Pink Boll Worm (गुलाबी सुंडी)

Table Of Content
  • गुलाबी सुंडी
  • लक्षण
  • जीवन चक्र
  • गुलाबी सूंडी का जीवन चक्र 
  • इससे होने वाले नुकसान
  • इसकी रोकथाम के उपाय
  • सावधानियां
Search गुलाबी सुंडी लक्षण जीवन चक्र गुलाबी सूंडी का जीवन चक्र  गुलाबी सुंडी

पिंक बॉलवॉर्म एशिया का मूल निवासी है लेकिन दुनिया के अधिकांश कपास उगाने वाले क्षेत्रों में एक आक्रामक प्रजाति बन गई है। भारत के कई क्षेत्रों में कपास पर गुलाबी सुंडी एक प्रमुख कीट के रूप में उभर कर आती रही  है । कपास के सबसे बड़े दुश्मन पिंक बॉल वार्म (Pink Boll worm) यानी गुलाबी सुंडी कीट के आक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है । यह इल्ली कपास के बीजों को खाकर आर्थिक हानि पहुँचाती है । गुलाबी इल्ली का प्रकोप फसल के मध्य तथा देर की अवस्था में होता है । गुलाबी सुंडी की लटें फलीय भागों के अंदर छुपकर तथा प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती हैं जिसके कारण इस कीट से होने वाले नुकसान की पहचान करना कठिन होता है और फसल को अधिक नुकसान होता है। फसल का सीजन बदलने के बाद किसानों को लगता है कि अब सूंडी का प्रकोप खत्म हो चुका है। लेकिन केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान गुलाबी सूंडी का कीड़ा पूरी तरह नहीं मरता है यह लकड़ियों और खराब टिंडों में शांत होकर छिप जाता है कीड़ा सीजन आने पर जागता है । गुलाबी सूंडी का कीड़ा 2 किलोमीटर तक उड़कर जा सकता है तो आइये जानते है इसके  लक्षण, जीवन चक्र, नुकसान और उसकी रोकथाम के बारे में :-

लक्षण

प्रौढ़ अवस्था में कीट आकार में छोटे व रंग में गहरे भूरे होते हैं। इनकी अगली पंखों पर काले धब्बे होते हैं तथा पिछली पंख किनारों से झालरनुमा होती हैं । रात को सक्रिय रहने वाला कीट है नमी के वातावरण में यह बहुत एक्टिव हो जाता है और फसल की अन्तिम अवस्था तक बना रहता है ।  यह एक प्रौढ़ गहरे स्लेटी चमकीले रंग का 8 से 9 मि.मी. आकार वाला फुर्तीला कीट है। अंडे हल्के गुलाबी व बैंगनी रंग की झलक लिए होते हैं जो कि प्रायः नई विकसित पत्तियों व कलियों पर पाए जाते हैं । प्रारम्भिक अवस्था में लटों का रंग सफ़ेद होता है जो कि बाद में गुलाबी हो जाते हैं पूर्ण विकसित लटों की लम्बाई 10 से 12 मि.मी. होती है।

जीवन चक्र

प्रत्येक वर्ष नरमा के खेत में फूल आने के समय इसकी मादा पतंगों की पहली पीढी फुलगुड्डी पर या फिरॢ उनके नजदीकी टहनियों, छोटी व नई पत्तियों के निचले हिस्सों पर एक एक करके सफेद व चपटे अंडे देती हैं। इसके बाद वाली पीढियां अपने अंडे एक-एक करके ही फूलों के बाह्यपुंजदल पर देती हैं। सामान्यतौर पर 3 से 4 दिनों में इन अंडों से छोटी सूंडियाँ निकलती हैं, पर तापमान व नमी की अनुकूलता अनुसार यह अंड-विस्फोटन में समय अन्तराल भी हो सकता है। प्रारम्भिक अवस्था में ये सूंडियाँ हल्के सफेद रंग की होती हैं परन्तु बाद में इनका रंग गुलाबी हो जाता है जिसकी वजह से इसका नाम गुलाबी सुंडी पड़ा है। ये सूंडियां कपास की फसल में फूलगुड्डीयों व फूलों पर हमला करती हैं,ओर फूल के अंदर घुसती है,ओर वहीं रहने लगती हैं। सूंडियों से ग्रसित फूल के हिस्से आपस में जुड़ जाते है और पूरी तरह नही खुलते। कपास के ये ग्रसित फूल बनावट में फिरकी या गुलाब के फूल जैसे हो जाते हैं। शुरुआती अवस्था में ही ये छोटी सूंडियां छोटे-छोटे टिंडों में घुस कर कच्चे बिनौले (बीजों) को खाती हैं। टिंडे में घुसने के बाद ये अपने द्वारा बनाएं अपने सुराख को अपने मल से ही बंद कर देती है,जिससे इन पर किसी कीटनाशक का असर नही भी नही होता है,ओर इससे एक समस्या ओर है की जो छेद बंद किया जाता है उसमे फंगस का आक्रमण भी हो जाता है और समस्या दोगुनी हो जाती है। 

