Kohlrabi

 

Table Of Content

  • नोल खोल की खेती
  • नोल खोल के लिए जलवायु
  • नोल खोल के लिए मिट्टी
  • नोल खोल का बीज दर
  • नोल खोल की बुवाई का समय
  • नोल खोल के लिए खेत की तैयारी
  • नोल खोल के लिए खाद
  • नोल खोल की सिंचाई
  • नोल खोल में खरपतवार नियंत्रण
  • नोल खोल की पैदावार
  • नोल खोल की खेती के समय जरूरी बातें
  • नोल खोल को कितनी धूप की होती है आवश्यकता
  • क्या नोल खोल को कंटेनरों में उगाया जा सकता है

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नोल खोल की खेती

नोल खोल जंगली गोभी (Knol Khol Wild Cabbage) की एक किस्म है, जो द्विवार्षिक रूप से बढ़ती है यानी इसको दो साल में एक बार ही उगाया जा सकता है | आमतौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका में इसे वार्षिक रूप से उगाया जाता है, लेकिन भारत में इसकी खेती कश्मीर, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में होती है | इसको आमतौर पर कोल्हाबी (Kohlrabi) के नाम से भी जाना जाता है |

बता दें कि हिंदी में इसको गांठगोभी (Ganth Gobhi) कहते हैं और खाने के मामले में इसकी पत्तियों का भी उपभोग किया जाता है इस पर सफेद, हल्के हरे और बैंगनी रंग की त्वचा होती है | यह गोभी, ब्रोकोली, फूलगोभी, ब्रसेल्स स्प्राउट्स, और गाई लैन जर्मन शलजम के परिवार से है | लोगों का कहना है कि कोल्हाबी कच्ची और पक्की दोनों तरह से स्वादिष्ट होती है |

नोल खोल के लिए जलवायु

यह भारतीय परिस्थितियों में उगने के लिए ज्यादा अनुकूल नहीं मानी जाती है, लेकिन यह सर्दी के प्रति अधिक सहिष्णु (Tolerant) है बता दें कि उत्तर भारत में इसकी खेती रबी सीजन (Rabi Season) में की जाती है |

नोल खोल के लिए मिट्टी

इसको सभी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन इसकी अच्छी उपज के लिए भारी दोमट मिट्टी (Heavy Loamy Soil) सबसे अच्छी होती है | मिट्टी की औसत पीएच रेंज 6.5 से 7.0 होनी चाहिए यह अत्यधिक अम्लीय और क्षारीय मिट्टी (Acidic and Alkaline Soil) के प्रति संवेदनशील है |

नोल खोल का बीज दर

मौसम के अनुसार, एक हेक्टेयर (करीब 2.4711 एकड़) भूमि में इसकी नर्सरी उगाने के लिए लगभग 1 से 1.5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है |

नोल खोल की बुवाई का समय

कोल्हबी के बीज सितंबर-अक्टूबर माह में बोएं जाते हैं और इसकी रोपाई अक्टूबर-नवंबर महीने में की जाती है | यह 4.4 से 23.9 डिग्री सेल्सियस के तापमान में सबसे अच्छी तरह से बढ़ती है |

नोल खोल के लिए खेत की तैयारी

भूमि की 3 से 4 बार जुताई करें और आखिरी जुताई में 20-25 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद डालें |

नोल खोल के लिए खाद

आमतौर पर रोपाई या अंतिम जुताई के समय P205, K20 की पूरी खुराक और नाइट्रोजन की आधी मात्रा के साथ 10 से 15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद (Cow Dung Manure) जरूर डालें. नाइट्रोजन की बची हुई खुराक रोपाई के 4 सप्ताह बाद देनी चाहिए |

नोल खोल की सिंचाई

फसल को मिट्टी और मौसम की स्थिति के आधार पर 4 से 7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए इसको उगने के लिए मिट्टी में नमी होना बेहद जरूरी है.

नोल खोल में खरपतवार नियंत्रण

चूंकि यह एक जड़ वाली फसल है, इसलिए खरपतवारों को नष्ट करने के लिए मिट्टी में लगातार उथली खेती (Shallow Farming) की जानी चाहिए ऐसे में पेंडीमेथालिन का 1 से 2 किग्रा प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें |

नोल खोल की पैदावार

इसको पूरी तरह विकसित होने में 45 से 60 दिन लगते हैं और प्रति हेक्टेयर लगभग 200 क्विंटल की उपज होती है |

नोल खोल की खेती के समय जरूरी बातें

  • कोल्हाबी की खेती तेज रोशनी में करनी चाहिए.
  • नोल खोल की खेती उस मिट्टी पर की जानी चाहिए, जो कार्बनिक पदार्थों से भरपूर हो.
  • रोपण शुरू करने से पहले मिट्टी में 2 इंच (5 सेंटीमीटर) पुरानी खाद डालें.
  • कोल्हाबी मिट्टी में 6.5 से 7.0 के पीएच रेंज के साथ पनपती है.
  • मौसम के बीच में कोल्हाबी को पुरानी खाद के साथ तैयार किया जाना चाहिए.
  • हल्के सर्दी के क्षेत्रों में कोल्हाबी की खेती पूरे वर्ष की जा सकती है.
  • सर्दियों की फसल के लिए कोल्हाबी की बुवाई का इष्टतम समय सितंबर है.
  • कोल्हाबी रेतीली मिट्टी पर अच्छी तरह से नहीं उगती है.

नोल खोल को कितनी धूप की आवश्यकता होती है

प्रतिदिन इसको लगभग 6 घंटे सीधी धूप की जरूरत होती है साथ ही इसके लिए अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ नम मिट्टी की आवश्यकता होती है जिसमें अच्छी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ हों |

क्या नोल खोल को कंटेनरों में उगाया जा सकता है

कोल्हाबी एक कंटेनर में उगाने के लिए सबसे अच्छी सब्जी है इसके लिए एक कंटेनर का चयन करें, जो लगभग 16 इंच चौड़ा और 16 इंच गहरा हो | इसे अच्छी तरह से मिट्टी के मिश्रण से भरें, जिसमें पोषक तत्वों से भरपूर खाद शामिल हो |

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Fennelमसाला फसलों में सौंफ का अपना विशिष्ट स्थान है। ये अपनी खुशबू के कारण लोकप्रिय होने के साथ ही औषधी के रूप में भी पहचानी जाती है। इसका सब्जियों में प्रयोग होने के साथ ही आचार बनाने में भी किया जाता है। यदि इसके औषधीय महत्व की बात करें तो इसे कई रोगों में दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है…Click HereBambooबांस का उपयोग बल्ली, सीढ़ी, टोकरी,चटाई टोकरी, बांस से बनी बोतल, फर्नीचर, खिलौने, कृषि यंत्र बनाने सहित अन्य साज-सज्जा का समान बनने के लिए किया जाता है। इसके अलावा कागज बनाने में इसका उपयोग होता है। अब तो घरों को आधुनिक लुक देने में भी बांस का प्रयोग किया जाने लगा है…Click Here Watercressवॉटरक्रेस एक स्वादिष्ट सलाद फसल है, जो खनिजों और पोषक तत्वों से भरपूर है, और इसका स्वाद तीखा, चटपटा, थोड़ा तीखा होता है। इसे अकेले खाया जा सकता है, या अन्य सलाद सामग्री के साथ मिलाया जा सकता है, और एक स्वादिष्ट ठंडा सूप बनाया जा सकता है…Click Here
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Parsnip

