Savory Herb Plant

Table Of Content

  • घर पर सेवरी हर्ब प्लांट कैसे लगाएं
  • सेवरी के बीज कब लगाएं
  • सेवरी का पौधा लगाने के लिए आवश्यक सामग्री
  • सेवरी प्लांट लगाने के लिए बेस्ट गमले
  • सेवरी का पौधा लगाने के लिए मिट्टी
  • सेवरी का पौधा लगाने की विधि
  • गमले में सेवरी प्लांट कैसे लगाएं
  • सेवरी हर्बल प्लांट की देखभाल कैसे करें
  • कीट
  • साथी पौधे
  • सेवरी हर्बल प्लांट हार्वेस्टिंग

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घर पर सेवरी हर्ब प्लांट कैसे लगाएं
सेवरी के बीज कब लगाएं
सेवरी का पौधा लगाने के लिए आवश्यक सामग्री
सेवरी प्लांट लगाने के लिए बेस्ट गमले
सेवरी का पौधा लगाने के लिए मिट्टी
घर पर सेवरी हर्ब प्लांट कैसे लगाएं

सेवरी, मिंट फैमिली (mint family) का एक हर्बल प्लांट है जिसकी पत्तियां जड़ी-बूटी के रूप में उपयोग की जाती हैं। सेवरी के पौधे दो प्रकार के होते हैं – विंटर सेवरी और समर सेवरी। विंटर सेवरी एक फैलने वाला बारहमासी पौधा है, जबकि समर सेवरी एक झाड़ीदार वार्षिक पौधा है। यदि आप अपने घर पर इस हर्बल प्लांट को उगाना चाहते हैं तो यह लेख आपके लिए काफी हेल्पफुल साबित हो सकता है। घर पर गमले में सेवरी या सैवरी (savory) हर्बल प्लांट कब और कैसे लगाएं सेवरी (savory) हर्बल प्लांट के बीज लगाने की विधि तथा सेवरी के पौधे की देखभाल कैसे करें, के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें।

सेवरी के बीज कब लगाएं

घर पर सेवरी हर्बल प्लांट उगाने के लिए आपको इस पौधे के बीज आखिरी ठण्ड या शुरूआती वसंत के कुछ समय पहले लगाने होंगे। गार्डन या गमले की मिट्टी में सेवरी प्लांट के बीज लगाने का सबसे बेस्ट समय जनवरी से मार्च का होता है।

सेवरी का पौधा लगाने के लिए आवश्यक सामग्री

घर पर गमले या गार्डन की मिट्टी में सेवरी या सैवरी हर्बल प्लांट उगाने के लिए आपको निम्न चीजों की आवश्यकता हो सकती है, जैसे :-

सेवरी प्लांट लगाने के लिए बेस्ट गमले

घर पर सेवरी (सैवरी) का पौधा लगभग 12 इंच चौड़ाई और समान गहराई वाले पॉट में अच्छी तरह से ग्रो करता है, हालांकि यह प्लांट 6 x 6 इंच (W x H) के पॉट या ग्रो बैग में भी आसानी से उगाया जा सकता है, लेकिन कुछ समय बाद आपको पौधे को उचित आकार के गमले में रिपॉट करना होगा। गमला लेते समय इस बात का ध्यान रहे कि, गमले में अतिरिक्त जल निकासी के लिए पर्याप्त छिद्र हों। आप सैवरी या सेवोरी पौधे लगाने के लिए निम्न साइज के गमले या ग्रो बैग का इस्तेमाल कर सकते हैं, जैसे:

  • 12 x 12 इंच (W x H)
  • 15 x 12 इंच (W x H)
  • 15 x 15 इंच (W x H)
  • 24 x 12 इंच (W x H)

सेवरी का पौधा लगाने के लिए मिट्टी

सेवोरी या सेवरी जड़ी-बूटी वाला पौधा अच्छी तरह से सूखी, अतिरिक्त जल निकासी वाली रेतीली मिट्टी में उगना पसंद करता है, जिसका PH मान लगभग 6.7 से 7.3 के बीच हो। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए आप मिट्टी में जैविक खाद, पुरानी गोबर खाद और वर्मीकम्पोस्ट आदि मिला सकते हैं। इसके अलावा आप सैवरी (Savory) हर्ब प्लांट लगाने के लिए पॉटिंग मिट्टी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।