गुलाबी सूंडी का जीवन चक्र 

4 से 5 दिन में गुलाबी सूंडी का अंडा तैयार होता है -> -अगले 10 से 14 दिन में लारवा बनता है -> प्यूपा 8 से 13 दिन में तैयार हो जाता है -> 15 से 20 दिन में सूंडी प्रौढ़ अवस्था में पहुंचती है |

इससे होने वाले नुकसान इसकी रोकथाम के उपाय सावधानियां इससे होने वाले नुकसान

वे भोजन के माध्यम से नुकसान पहुंचाते हैं । गुलाबी सुंडी के नुकसान की पहचान अपेक्षाकृत कठिन होती है क्योंकि लटें फलीय भागों के अंदर छुपकर तथा प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती हैं । कपास में फूल लगने और फूल खिलने के दौरान इसका संक्रमण शुरू होता है । संक्रमित फूल गुलाब के फूल की तरह ही रोसेट फूल में बदल जाते हैं । संक्रमित फूल, कलियां और छोटे कपाल बॉल नीचे गिर जाते हैं । लार्वा बॉल में प्रवेश कर शाखाओं और बीजों को नुकसान पहुंचाती है ।  वे बीज पर भोजन करने के लिए कपास की लिंट को चबाते हैं  चूंकि कपास का उपयोग फाइबर और बीज के तेल दोनों के लिए किया जाता है इसलिए नुकसान दुगना होता है। बीजकोष के चारों ओर सुरक्षात्मक ऊतक का उनका विघटन अन्य कीड़ों और कवक के प्रवेश का एक पोर्टल है । कीट का सक्रिय काल मध्य जुलाई से मध्य अक्टूबर है।

इसकी रोकथाम के उपाय

घरेलु उपचार :-

  1. जिन किसानों ने पिछले सीजन की फसल की सूखी लकड़ी संभाल कर रखी है उसे अप्रैल माह से पहले किसी भी तरीके से आग से नष्ट कर दें।
  2. पिछली बार सूंडी के कारण जो टिंडे खराब हो गए थे या अधपके टिंडे थे उन्हें भी नष्ट कर दें। प्रभावित पौधों को बिच में उखाड़ कर जमीन में दबा दें ।
  3. लकड़ियों के ढेर को मच्छरदानी जैसी जाली, तिरपाल से पूरी तरह ढक दें ताकि सूंडी का पतंगा बाहर ना आ पाए और अंडे भी पनप ना सकें।
  4. खेत में बचे अधखुले, खराब टिंडों को नष्ट करने के लिए खेत में भेड़, बकरी आदि जानवरों को चरने दें
  5. सूंडी के प्रकोप वाले खेतों से लकड़ियों को नहीं ले जाना चाहिए और न ही कहीं एकत्र करें । संभव हो तो लकड़ियों को काट कर जमीन में मिला दें ।
  6.  बुआई के दौरान खेत के चारों ओर एक या दो लाइन नॉन बीटी नरमा या अरहर या रिफ्यूजी बीज खेत के चारों तरफ लगाने से गुलाबी सुंडी के प्रबन्धन में आसानी रहती है।

रासायनिक उपचार :

किसान फसल की बुआई के 60 दिनों के बाद नीम के बीजों का अर्क 5% + नीम का तेल ( 5 मिली॰/ली) को मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है। किसान कपास में गुलाबी सुंडी को ख़त्म करने के लिए रासायनिक दवाओं का प्रयोग कर सकते हैं इसके लिए किसान नीचे दिए गए कीटनाशकों में से किसी एक का प्रयोग करें :-