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  • घर पर गमले में पार्सनिप कैसे उगाएं
  • पार्सनिप के बारे में मुख्य जानकारी
  • पार्सनिप का पौधा कब लगाना चाहिए
  • पार्सनिप के पौधे लगाने के लिए गमला
  • पार्सनिप के पौधे लगाने के लिए आवश्यक मिट्टी
  • घर पर पार्सनिप कैसे लगाएं
  • गमले में पार्सनिप के बीज लगाने की विधि
  • पार्सनिप के पौधों की देखभाल कैसे करें
  • कीट और रोग
  • पार्सनिप की हार्वेस्टिंग कब करें

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घर पर गमले में पार्सनिप कैसे उगाएं

पार्सनिप एक कूल-सीजन द्विवार्षिक सब्जी वाला पौधा है, लेकिन इसे आमतौर पर वार्षिक सब्जियों के रूप में उगाया जाता है। ये गाजर के समान दिखते हैं और अक्सर सफेद रंग के एवं मोटे होते हैं। पार्सनिप किसी भी रसोई व्यंजन को पौष्टिक और मीठा स्वाद देते हैं, इसके साथ ही इस जड़ वाली सब्जी का उपयोग आप साइड डिश के रूप में भी कर सकते हैं। पार्सनिप में पोटेशियम, विटामिन बी 6 और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो हमारे हेल्थ के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। आज हम आपको घर पर गमले में पार्सनिप सब्जी कैसे उगाएं के बारे में विस्तार से बताएंगे। इनडोर या आउटडोर गमले में पार्सनिप का पौधा कैसे लगाएं, गमले में पार्सनिप के बीज लगाने की विधि तथा इसकी देखभाल करने के तरीके आदि के बारे में जानने के लिए आर्टिकल को पूरा पढ़ें।

पार्सनिप के बारे में मुख्य जानकारी

  • साधारण नाम – पार्सनिप (Parsnip)
  • वानस्पतिक नाम – पास्टिनाका सैटिवा (Pastinaca sativa)
  • पौधे का प्रकार – द्विवार्षिक सब्जी का पौधा
  • आदर्श तापमान – 7-24°C
  • सूर्य का प्रकाश – 6-8 घंटे की सीधी या आंशिक धूप
  • मिट्टी का प्रकार – अच्छी जलनिकासी वाली हल्की मिट्टी
  • कटाई का समय – लगभग 4-6 महीने बाद

पार्सनिप का पौधा कब लगाना चाहिए

घर पर गमले में पार्सनिप सब्जी का पौधा लगाने के लिए सबसे अच्छा समय वसंत का मौसम होता है, क्योंकि इन्हें बढ़ने के लिए लंबे समय तक ग्रोइंग सीजन की आवश्यकता होती है। कुछ क्षेत्रों में इसे सर्दियों के मौसम में भी उगाया जाता हैं। पार्सनिप रूट वेजिटेबल को आप अक्टूबर-नवंबर या फरवरी-मार्च के महीने में अपने होम गार्डन में ग्रो कर सकते हैं। पार्सनिप लगाते समय, याद रखें कि ठंडा मौसम इसके स्वाद को बढ़ाता है।

नोट – पार्सनिप के बीज लगाने के लिए हमेशा ताजा बीजों का उपयोग करें, क्योंकि एक वर्ष से अधिक पुराने बीजों की अंकुरण क्षमता कम या लगभग नामुमकिन होती है।

पार्सनिप के पौधे लगाने के लिए गमला

घर के किचिन गार्डन में या आउटडोर गमलों में पार्सनिप के पौधे लगाने के लिए बड़े गमलों का उपयोग करना चाहिए, क्योंकि इनकी जड़ें लगभग 1 फुट की गहराई तक बढ़ती हैं। पार्सनिप सीड्स लगाने के लिए कम से कम 15 इंच गहरा और चौड़ा कंटेनर चुनें। पार्सनिप की हेल्दी ग्रोथ के लिए आप निम्न साइज़ के ग्रो बैग्स में पार्सनिप के बीज लगा सकते हैं:

  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x गहराई)
  • 18 x 15 इंच (चौड़ाई x गहराई)
  • 24 x 15 इंच (चौड़ाई x गहराई)
  • 24 x 18 इंच (चौड़ाई x गहराई)

पार्सनिप के पौधे लगाने के लिए आवश्यक मिट्टी

घर पर गमले में पार्सनिप के पौधे लगाने के लिए अच्छी जल निकासी वाली हल्की मिट्टी सबसे बेस्ट होती है, जिसमें भरपूर पोषक तत्व मौजूद हों। आप अपनी गार्डन सॉइल या पुरानी मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करके उसमें पार्सनिप के पौधे लगा सकते हैं। यदि आपके पास किसी भी प्रकार की मिट्टी नहीं है, तो आप अपने पास की नर्सरी से या ऑनलाइन आर्डर के माध्यम से रेडी टू यूज़ पॉटिंग सॉइल खरीदकर उसमें पार्सनिप प्लांट्स ग्रो कर सकते हैं।

नोट – चिकनी मिट्टी या सघन मिट्टी पार्सनिप की जड़ों को पतला और विकृत कर सकती है, इसीलिए अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी का उपयोग करें।

घर पर पार्सनिप कैसे लगाएं

पार्सनिप की जड़ें लम्बी होती हैं, इसीलिए इन्हें प्रत्यारोपण पसंद नहीं होता। आप अपने घर पर गमले की मिट्टी में या आउटडोर गार्डन में बीजों को डायरेक्ट लगा सकते हैं। अगर आप इन्हें जल्दी लगाना चाहते हैं तो किसी बायोडिग्रेडेबल पॉट या कोको कोइंस में बीज लगाकर सीडलिंग तैयार कर सकते हैं, और अनुकूल वातावरण में सावधानीपूर्वक किसी बड़े गमले में या आउटडोर गार्डन में लगा सकते हैं। आइये जानते हैं गमले में पार्सनिप के बीज कैसे लगाएं? के बारे में।

गमले में पार्सनिप के बीज लगाने की विधि

घर पर गमले में पार्सनिप के बीज लगाने के लिए निम्न स्टेप्स फॉलो करें:

  • गमले में अच्छी जलनिकासी वाली जैविक खाद युक्त मिट्टी या पॉटिंग सॉइल भरें।
  • अब मिट्टी में ½ इंच की गहराई एवं 6-8 इंच की दूरी पर बीज लगाएं।
  • बीजों को मिट्टी की हल्की परत से ढँक दें और पर्याप्त पानी दें, ताकि मिट्टी नम हो जाए।
  • गमले को अप्रत्यक्ष धूप वाले स्थान पर रखें तथा जर्मिनेशन के दौरान मिट्टी को नम रखें। ध्यान रखें मिट्टी को बहुत अधिक गीला रखने से बीज सड़ सकते हैं।
  • पार्सनिप सीड्स को जर्मिनेट होने में लगभग 2 से 3 सप्ताह का समय लग सकता है।

पार्सनिप के पौधों की देखभाल कैसे करें

आप निम्न तरीके अपनाकर अपने पार्सनिप प्लांट की देखभाल  कर सकते हैं:-

पानी :–

पार्सनिप के पौधे नम मिट्टी में उगना पसंद करते हैं, इसीलिए इन्हें पर्याप्त पानी देना सुनिश्चित करें, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। लेकिन बहुत ज्यादा पानी देने से पौधों को नुकसान हो सकता है, इसीलिए अधिक पानी न देना (Over Watering) चाहिए करें। पार्सनिप की जड़ें वहीं जाती हैं जहां पानी होता है, इसीलिए स्वस्थ व मजबूत जड़ विकास को बढ़ावा देने के लिए गहराई से पानी देना सुनिश्चित करें। पार्सनिप को बार-बार और कम पानी देने से इसकी जड़ें उथली और कमजोर हो सकती हैं।