सेवरी का पौधा लगाने की विधि
गमले में सेवरी प्लांट कैसे लगाएं
सेवरी हर्बल प्लांट की देखभाल कैसे करें
कीट
साथी पौधे
सेवरी का पौधा लगाने की विधि

घर पर गमले या ग्रो बैग में सेवरी (सैवरी) के पौधों को दो मेथड से उगाया जा सकता है, जो निम्न हैं:

  1. डायरेक्ट मेथड और
  2. ट्रांसप्लांटिंग मेथड

डायरेक्ट मेथड में आप सेवरी के बीजों को सीधे गमले या ग्रो बैग की मिट्टी में लगा सकते हैं, जबकि ट्रांसप्लांटिंग मेथड में सेवरी के बीजों को पहले सीडलिंग ट्रे या छोटे पॉट में लगाया जाता है और जब पौधे अंकुरित होकर 3-4 इंच लंबे हो जाएँ, तब आप इन्हें किसी बड़े गमले या गार्डन की मिट्टी में स्थानांतरित कर सकते हैं।

गमले में सेवरी प्लांट कैसे लगाएं

होम गार्डन या टेरिस गार्डन के पॉट या ग्रो बैग में सेवरी प्लांट के बीज लगाने की विधि निम्न प्रकार है:-

  • अच्छी गुणवत्ता वाले सेवरी (savory) के बीज लें।
  • अब गमले में तैयार की हुई मिट्टी भरें, मिट्टी भरते समय इस बात का ध्यान रखें कि, गमला ऊपर से 3-4 इंच खाली हो।
  • बीज लगाने से पहले यह सुनिश्चित करें कि, मिट्टी नम है।
  • अब गमले या ग्रो बैग के बीचों-बीच ¼-1/8 इंच गहराई में सेवरी के बीजों को लगाएं।
  • सीड (seed) लगे गमले की मिट्टी में स्प्रे पंप की मदद से पानी डालें।
  • इसके बाद गमले को आंशिक धूप वाले स्थान पर रखें।
  • 15-24 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर सेवरी के बीज अंकुरित होने में लगभग 7-21 दिन का समय लग सकता है।
  • सेवरी के दो पौधों की दूरी 12-18 इंच होनी चाहिए, यदि आपके पौधे बहुत पास-पास लगे हैं, तो उन पौधों को आप बड़े गमले या ग्रो बैग में ट्रांसप्लांट कर सकते हैं।

सेवरी हर्बल प्लांट की देखभाल कैसे करें

यदि आपने अपने घर पर इस हर्बल प्लांट को लगाया है, तो अच्छी ग्रोथ के लिए पौधे की देखभाल करनी होगी। आप सैवरी (सेवरी) हर्ब के पौधे की देखभाल निम्न प्रकार कर सकते हैं, जैसे :-

पानी –

सेवरी के पौधे की अच्छी ग्रोथ के लिए मिट्टी में नमी बनाये रखें, इसके लिए आपको इन पौधों को नियमित रूप से पानी देना होगा, लेकिन ध्यान रहे कि, मिट्टी ज्यादा गीली और चिपचिपी न हो पाए। गर्मियों के समय सेवरी प्लांट को जरूरत के अनुसार पानी दें, क्योंकि इस मौसम में पौधों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। पौधों को पानी देने के लिए आप वॉटर कैन और स्प्रे पंप का उपयोग कर सकते हैं।

सूर्य का प्रकाश –

सैवरी या सेवरी के पौधे पूर्ण सूर्य प्रकाश में अच्छी तरह से उगते हैं। यदि आपने ये पौधे अपने घर के अन्दर उगाये हैं, तो पौधे लगे गमले या ग्रो बैग को ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ पर्याप्त धूप आती हो, इसके लिए आप पौधों को खिड़की के पास, बालकनी में रख सकते हैं। सेवरी के पौधे की अच्छी ग्रोथ के लिए प्रतिदिन लगभग 5-6 घंटे धूप की आवश्यकता होती है।

तापमान –

सेवरी एक मध्यम तापमान और गर्म जलवायु वाला पौधा है, जिसे अच्छी तरह से बढ़ने के लिए 12 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है, हालांकि यह प्लांट कुछ समय तक अधिक तापमान को भी सहन कर सकता है।

उर्वरक –

घर पर गमले या गार्डन की मिट्टी में लगे सेवरी हर्बल प्लांट को अधिक उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन फिर भी पौधे के विकास व वृद्धि करने के लिए आप नियमित समयांतराल से पौधे की मिट्टी में जैविक खाद डाल सकते हैं। आप पौधों को नीम केक, रॉक फॉस्फेट, पुरानी गोबर खाद और वर्मीकम्पोस्ट आदि खाद दे सकते हैं।