  1. साइपरमेथ्रिन 10 प्रतिशत ई.सी.- 1.0 मिली. प्रति लीटर पानी
  2. मेलिथियान 50 प्रतिशत  ई.सी. – 2.0 मिली. प्रति लीटर पानी
  3. साइपरमेथ्रिन 25 प्रतिशत ई.सी.- 0.4 मिली. प्रति लीटर पानी
  4. डेल्टामेथ्रिन 2.8 प्रतिशत ई.सी. – 1.0 मिली. प्रति लीटर पानी
सावधानियां

 

  1. तेज हवा या बारिश के टाइम स्प्रे न करें ।
  2. आँखों की सुरक्षा करें ।
  3. स्प्रे के बाद अपना हाथ, पैर और चेहरा अच्छी तरह से धोएं ।
  4. कीटनाशक का छिड़काव सुबह 11 बजे से पहले या शाम 5 बजे के बाद ही करें दोपहर को यह पतंगे सक्रिय नहीं होते हैं जिससे इनको नुकसान नहीं पहुंचता है ।
  5. कीटनाशकों के प्रयोग के समय किसी भी स्टिकर का प्रयोग अवश्य करें इससे कीटनाशक की क्षमता बहुत बढ़ जाती है स्प्रे के दौरान या स्प्रे करने के 8 से 12 घंटे के अंदर बारिश आ जाए दोबारा कीटनाशक का प्रयोग करें ।
  6. बच्चों की पहुच से दूर रखें ।
Posts प्रगतिशील किसान सम्मान योजनाभारत की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत‌ बनाए रखने में किसान भी अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन आज भी कहीं ना कहीं हमारे देश के किसानों के कार्य एवं मेहनत को सही सम्मान नहीं मिल पाता है। इसी बिंदु को मद्देनजर रखते हुए हरियाणा सरकार द्वारा अपने राज्य के प्रगतिशील किसानों….Click Hereभावान्तर भरपाई योजना का संक्षिप्त विवरणमण्डी में सब्जी व फल की कम कीमत के दौरान किसानों का निर्धारित संरक्षित मूल्य द्वारा ज़ोखिम को कम करना। कृषि में विविधिकरण के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना।बागवानी उत्पादकों के लिए मण्डी में उनके उत्पादन के कम दाम मिलने पर सरकार द्वारा भरपाई करने की एक अनूठी योजना..Click Hereमेरा पानी मेरी विरासत योजनाहरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी के द्वारा लॉन्च की गयी है | इस योजना के अंतर्गत हरियाणा के डार्क जोन में शामिल क्षेत्रों में धान की खेती छोड़ने तथा धान के स्थान पर अन्य विकल्पित फसलों की बुआई करने वाले किसानों को 7 हजार रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन धनराशि राज्य सरकार द्वारा प्रदान की जाएगी…Click Here Previous slide Next slide
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मिर्च के पौधे

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  • परिचय
  • जलवायु और मृदा
  • मिर्च की उन्नत किस्में
  • मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन
  • मिर्च के महत्वपूर्ण कीट एवं प्रबंधन तकनीक
  • मिर्च के महत्वपूर्ण रोग एवं प्रबंधन तकनीक

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परिचय
जलवायु और मृदा
मिर्च की उन्नत किस्में
मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन
परिचय

मिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये। काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे. हरी मिर्च.)

मिर्च उगाने वाले महत्वपूर्ण राज्य आंध्र प्रदेश (समग्र), महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा और तमिलनाडु हैं जो भारत का 70 प्रतिशत से अधिक रकबा बनाते हैं।

जलवायु और मृदा

मिर्च की खेती विविध प्रकार की मिट्टियों मे जिसमे की कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त हो एवं जल निकास की उचित सुविधा हो, मे सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिर्च की फसल जलभराव वाली स्थिति सहन नही कर पाती है। यद्यपि मिर्च को pH 6.5—8.00 वाली मिट्टी मे भी (वर्टीसोल्स) मे भी उगाया जा सकता है |
मिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये।

मिर्च की उन्नत किस्में

काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे हरी मिर्च.) जवाहर मिर्च -218 (उपज 18-20 क्वि. / हे सूखी मिर्च.) अर्का सुफल (उपज 250 क्वि. / हे.) तथा संकर किस्म काशी अर्ली (उपज 300-350 क्वि. / हे.), काषी सुर्ख या काशी हरिता (उपज 300 क्वि. / हे.) का चयन करें। पब्लिक सेक्टर की एचपीएच-1900, 2680, उजाला तथा यूएस-611, 720 संकर किस्में की खेती की जा रही है।

मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन

मिर्च की पौध तैयार करने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहाँ पर पर्याप्त मात्रा में धूप आती हो तथा बीजो की बुवाई 3 गुणा 1 मीटर आकार की भूमि से 20 सेमी ऊँची उठी क्यारी में करें। मिर्च की पौधशाला की तैयारी के समय 2-3 टोकरी वर्मी कंपोस्ट या पूर्णतया सड़ी गोबर खाद 50 ग्राम फोटेट दवा / क्यारी मिट्टी में मिलाऐं। बुवाई के 1 दिन पूर्व कार्बन्डाजिम दवा 1.5 ग्राम/ली. पानी की दर से क्यारी में टोहा करे। अगले दिन क्यारी में 5 सेमी दूरी पर 0.5-1 सेमी गहरी नालियाँ बनाकर बीज बुवाई करें।

बीज की मात्रा :-

मिर्च की ओ.पी. किस्मों के 500 ग्राम तथा संकर (हायब्रिड) किस्मों के 200-225 ग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र की नर्सरी तैयार करने के लिए पर्याप्त होती है।

रोपाई की तकनीक एवं समय :- 

मिर्च की रोपाई वर्षा, शरद, ग्रीष्म तीनों मौसम  मे की जा सकती है। परन्तु मिर्च की मुख्य फसल खरीफ (जून-अक्टू.) मे तैयार की जाती है। जिसकी रोपाई जून.-जूलाई मे, शरद ऋतु की फसल की रोपाई सितम्बर-अक्टूबर तथा ग्रीष्म कालीन फसल की रोपाई फर-मार्च में की जाती है।

पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक :-

मिर्च की फसल मे उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करे। सामान्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्रफल मे 200-250 क्वि गोबर की पूर्णतः सड़ी हुयी खाद या 50 क्वि. वर्मीकंपोस्ट खेत की तैयारी के समय मिलायें। नत्रजन 120-150 किलों, फास्फोरस 60 किलो तथा पोटाश 80 किलो का प्रयोग करे।

मिर्च के महत्वपूर्ण कीट एवं प्रबंधन तकनीक
मिर्च के महत्वपूर्ण रोग एवं प्रबंधन तकनीक
मिर्च के महत्वपूर्ण कीट एवं प्रबंधन तकनीक

कीट प्रमुख लक्षण रोकथाम / नियंत्रण के उपाय
थ्रिप्स वैज्ञानिक भाषा मे इसे सिटरोथ्रिटस डोरसेलिस हुड कहते है। छोटी अवस्था मे ही कीट पौधों की पत्तियों एवं अन्य मुलायम भागों से रस चूसते है जिसके कारण पत्तियां उपर की ओर मुड कर नाव के समान हो जाती है। 1. बुवाई के पूर्व थायोमिथम्जाम 5 ग्राम प्रति किलो बीज दर से बीजोचार करे।
2. नीम बीज अर्क का 4 प्रतिशत का छिडकाव करें।
3. रासायनिक नियंत्रण के अंतर्गत फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एस.सी. 1.5 मि. ली. 1 ली. पानी मे मिला कर छिडकाव करें।
4. एसिटामिप्रिड 0.2 ग्रा. 1 ली. या इमिडक्लोप्रिड 0.3 ग्रा. 1 ली. या थायोमिथम्जाम 0.3 ग्र्रा.1 ली. पानी में मिलाकर छिडकाव करें।
सफ़ेद मक्खी इस कीट का वैज्ञानिक नाम बेमिसिया तवेकाई है  जिसके शिशु एवं वयस्क पत्तियों की निचली सतह पर चिपक कर रस चूसते हैं जिसकी पत्तियां नीचे तरफ मुड़ जाती हैं । 1. कीट की सतत निगरानी कर तथा संख्या के आधार पर डाईमिथएट की 2 मि.ली. मात्रा 1 पानी मिलकर छिड़काव करें ।
2. अधिक प्रकोप की स्थिति में थायमेथाइसम 25 डब्लू जी की 5 ग्राम मात्रा 15 ली. पानी में मिलकर छिड़काव करें ।
माइट कीट का वैज्ञानिक नाम – हेमीटारयोनेमसलाटस बैंक है। यह बहुत ही छोटे कीट होते है जो पत्तियों की सतह से रस चूसते है जिसम पत्तियां नीचे की ओर मुड जाती है। 1. नीम की निबोंली के सत का 4 प्रतिशत का छिडकाव करे।
2. डायोकोफाल 2.5 मि.ली. या ओमाइट 3 मि.ली. / ली. पानी मे मिलाकर छिडकाव करें।