सूरज की रोशनी :-

पार्सनिप के पौधे पूर्ण सूर्य प्रकाश में अच्छी तरह ग्रो होते हैं, इसीलिए इनकी बेहतर ग्रोथ के लिए पार्सनिप प्लांट्स को ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ पौधों को रोजाना 6-8 घंटे की धूप मिल सके। हालांकि वे कुछ छाया भी सहन कर सकते हैं।

तापमान :–

पार्सनिप प्लांट्स की बेहतर ग्रोथ के लिए 7-24°C के मध्य का तापमान सबसे बेस्ट होता है।

कीट और रोग

हालांकि पार्सनिप प्लांट्स कीट और रोग मुक्त होते हैं, लेकिन कुछ आम गार्डन कीट पार्सनिप के पौधों को परेशान कर सकते हैं, जिनमें एफिड्स, लीफ माइनर्स और गाजर मक्खियाँ (carrot flies) शामिल हैं। इन कीटों से बचाने के लिए आप नीम तेल या कीटनाशक साबुन के घोल का छिडकाव कर सकते हैं।

पार्सनिप की हार्वेस्टिंग कब करें

पार्सनिप के पौधों को जब ठंडे मौसम के दौरान लगाया जाता है, तो उनका स्वाद सबसे अच्छा होता है। घर पर पार्सनिप को बीज से लगाने के बाद यह लगभग 120 से 180 दिन में हार्वेस्ट के लिए तैयार हो जाते हैं। इसलिए कुछ क्षेत्रों में उन्हें सर्दियों की सब्जी के रूप में मध्य पतझड़ (अक्टूबर-नवंबर) में लगाया जाता है और शुरुआती वसंत (जनवरी-फरवरी) में काटा जाता है। हालांकि, ठंडे क्षेत्रों में पार्सनिप को शुरुआती वसंत में लगाया जाता है और पतझड़ के समय हार्वेस्टिंग की जाती है।

गमले में पार्सनिप के बीज लगाने की विधि और देखभाल के तरीके अपनाकर आप पार्सनिप का अधिक उत्पादन कर सकते हैं। उम्मीद है आपको इस लेख में दी गई जानकारी पसंद आई होगी। अगर इससे सम्बंधित आपके कोई सवाल या सुझाव हो तो उन्हें कमेंट में जरूर बताएं और गार्डनिंग से रिलेटेड अन्य पोस्ट पढ़ने के लिए kisandapp.com वेबसाइट पर विजिट करें।

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Jimikand or Suran or Elephant yamजिमीकंद को एक औषधीय फसल के रूप में उगाया जाता है, किन्तु इसका इस्तेमाल हमारे घरो में सब्जियों के रूप में भी होता है | इसे ओल और सूरन के नाम से भी जाना जाता है | जिमीकंद की तासीर अधिक गर्म होती है…Click HereMuskMelonखरबूजा ( कुकुमिस मेलो एल) एक फल की फसल है जिसकी खेती भारत में किसानों द्वारा विशेष रूप से गर्मी के मौसम में व्यापक रूप से की जाती है। यह गर्म मौसम की फसल है जो अपने अनोखे स्वाद के लिए जानी जाती है यह फल अपनी उच्च जल सामग्री के लिए जाना जाता है और इसका शरीर पर ठंडा प्रभाव पड़ता है…..Click Here Lotus cucumberकमल ककड़ी की खेती सब्जी के लिए की जाती है| कमल के पौधों में लगने वाला फूल जितना लोकप्रिय है, उतने ही खास उस पौधे के बाक़ी हिस्से भी है| कमल के फूल के अलावा बीज और जड़ो को भी काफी पसंद किया जाता है | जिसमे इसके बीजो से मिलने वाला मखाना सेहत को बेहतर बनाने में सहायता प्रदान करता है, तो वही इसकी जड़े जिसे कमल ककड़ी कहते है…Click Here
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Butternut Squash

 

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  • गमले में बटरनट स्क्वैश कैसे उगाएं
  • बटरनट स्क्वैश का पौधा उगाने से सम्बंधित जानकारी
  • बटरनट स्क्वैश के बीज कब लगाएं
  • गार्डन में बटरनट स्क्वैश का पौधा लगाने के लिए आवश्यक सामग्री
  • घर पर बटरनट स्क्वैश के बीज लगाने के लिए ग्रो बैग
  • बटरनट स्क्वैश का पौधा लगाने के लिए मिट्टी
  • बटरनट स्क्वैश को बीज से कैसे उगाएं
  • गमले में बटरनट स्क्वैश के बीज लगाने की विधि
  • बटरनट स्क्वैश के पौधे की देखभाल कैसे करें
  • कीट व रोग
  • बटरनट स्क्वैश की फसल कटाई कैसे करें

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गमले में बटरनट स्क्वैश कैसे उगाएं

कद्दू के समान दिखने वाला बटरनट स्क्वैश, जिसे बटरनट पमकिन या ग्रामा स्क्वैश (gramma squash) आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है, यह किसी भी जलवायु में उगने वाला एक वार्षिक पौधा है, जो बेल के रूप में बढ़ता है, हालांकि इसकी कुछ किस्में झाड़ीदार भी हो सकती हैं। भारतीय व्यंजनों में उपयोग किया जाने वाला विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर, बटरनट स्क्वैश को टेरिस गार्डन या होम गार्डन में आसानी से किसी पॉट या कंटेनर में उगाया जा सकता है। यदि आप अपने घर पर बटरनट स्क्वैश प्लांट उगाना चाहते हैं, तो इस आर्टिकल में आप जानेंगे कि बटरनट स्क्वैश या बटरनट पमकिन का पौधा कैसे उगाएं, बीज लगाने का सही समय और विधि क्या है, बटरनट स्क्वैश के पौधे की देखभाल तथा हार्वेस्टिंग कैसे करें? कद्दू बटरनट स्क्वैश के बीज लगाने से लेकर फल तोड़ने तक की जानकारी पाने के लिए लेख पूरा पढ़ें।

बटरनट स्क्वैश का पौधा उगाने से सम्बंधित जानकारी

  • वानस्पतिक नाम – कुकुर्बिटा मोस्काटा ‘बटरनट’ ( Cucurbita moschata ‘Butternut’)
  • सामान्य नाम – बटरनट स्क्वैश, बटरनट पमकिन, ग्रामा (gramma)
  • पौधे का प्रकार – वार्षिक पौधा
  • बीज लगाने का समय – वसंत से समर (फरवरी से जून)
  • सूर्य प्रकाश की आवश्यकता – पूर्ण सूर्यप्रकाश
  • मिट्टी का पीएच – अम्लीय से उदासीन (5.5 से 7.0 PH वाली मिट्टी)
  • पौधे का आकार – 9-18 इंच चौड़ा, 10-15 फीट लंबाई वाली बेल/ कुछ किस्में झाड़ीदार भी होती हैं।
  • हार्वेस्टिंग टाइम – 110-120 दिन

बटरनट स्क्वैश के बीज कब लगाएं

घर पर बटरनट स्क्वैश ठंड व गर्म दोनों मौसम में उगाया जाता है। ठंड के मौसम में उगाये जाने वाले बटरनट स्क्वैश को, विंटर स्क्वैश तथा गर्म मौसम में उगाये जाने वाले बटरनट स्क्वैश, को समर स्क्वैश कहते हैं। समर स्क्वैश को फरवरी से मार्च के महीने में और विंटर स्क्वैश को सितंबर से नवम्बर के महीने के बीच लगाने का समय सबसे अच्छा होता है। यदि आप मध्यम गर्म तापमान वाले क्षेत्र में रहते हैं तो पूर्व साल बटरनट स्क्वैश को ग्रो कर सकते हैं।

गार्डन में बटरनट स्क्वैश का पौधा लगाने के लिए आवश्यक सामग्री

अपने टेरेस गार्डन या होम गार्डन में बटरनट स्क्वैश का पौधा उगाने के लिए, आपको निम्न चीजों की आवश्यकता होगी:-

