींद लाने में मदद कर सकता है
  • यह पाचन में मदद कर सकता है
  • यह कीड़ों को मारने में मदद कर सकता है|

कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग

कटहल (जैकफ्रूट) के एंटीऑक्सीडेंट फायदे सेहत को बेहतर बनाने और कई तरह की मेडिकल समस्याओं से राहत दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं जैसा कि नीचे चर्चा की गई है। नीचे कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग बताए गए हैं :-

दिल के लिए कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग :-

खून में लिपिड की ज़्यादा मात्रा कोरोनरी हार्ट डिजीज (दिल की बीमारी) का प्रमुख कारण है। खराब कोलेस्ट्रॉल के ज़्यादा लेवल और अच्छे कोलेस्ट्रॉल लेवल इसकी पहचान है। कटहल (जैकफ्रूट) में विटामिन B6 होता है जो होमोसिस्टीन लेवल को कम करने में मदद कर सकता है जिससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा कम हो जाता है। हाई ब्लड प्रेशर के कारण स्ट्रोक और अन्य दिल की बीमारियां हो सकती हैं।

कटहल (जैकफ्रूट) में मौजूद कंपाउंड ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद कर सकते हैं और दिल की बीमारी और स्ट्रोक को प्रबंधित करने में मदद कर सकते हैं। कटहल (जैकफ्रूट) में काफी अच्छी मात्रा में पोटेशियम होता है जो ब्लड वेसल (रक्त वाहिकाओं) और दिल पर असर डालने वाले ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद कर सकता है लेकिन अगर आपको कोई दिल की बीमारी है तो आपको अपने हेल्थ केयर प्रोवाइडर से बात करनी चाहिए। जड़ी-बूटियों या सब्जियों को नियमित ट्रीटमेंट के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल न करें।

स्किन के लिए कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग :-

लंबे समय तक धूप में रहने से इंसान की स्किन को सनबर्न, समय से पहले स्किन की उम्र बढ़ना, इम्यून सप्रेशन, स्किन कैंसर और ऑक्सीडेटिव क्षति आदि जैसे कई तरह के नुकसान पहुंचते हैं। विटामिन C स्किन के लिए फायदेमंद है और यह एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है। कटहल (जैकफ्रूट) में मौजूद विटामिन C स्किन के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कोलेजन उत्पादन को बढ़ा सकता है। कोलेजन वह प्रोटीन है जो स्किन को स्ट्रक्चर और मजबूती प्रदान करता है साथ ही विटामिन C के एंटीऑक्सीडेंट फायदे सूरज के संपर्क में आने से होने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से निपटने में मदद कर सकते हैं। कटहल (जैकफ्रूट) में विटामिन C ज़्यादा मात्रा में होता है। यह एक ऐसा विटामिन है जो हमारे शरीर के अंदर नहीं बनता है इसलिए हमें इसे अपनी डाइट से प्राप्त करना चाहिए और कटहल (जैकफ्रूट) इसका बहुत अच्छा स्रोत है। इसके अलावा अगर आपको स्किन से जुड़ी कोई भी समस्या है तो आपको अपने स्किन डॉक्टर से परामर्श के लिए संपर्क करना चाहिए। डॉक्टर से परामर्श किए बिना किसी भी जड़ी-बूटी या सब्जी का इस्तेमाल करने से बचें।

पेट के लिए कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग :-

पेट का अल्सर या गैस्ट्रिक अल्सर पेप्टिक अल्सर का एक प्रकार है। हेलिकोबैक्टर पाइलोरी नाम के बैक्टीरिया के इंफेक्शन से पेट में अल्सर हो जाता है। इस तरह के इंफेक्शन या अन्य कारणों से पेट की परत को लगातार नुकसान पहुंचने के कारण गैस्ट्रिक अल्सर होता है। गैस्ट्रिक अल्सर से राहत देने के लिए पारंपरिक तौर पर कटहल (जैकफ्रूट) का इस्तेमाल किया जाता रहा है।

हम इंसान पर ज़्यादा स्टडीज करके यह पहचान सकते हैं कि कटहल (जैकफ्रूट) वास्तव में गैस्ट्रिक अल्सर ठीक करने में किस तरह से मदद करता है। लेकिन तब तक आपको यही सलाह दी जाती है कि अपने डॉक्टर से परामर्श किए बिना कटहल (जैकफ्रूट) को पेट के अल्सर के इलाज के तौर पर इस्तेमाल न करें।

पाचन में कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग :-

कटहल (जैकफ्रूट) में फाइबर की मात्रा काफी ज़्यादा होती है ज़्यादा फाइबर से शरीर को बहुत सारे फायदे मिलते हैं। इससे मल त्यागने में आसानी होती है और यह कब्ज जैसी समस्याओं से बचने में मदद कर सकता है। यह बड़ी आंत से कैंसर का कारण बनने वाले विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद कर सकता है और कोलोन म्यूकस मेम्ब्रेन की रक्षा कर सकता है। अगर आपको कोई पाचन संबंधी समस्या है तो आपको अपने डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए |

हड्डियों के लिए कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग :-

कटहल (जैकफ्रूट) में मैग्नीशियम की मात्रा काफी ज़्यादा होती है। मैग्नीशियम हड्डियों के सेहत के लिए अच्छा होता है। यह मिनरल कैल्शियम अवशोषण के लिए अहम है और हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। यह ऑस्टियोपोरोसिस जैसे हड्डियों के विकारों को ठीक करने में भी मदद कर सकता है हालांकि इंसान में हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए कटहल (जैकफ्रूट) के इस्तेमाल को सपोर्ट करने के लिए ज़्यादा अध्ययन करने की ज़रुरत है इसलिए आपको सलाह दी जाती है कि बिना डॉक्टर की सलाह के कटहलकटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करने से बचें।

कटहल (जैकफ्रूट) के अन्य संभावित उपयोग :-

कटहल (जैकफ्रूट) के सेवन से अन्य संभावित उपयोग इस प्रकार हैं :-

  • कटहल (जैकफ्रूट) में भरपूर मात्रा में आयरन होता है। जिनकी डाइट में आयरन की कमी है वे लोग अगर कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करें तो यह काफी मदद कर सकता है और साथ ही यह ब्लड सर्कुलेशन को सही रखने में भी मदद कर सकता है।
  • कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन थायरॉयड ग्लैंड (ग्रंथि) के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद कर सकता है। कटहल (जैकफ्रूट) में काफी अच्छी मात्रा में कॉपर होता  है। कॉपर थायरॉयड ग्लैंड (ग्रंथि) के मेटाबोलिज्म के लिए बहुत ज़रूरी है। हार्मोन उत्पादन पर भी इसका कुछ असर हो सकता है।

हालांकि ऐसे अध्ययन हैं जो विभिन्न बीमारियों की स्थितियों में कटहल (जैकफ्रूट) के संभावित उपयोग को दर्शाते हैं, लेकिन ये अध्ययन अपर्याप्त हैं और इंसान की सेहत पर कटहल (जैकफ्रूट) के फायदों की सही सीमा स्थापित करने के लिए आगे और अध्ययन की ज़रुरत है।

कटहल (जैकफ्रूट) का इस्तेमाल कैसे करें?