मिर्च के महत्वपूर्ण रोग एवं प्रबंधन तकनीक

प्रमुख लक्षण रोकथाम / नियंत्रण के उपाय
डेम्पिंग ऑफ़ आर्द्रगलन इस रोग का कारण पीथियम एफिजडरमेटम, फाइटोफ्थोरा स्पी. फफूंद जिसम नर्सरी में पौधा भूमि की सतह के पास से गलकर गिर जाता है। 1. मिर्च की नर्सरी उठी हुयी क्यारी पद्धति से तैयार करे जिसम जल निकास की उचित व्यवस्था हो।
2. बिजोचार कार्बेन्डाजिम 1 ग्रा.दवा 1 किलो बिज से करें।
एन्थे्रक्लोज कोलेटोट्राइकम कैप्सीकी नामक फफूंद से होने वाला अतिव्यापक एवं महत्वपूर्ण रोग है। विकसित पौधों पर शाखाओं का कोमल शीर्ष भाग ऊपर से नीचे की ओर सूखना प्रारम्भ होता है। 1. फसल चक्र अपनाएं तथा स्वस्थ व प्रमाणित बीज बोये बुवाई पूर्व बिजोंचार अवश्य करें।
2. रोग का प्रारंभिक अवस्था मे ही लाइटक्स 50, अइथेन 45, के 0. 25 प्रतिशत धोल का 7 दिन अंतराल पर अवश्यकता अनूसार छिडकाव करें।
जीवाणु जम्लानी (बैक्टीरियलविल्ट) इस रोग का कारण स्यूडोमोनस सोलेनेसियेरम नमक जीवाणु है | शिमला मिर्च, टमाटर तथा बैगन में इसका अधिक प्रकोप होता है | पौध रोपण पूर्व बोरडेक्स मिश्रण के
1 घोल या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम दवा 1 ली. पानी में घोलकर मृदा उपचार अवश्य करें या टोह करें
ट्राइकोडर्मा विरिडी या हरजीयनम 4 ग्राम और मेटलेक्सिल 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें
पर्ण कुंचन यह रोग विषाणु के कारण होता है जो कि तंबाकूपर्ण कुंचन विषाणु से होता है। रोग के कारण पौधें की पत्तियां छोटी होकर मुड जाती है तथा पौधा बोना हो जाता है यह रोग सफेद मक्खी कीट के कारण एक दूसरे पौधे पर फैलता है 1. नर्सरी मे रोगी पौधौं को समय-समय पर हटाते रहे। तथा स्वस्थ पौधौं का ही रोपण करे।
2. रसचूसक कीटो के नियंत्रण हेतू अनुशंसित दवाओं का प्रयोग करे ।

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सेब के लिए कटाई के बाद का प्रबंधनवैज्ञानिक रूप से मैलस पुमिला के नाम से जाना जाने वाला सेब अपनी कुरकुरी बनावट और मीठे-तीखे स्वाद के लिए पसंद किया जाता है। भारत में, सेब की खेती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है। इसके अतिरिक्त, इसे कुछ हद तक अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड….Click Hereभारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजनाभारत सरकार ने उन किसानों का समर्थन करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास किया है जो रसायनों के उपयोग के बिना खेती करना चुनते हैं और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के लिए बाजार का विस्तार करते हैं। साल 2023-2024 तक एक विशिष्ट और स्वतंत्र योजना के रूप में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) बनाकर..Click Hereराष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशनआत्मनिर्भर भारत योजना के एक भाग के रूप में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन की घोषणा की गई। आइए इन शीर्षकों के तहत योजनाओं के विवरण के बारे में जानें
लॉन्च की तारीख – देश में एकीकृत कृषि प्रणाली को ध्यान में रखते हुए 2020 में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन शुरू किया गया है।
NBHM: मंत्रालय – NBHM कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है…Click Here

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कपास की फसल में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीट एवं उनका प्रबंधन

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  • कपास की उन्नत उत्पादन तकनीक
  • उन्नत क़िस्म
  • बुवाई का समय एवं विधि
  • बुवाई का समय एवं विधि
  • खाद एवं उर्वरक
  • सिचांई
  • कीटनाशक,पहचान,नियंत्रण करने के उपाय
  • उपज
  • कपास की चुनाई के समय रखने वाली सावधानियाँ