घर पर बटरनट स्क्वैश के बीज लगाने के लिए ग्रो बैग

बटरनट स्क्वैश या बटरनट कद्दू का पौधा बेल के रूप में बढ़ता है, जिसकी लम्बाई 10 से 15 फीट तक हो सकती है, इसलिए इस पौधे को लगाने के लिए आपको एक ऐसा ग्रो बैग या गमला चाहिए, जिससे इसकी जड़ों को ग्रो होने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके। बटरनट स्क्वैश के बीज को लगाने के लिए कम से कम 15 इंच गहराई तथा 18 इंच चौड़ाई वाला ग्रो बैग आदर्श होगा। गमला या ग्रो बैग चुनते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें, कि उसमें जल निकासी के लिए पर्याप्त छिद्र हों। आप अपने किचिन गार्डन या होम गार्डन में बटरनट स्क्वैश का पौधा लगाने के लिए, निम्न साइज़ के ग्रो बैग यूज़ कर सकते हैं :-

बटरनट स्क्वैश का पौधा लगाने के लिए मिट्टी

यदि आप अपने घर पर बटरनट स्क्वैश का पौधा उगाने का सोच रहे हैं, तो हम आपको बता दें, कि बटरनट स्क्वैश का पौधा उगाने के लिए 5.5 से 7.0 के बीच पीएच के साथ थोड़ी अम्लीय, कार्बनिक पदार्थों (जैविक खाद) से समृद्ध और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी होनी चाहिए। यदि आपके गार्डन में ऐसी उपजाऊ मिट्टी उपलब्ध नहीं है, तो आप सामान्य मिट्टी में जैविक खाद और वर्मीकम्पोस्ट मिलाकर पॉटिंग मिक्स तैयार कर सकते हैं या फिर आप रेडीमेड पॉटिंग सॉइल का भी उपयोग कर सकते हैं, यह मिट्टी भी पोषक तत्वों से भरपूर होती है।

बटरनट स्क्वैश को बीज से कैसे उगाएं

इस पौधे को लगाने के लिए सबसे पहले आपको बटरनट स्क्वैश की उन्नत किस्म के बीज को चुनना होगा (आप बीज को सीड स्टोर या फिर ऑनलाइन स्टोर से खरीद सकते हैं)। बीज खरीदने के बाद उन बीजों की सीडलिंग तैयार करनी होगी इसके बाद उचित तापमान होने पर जब पौधे 6 से 8 इंच की लम्बाई के हो जाएं तब आपको उन्हें किसी पॉट, ग्रो बैग या फिर गार्डन की मिट्टी में ट्रांसप्लांट करना होगा। यदि आप बटरनट स्क्वैश के पौधे रिपॉट या ट्रांसप्लांट नहीं करना चाहते हैं तो आप इस पौधे के बीज को सीधे किसी पॉट, कंटेनर या ग्रो बैग में लगाकर भी ग्रो कर सकते हैं।

गमले में बटरनट स्क्वैश के बीज लगाने की विधि

किचिन गार्डन या घर पर पॉट या कंटेनर में बटरनट स्क्वैश का पौधा लगाने की विधि निम्न प्रकार है :-

  • सबसे पहले बटरनट स्क्वैश की अच्छी किस्म के बीज लें।
  • अब चुने हुए गमले में पॉटिंग सॉइल भरें, मिट्टी भरते समय इस बात का ध्यान रहे, कि गमला ऊपर से 3 से 4 इंच खाली हो।
  • गमले के बीचों-बीच बटरनट स्क्वैश के दो बीजों को, लगभग 1 इंच की गहराई और 3-4 इंच की दूरी पर लगाएं।
  • बीज लगे हुए गमले की मिट्टी में वाटर कैन की मदद से पानी दें।
  • इसके बाद गमले को धूप वाले स्थान पर रखें तथा मिट्टी की नमी को बनाएं रखने के लिए समय समय पर पानी दें।
  • बीज अंकुरण के लिए मिट्टी का तापमान कम से कम 15 डिग्री सेल्सियस से अधिक होना चाहिए, उचित तापमान मिलने पर बटरनट स्क्वैश के बीज 7-10 दिनों में अंकुरित हो सकते हैं।
  • बीज अंकुरित होने के बाद जब पौधे 6 इंच लम्बाई के हो जाएं तब पौधों के मध्य उचित दूरी बनाए रखने के लिए उन्हें सावधानीपूर्वक किसी दूसरे पॉट में ट्रांसप्लांट कर सकते हैं। बटरनट स्क्वैश के दो पौधों के बीच की दूरी कम से कम 18 से 24 इंच होनी चाहिए।

बटरनट स्क्वैश के पौधे की देखभाल कैसे करें

यदि आपने बटरनट कद्दू या बटरनट स्क्वैश का पौधा अपने टेरेस गार्डन या होम गार्डन में लगाया है तो उस पौधे को अच्छी तरह से ग्रो करने और उसमें अधिक फल लगने के लिए आपको पौधे की उचित देखभाल करनी होगी। आइए जानते हैं, बटरनट स्क्वैश पौधे की देखभाल के तरीके के बारे में :-

  • पानी :–

अंकुरित होने के बाद बटरनट स्क्वैश के पौधे को नियमित रूप से पानी देना चाहिए। जैसे-जैसे बेल बड़ी होती हैं उस समय आपके बटरनट कद्दू के पौधों को और भी अधिक पानी की आवश्यकता होती है। गर्म, शुष्क मौसम के दौरान, आप प्रतिदिन सुबह के समय उस पौधे को पानी दे सकते हैं। पानी देते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें, कि मिट्टी सूखी दिखने पर ही पानी दें, क्योंकि बटरनट स्क्वैश के पौधे की जड़ें ज्यादा कठोर नहीं होती जो कि लगातार गीली मिट्टी के संपर्क में रहने से खराब हो (सड़) सकती हैं।

  • सूर्य का प्रकाश :–बटरनट स्क्वैश के पौधे को अच्छी तरह से बढ़ने के लिए पूर्ण सूर्य प्रकाश की आवश्यकता होती है इसलिए आप इस पौधे को ऐसे स्थान पर लगाएं, जहाँ प्रति दिन 6 घंटे की धूप आती हो। बटरनट स्क्वैश के पौधे अधिक समय तक तेज धूप को सहन नहीं कर सकते और इससे वे मुरझा सकते हैं, इसलिए आप इस पौधे को ऐसे स्थान पर लगाएं, जहाँ दोपहर के कुछ समय के लिए छाया आती हो।
  • तापमान :–बटरनट स्क्वैश का पौधा ठंड के प्रति संवेदनशील होता है इसलिए ठण्ड के समय में इस पौधे को विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। 10 डिग्री सेल्सियस या इससे कम तापमान पर पौधे की ग्रोथ रुक जाती है। बटरनट स्क्वैश के पौधे को अच्छी तरह से ग्रो करने के लिए 21 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान सबसे अच्छा होता है। हालांकि अधिक तापमान होने पर इस पौधे की पत्तियां मुरझा सकती हैं लेकिन कम तापमान अर्थात शाम के समय यह पौधा वापस उसी अवस्था में आ जाएगा।
  • उर्वरक :–बटरनट स्क्वैश एक भारी फीडर प्लांट है जिसको अच्छी तरह से बढ़ने के लिए खाद और उर्वरक की आवश्यकता होती है इसलिए इस पौधे को लगाते समय मिट्टी कार्बनिक पदार्थों से युक्त होनी चाहिए। जैसे-जैसे पौधा वृद्धि करता है उसकी मिट्टी में दो या तीन सप्ताह के समयांतराल से जैविक खाद या तरल उर्वरक मिलाएं। बटरनट स्क्वैश के युवा पौधे जब फल लगने की अवस्था में आते हैं तब नाइट्रोजन युक्त खाद की मात्रा कम डालें क्योंकि नाइट्रोजन फल की अपेक्षा पत्तियों की वृद्धि को प्रोत्साहित करता है, जिससे पौधे पर फल कम लगते हैं। पौधे में अधिक फल लगने के लिए आप बोनमीलमस्टर्ड केकPROM इत्यादि ऑर्गनिक फर्टिलाइजर दे सकते हैं।