कटहल (जैकफ्रूट) के फल के साथ-साथ इसके बीज भी खाने योग्य और स्वादिष्ट होते हैं। कटहल (जैकफ्रूट) का इस्तेमाल करने और अपने रोज़ाना की डाइट में इसे शामिल करने के कई तरीके हैं।

बीज

  • इसके बीज पके हुए व्यंजनों में डाले जा सकते हैं। आप बेकिंग में भी इसके बीज के आटे का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • कटहल (जैकफ्रूट) के बीजों को चीनी के साथ उबालकर इसे कैंडी के तौर पर भी खाया जा सकता है।

फल

  • पके हुए कटहल (जैकफ्रूट) को सलाद और करी में डाला जा सकता है अन्य सब्जियों के साथ भी पकाया जा सकता है।
  • सूखे कटहल (जैकफ्रूट) के पल्प (गूदे) का इस्तेमाल कटहल (जैकफ्रूट) के चिप्स बनाने में किया जाता है।
  • आप पके हुए कटहल को कच्चा भी खा सकते हैं या नारियल के दूध में पकाकर इसकी मिठाई भी बना सकते हैं।2

आपको कोई भी हर्बल सप्लीमेंट लेने से पहले किसी योग्य डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। किसी योग्य डॉक्टर से परामर्श किए बिना कोई भी जारी दवा या इलाज बंद न करें या इसे आयुर्वेदिक/हर्बल दवा या इलाज से रिप्लेस न करें।

कटहल (जैकफ्रूट) के साइड इफेक्ट

कटहल (जैकफ्रूट) के साइड इफेक्ट के बारे में ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग लोग एक ही चीज़ पर अलग-अलग प्रतिक्रिया कर सकते हैं। इसलिए, अगर आप कटहल (जैकफ्रूट) के सेवन के बाद कोई भी साइड इफेक्ट महसूस करते हैं, तो तुरंत अपने हेल्थ केयर प्रोवाइडर से संपर्क करें।

इसके अलावा, अपने डॉक्टर से परामर्श किए बिना किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या किसी इसके किसी भी फायदे के लिए कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करने  से बचें। ऐसा करने से आपको किसी भी अनचाहे साइड इफेक्ट से बचने में मदद मिलेगी।

(जैकफ्रूट) का इस्तेमाल करते समय सावधानियां

आपको कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए

  • पोलन एलर्जी (पराग से एलर्जी)

अगर आपको लेटेक्स या बर्च पोलन एलर्जी (पराग से एलर्जी) है तो कटहल (जैकफ्रूट) खाने से बचें। इन एलर्जी की कटहल (जैकफ्रूट) के साथ क्रॉस-रिएक्शन हो सकती है।

  • किडनी की पुरानी या लंबे समय से चल रही बीमारी

कटहल (जैकफ्रूट) में काफी मात्रा में पोटेशियम होता है जो किडनी की पुरानी या लंबे समय से चल रही बीमारी या एक्यूट किडनी फेलियर से पीड़ित लोगों के लिए हानिकारक हो सकता है। ज़्यादा पोटेशियम वाली डाइट ऐसे लोगों में हाइपरकलेमिया (खून में इलेक्ट्रोलाइट पोटेशियम ज़्यादा होना) का कारण बन सकती है। खून में पोटेशियम का निर्माण एक ऐसी स्थिति है जिसे हाइपरकलेमिया कहा जाता है। यह कमजोरी, पैरालिसिस (पक्षाघात) और हार्ट फैल का कारण बन सकता है।

  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सावधानी के साथ कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करना चाहिए। इसी तरह बुजुर्गों को भी कम मात्रा में कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करना चाहिए।

अगर आपको कोई बीमारी या एलर्जी है, तो अपने डॉक्टर से सलाह लें कि किन खाद्य पदार्थों और सब्जियों को नहीं खाना चाहिए। इसके अलावा, डॉक्टर से परामर्श किए बिना किसी भी सेहत संबंधी समस्या के लिए कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करने से बचें।

अन्य दवाओं के साथ इंटरेक्शन (परस्पर क्रिया)

अन्य दवाओं के साथ कटहल (जैकफ्रूट) के इंटरेक्शन (परस्पर क्रिया) के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसलिए, किन दवाओं के साथ कटहल (जैकफ्रूट) का सेवन करना सुरक्षित है, इस संबंध में पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। आप इस बारे में अपने डॉक्टर या प्रोफेशनल से सलाह ले सकते हैं।

मान लीजिए कि आप कोई दवा ले रहे हैं, तो उस स्थिति में आपको किसी भी सब्जी या जड़ी-बूटियों के साथ दवा के संभावित इंटरेक्शन (परस्पर क्रिया) के बारे में अपने डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। इससे आपको किसी भी जड़ी-बूटी या सब्जी के साथ दवाओं के संभावित इंटरेक्शन (परस्पर क्रिया) से बचने में मदद मिलेगी।

कटहल के खाने का तरीका

कटहल (जैकफ्रूट) के फल के साथ-साथ इसके बीज भी खाने योग्य और स्वादिष्ट होते हैं। कटहल (जैकफ्रूट) का इस्तेमाल करने और अपने रोज़ाना की डाइट में इसे शामिल करने के कई तरीके हैं।

बीज

  • इसके बीज पके हुए व्यंजनों में डाले जा सकते हैं। आप बेकिंग में भी इसके बीज के आटे का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • कटहल (जैकफ्रूट) के बीजों को चीनी के साथ उबालकर इसे कैंडी के तौर पर भी खाया जा सकता है।

फल

  • पके हुए कटहल (जैकफ्रूट) को सलाद और करी में डाला जा सकता है अन्य सब्जियों के साथ भी पकाया जा सकता है।
  • सूखे कटहल (जैकफ्रूट) के पल्प (गूदे) का इस्तेमाल कटहल (जैकफ्रूट) के चिप्स बनाने में किया जाता है।
  • आप पके हुए कटहल को कच्चा भी खा सकते हैं या नारियल के दूध में पकाकर इसकी मिठाई भी बना सकते हैं।2

आपको कोई भी हर्बल सप्लीमेंट लेने से पहले किसी योग्य डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। किसी योग्य डॉक्टर से परामर्श किए बिना कोई भी जारी दवा या इलाज बंद न करें या इसे आयुर्वेदिक/हर्बल दवा या इलाज से रिप्लेस न करें।

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सहजन का पौधा की जानकारी: इतिहास, पहचान, फायदे, नुकसानसहजन एक प्रकार का पौधा है जो हमारे खान-पान और सेहत में बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसे ‘मोरिंगा’ या ‘ड्रमस्टिक’ नाम से भी जाना जाता है। सहजन का पौधा लगभग 10 मीटर तक ऊंचा होता है। इसकी पत्तियां हरी-भरी और फलियां लंबी होती हैं।
यह पौधा धूप में अच्छी तरह से उगता है और इसके हर हिस्से को खाने या औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है..Click Here
करेले के फायदे, उपयोग और नुकसानकरेला एक हरी सब्जी है और यह स्क्वैश परिवार का सदस्य है। करेले का वैज्ञानिक नाम मोमोर्डिका चरैन्टिया (Momordica Charantia) है। इसे अंग्रेजी में बिटर मेलन और बिटर गॉर्ड के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा, इसे बंगाली में कॉरोला, कन्नड़ में हगालाकायी और हिंदी में करेला कहा जाता है। यह अफ्रीका, कैरिबियन, भारत और मध्य पूर्वी देशों में बहुत लोकप्रिय है। भले ही यह खाने में कड़वा हो, लेकिन यह औषधीय गुणों से भरपूर होता है…Click Hereकैसे करें सब्जियों की पौध तैयारीअधिकतर सब्जी फसलें जैसे कि टमाटर, गोभी व प्याज जिनके बीज छोटे व पतले होते है, उनकी स्वस्थ व उन्नत पौध तैयार कर लेना ही आधी फसल उगाने के बराबर होता है|स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए पौधशाला के स्थान का चयन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है|इससे जुडी हुई अन्य बाते निम्नलिखित हैं;
1. स्थान ऊंचाई पर होना चाहिए जहां से पानी का निकास उचित हो |
2. भूमि दुमट बलुई होनी चाहिए जिसका पीएच मान लगभग 6.5 हो…Click Here