प्रूनिंग –

आप सेवरी के पौधे की प्रूनिंग भी कर सकते हैं। इस पौधे की लगातार हार्वेस्टिंग करने अर्थात् पौधे में अधिक से अधिक और नई पत्तियां लगने के लिए, ज्यादा पुरानी शाखाओं और डैमेज भागों को प्रूनर की मदद से काट कर अलग कर देना चाहिए।

कीट

सेवरी के पौधों को नुकसान पहुँचाने वाले कीट निम्न हैं, जैसे :-

  • एफिड्स (Aphids)
  • स्पाइडर माइट्स (Spider Mites)
  • लीफहापर्स (Leafhoppers) आदि

इन कीटों से सेवरी प्लांट्स को बचाने के लिए पौधे की पत्तियों पर जैविक कीटनाशक साबुन और नीम तेल का छिड़काव करें। इसके अलावा आप अपने अनुसार पौधों को कीटों से बचाने के लिए अन्य तरीके भी अपना सकते हैं।

साथी पौधे

सेवरी के पौधे को सेम और टमाटर के साथ भी उगाया जा सकता है। कहा जाता है कि इस पौधे को प्याज के पास लगाने से प्याज का बल्व (कंद) मीठा होता है। मधुमक्खियाँ जैसे पोलिनेटर्स को आकर्षित करने के लिए सेवरी के पौधे के साथ लैवेंडर, सेलेरी और सेज प्लांट लगाएं।

सेवरी हर्बल प्लांट हार्वेस्टिंग
सेवरी हर्बल प्लांट हार्वेस्टिंग

अंकुरण के बाद जब पौधे लगभग 6-8 इंच के हो जाते हैं, तब आप इस प्लांट की हार्वेस्टिंग कर सकते हैं। हार्वेस्टिंग के लिए प्रूनर या कैंची के मदद से फूल आने से पहले कम से 6 इंच के तनों को काटकर अलग कर लें। सेवरी की किस्म, विंटर सेवरी की हार्वेस्टिंग सालभर की जा सकती है। आप सेवरी के पत्तों को सुखाकर उसे स्टोर करके भी रख सकते हैं।

इस आर्टिकल में आपने जाना कि, सेवरी के पौधे को घर पर कैसे और कब लगाएं, बीज लगाने की विधि तथा सेवरी के पौधे की देखभाल के तरीके कौन-कौन से हैं। आशा करते हैं यह लेख आपको पसंद आया होगा, इस लेख से सम्बन्धित आपके जो भी सवाल या सुझाव हैं, हमें कमेंट में लिखकर जरूर बताएं।

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मिर्च के पौधेमिर्च की खेती विविध प्रकार की मिट्टियों मे जिसमे की कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त हो एवं जल निकास की उचित सुविधा हो, मे सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिर्च की फसल जलभराव वाली स्थिति सहन नही कर पाती है…Click Hereकृषि उड़ान योजनाजैसे की आप लोग जानते है की ज्यादातर कृषि पर ही निर्भर रहते है ।कृषि ही उनकी आय का साधन होती है ।किसानो की फसल की पैदावार की अच्छी कीमत प्रदान करने के लिए ही सरकार ने इस योजना को शुरू किया गया है ।
इस योजना के ज़रिये किसानो की आय को दुगुना करनाClick Here
किसान क्रेडिट कार्डकिसान क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी। किसानों की ऋण आवश्‍यकताओं (कृषि संबंधी खर्चों) की पूर्ति के लिये पर्याप्‍त एवं समय पर ऋण की सुविधा प्रदान करना, साथ ही आकस्‍मिक खर्चों के अलावा सहायक कार्यकलापों से संबंधित खर्चों की पूर्ति करना..Click Here
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Dragon Fruit Farming

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  • कमलम की खेती
  • भारत में कहाँ होती है कमलम की खेती
  • कैसे की जाती है Dragon Fruit की खेती ? 