कीट व रोग

स्क्वैश बग (Squash bug), कुकुम्बर बीटल (cucumber beetle) जैसे कीट बटरनट स्क्वैश के पौधे को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह कीट पौधे के आसपास की खरपतवार के माध्यम से फैलते हैं इन कीटों को लगने से रोकने के लिए आप पौधे के आस पास उगने वाली खरपतवार को हटाएं और गीली घांस या पुआल से मल्चिंग करें। बटरनट स्क्वैश के पौधे पर इन कीटों का प्रकोप दिखाई देने पर आप पत्तियों पर कीटनाशक साबुन या नीम के तेल का छिड़काव भी कर सकते हैं। बटरनट स्क्वैश के पौधे में निम्न प्रकार के रोग हो सकते हैं :-

  1. डाउनी मिल्ड्यू
  2. पाउडरी मिल्ड्यू
  3. एन्थ्रेक्नोज

ये बीमारियां बटरनट स्क्वैश के पौधे को प्रभावित कर सकती हैं। इन बीमारियों से पौधे को बचाने के लिए आप इस पौधे की कुछ प्रतिरोधी किस्म को उगाएं, पौधे की पत्तियों को गीला न करें तथा पौधे को पूर्ण सूर्य प्रकाश वाले स्थान में लगाएं। बटरनट स्क्वैश के पौधे पर इन बीमारियों का संक्रमण दिखाई देने पर आप संक्रमित हिस्से को काट कर नष्ट कर दें और पौधे पर जैविक कीटनाशक का छिड़काव भी कर सकते हैं।

बटरनट स्क्वैश की फसल कटाई कैसे करें

बीज अंकुरण के लगभग 110 से 120 दिन बाद जब बटरनट स्क्वैश की त्वचा हल्की कठोर हो जाती है तथा फल को बेल से जोड़ने वाला तना पूरी तरह से सूख जाता है तब आप इस फल की हार्वेस्टिंग कर सकते हैं। यदि मार्च-अप्रैल के महीने आपने इस पौधे के बीज को लगाया है तो जुलाई-अगस्त के महीने में आपको बटरनट कद्दू तोड़ने को मिल सकते हैं। बटरनट कद्दू के तने को लगभग एक इंच ऊपर से प्रूनर की मदद से काट लें। यदि आप इस फल को स्टोर करके रखना चाहते हैं तो इसे लगभग दो सप्ताह तक धूप में सूखने दें।

उपरोक्त आर्टिकल में आपने जाना कि बटरनट स्क्वैश का पौधा कैसे लगाएं पौधा लगाने का सही समय तथा विधि क्या है और बटरनट स्क्वैश के पौधे की देखभाल तथा हार्वेस्टिंग कैसे की जाती है। उम्मीद है यह लेख आपको पसंद आया होगा, इस लेख से सम्बंधित आपके जो भी सवाल या सुझाव हों, हमें कमेंट में अवश्य बताएं।

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Poppy Seedsखसखस, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘Papaver somniferum’ कहा जाता है, एक विशेष प्रकार का पौधा है जिसका महत्व हमारी रोजमर्रा की जीवन में बहुत अधिक है। इसके बीज से प्राप्त तेल का उपयोग खाने-पकाने में होता है और यह आयुर्वेद में भी उपयोगी माना जाता है…Click Here Papayaपपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। पपीता को भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिन्सकाटेन को जाता है जिनके द्वारा पपीता के पौधे वेस्टइंडीज से सन् 1575 में मलेशिया लाया फिर वहां से भारत आया…Click Here Lotus cucumberकमल ककड़ी की खेती सब्जी के लिए की जाती है| कमल के पौधों में लगने वाला फूल जितना लोकप्रिय है, उतने ही खास उस पौधे के बाक़ी हिस्से भी है| कमल के फूल के अलावा बीज और जड़ो को भी काफी पसंद किया जाता है | जिसमे इसके बीजो से मिलने वाला मखाना सेहत को बेहतर बनाने में सहायता प्रदान करता है…Click Here
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Arugula

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  • क्या है अरुगुला ?
  • अरुगुला उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ मृदा
  • अरुगुला सलाद की अलग-अलग किस्म
  • कैसे करें बीज उपचार और बुवाई
  • कौनसे उर्वरकों का करें इस्तेमाल
  • कैसे करें उपयुक्त सिंचाई
  • अरुगुला सलाद में लगने वाली बीमारियां और उनका उपचार

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पिछले कुछ वर्षों से भारतीय कृषि क्षेत्र में भी विविध प्रकार से कृषि पालन किया जा रहा है। इस विविधता के पीछे सरकार की कुछ बेहतरीन नीतियां और युवा किसानों का कृषि क्षेत्र में निरंतर विश्वास, आने वाले समय में भारतीय कृषि को तकनीक और उत्पादन के स्तर पर विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाने में सहायक हो सकता है।

क्या है अरुगुला ?

अरुगुला या आर्गुला (Arugula) एक प्रकार की सलाद होती है, जिसे भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हालांकि कुछ युवा और संपन्न किसानों को छोड़कर इस सलाद की फसल का उत्पादन बहुत ही कम क्षेत्रों और कम किसानों के द्वारा किया जाता है। इसे रॉकेट सलाद , भूमध्यसागरीय सलाद (Mediterranean Salad) और गारघिर (Gargeer) के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में जिम के माध्यम से बॉडीबिल्डिंग करने वाले युवाओं में इस सलाद का सेवन काफी लोकप्रिय हो रहा है। अरुगुला सलाद की मदद से शरीर में कई सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति तो होती ही है, साथ ही इसमें पाए जाने वाले प्रोटीन तथा आयरन के गुण स्वास्थ्य प्रेमियों की शारीरिक आवश्यकताओं की मांग को पूरी करने के लिए पर्याप्त होते है। भारत के उत्तरी पूर्वी राज्यों में इसका उत्पादन अक्टूबर महीने के अंतिम सप्ताह में शुरू किया जाता है, क्योंकि इस फसल के लिए 10 डिग्री से 25 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य तापमान की आवश्यकता होती है, इसीलिए दक्षिणी और तटीय राज्यों में अरुगुला की उत्पादकता काफी कम देखने को मिलती है। पिछले कुछ समय से राजस्थान, पंजाब तथा हरियाणा इस सलाद के उत्पादन में सबसे बड़े उत्पादक के रूप में उभर कर सामने आए है। पंजाब में उत्पादित होने वाली अरुगुला सलाद की मांग अमेरिका तथा कनाडा की कई मल्टिनैशनल कम्पनियों में लगातार बढ़ती जा रही है।    