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करेले के फायदे, उपयोग और नुकसान

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करेले को चुनिंदा स्वास्थ्यवर्धक सब्जियों में गिना जाता है स्वाद में कड़वा होने के कारण कई लोग इसे पसंद नहीं करते लेकिन स्वास्थ्य के लिहाज से यह फायदेमंद है। आपको जानकर हैरानी होगी कि करेला कई बीमारियों के प्रभाव व उनके लक्षणों को कम करने की क्षमता रखता है इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस लेख में हम शरीर के लिए करेले के फायदे बताने जा रहे हैं। यहां आपको करेला खाने के फायदे से लेकर करेला का उपयोग कैसे किया जा सकता है इस संबंध में जरूरी जानकारी मिलेगी । लेख को पढ़ते समय पाठक इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि करेला यहां बताई गई किसी भी बीमारी का इलाज नहीं है लेकिन यह इनके इलाज में एक सहायक भूमिका जरूर निभा सकता है।

आइए सबसे पहले हम करेले के बारे में कुछ सामान्य जानकारी हासिल कर लेते हैं।

करेला क्या है ?

करेला एक हरी सब्जी है और यह स्क्वैश परिवार का सदस्य है। करेले का वैज्ञानिक नाम मोमोर्डिका चरैन्टिया (Momordica Charantia) है। इसे अंग्रेजी में बिटर मेलन और बिटर गॉर्ड के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा इसे बंगाली में कॉरोला, कन्नड़ में हगालाकायी और हिंदी में करेला कहा जाता है। यह अफ्रीका, कैरिबियन, भारत और मध्य पूर्वी देशों में बहुत लोकप्रिय है। भले ही यह खाने में कड़वा हो लेकिन यह औषधीय गुणों से भरपूर होता है । स्वास्थ्य के लिए यह किस प्रकार लाभदायक है यह जानकारी नीचे दी गई है।

अब जानते हैं यह कड़वी सब्जी स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार लाभदायक हो सकती है।

करेले के फायदे

नीचे जानिए स्वास्थ्य के लिए करेला खाने के फायदे –

1. मधुमेह के लिए करेला खाने के फायदे :-

मधुमेह से बचाव के लिए करेला या करेला के जूस का सेवन किया जा सकता है। दरअसल, एनसीबीआई (NCBI – National Center for Biotechnology Information) की वेबसाइट पर प्रकाशित शोध में करेले के एंटीडायबिटिक गुण साबित होते हैं। अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि करेला हाइपोग्लाइसेमिक (Hypoglycemic – ब्लड शुगर को कम करना) प्रभाव प्रदर्शित कर सकता है |

वहीं जानवरों पर किए गए एक शोध में भी करेले के हाइपोग्लाइसेमिक प्रभाव का असर देखा गया है । इंसानों पर इसका प्रभाव कितना कारगर होगा, इस विषय पर अभी और शोध की आवश्यकता है। मधुमेह के घरेलू उपाय के तौर पर इसका सेवन संतुलित मात्रा में डॉक्टरी परामर्श पर किया जा सकता है।

2. वजन घटाने के लिए करेला के फायदे :-

वजन घटाने के घरेलू उपाय के तौर पर भी करेला एक कारगर भूमिका निभा सकता है। दरअसल, एक वैज्ञानिक शोध में बढ़ते वजन के लिए करेले के फायदे देखे गए हैं। अध्ययन के निष्कर्ष में पाया गया कि उच्च वसा का सेवन करने वाले चूहों में करेले का एंटीओबेसिटी (मोटापा कम करने वाला गुण) प्रभाव पाया गया, जिससे बढ़ते वजन में रुकावट देखी गई। इसके साथ ही लिपिड मेटाबोलिज्म में बढ़ोतरी पायी गई । फिलहाल मनुष्यों पर इसके प्रभाव के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।

3. कैंसर से बचाव के लिए करेला के औषधीय गुण :-

करेले के औषधीय गुणों की बात की जाए तो यह कैंसर के जोखिम को भी कम करने में मदद कर सकता है। करेले से जुड़े अध्ययन में यह बात सामने आई है कि करेले में कैंसर के जोखिम को कम करने के गुण मौजूद होते है। शोध में आयुर्वेद की बात भी कही गई है। आयुर्वेद के अनुसार करेले का उपयोग कैंसर जैसी बीमारी के उपचार में भी किया जा सकता है।

शोध में कहा गया कि करेला का उपयोग कैंसर कोशिकाओं के निर्माण में बाधा डालने का काम कर कैंसर के जोखिम को कम कर सकता है। यह प्रोस्टेट कैंसर और पेट के कैंसर से बचाव में मदद कर सकता है । हालांकि, पाठक इस बात का ध्यान रखें कि कैंसर एक गंभीर बीमारी है, इसलिए सिर्फ करेले का सेवन इस बीमारी को ठीक करने में असमर्थ है। बेहतर है कि कैंसर के लिए व्यक्ति डॉक्टरी इलाज को पहली प्राथमिकता दें और डॉक्टर की सलाह के बाद ही करेले का सेवन करें।

4. लिवर के लिए करेला खाने के फायदे :-

करेला लिवर के लिए एक अच्छा डिटॉक्सिफाय एजेंट का काम कर सकता है जो शरीर को प्राकृतिक रूप से साफ करने में मदद कर सकता है । दरअसल, चूहों पर किए गए एक शोध में इसके हेपेटोप्रोटेक्टिव (Hepatoprotective – लिवर को सुरक्षित रखने का गुण) प्रभाव के बारे में पता चला है। साथ ही फैटी लिवर जैसी बीमारी में भी इसके लाभ देखे जा सकते हैं। फैटी लिवर वह समस्या होती है, जिसमें लिवर में फैट जमा होने लगता है। देखा गया है कि अत्यधिक शराब का सेवन भी इस समस्या का कारण बन सकता है । यहां करेले के फायदे देखे जा सकते हैं। नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी के एक शोध के अनुसार, करेले का अर्क ऑक्सीडेटिव तनाव और सूजन को कम करके अल्कोहलिक फैटी लिवर की बीमारी पर सकारात्मक प्रभाव दिखा सकता है  एक अन्य शोध के मुताबिक करेला, फैटी लिवर की बीमारी बढ़ने के दौरान फैट के जमाव को रोकने में मदद कर सकता है ।

5. कोलेस्ट्रॉल के लिए करेले के फायदे :-

कोलेस्ट्रॉल के कारण हृदय संबंधी रोग हो सकते हैं या फिर दिल का दौरा पड़ने का जोखिम रहता है ऐसे में उन खाद्य पदार्थों का सेवन जरूरी हो जाता है जो कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित या कम करने में मदद कर सकें। यहां करेला लाभकारी साबित हो सकता है। इस विषय पर आधारित एक शोध के अनुसार, कोलेस्ट्रॉल युक्त आहार का सेवन करने वाले चूहों को करेले के अर्क का सप्लीमेंट दिया गया। इससे उनके कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड (Triglycerides- रक्त में मौजूद एक प्रकार का फैट) में कमी पाई गई। इस अध्ययन से यह माना जाता है कि हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया (hypercholesterolemia- बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल की स्थिति) के लिए खाद्य उत्पादों में करेले के अर्क को सप्लीमेंट की तरह दिया जा सकता है। फिलहाल, मनुष्यों पर इसके प्रभाव के लिए और शोध किए जाने की आवश्यकता है ।