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कपास संपूर्ण भारत के किसानों के लिए एक नकदी फसल मानी जाती है। इसकी खेती केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्वभर में की जाती है, लेकिन कपास के उत्पादन में भारत का स्थान सबसे पहले आता है। चूँकि कपास एक नकदी फसल है, इसलिए इसकी खेती किसानों की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पिछले कुछ वर्षों में कपास फसल के उत्पादन और कीमत में काफी उछाल देखी गयी है। कपास की फसल से जहाँ एक तरफ किसान अधिक आय प्राप्त करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ किसानों को अपनी फसल से कीटों और रोगों के चलते काफी नुकसान भी झेलना पड़ता है। जी हाँ अक्सर मौसम में अधिक नमी और अनियमितता की वजह से फसल में विभिन्न प्रकार के कीटों का आक्रमण हो जाता है, जो फसलों को भारी हानि पहुंचाते हैं साथ ही किसानों की मेहनत और आय को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए  यदि आपने भी अपने खेतों में कपास की खेती की है एवं उसमें किसी भी प्रकार के कीटों के हमले का सामना कर रहे हैं, तो आप इस लेख में बताये गए सुझाव के अनुसार अपनी कपास की फसल को सुरक्षित कर सकते हैं।

कपास की उन्नत उत्पादन तकनीक

  • कपास रेशे वाली फसल हैं यह कपडे़ तैयार करने का नैसर्गिक रेशा हैं।
  • मध्यप्रदेश में कपास सिंचित एवं असिंचित दोनों प्रकार के क्षेत्रों में लगाया जाताहैं।
  • प्रदेश में कपास फसल का क्षेत्र 7.06 लाख हेक्टेयर था तथा उपज 426.2 किग्रा लिंट/हे.
  • बीटी कपास में रस चूसक कीटों के नियंत्रण के लिये 2-3छिडकाव कर नापर्याप्त होता हैं जबकि पहले में देश की कुल कीटनाशक खपत का लगभग आधाभाग लग जाता था।
  • बी.टी.कपास से अधिकतम उपज दिसम्बर मध्य तक लेली जाती हैं जिससे रबी मौसम गेहूँ का उत्पादन भी लिया जा सकता हैं।

उन्नत क़िस्म

संकर किस्म उपयुक्त क्षेत्र जिले विशेष
डी.सी.एच. 32 (1983) धार, झाबुआ, बड़वानी खरगौन महीन रेशेकी किस्म
एच-8 (2008) खण्डवा, खरगौन व अन्य क्षेत्र जल्दी पकने वाली किस्म 130-135दिन
रासी 659 बीजी II (Rasi 659 BG II) सिरसा,फतेहाबाद,हिसार,आदि यह किस्म मध्यम भारी मिट्टी में लगाई जाती है।
इसके बड़े बॉल होते है ।
यह किस्म 145-160 दिन की होती है।
अजीत 155 बीजी II (Ajeet 155 BG II) सिरसा,फतेहाबाद,हिसार,आदि यह किस्म मध्यम हल्की मिट्टी में लगाई जाती है
इसके बॉल मध्यम आकर के होते है।
यह किस्म 140-150 दिन की होती है।

बुवाई का समय एवं विधि

यदि पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध हैं तो कपास की फसल को मई माह में ही लगाया जा सकता हैं सिंचाई की पर्याप्त उपलब्धता न होने पर मानसून की उपयुक्त वर्षा होते ही कपास की फसल लगावें। कपास की फसल को मिट्टी अच्छी भूरभूरी तैयार कर लगाना चाहिए। सामान्यतः उन्नत जातियों का 2.5 से 3.0 किग्रा. बीज (रेशाविहीन/डिलिन्टेड) तथा संकर एवं बीटी जातियों का 1.0 किग्रा. बीज (रेशाविहीन) प्रति हेक्टेयर की बुवाई के लिए उपयुक्त होता हैं। उन्नत जातियों में चैफुली 45-60*45-60 सेमी. पर लगायी जाती हैं (भारी भूमि में 60*60, मध्य भूमि में 60*45, एवं हल्की भूमि में ) संकर एवं बीटी जातियों में कतार से कतार एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी क्रमशः 90 से 120 सेमी. एवं 60 से 90सेमी रखी जाती हैं |