अरुगुला उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ मृदा

वैसे तो इस सलाद का उत्पादन अलग-अलग प्रकार की मृदा में किया जा सकता है, लेकिन दोमट और बलुई दोमट मिट्टी में इसकी उत्पादकता सर्वश्रेष्ठ प्राप्त होती है। साथ ही किसान भाई ध्यान रखें कि बेहतरीन सिंचाई के साथ तैयार की हुई मिट्टी, इस फसल में लगने वाले रोगों की प्रभाविकता को काफी कम कर सकती है। अरुगुला की बुवाई करने से पहले किसान सेवा केंद्र के वैज्ञानिकों की मदद से अपने खेत की मिट्टी की अम्लीयता की जांच जरूर करवाएं, क्योंकि सलाद के उत्पादन के लिए मिट्टी की पीएच का मान 6 से लेकर 7 के बीच में होना चाहिए ,अधिक क्षारीयता वाली मिट्टी इसके उत्पादकता को बहुत ही कम कर सकती है। इस फसल की एक और खास बात यह है कि यह पाले जैसी स्थिति को आसानी से झेल सकती है, लेकिन अधिक धूप पड़ने पर इसके पत्ते सूख जाते है। कई किसान भाई इस सलाद के उत्पादन के दौरान, उसे ढकने के लिए इस्तेमाल में होने वाले कवर और अधिक गर्मी से बचाने के लिए बेहतरीन सिंचाई की व्यवस्था पर पूरा ध्यान देते है।  

फसल के बारे में अधिक जानकारी

अरुगुला सलाद की अलग-अलग किस्म

वर्तमान में कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा तैयार की गई अरुगुला सलाद की हाइब्रिड किस्में भारतीय किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है। इन्हीं कुछ किस्मों में से एस्ट्रो (Astro), रेड ड्रैगन (Red Dragon), रॉकेट तथा स्लो बोल्ट(Slow Bolt) और वसाबी जैसी किस्में शंकर विधि से तैयार की गई है। इसी वजह से ऊपर बताई गई सभी किस्में जलवायु में होने वाले सामान्य परिवर्तन को आसानी से झेल सकती है और मौसम में आने वाले उतार-चढ़ाव के दौरान भी बेहतर उत्पादन कर सकती है। हरियाणा और पंजाब के क्षेत्रों में रेड ड्रैगन तथा वसाबी किस्म की सलाद का उत्पादन सर्वाधिक किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मार्केट में स्लो बोल्ट किस्म की बढ़ती मांग की वजह से जम्मू कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के कुछ सम्पन्न किसानों के द्वारा इसका उत्पादन भी बड़े स्तर पर शुरू कर दिया गया है। अरुगुला सलाद की एक खास बात यह भी है कि इसकी लगभग सभी प्रकार की किस्में 40 से 50 दिन में पूरी तरीके से तैयार की जा सकती है।

फसल के बारे में अधिक जानकारी

कैसे करें बीज उपचार और बुवाई

अरुगुला सलाद के बीजों में कीटनाशी काफी जल्दी प्रभाव पैदा कर सकते है, इसीलिए इन्हें बोने से पहले बीज उपचार करना आवश्यक हो जाता है। अपने खेत में इन बीजों को बोने से पहले पूरी तरीके से जर्मिनेट (Germinate) कर लें। वर्तमान में कई बड़े किसानों के द्वारा इन बीजों को एक मशीन में डालकर इन्हें मोटे दानों के रूप में बदल दिया जाता है, इस विधि को पेलेटाइज़िंग (Pelletizing) कहते है, इसके बाद इन बीजों की बुवाई करने पर इनमें कीटनाशी और कवक जैसी बीमारी फैलने का खतरा बहुत ही कम हो जाता है। अरुगुला की खेती के लिए मुख्यतया, अंतराल कृषि विधि को अपनाया जाता है इसे स्टैगर्ड प्लांटिंग (Staggered Planting) भी कहते है। इस विधि में पौधे के बीजों की एक साथ बुवाई करने के स्थान पर एक से दो सप्ताह के अंतराल पर लगातार बोया जाता है और इन बीजों को बोते समय दो पंक्तियों के मध्य की दूरी 12 से 15 इंच रखनी होती है साथ ही दो छोटी पौध के बीच की दूरी कम से कम 6 इंच होनी चाहिए। पौध के बीच में सीमित दूरी रखने से मृदा कुपोषण और एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलने वाली बीमारियों की दर को कम किया जा सकता है।

कौनसे उर्वरकों का करें इस्तेमाल

किसान भाई यह बात तो जानते ही है कि जैविक उर्वरक किन्हीं भी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों से सर्वश्रेष्ठ होते है। यदि आप भी कृषि कार्यों की अतिरिक्त पशुपालन करते है तो वहां से प्राप्त जैविक खाद का इस्तेमाल उर्वरक के तौर पर कर सकते है। इसके अलावा कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए फसल के उगते समय ही नाइट्रोजन का 50 ग्राम प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना उपयुक्त रहता है। साथ ही फास्फोरस और पोटेशियम जैसे रासायनिक उर्वरकों की मदद से इस फसल की जड़ों में होने वाली बीमारियों को कम करने के साथ ही वृद्धि दर को काफी तेज किया जा सकता है। अरुगुला की पौध लगने से पहले ही खेत की मिट्टी में वैज्ञानिकों के द्वारा सुझाई गई सल्फर की सीमित मात्रा का छिड़काव मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने में सहायक होता है।

कैसे करें उपयुक्त सिंचाई

अरुगुला जैसी सलाद वाली फसल को पानी की नियमित स्तर पर आवश्यकता होती है क्योंकि इस फसल की जड़े बहुत ही जल्दी पानी को सोख लेती है। अलग अलग मौसम के अनुसार लगभग 8 से 10 इंच पानी की आवश्यकता पौधे के अंकुरित होने से लेकर लगभग 50 दिन तक जरूरी होती है। हल्की और बलुई मिट्टी और अधिक पानी की मांग भी कर सकती है इसीलिए आप अपने खेत की मिट्टी की वैरायटी के अनुसार पानी की मात्रा निर्धारित कर सकते है।

अरुगुला सलाद में लगने वाली बीमारियां और उनका उपचार

वैसे तो एक सलाद की फसल होने की वजह से इस फसल की रोगाणुनासक क्षमता सर्वश्रेष्ठ होती है, परंतु फिर भी भारत की मिट्टियों में कई प्रकार के पोषक तत्वों की कमी की वजह से अरुगुला जैसे सलाद में भी कई रोग लग सकते है जैसे कि :-

  1. बेक्टेरिया ब्लाइट ( Bacterial Blight ) :-

    बैक्टीरिया की वजह से होने वाले इस रोग में पौधे की पत्तियां भूरे रंग की हो जाती है और थोड़े दिन बाद इनका रंग पीला पड़ने लगता है। मुख्यतः यह समस्या तब होती है जब रात और दिन के तापमान में अंतराल काफी अधिक हो जाता है। इस रोग से बचने के लिए अरुगुला के बीजों का सही तरह से उपचार करके ही बुवाई करनी चाहिए। बीजों को बोने से पहले उन्हें एक दिन तक गर्म पानी में डालकर रखना चाहिए साथ ही आप अपने खेत में रूपांतरित कृषि विधि का प्रयोग भी कर सकते हैं इस विधि में एक बार एक जगह पर एक फसल उगाने के बाद अगले सीजन में उस जगह पर दूसरी फसल का उत्पादन किया जाता है। साथियों बाजार में बिकने वाले कई एंटीबैक्टीरियल रसायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

  2. कोमल फफूंद रोग :-

    इस रोग में पौधे की पत्तियां फंगस का शिकार हो जाती है और पती के ऊपरी हिस्से तथा उनके तलवे में सफेद रंग का फफूंद लगना शुरू हो जाता है। धीरे-धीरे यह फफूंद पौधे की पतियों को बीच में से काट कर खोखला बना देता है, जिससे फसल की उत्पादकता काफी कम हो जाती है। इस रोग से बचने के लिए दो पौधों के बीच की जगह पर्याप्त होनी चाहिए साथ ही निराई गुड़ाई कर पौधे के आसपास उगने वाले खरपतवार को निरंतर समय पर हटाते रहना होगा। मृदा और मौसम में ज्यादा नमी की वजह से भी यह रोग आसानी से फैलता है इसलिए नमी को कम करने के लिए खेत को हवादार बनाने के लिए उचित प्रबंधन किया जाना चाहिए। आशा करते है कि kisandapp.com के द्वारा दी गई इस जानकारी के माध्यम से किसान भाइयों को एक नई और अच्छा उत्पादन देने वाली फसल के बारे में पता लगा होगा और भविष्य में आप भी अपने खेत में बेहतरीन वैज्ञानिक विधि की मदद से अरुगुला की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे।