6. कब्ज और बवासीर के लिए करेला के फायदे :-

करेला कब्ज और बवासीर जैसी परेशानी में भी लाभकारी हो सकता है। दरअसल करेले में भोजन पचाने के गुण पाए जाते हैं जो मल त्याग को आसान बनाने में मदद कर सकता है साथ ही यह बवासीर पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ सकता है। बवासीर के मरीजों पर किए गए एक शोध में देखा गया कि करेले के पत्तों का अर्क मल त्याग को आसान बनाकर कब्ज से निजात दिलाने में मदद कर सकता है। बवासीर का एक कारण कब्ज भी है इसलिए यह कहा जा सकता है कि करेले का जूस कब्ज के साथ-साथ बवासीर में भी मददगार साबित हो सकता है। कब्ज और बवासीर के लिए करेले के पत्तों का जूस डॉक्टरी परामर्श पर लिया जा सकता है। फिलहाल, इस पर अभी और शोध की आवश्यकता है।

7. आंखों के लिए करेले के फायदे :-

करेला आंखों के लिए भी लाभकारी हो सकता है। दरअसल, यह बात कर्नाटक के मुदिगेरे  कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर (College of Horticulture) के एक रिसर्च में सामने आई है। शोध में कहा गया कि इसमें मौजूद बीटा कैरोटीन आंखों की बीमारियों के जोखिम से बचाव कर सकता है। इतना ही नहीं यह आंखों की रोशनी बढ़ाने में भी मदद कर सकता है।

8. सूजन के लिए करेला के फायदे :-

करेले में एंटी-इन्फ्लामेटरी गुण भी मौजूद होते हैं। ऐसे में इसका सेवन सूजन के जोखिम से बचाव करने में मददगार साबित हो सकता है । यह सूजन के कारण होने वाली समस्याओं में कितना लाभकारी हो सकता है, इस पर और शोध की आवश्यकता है।

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खुम्ब की खेती

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परिचय

सदियों से खुम्ब (मशरुम) ने मनुष्य को आकर्षित किया है इनके रंग-बिरंगे, सुन्दर फलनकाय सहज ही हमारा ध्यान खींच लेते हैं। मशरुम एक प्रकार का मांशल कवक है जो अत्यंत  स्वादिष्ट एवं पौष्टिक शुद्ध शाकाहार भोजन है। प्रकृति में पाये जाने वाले सभी खुम्ब खाने योग्य नहीं हैं उनमें से कुछ विषैले भी होते हैं। अभी तक विश्वभर में 1600 से अधिक खुम्ब की किस्में मिल चुकी हैं जिनमें से 100 प्रकार के मशरुम हमारे भोजन में सम्मिलित हो चुके हैं।

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के मशरुम की खेती करने का समय

  • सफेद बटन मशरुम (अगेरिकस बाइस्पोरस)       – मध्य सितम्बर से मघ्य मार्च तक
  • शिटाके मशरुम (लैन्टीनूला इडोड्‌स)        –     सितम्बर मध्य से फरवरी
  • धान पुआल खुम्ब (वोल्वेरिएला प्रजातियाँ) –     मई से मध्य अगस्त
  • आयस्टर मशरुम (प्लूरोट्‌स प्रजातियाँ)     –     अगस्त से अप्रैल
  • दूधिया मशरुम (कैलोसाइबी इण्डिका)      –     मार्च से मध्य अगस्त

मशरुम की खेती से लाभ

1. मशरुम की खेती अन्य फसलों की उपज से बचे पदार्थों जैसे कि अनाज वाली फसलों का भूसा अथवा अन्य कृषि-अवशेषों पर की जाती है जिससे उनका पुनर्चक्रण होकर उच्च कोटि के पोषक तत्वों एवं औषधीय गुणों से भरपूर मशरुम प्राप्त होता है।

2. इससे हमारे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता। मशरुम की खेती के बाद बचा हुआ कम्पोस्ट और भूसा फिर से कार्बनिक खाद के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है और यह जानवरों को खिलाने के काम भी आ सकता है या उसे पूरी तरह सड़ाने के बाद अपने खेत की मिट॒टी में मिला सकते हैं।

3. मशरुम की खेती के लिए अन्य फसलों की तरह उपजाऊ जमीन की आवश्यकता नहीं होती बेकार पड़ी बंजर जमीन पर मशरुम फार्म बना सकते हैं और इस प्रकार से यह खेती छोटे किसानों के लिए काफी लाभदायी है।

4. किसान मशरुम की खेती को अपनी सामान्य खेती के साथ-साथ दो फसलों के बीच मिलने वाले समय के दौरान अतिरिक्त आय के साधन के रुप में कर सकते हैं।

5. गाँव के बेरोजगार युवकों और मजदूर भाइयों के लिए यह खेती स्वरोजगार का अवसर प्रदान करती है।

6. घरेलू महिलाओं के आर्थिक रुप से स्वावलम्बी बनाने के लिए भी मशरुम की खेती में अच्छी संभावनाएँ हैं।

7. मशरुम की खेती में निर्यात की प्रबल संभावनाएँ हैं।

8. यदि प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादन की दृष्टि से देखें तो मशरुम की खेती में उत्पादन किसी भी अन्य फसल से कई गुणा ज्यादा है।

बटन मशरुम की खेती

भारतवर्ष एवं अन्य सभी खुम्ब उत्पादक देशों में व्यावसायिक रुप से उगाए जाने वाले खुम्बों में बटन मशरुम (अगेरिकस बाइस्पोरस) ही सबसे अधिक उगाया जाता है। कृत्रिम रुप से विभिन्न वातावरण में इसे पूरे साल उगाया जा सकता है और इसकी चार फसलें ले सकते हैं। जबकि उत्तर भारत की प्राकृतिक परिस्थितियों में यह खुम्ब अक्तूबर से मार्च के बीच उगाया जाता है और तीन-तीन महीने की अवधि की दो फसलें प्राप्त कर सकते हैं।

बटन मशरुम के कवक जाल की वृद्धि के लिए 22-25 डिग्री से. तापमान सबसे अनुकूल होता है जबकि फलनकाय बनने के लिए अनुकूलतम तापमान 16-18 डिग्री से. से अधिक तापमान हानिकारक हो जाता है तथा 14 डिग्री से. के नीचे तापमान पहुँचने पर कवक जाल (कायिक वृद्धि) और फलनकाय, दोनों का बनना कम हो जाता है। 80 से 85 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता, मशरुम- वृद्धि के लिए आवश्यक है।

अगेरिकस की एक अन्य प्रजाति अ. बाइटोरक्विस (ए. बिटोरक्वीस) भी व्यावसायिक रुप से उगायी जाती है। इसकी कायिक वृद्धि के लिए 25-30 डिग्री से. तापमान और फलनकाय बनने के लिए 20-25 डिग्री से. तापमान अनुकूलतम है वैसे उत्तर भारत में बटन मशरुम की खेती के लिए अ. बाइस्पोरस की ही सिफारिश की जाती है क्योंकि यह प्रजाति अधिक लोकप्रिय है।

 

खेती के लिए आवश्यक सामग्री

बटन मशरुम की खेती कृत्रिम रुप से तैयार किए गए कम्पोस्ट पर की जाती है जिसके बनाने की दो विधियाँ हैं – (1) लम्बी विधि और (2) छोटी विधि या पाशच्यूराइजेशन विधि। मशरुम की खेती के लिए आवश्यक चीजें इस प्रकार से हैं – मशरुम घर, 15 सें.मी. से 100 सें.मी. परिणाम की ट्रे अथवा 30 से 45 सें.मी. परिमाक के थेले कम्पोस्ट बनाने के लिए चबूतरा, कम्पोस्ट बनाने की सामग्री, मशरुम स्पान, केसिंग मिट॒टी आदि।