खाद एवं उर्वरक

प्रजाति नत्रजन (किलोग्राम/हे. ) फास्फोरस/हे. पोटाश/हे. गंधक (किग्रा/हे.)
उन्नत 80-120 40-60 20-30 25
संकर 150 75 40 25
15% बुआई के समय एक चैथाई 30 दिन, 60 दिन, 90 दिन पर बाकी 120 दिन आधा बुआई के समय एवं बाकी 60 दिन पर आधा बुआई के समय एवं बाकी 60 दिन पर बुआई के समय
  • उपलब्ध होने पर अच्छी तरह से पकी हुई गोबर की खाद/कम्पोस्ट 7 से 10 टन/हे. (20 से 25 गाड़ी) अवश्य देना चाहिए ।
  • बुआई के समय एक हेक्टेयर के लिए लगने वाले बीज को 500 ग्राम एजोस्पाइरिलम एवं 500 ग्राम पी.एस.बी. से भी उपचारित कर सकते है जिससे 20 किग्रा नत्रजन एवं 10 किग्रा स्फुर की बचत होगी।
  • बोनी के बाद उर्वरक को कालम पद्धति से देना चाहिए। इस पद्धति से पौधे के घेरे/परिधि पर 15 सेमी गहरे गड्ढे सब्बल बनाकर उनमें प्रति पौधे को दिया जाने वाला उर्वरक डालते है व मिट्टी से बंद कर देते है।

सिचांई

एकान्तर (कतार छोड़ ) पद्धति अपना कर सिंचाई जल की बचत करे बाद वाली सिंचाईयाँ हल्की करें,अधिक सिंचाई से पौधो के आसपास आर्द्रता बढ़ती है व मौसम गरम रहा तो कीट एवं रोगों के प्रभाव की संभावना बढ़ती है ।

कीटनाशक,पहचान,नियंत्रण करने के उपाय

कीट पहचान हानि नियंत्रण के उपाय
हरा मच्छर पंचभुजाकार हरे पीले रंग के अगले जोड़ी पंख पर एक काला धब्बा पाया जाता है शिशु -व्यस्क पत्तियों के निचले भाग से रस चूसते है। पत्तिया क्रमशः पीली पड़कर सूखने लगती है। 1.पूरे खेत में प्रति एकड़ 10 पीले प्रपंच लगाये। 2.नीम तेल 5 मिली.टिनोपाल/सेन्डोविट 1 मिली.प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।3.रासायनिक कीटनाशी थायोमिथाक्ज़्म 25डब्लुजी – 100 ग्राम सक्रिय तत्व/हेएसिटामेप्रिड 20एस.पी. – 20 ग्राम सक्रिय तत्व/हे.इमिडाक्लोप्रिड 17.8एस.एल – 200 मिली.सक्रिय तत्व/हे ट्रायजोफास 40ईसी 400 मिली सक्रिय तत्व/हे.एक बार उपयोग में लाई गई दवा का पुनः छिड़काव नहीं करें।
सफेदमक्खी हल्के पीले रंग की जिसका शरीर सफेद मोमीय पाउडर से ढंका रहता है पत्तियो से रस चूसती है एवं मीठा चिपचिपा पदार्थ पौधे की सतह पर छोड़ते है वायरस का संचरण भी करती है।
तेला अत्यंत छोटे काले रंग के कीट पत्तियो की कनचली समह से खुरचकर हरे पदार्थ का रस पान करते है।
मिलिबग मादा पंखी विहीन,शरीर सफेद पाउडर से ढंका। शरीर पर काले रंग के पंख। तने,शाखाओं,पर्णवृतों,फूल पूड़ी एवं घेटोंपर समूह में रस चूसकर मीठा,चिपचिपा पदार्थ उत्सर्जित करती है।

उपज

देशी/उन्नत जातियों की चुनाई प्रायः नवम्बर से जनवरी-फरवरी तक, संकर जातियों की अक्टूबर-नवम्बर से दिसम्बर-जनवरी तक तथा बी.टी. किस्मों की चुनाई अक्टूबर से दिसम्बर तक की जाती है। कहीं-कहीं बी.टी. किस्मों की चुनाई जनवरी-फरवरी तक भी होती है। देशी/उन्नत किस्मों से 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, संकर किस्मों से 13-18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथी बी.टी. किस्मों से 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक औसत उपज प्राप्त होती है।