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Poppy Seedsखसखस, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘Papaver somniferum’ कहा जाता है, एक विशेष प्रकार का पौधा है जिसका महत्व हमारी रोजमर्रा की जीवन में बहुत अधिक है। इसके बीज से प्राप्त तेल का उपयोग खाने-पकाने में होता है और यह आयुर्वेद में भी उपयोगी माना जाता है…Click Here Papayaपपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। पपीता को भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिन्सकाटेन को जाता है जिनके द्वारा पपीता के पौधे वेस्टइंडीज से सन् 1575 में मलेशिया लाया फिर वहां से भारत आया…Click Here Lotus cucumberकमल ककड़ी की खेती सब्जी के लिए की जाती है| कमल के पौधों में लगने वाला फूल जितना लोकप्रिय है, उतने ही खास उस पौधे के बाक़ी हिस्से भी है| कमल के फूल के अलावा बीज और जड़ो को भी काफी पसंद किया जाता है | जिसमे इसके बीजो से मिलने वाला मखाना सेहत को बेहतर बनाने में सहायता प्रदान करता है…Click Here
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Banana

 

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  • केला
  • प्रसिद्ध किस्में और पैदावार
  • मिट्टी
  • बीज
  • ज़मीन की तैयारी
  • बिजाई
  • सिंचाई
  • खाद
  • खरपतवार नियंत्रण
  • पौधे की देखभाल
  • फसल की कटाई
  • कटाई के बाद

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केला

केला, आम के बाद भारत की महत्तवपूर्ण फल की फसल है। इसके स्वाद, पोषक तत्व और चिकित्सक गुणों के कारण यह लगभग पूरे वर्ष उपलब्ध रहता है यह सभी वर्गों के लोगों का पसंदीदा फल है। यह कार्बोहाइड्रेट और विटामिन, विशेष कर विटामिन बी का उच्च स्त्रोत है। केला दिल की बीमारियों के खतरे को कम करने में सहायक है। इसके अलावा गठिया, उच्च रक्तचाप, अल्सर, गैस्ट्रोएन्टराइटिस और किडनी के विकारों से संबंधित रोगियों के लिए इसकी सिफारिश की जाती है। केले से विभिन्न तरह के उत्पाद जैसे चिप्स, केला प्यूरी, जैम, जैली, जूस आदि बनाये जाते हैं। केले के फाइबर से बैग, बर्तन और वॉली हैंगर जैसे उत्पाद बनाये जाते हैं। रस्सी और अच्छी क्वालिटी के पेपर जैसे उत्पाद केले के व्यर्थ पदार्थ से तैयार किए जा सकते हैं। भारत में केला, उत्पादन में पहले स्थान पर और फलों के क्षेत्र में तीसरे नंबर पर है। भारत के अंदर महाराष्ट्र राज्य में केले की सर्वोच्च उत्पादकता है। केले का उत्पादन करने वाले अन्य राज्य जैसे कर्नाटक, गुजरात, आंध्र प्रदेश और आसाम है।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

ग्रैंड नैने : यह किस्म 2008 में जारी की गई है और यह एशिया में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।  यह औसतन 25-30 किलो गुच्छे निकालते हैं।

दूसरे राज्यों की किस्में : लाल केला, सफेद वेलाची, बसराई, रस्थली, बौना कैवेंडिश, रोबस्टा, पूवन, नेंद्रन, अर्धपुरी, न्याली

मिट्टी

इसे मिट्टी की विभिन्न किस्मों हल्की से उच्च पोषक तत्वों वाली मिट्टी में उगाया जा सकता है जैसे कि गहरी गाद चिकनी, दोमट और उच्च दोमट मिट्टी केले की खेती के लिए उपयुक्त होती है। केले की खेती के लिए मिट्टी की पी एच 6 से 7.5 होनी चाहिए। केला उगाने के लिए, अच्छे निकास वाली, पर्याप्त उपजाऊ और नमी की क्षमता वाली मिट्टी का चयन करें। उच्च नाइट्रोजन युक्त मिट्टी,पर्याप्त फासफोरस और उच्च स्तर की पोटाश वाली मिट्टी में केले की खेती अच्छी होती है। जल जमाव, कम हवादार और कम पौष्टिक तत्वों वाली मिट्टी में इसकी खेती ना करें। रेतली, नमक वाली, कैल्शियम युक्त और अत्याधिक चिकनी मिट्टी में भी इसकी खेती ना करें।

बीज
बीज की मात्रायदि फासला  1.8×1.5 मीटर लिया जाये तो प्रति एकड़ में 1452 पौधे लगाएं। यदि फासला 2 मीटर x 2.5 मीटर लिया जाये, तो एक एकड़ में 800 पौधे लगाने की सिफारिश की जाती है।बीज का उपचाररोपाई के लिए, सेहतमंद और संक्रमण रहित जड़ों या राइज़ोम का प्रयोग करें। रोपाई से पहले, जड़ों को धोयें और क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी  2.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में डुबोयें। फसल को राइज़ोम की भुंडी से बचाने के लिए रोपाई से पहले कार्बोफ्युरॉन 3 प्रतिशत सी जी 33 ग्राम में प्रति जड़ों को डुबोयें और उसके बाद 72 घंटों के लिए छांव में सुखाएं। गांठों को निमाटोड के हमले से बचाने के लिए कार्बोफ्युरॉन 3 प्रतिशत सी जी  50 ग्राम से प्रति जड़ का उपचार करें। फुज़ारियम सूखे की रोकथाम के लिए, जड़ों को कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में 15-20 मिनट के लिए डुबोयें।
ज़मीन की तैयारी

गर्मियों में, कम से कम 3 से 4 बार जोताई करें। आखिरी जोताई के समय, 10 टन अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें। ज़मीन को समतल करने के लिए ब्लेड हैरो या लेज़र लेवलर का प्रयोग करें। वे क्षेत्र जहां निमाटोड की समस्या होती है वहां पर रोपाई से पहले निमाटीसाइड और  धूमन, गड्ढों में डालें।