मशरुम घर

एक अच्छा मशरुम घर हवादार एवं तापरोधी होना चाहिए ताकि उसके भीतर तापमान और आपेक्षिक आर्द्रता को नियंत्रित रखा जा सके। इसके भीतर 1500-2500 लक्स तीव्रता के प्रकाश, एग्जॉस्ट पंखे और कूलर या एयर कंडीशनर की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके भीतर ईंटों या कंक्रीट का बना पक्का फ़र्श होना चाहिए।

कम्पोस्ट तैयार करना

पादप-अवशेष मुख्यतः सेल्यूलोज, हेमीसेल्यूलोज और लिग्नन के बने होते हैं जो मशरुम की वृद्धि हेतु तुरन्त उपलब्ध नहीं होते। इन पादप अवशेषों को कम्पोस्टिंग के दौरान इस प्रकार परिवर्तित किया जाता है कि पोषक तत्व मशरुम को उपलब्ध हो सके। मशरुम-कम्पोस्ट बनना एक जटिल जैव रसायन प्रक्रिया है। इसमें सेल्यूलोज, हेमी सेल्यूलोज और लिग्निन आंशिक रूप् से सड़ जाते हैं और अकार्बनिक नाइट्रोजन से सूक्ष्मजीवी प्रोटीन का संशलेषक होता है। कम्पोस्टिंग के दौरान वायवीय परिस्थितियों में जटिल किण्वन प्रक्रिया होती है, जिसमें एक के बाद एक मध्यम तापरागी (मीजोफिलिक) और तापरागी (थर्मोफिलिक) सूक्ष्मजीव भाग लेते हैं। इस कारण से ढेऱ का भीतरी तापमान 75-80 डिग्री से. तक हो जाता है। इस प्रक्रिया में लिग्नोप्रोटीन कॅम्प्लेक्स बनता है जो अ. बाइस्पोरस की वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थिति है। नाइट्रोजन-स्रोतों को कम्पोस्ट में मिलाने के कारण कार्बन/नाइट्रोजन अनुपात भी कम हो जाता है |

कम्पोस्ट सामग्री

कटा हुआ गेहूँ का भूसा/धान पुआल (10-15 सें.मी. लम्बा) 250 कि.ग्रा
गेहूँ/धान का छिलका (चोकर) 20-25 कि.ग्रा.
अमोनियम सल्फेट/कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट 4 कि.ग्रा.
यूरिया 3 कि.ग्रा.
म्यूरेट ऑफ पोटाश 4 कि.ग्रा.
जिप्सम 20 कि.ग्रा.
मेलाथियान 40 कि.ग्रा.

कम्पोस्ट बनाने के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला भूसा एक साल से अधिक पुराना वारिश में भींगा नहीं होना चाहिए। 250 कि.ग्रा. गेहूँ के भूसे के स्थान पर 400 कि.ग्रा. धान पुआल का भी प्रयोग कर सकते हैं। यदि धान का भूसा प्रयोग कर रहे हों तो साथ में 6 किलो बिनौले (कपास का बीज) के आटे का प्रयोग भी करें।

पलटाई कार्यक्रम

पहली पलटाई छठे दिन की जाती है और तत्पश्चातत्‌ पलटाई, 10, 13, 16, 19, 22 और 25वें दिन करते हैं। इस प्रकार से तैयार कम्पोस्ट को 26वें या 27वें दिन ट्रे में भर दिया जाता है।

दूसरी पलटाई के समय कैल्शियम या चॉक पाउडर मिलाते हैं।

तीसरी पलटाई       – जिप्सम मिलाया जाता है।

चौथी पलटाई        – बिनौले का आटा मिलाया जाता है।

अन्तिम पलटाई     के समय 15 मि.लि. मेलाथियॉन और 25 मि.लि. नीमागोन मिला सकते हैं।

एक अन्य फार्मूला

गेहूँ का भूसा 300 कि.ग्रा
अमोनियम सल्फेट या कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट 9 कि.ग्रा.
सुपर फॉस्फेट 3 कि.ग्रा
यूरिया 4 कि.ग्रा
म्यूरेट ऑफ पोटाश/सल्फेट ऑफ पोटाश 3 कि.ग्रा
गेहूँ का चोकर 25 कि.ग्रा
शीरा 5 कि.ग्रा
जिप्सम 30 कि.ग्रा
मेलाथियान 15 मि.लि.
नीमागोन 25-30 मि.लि.

 

कम्पोस्ट बनाने की विधियाँ

कम्पोस्ट दो विधियों द्वारा तैयार किया जा सकता है – (1) लम्बी विधि (2) छोटी विधि या पाशच्युराइजेशन विधि।

1. लम्बी विधि

कम्पोस्ट बनाने वाले चबूतरे के पक्के फ़र्श पर गेहूँ के भूसे (10-15 सें.मी. लम्बा कटा हुआ) की 8-10 इंच मोटाई की पर्त फैला देते हैं। अब इस भूसे पर पानी छिड़का जाता है धीरे-धीरे भूसे को भिंगोया जाता है इस प्रकार दिन में 3-4 बार भूसे को भिंगोते हैं यह भूसा 2 दिन में पूरी तरह भींग जाता है भींगे भूसे में अन्य पदार्थ मिलाने से पहले उनको अच्छी तरह मिलाकर हल्के पानी में भिंगो कर एक गीले टाट से ढंक कर रात भर (16-18 घण्टे) रखते हैं। जिप्सम को छोड़कर दूसरे पदार्थ जैसे गेहूँ का चोकर, यूरिया और कैल्शियम नाइट्रेट आदि को एकसार रूप से अच्छी तरह भींगे हुए भूसे में मिला देते हैं।

इस अच्छी तरह से मिलाए गए भूसे को कम से कम 1 मीटर चौड़ा और 1 मीटर ऊँचा तथा 1 मीटर लम्बा (लम्बाई घट बढ़ सकती है) बना देते हैं। इसे दृढ़ तो बनाया जाता है पर बहुत अधिक सघन रूप से दबाते नहीं हैं। हर 3 या 4 दिन के अन्तराल पर, भूसे के इस ढेर को खोल कर कम्पोस्ट बनाने वाले चबूतरे पर कम से कम आधे घण्टे के लिए फैला दिया जाता है। यदि भूसा सूखा लगे तो इस पर पानी का छिड़काव किया जा सकता है और खोलने के 50-60 मिनट बाद पुनः इसका चट्टा बना दिया जाता है। यह प्रक्रिया हर तीसरे या चौथे दिन दोहराई जाती है।

तीसरी पलटाई के बाद 10 कि.ग्रा. जिन्स इसमें मिला देते हैं तथा शेष 10 कि.ग्रा. जिप्सम चौथी पलटाई के बाद मिलाया जाता हे। तीसरी पलटाई के दौरान जिप्सम की पूरी मात्रा भी एक साथ मिलायी जा सकती है। पाँचवीं पलटाई के दौरान मेलाथियॉन को 5 लि. पानी में घोलकर ऊपर से छिड़ककर अच्छी तरह मिला देते हैं। पुनः चट्टा बना दिया जाता है और इसे 3 दिन बाद खोलते हैं यदि अमोनिया की गंध अभी आती हो तो इसे और 2-3 दिनों के लिए चट्टा बना कर छोड़ देते हैं। इस प्रकार से लम्बी विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने में हर तीसरे दिन पलटाई करने पर 18-21 दिन लग जाते हैं तथा चौथे दिन पलटाई करने पर 26-28 दिन लगते हैं।

2. छोटी विधि या पाशचयुराजेशन विधि

इस विधि में कम्पोस्ट दो अवस्थाओं में तैयार किया जाता है। अवस्था 1. कम्पोस्ट बनाने वाले चबूतरे पर की जाती है और तत्पश्चातत्‌ अवस्था 2. एक बन्द कमरे में होती है जिसमें भाप की सहायता से कम्पोस्ट का पाशच्युराइजेशन एवं स्थिरीकरण (कंडीशन) किया जाता है।