कपास की चुनाई के समय रखने वाली सावधानियाँ

  • कपास की चुनाई प्रायः ओस सूखन के बाद ही करनी चाहिए।
  • अविकसित, अधखिले या गीले घेटों की चुनाई नहीं करनी चाहिए ।
  • चुनाई करते समय कपास के साथ सूखी पत्तियाँ, डण्ठल, मिट्टी इत्यादि नहीं आना चाहिए।
  • चुनाई पश्चात् कपास को धूप में सुखा लेना चाहिए क्योंकि अधिक नमी से कपास में रूई तथा बीज दोनों की गुणवत्ता में कमी आती है । कपास को सूखाकर ही भंडारित करें क्योंकि नमी होने पर कपास पीला पड़ जायेगा व फफूंद भी लग सकती हैं।

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मिर्च के पौधेमिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये। काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे. हरी मिर्च.)….Click Hereभारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजनाभारत सरकार ने उन किसानों का समर्थन करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास किया है जो रसायनों के उपयोग के बिना खेती करना चुनते हैं और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के लिए बाजार का विस्तार करते हैं। साल 2023-2024 तक एक विशिष्ट और स्वतंत्र योजना के रूप में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) बनाकर…Click Hereराष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशनआत्मनिर्भर भारत योजना के एक भाग के रूप में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन की घोषणा की गई। आइए इन शीर्षकों के तहत योजनाओं के विवरण के बारे में जानें
लॉन्च की तारीख – देश में एकीकृत कृषि प्रणाली को ध्यान में रखते हुए 2020 में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन शुरू …Click Here

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Termite(दीमक)

दीमक एक सामाजिक कीट है। दीमक हल्के पीले या भूरे रंग के कोमल कीट होते हैं।  चींटी की जाति का एक छोटा कीड़ा जो समूह में रहता है और कागज़, लकड़ी, पौधों आदि को खा जाता है। इसको सफेद चींटी भी कहा जाता है | दुनिया भर में लगभग 2,750 से अधिक प्रजातियां है, यह उष्णकटिबंधीय व शीतोष्ण क्षेत्रों सबसे ज्यादा पाये जाते है, कुछ प्रजाति ठंडे तापमान के लिए अनुकूलित होते है| दीमक मिट्टी के अन्दर या आस-पास तथा नमी वाले स्थान पर पाये जाते है| इसका अस्तित्व 120 मिलियन से अधिक वर्षों से है | दीमक भोजन में क्या खायेगी यह उसके विभिन्न प्रजातियों पर निर्भर करता है| यह सेल्यूलोज युक्त कार्बनिक पदार्थ को खाते हैं,यह आमतौर पर मृत पौधे, पत्ती, लकड़ी, कूड़े, मिट्टी तथा जानवरों के गोबर को ग्रहण करते है | तो आइये जानते है इसके  लक्षण, जीवन चक्र, नुकसान और उसकी रोकथाम के बारे में:-

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Pink Boll Worm (गुलाबी सुंडी)

पिंक बॉलवॉर्म एशिया का मूल निवासी है, लेकिन दुनिया के अधिकांश कपास उगाने वाले क्षेत्रों में एक आक्रामक प्रजाति बन गई है। भारत के कई क्षेत्रों में कपास पर गुलाबी सुंडी एक प्रमुख कीट के रूप में उभर कर आती रही  है। कपास में कपास के सबसे बड़े दुश्मन पिंक बॉल वार्म (Pink Boll worm) यानी गुलाबी सुंडी कीट के आक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है। यह इल्ली कपास के बीजों को खाकर आर्थिक हानि पहुँचाती है। गुलाबी इल्ली का प्रकोप फसल के मध्य तथा देर की अवस्था में होता है। गुलाबी सुंडी की लटें फलीय भागों के अंदर छुपकर तथा प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती हैं जिसके कारण इस कीट से होने वाले नुकसान की पहचान करना कठिन होता है, और फसल को अधिक नुकसान होता है। फसल का सीजन बदलने के बाद किसानों को लगता है कि अब सूंडी का प्रकोप खत्म हो चुका है। लेकिन केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान गुलाबी सूंडी का कीड़ा पूरी तरह नहीं मरता है | यह लकड़ियों और खराब टिंडों में शांत होकर छिप जाता है कीड़ा, सीजन आने पर जागता है | गुलाबी सूंडी का कीड़ा 2 किलोमीटर तक उड़कर जा सकता है। तो आइये जानते है इसके  लक्षण, जीवन चक्र, नुकसान और उसकी रोकथाम के बारे में:-

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