बिजाई
बिजाई का समयबिजाई के लिए मध्य फरवरी से मार्च का पहला सप्ताह उपयुक्त होता है।फासलाउत्तरी भारत में तटीय क्षेत्रों में, जहां उच्च नमी और तापमान जैसे 5-7 डिगरी सेल्सियस  से कम तापमान हो, वहां पर रोपाई के लिए 1.8मीटरx 1.8 मीटर से कम फासला नहीं होना चाहिए।बीज की गहराईकेले की जड़ों को 45x 45×45 सैं.मी. या 60x60x60 सैं.मी. आकार के गड्ढों में रोपित करें। गड्ढों को धूप में खुला छोड़ें, इससे हानिकारक कीट मर जायेंगे। गड्ढों  को 10 किलो रूड़ी की खाद या गला हुआ गोबर, नीम केक 250 ग्राम और कार्बोफ्युरॉन 20 ग्राम से भरें। जड़ों को गड्ढें के मध्य में रोपित करे और मिट्टी के आसपास अच्छी तरह से दबायें। गहरी रोपाई ना करें।बिजाई का ढंगबिजाई के लिए, रोपाई ढंग का प्रयोग किया जाता है।
सिंचाई
केला एक ऐसी फसल है जिसकी जड़ें ज्यादा गहराई तक नहीं जाती। इसलिए इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। अच्छी उपज के लिए इसे 70-75 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है।  सर्दियों में 7-8 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें और गर्मियों में 4-5 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। बारिश के मौसम में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। अतिरिक्त पानी को खेत में से निकाल दें क्योंकि यह पौधों की नींव और वृद्धि को प्रभावित करेगा। उन्नत सिंचाई तकनीक जैसे तुपका सिंचाई का प्रयोग किया जा सकता है। रिसर्च के आधार पर केले की फसल में तुपका सिंचाई करने से 58 प्रतिशत पानी की बचत होती है और 23-32 प्रतिशत उपज में वृद्धि होती है। तुपका सिंचाई में, रोपाई से चौथे महीने तक 5-10 लीटर पानी प्रतिदिन प्रति पौधे में दें। पांचवे महीने से टहनियों के निकलने तक 10-15 लीटर पानी प्रतिदिन प्रति पौधे में दें और टहनियों के निकलने से तुड़ाई के 15 दिन पहले 15 लीटर पानी प्रतिदिन प्रति पौधे में दें।
खाद

खादें (ग्राम प्रति वृक्ष)

महीने यूरिया DAP MOP
फरवरी – मार्च 190
मार्च 60 60
जून 60 60
जुलाई 80 70
अगस्त 80 80
सितंबर 80 80

यूरिया 450 ग्राम (नाइट्रोजन 200 ग्राम) और म्यूरेट ऑफ पोटाश 350 ग्राम (म्यूरेट ऑफ पोटाश 210 ग्राम) को 5 भागों में बांटकर डालें।

खरपतवार नियंत्रण

रोपाई से पहले गहरी जोताई और क्रॉस हैरो से जोताई करके नदीनों को निकाल दें। यदि हमला घास प्रजातियों द्वारा हो तो नदीनों के अंकुरण से पहले ड्यूरॉन 80 प्रतिशत डब्लयु पी 800 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में डालें।

पौधे की देखभाल
रोपाई के बाद फसल 11-12 महीनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। मार्किट की आवश्यकताओं के अनुसार केले के पूरी तरह पक जाने पर तुड़ाई करें। लोकल मार्किट के लिए फलों की तुड़ाई पकने की अवस्था पर करें और लंबी दूरी वाले स्थानों पर ले जाने के लिए 75-80 प्रतिशत पक जाने पर फलों की तुड़ाई करें। जबकि निर्यात के लिए एक जगह से दूसरी जगह ले जाने से एक दिन पहले या उसी दिन तुड़ाई करें। गर्मियों में फल की तुड़ाई दिन में करें और सर्दियों में जल्दी सुबह तुड़ाई ना करें।

हानिकारक कीट और रोकथाम :-
फल की भुंडी : यदि फल की भुंडी का हमला दिखे तो तने के चारों तरफ मिट्टी में कार्बरील 10-20 ग्राम प्रति पौधे में डालें।

राइज़ोम की भुंडी : इसकी रोकथाम के लिए सूखे हुए पत्तों को निकाल दें और बाग को साफ रखें। रोपाई से पहले राइज़ोम को मिथाइल ऑक्सीडेमेटन 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में डुबो दें। रोपाई से पहले केस्टर केक 250 ग्राम या कार्बरील 50 ग्राम या फोरेट 10 ग्राम प्रति गड्ढे में डालें।

केले का चेपा : यदि इसका हमला दिखे तो मिथाइल डेमेटन 2 मि.ली या डाइमैथोएट 30 ई सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।


थ्रिप्स :
 इसकी रोकथाम के लिए मिथाइल डेमेटन 20 ई सी 2 मि.ली. या मोनोक्रोटोफॉस 36 डब्लयु एस सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

  • बीमारियां और रोकथाम

सिगाटोका पत्तों पर धब्बा रोग : प्रभावित पत्तों को निकालें और जला दें। जल जमाव हालातों के लिए खेत में से पानी के निकास का उचित प्रबंध करें।
किसी एक फंगसनाशी जैसे कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम या मैनकोजेब 2 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम या ज़ीरम 2 मि.ली. या क्लोरोथालोनिल 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी मे मिलाकर स्प्रे करें। घुलनशील पदार्थ जैसे सैंडोविट, टीपॉल 5 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे में मिलायें।

एंथ्राक्नोस :  यदि इसका हमला दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम  या बॉर्डीऑक्स मिश्रण 10 ग्राम या क्लोरोथालोनिल फंगसनाशी 2 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

पनामा बीमारी : यदि इसका हमला खेत में दिखे तो विभिन्न तरह के प्रभावित पौधों को उखाड़े और खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। उसके बाद चूना 1-2 किलो गड्ढों में डालें।
रोपाई से पहले जड़ों को कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में डुबोयें और रोपाई के  6 महीने  कार्बेनडाज़िम छिड़कें।

फुज़ेरियम सूखा : प्रभावित पौधों को निकाल दें और 1-2 किलो चूना प्रति पौधे में डालें।
रोपाई के बाद कार्बेनडाज़िम 60 मि.ग्रा.  दूसरे, चौथे, 6वें महीने में प्रति वृक्ष में प्रति फल पर डालें। कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर धब्बों पर छिड़कें।

गुच्छे बनना : यह चेपे के हमले के कारण होता है। पौधे के प्रभावित भागों को निकालें और खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर दें। यदि खेत में चेपे का हमला दिखे तो डाइमैथोएट 20 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
फसल की कटाई

रोपाई के बाद फसल 11-12 महीनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है।

कटाई के बाद
तुड़ाई के बाद, क्यूरिंग, धुलाई, छंटाई, पैकेजिंग, स्टोरेज, परिवहन और मार्किटिंग आदि तुड़ाई के बाद की मुख्य क्रियाएं हैं।आकार, रंग और पकने के आधार पर छंटाई की जाती है। छोटे, ज्यादा पके हुए, नष्ट हुए  और बीमारी से प्रभावित फलों को निकाल  दें। आमतौर पर फलों की तुड़ाई, फल पकने से पहले की अवस्था में की जाती है। उसके बाद, तैयार रंग विकसित करने के लिए फलों को इथरिल की कम मात्रा में पकाया जाता है।
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Jimikand or Suran or Elephant yamजिमीकंद को एक औषधीय फसल के रूप में उगाया जाता है, किन्तु इसका इस्तेमाल हमारे घरो में सब्जियों के रूप में भी होता है | इसे ओल और सूरन के नाम से भी जाना जाता है | जिमीकंद की तासीर अधिक गर्म होती है…Click HereMuskMelonखरबूजा ( कुकुमिस मेलो एल) एक फल की फसल है जिसकी खेती भारत में किसानों द्वारा विशेष रूप से गर्मी के मौसम में व्यापक रूप से की जाती है। यह गर्म मौसम की फसल है जो अपने अनोखे स्वाद के लिए जानी जाती है यह फल अपनी उच्च जल सामग्री के लिए जाना जाता है और इसका शरीर पर ठंडा प्रभाव पड़ता है…..Click Here Lotus cucumberकमल ककड़ी की खेती सब्जी के लिए की जाती है| कमल के पौधों में लगने वाला फूल जितना लोकप्रिय है, उतने ही खास उस पौधे के बाक़ी हिस्से भी है| कमल के फूल के अलावा बीज और जड़ो को भी काफी पसंद किया जाता है | जिसमे इसके बीजो से मिलने वाला मखाना सेहत को बेहतर बनाने में सहायता प्रदान करता है, तो वही इसकी जड़े जिसे कमल ककड़ी कहते है…Click Here
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