अवस्था I  लग्बी विधि की भांति ही कटे हुए भूसे को चबूतरे पर 30-40 सें.मी. मोटी पर्त बनाकर फैला देते हैं और पानी का छिड़काव करते हैं। 3-4 दिनों तक इसे उलट-पलट कर भिंगोते रहते हैं। चार दिन बाद, जिप्सम को छोड़कर शेष पदार्थ एक सार रूप् से भूसे में अच्छी तरह मिला देते हैं। भूसे के इस चट्टे की प्रत्येक 48 घण्टे बाद पलटाई करते रहते हैं। तीसरी पलटाई के बाद जिप्सम मिलाया जाता है। सातवें दिन इस कम्पोस्ट को ट्रे में भरकर या सीधे पास्च्युराजेशन कक्ष में पहुँचा देते हैं।

अवस्था II  कम्पोस्ट को पास्च्युराइजेशन कक्ष में पहुँचाने के समय वहाँ का तापमान 45 से. रखा जाता है। अब पास्च्युराइजेशन कक्ष को बन्द कर तापरोधी बना दिया जाता है और इसे भाप द्वारा गर्म किया जाता है। भाप पहुँचने से 2-3 घंटे में घीरे-धीरे तापमान बढ़ना शुरु हो जाता है। जब कमरे के भीतर का तापमान 50-52  से. पहुँच जाए तो भाप की आपूर्ति बन्द कर देते हैं। अगले 2-3 दिनों तक यही तापमान (50-52 से.) बनाए रखा जाता है। तत्पश्चातत्‌ 2-3 घंटे के लिए तापमान 58-60 से. तक बढ़ा दिया जाता है।

इसके बाद किसी छोटी खिड़की को खोलकर ताजी हवा कक्ष में घुसने देते हैं जिससे तापमान कम होना शुरू हो जाता है। 12-14 घंटे के भीतर यह तापमान 40-45 से. पहुँच जाता है। अब खिड़की बन्द कर देते हैं। यह तापमान अगले 2-3 दिनों तक बनाए रखते हैं ऐसा करना कम्पोस्ट के स्थिरीकरण के लिए आवश्यक है। इस दौरान तापरागी सूक्ष्मजीव अमोनिया का उपयोग कर इसे कार्बनिक जैवमात्रा में परिवर्तित करते हैं। इसके फलस्वरूप अवस्था 2 के बाद नाइट्रोजन की मात्रा 2.2 से 2.2 प्रतिशत हो जाती है और यह कम्पोस्ट मशरूम की वृद्धि हेतु एक अच्छा संवर्धन माध्यम बन जाता है।

जब कम्पोस्ट परिवात-ताप पर पहुँच जाता है तो यह स्पान मिलाने के लिए तैयार हो जाता है ध्यान रहे बटन मशरूम का स्पान कम्पोस्ट में मिलाते वक्त वह पूरी तरह तैयार तथा अमोनिया गंध रहित हो एवं उसका तापमान 27-28 से. से ज्यादा न हो।

पास्च्युराइज्ड कम्पोस्ट से 6 सप्ताह में मिलने वाली अनुमानित उपज 16-20 कि.ग्रा. प्रति 100 कि.ग्रा. कम्पोस्ट होती है जबकि लम्बी विधि द्वारा बनाए गए कम्पोस्ट से 6-8 सप्ताह में मशरूम की उपज 8-10 कि.ग्रा. प्रति 100 कि.ग्रा. कम्पोस्ट मिलने की सम्भावना होती है।

100 कि.ग्रा. शुष्क भूसे से पानी एवं अन्य अवयव मिलाने के बाद 200 से 225 कि.ग्रा. कम्पोस्ट तैयार हो जाता है |

कम्पोस्टिंग क्यों आवश्यक है ?

(1) इससे  भूसा  नरम हो  जाता है  और  कम्पोस्ट  का नम भार लगभग 550-600 कि.ग्रा./मी. है जिससे इसमें हवा का आदान-प्रदान अधिक होता है।

(2) इससे  कम्पोस्ट  के अवयव मशरूम के लिए पोषक तत्वों में परिवर्तित हो जाते हैं जो मशरूम की वृद्धि के लिए  आवश्यक है। मुक्त अमोनिया, लिग्नन से पॉलीसैके राइड्‌स को मुक्त करती है और इस प्रकार वे मशरूम को उपलब्ध हो जाते हैं।

(3) कम्पोस्टिंग की अवस्था 1 के दौरान जीवाणु (बेक्टीरिया)  कम्पोस्ट से उपलब्ध पोषक तत्वों का तुरन्त उपयोग कर लेते हैं जिसके कारण  अवस्था II के दौरान आवश्यकता से अधिक तापमान और प्रतिस्पर्धी की वृद्धि नहीं होती।

(4) इससे उपयुक्त जैव मात्रा निर्मित होती है और कई प्रकार के सूक्ष्मजीव-उत्पाद बनते हैं जिनमें से कुछ मशरूम की वृद्धि हेतु पोषक का कार्य करते हैं।

(5) इससे अन्य सूक्ष्मजीवों के बजाय बटन की वृद्धि होती है।

(6) इससे  कम्पोस्ट की संरचना परिवर्तित हो जाती है और उसकी जल रोकने की क्षमता बढ़ जाती है।

(7) यह प्रक्रिया  नाइट्रोजन  को स्थायी कार्बनिक अवस्था में परिवर्तित कर देती है ताकि मशरूम को उपलब्ध हो सके जब तक पी.एच. मान 7 से कम रहता है युक्त अमोनिया के बजाय अमोनियम आयन उपस्थित रहते हैं। युक्त अमोनिया बाइस्पोरस पर विषाक्त नहीं होता।

अच्छे कम्पोस्ट के गुण

(1) कम्पोस्ट तैयार करने के लिए  एक  साल से अधिक पुराना भूसा प्रयोग नहीं करना चाहिए और प्रयोग में  लाया  जाने  वाला  भूसा वारिश में भींगा नहीं होना चाहिए। 8-10 सें.मी. लम्बाई का कटा भूसा एकदम सही रहता है ज्यादा  छोटे कटे भूसे से सघनता आती हे जिसके कारण वायु-स्थान कम हो जाते हैं और पानी ठहरने के कारण संदूषक (रोग आने) की संभावना बढ़ जाती है।

(2) सही ढंग से तैयार कम्पोस्ट गहरे भूरे रंग का होता है उसमें अमोनिया शेष नहीं रहती और कोई दुर्गन्ध नहीं आती।

(3) कम्पोस्ट का पी.एच. उदासीन या लगभग उदासीन रहना चाहिए अर्थात 7 और 7.5 के बीच होना चाहिए किसी भी परिस्थिति में यह 8.0 से अधिक नहीं रहना चाहिए अन्यथा ऐसा कवक जाल की वृद्धि के लिए हानिकारक होगा।

(4) कम्पोस्ट में जल की मात्रा 67-70 प्रतिशत की सीमा के भीतर रहनी चाहिए मशरूम की वृद्धि के लिए 68 प्रतिशत जल की मात्रा सर्वधा उपयुक्त है।

(5) इसमें नाइट्रोजन की मात्रा 2.2 से 2.5 प्रतिशत होनी चाहिए।

कम्पोस्ट भरना

कम्पोस्ट को भरने से पहले उसमें जल की मात्रा की जाँच हथेली परीक्षण से कर सकते हैं। इसके लिए कम्पोस्ट को हथेली पर रखकर दबाने से यदि पानी की कुछ बूंदे बाहर निकलें तो समझना चाहिए कि नमी सही है। तैयार कम्पोस्ट का उपयोग अतिशीघर कर लेना चाहिए क्योंकि यदि इसे ढेर में लम्बे समय तक छो़ड़ दिया जाए तो कम्पोस्ट खराब होने लगता है।

पूर्णरूपेक तैयार कम्पोस्ट को ट्रे, रैकों या थैलियों में भर लेते हैं। ट्रे अथवा रैकों में कम्पोस्ट की 6 इंच मोटी पर्त भरते हैं। भरने के बाद कम्पोस्ट को हल्का सा दबाकर समतल कर देते हैं। चार से पाँच ट्रे एक दूसरे के ऊपर रख सकते हैं। सबसे निचली ट्रे जमीन से 20 सें.मी. ऊँचाई पर होनी चाहिए ऊपर-नीचे रखी दो ट्रे के बीच 20-25 सें.मी. का फासला अवश्य रखें जो विभिन्न क्रिया-कलापों और हवा के आने-जाने के लिए आवश्यक है। सबसे ऊपरी ट्रे में कम्पोस्ट और छत के बीच का फासला 100 सें.मी. अवश्य होना चाहिए।

यदि उत्पादन थैलियों में कर रहे हों तो 30 से 45 अथवा 45 से 60 सें.मी. परिणाम की पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग कर सकते हैं। इनमें कम्पोस्ट की 10-12 इंच की पर्त भर कर हल्का सा दबा देते हैं। इन थैलियों में 4-5 सें.मी. के फासले पर 2 मि.मी. व्यास के छेद बना देते हैं। थैलियों के मुँह धागे से बाँध देते हैं। स्पान मिलाने से पहले कम्पोस्ट को 500 पी.पी.एम. बाविस्टीन, टॉप्सिन एम या सीकारिल से उपचारित कर लेना चाहिए।

स्पान मिलाना

स्पान आम भाषा में मशरूम का बीज है। वस्तुतः यह संवर्धन माध्यम पर विकसित मशरूम कवक का कवकजाल होता है। संवर्धन माध्यम प्रायः गेहूँ या अन्य किसी अनाज के दाने होते हैं जो इसकी वृद्धि के लिए पोषक प्रदान करते हैं।

अच्छे स्पान के गुण

एक अच्छे स्पान में सफेद रंग का कवकजाल अच्छी तरह फैला रहता है। एक महीने से अधिक पुराना स्पान प्रयोग नहीं करना चाहिए और अगर जरूरत हो तो इसका भण्डारण 5 डिग्री से. तापमान पर करना चाहिए। इसमें किसी प्रकार का संदूषक नहीं होना चाहिए अर्थात दूसरे सूक्ष्मजीवों से मुक्त होना चाहिए। स्पान किसी इच्छित विभेद ( स्ट्रेन) से तैयार किया जाना चाहिए जिसका भली-भांति परीक्षण किया जा चुका हो और क्षेत्र विशेष के लिए जिसकी संस्तुति की गई हो।

100x50x15 सें.मी. परिमाक की एक ट्रे के लिए लगभग 80-85 ग्राम स्पान पर्याप्त होता है। स्पान की मात्रा मुख्य रूप से वातावरण की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। आदर्द्गा परिस्थितियों में स्पान की मात्रा परिस्थितियों पर निर्भर करती हे। आर्द्र परिस्थितियों में स्पान की मात्रा घटाई जा सकती है जबकि कम तापमान वाले ठंडे/पर्वतीय क्षेत्रों में स्पान की मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए। आमतौर पर (भार/भार) के अनुपात से कम्पोस्ट के भार का 1 प्रतिशत या सूखे भूसे के भार के 2 प्रतिशत के हिसाब से कम्पोस्ट में स्पान मिलाया जाता है।

स्पान मिलाने की विधियाँ

(1) सतह पर स्पान मिलाना :-

स्पान के दाने ट्रे अथवा रैक में भरे कम्पोस्ट की सम्पूर्ण सतह पर फैला दिए जाते हैं और उसके बाद उन्हें  2 सें.मी.  मोटाई की कम्पोस्ट की एक परत से ढक दिया जाता है।

(2) दो पर्तों में स्पान मिलाना :-

इस  विधि  का प्रयोग प्रतिकूल वातावरण, ठंडे इलाकों जहाँ तापमान कम रहता है में किया जाता है।  पहले ट्रे को कम्पोस्ट से आधा भरते हैं। इस पर स्पान फैलाते हैं और तत्पश्चात ट्रे को पूरा भरकर पुनः उसी प्रकार स्पान फैला दिया जाता है। अन्त में कम्पोस्ट की एक पतली परत इसके ऊपर फैला देते हैं इस प्रकार स्पान दो परतों के रूप में मिलाते हैं।

(3) एकसार रूप से स्पान मिलाना :-

प्रयोग की जाने वाली स्पान की सम्पूर्ण मात्रा, अच्छी तरह से पूरे कम्पोस्ट में एकसार रूप से मिला दी जाती है और तब यह मिश्रण ट्रे, रैकों अथवा थैलियों में भरा जाता है। पॉलीथीन की थैलियों में मशरूम उत्पादन  करते समय अक्सर इसी प्रकार से स्पान मिलाया जाता हैं।

(4) कुछ बिन्दुओं  पर  स्पान  मिलाना :-

पहले  ट्रे  या  रैक को कम्पोस्ट से भर लेते हैं। ऊँगली से पंक्तियों  में  4-5 इंच  के  फासले  पर 1-2 इंच गहरे गड्‌ढे में एक चाय वाला चम्मच स्पान से भरकर डाल दिया जाता है जिन्हें ऊपर से कम्पोस्ट द्वारा ढंक देते हैं।

स्पान मिलाने के पश्चात् इन ट्रे अथवा रैकों को पुराने अखबार के पन्नों से ढंक देते हैं और स्प्रेयर (फुहारे) की सहायता से इनके ऊपर घीरे-धीरे पानी छिड़कते हें। 4-5 ट्रे एक दूसरे के ऊपर रखी जा सकती है।

स्पान का फैलना

मशरूम घर का तापमान 22 से 26 डिग्री के बीच और आर्द्रता का स्तर 80-85 प्रतिशत बनाए रखा जाता है इसके लिए समय-समय पर मशरूम घर की दीवारों और फर्श पर पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए। कम्पोस्ट में स्पान फैलाते समय ताजा हवा की आवश्यकता नहीं होती इसलिए अंधेरा और आर्द्रता बनाए रखने के लिए कमरे को बंद रखें। हवा में 26 प्रतिशत स्तर तक कार्बन डाइऑक्साइड गैस, मशरूम के कवकजाल की वृद्धि में सहायक होती है।

अनुकूल परिस्थितओं में स्पान मिलाने के 14-15 दिनों के भीतर कम्पोस्ट की सतह सफेद रूई के समान कवकजाल की वृद्धि से ढंक जाती है। इस अवस्था को कवकजाल फैलने  की पूर्णावस्था कहा जाता है। यदि तापमान अनूकूलतम तापमान से कम है तो इस अवस्था के आने में 20-22 दिन लग सकते है जबकि तापमान अधिक होने पर कवकजाल की वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है।

केसिंग

जब कम्पोस्ट में स्पान पूरी तरह से फैल जाता है तो रैक थैलों अथवा ट्रे पर केसिंग की जाती है। स्पान फैलने के बाद कम्पोस्ट को जिस चीज से ढंका जाता है उसे केसिंग मिट॒टी कहते हैं। अच्छी केसिंग मिट॒टी उदासीन या लगभग उदासीन होनी चाहिए अर्थात उसका पी.एच. माल लगभग 7 होना चाहिए और यह छिद्रयुक्त (पोली) होनी चाहिए ताकि हवा का आदान-प्रदान सुगमता (आसानी) से हो सके। इसकी पानी रोकने की क्षमता भी अधिक होनी चाहिए। केसिंग मिट॒टी निर्जर्मीकृत होनी चाहिए ताकि इसमें हानिकारण पीड़क और सूक्ष्मजीव न रहे। केसिंग इसलिए की जाती है कि मशरूम के फलनकाय बनना आरम्भ हो जायें और बनने के बाद सहारा मिले। विभिन्न प्रकार के केसिंग पदार्थ जो प्रयोग में लाए जा सकते हैं इस प्रकार से हैं :-

(1) तीन हिस्से गाय का सड़ा हुआ गोबर और एक हिस्सा  पाउडर बनाकर छनी हुई क्ले मिट॒टी (3:1) के अनुपात में) मिलाकर केसिंग मिट॒टी के रूप में प्रयोग कर सकते  है। गाय का गोबर एक वर्ष पुराना अवशय होना चाहिए।

(2) मशरूम उगाने के बाद शेष  बचा  कम्पोस्ट (दो वर्ष पुराना) गाय का सड़ा हुआ गोबर और क्ले मिट॒टी 2:1:1 के अनुपात में मिलाकर केसिंग के लिए प्रयोग कर सकते है।

(3) बजरी और गोबर की खाद 1:1 के अनुपात में मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं।

(4) दोमट मिट॒टी और गोबर की खाद 1:1 अनुपात में मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं।

(5) बगीचे की मिट॒टी और गोबर की खाद 1:1 अनुपात में मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं।

केसिंग के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला पदार्थ कम्पोस्ट पर पहले भी-भांति विसंक्रमित कर लेना चाहिए ताकि मिट॒टी में उपस्थित कीट सूत्रकृमि या अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीव मर जाएँ। विसंक्रमक, भाप द्वारा या रसायन द्वारा किया जा सकता है।

भाप द्वारा निसंक्रमक :

एक कक्ष में केसिंग पदार्थ रखकर उसमें भाप प्रवाहित की जाती है और कम से कम चार घंटे तक 56-60 डिग्री से. अथवा 2 घंटे तक 80 डिग्री से. तापमान बनाए रखते हैं।

रासायनिक निसंक्रमक :

यह फॉर्मेलीन द्वारा करते हैं। आधा लिटर 40 प्रतिशत फॉर्मेलीन का घोल 10 लि. पानी में मिलाकर प्रयोग किया जाता है। यह घोल एक धन मीटर केसिंग मिट॒टी के लिए पर्याप्त होता है और उस पर फॉर्मेलीन का पानी में बना घोल छिड़का जाता है। उपचारित मिट॒टी का ढेर बनाकर उसे 48 घंटे के लिए एक अन्य पॉलीथीन की चादर द्वारा ढंक देते हैं। तत्पश्चात एक हपते तक इस केसिंग मिट॒टी को कुरेद कर तथा उलट-पुलट कर फॉर्मेलीन की दुर्गंध दूर करते हैं। फॉर्मेलीन की गंध से मुक्त होने पर यह केसिंग मिट्ट प्रयोग के लिए तैयार हो जाती है।

जब कम्पोस्ट में स्पान पूरी तरह फैल जाता है तो कम्पोस्ट को केसिंग मिट॒टी की 3-5 सें.मी. की पतली परत से ढंक दिया जाता है। केसिंग के बाद अगले 3 दिन तक मशरूम घर का तापमान 24-25 डिग्री से. बनाए रखते हैं। तीन दिन बाद तापमान 18 डिग्री से तक कम कर देते हैं ओर फलनकाय बनने के दौरान तापमान 14-18 डिग्री से. रखा जाता है। तीन दिन के भीतर मशरूम का कवकजाल, केसिंग मिट॒टी पर फैल जाता है।

जब भी आवश्यक हो, स्प्रेयर द्वारा पानी का छिड़काव करना चाहिए और पूरी फसल के दौरान आपेक्षिक आर्द्रता कम से कम 80-85 प्रतिशत बनाए रखते हैं।

 

फलनकाय बनना 

फलनकाय बनते समय ताजा हवा आवश्यक होती है। समय-समय पर स्प्रेयर से पानी का छिड़काव कर  केसिंग  मिट॒टी को नम बनाए रखते हैं। इस दौरान तापमान 14-18 डिग्री से. और आपेक्षिक आद्रता 80-85 प्रतिशत बनाए रखनी चाहिए। अनुकूल परिस्थितियों में सामान्यतया केसिंग के 15-20 दिन बाद मशरूम के पिन दिखाई देने लगते हैं। 4-5 दिन के भीतर ये पिन सफैद बटन का रूप् ले लेते हैं। तुड़ाई योग्य मशरूम तैयार होने में कुल मिलाकर 8-10 दिन लग जाते हैं।

तुड़ाई

जब मशरूम के पीलियस (टोपी) का व्यास 3 – 4.5 सें.मी. तक हो जाय और स्टाइप (तने) की लम्बाई से लगभग दोगुना हो जाय तो इसकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए। यदि तुड़ाई से पहले 2 प्रतिशत एस्कॉर्बिक अम्ल का छिड़काव कर दिया जाय तो मशरूम का रंग सफेद बना हुआ रहता है क्योंकि पॉलीफीनोल ऑक्सिडज नामक एन्जाइम की क्रिया रुक जाती है। जब तक टोपी दृढ़ अवस्था में हो और उसके नीचे स्थित झिल्ली फटी न हो तुड़ाई का सही समय माना जाता है। टोपी ढ़ीली पड़ने और झिल्ली के फटने के फलस्वरुप गिल्स खुलने के बाद मशरूम घटिया समझे जाते हैं और बाजार में भी उनका मूल्य नहीं मिल पाता।

मशरूम तोड़ने के लिए उसकी टोपी को ऊँगलियों से पकड़ते हैं और नीचे की ओर हल्का सा दबाव देते हुए इधर-उधर घुमाकर तोड़ लेते हैं। चाकू द्वारा तने के निचले मिट॒टी लगे हिस्से को काट कर अलग कर देते है ओर साफ सुथरा मशरूम इकट्ठा कर लेते हैं।

उपज (पैदावार)

लम्बी विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने पर प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र से ओसतन 8-10 कि.ग्रा. ताजे मशरूम की उपज प्राप्त होती है। यह उपज प्रति 100 कि.ग्रा. कम्पोस्ट से 5-6 सप्ताह में प्राप्त होती है।

दूसरी ओर जब कम्पोस्ट छोटी विधि द्वारा तैयार किया जाता है और पास्च्यूराइज्ड कम्पोस्ट प्रयोग किया जाता है तो 6 सप्ताह में 100 कि.ग्रा. कम्पोस्ट से 16-20 कि.ग्रा. ताजा मशरूम प्राप्त किया जा सकता है। पॉलीथीन की थैलियों में मशरूम उगाने की विधि से 100 कि.ग्रा. कम्पोस्ट से 16-20 कि.ग्रा. ताजा मशरूम प्राप्त किया जा सकता है।

भण्डारण एवं पैकिंग

(1) परिवात ताप  पर मशरूम को 24 घंटे तक रखा जा सकता हे जबकि प्रशीतित परिस्थितियों में 3-4 दिनों तक इस खुम्ब का भण्डारण किया जा सकता है।

(2) तुड़ाई के बाद मशरूम को बहते पानी में धोकर तुरन्त 5 डिग्री से. पर ठन्डा कर देना चाहिए।

(3) पैकिंग 200 ग्रा. या 500 ग्रा. के  पॉलीथीन की थैलियों में की जाती है लेकिन भण्डारण के दौरान इन थैलियों में एक से.मी.व्यास के दो-दो दोनों तरफ कर देते हैं।

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