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कमलम की खेती
भारत में कहाँ होती है कमलम की खेती
कैसे की जाती है Dragon Fruit की खेती ? 
कमलम की खेती

Dragon Fruit Farming: कमलम या ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) औषधीय गुणों से परिपूर्ण एक बारहमासी कैक्टस है| इसकी खेती से सालाना 10 लाख रुपये तक कमाई की जा सकती है|

Dragon Fruit Farming: अगर आप कम खेत में मोटी कमाई करना चाहते हैं तो आपको कमलम या ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit Farming) की खेती करनी चाहिए भारत में कमलम (ड्रैगन फ्रूट) की खेती का क्षेत्र वर्तमान में 3,000 हेक्टेयर है, जिसे बढ़ाकर 50,000 हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य है | बिहार, यूपी, गुजरात, कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु समेत कई राज्यों में Dragon Fruit की खेती होती है इससे वहां के किसान तगड़ी कमाई कर रहे हैं | ड्रैगन फ्रूट की खेती इसलिए खास है क्योंकि यह आमदनी का बेहतर स्रोत है इसमें बस एक बार पैसा लागकर आप 40 वर्ष तक इससे मुनाफा ले सकते हैं|

कमलम या ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) औषधीय गुणों से परिपूर्ण एक बारहमासी कैक्टस है, जिसका मूल उत्पादन दक्षिणी मैक्सिको, मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में शुरू हुआ. अंग्रेजी में ड्रैगन फ्रूट कहे जाने वाला पिटाया अलग-अलग नामों से लोकप्रिय है जैसे मेक्सिको में पिठैया, मध्य और उत्तरी अमेरिका में पिटया रोजा, थाईलैंड में पिथाजाह और भारत में संस्कृत नाम कमल से इस फल को कमलम कहा जाता है इसे “21वीं सदी का चमत्कारिक फल” भी कहा जाता है |

कमलम (Dragon Fruit) ने न केवल अपने लाल बैंगनी रंग और खाद्य उत्पादों के आर्थिक मूल्य के कारण बल्कि अपने जबरदस्त स्वास्थ्य लाभों के कारण हाल ही में दुनिया भर के उत्पादकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है | इस फल के छिलके सहपत्रों या शल्कों से ढके रहते हैं जिसके कारण यह फल पौराणिक जीव ‘ड्रैगन’ जैसा दिखता है, इसलिए इसका नाम ड्रैगन फ्रूट रखा गया है वर्तमान में इसकी खेती कम से कम 22 उष्णकटिबंधीय देशों में की जा रही है |

भारत में कहाँ होती है कमलम की खेती

भारत में कमलम फल (Dragon Fruit) की खेती तेजी से बढ़ रही है और कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, मिजोरम और नागालैंड के किसानों ने इसकी खेती करना शुरू कर चुके है |

कैसे की जाती है Dragon Fruit की खेती ? 

ड्रैगन फ्रूट खेती पौधे और बीज दोनों से ही हो सकती है हालांकि अगर आप बीज से खेती करेंगे तो फल आने में 4-5 साल लग सकते हैं जबकि कलम से बनाए गए पौधे से खेती करने पर आपको 2 साल में ही फल मिलने शुरू हो जाते हैं  इसकी खेती कम पानी में भी हो सकती है | इसकी खेती से पहले खेत में पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद जरूर डालें, ताकि पौधे को पोषक तत्व की कोई कमी ना हो |

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किसान क्रेडिट कार्डकिसान क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी। किसानों की ऋण आवश्‍यकताओं (कृषि संबंधी खर्चों) की पूर्ति के लिये पर्याप्‍त एवं समय पर ऋण की सुविधा प्रदान करना, साथ ही आकस्‍मिक खर्चों के अलावा सहायक कार्यकलापों से संबंधित खर्चों की पूर्ति करना…Click Here मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme)Soil Health Card Scheme को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2015 में देश के किसानो को लाभ पहुंचाने के लिए शुरू की गयी है | इस योजना के अंतर्गत देश के किसानो की जमीन की मिट्टी की गुणवत्ता का अध्ययन करके एक अच्छी फ़सल प्राप्त करने में सहायता दी जाएगी…Click HereTermite(दीमक)दीमक एक सामाजिक कीट है। दीमक हल्के पीले या भूरे रंग के कोमल कीट होते हैं। चींटी की जाति का एक छोटा कीड़ा जो समूह में रहता है और कागज़, लकड़ी, पौधों आदि को खा जाता है। इसको सफेद चींटी भी कहा जाता है…Click Here
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Lemon Grass

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  • बुनियादी जानकारी :-
  • बीज विशिष्टता :-
  • भूमि की तैयारी एवं मृदा स्वास्थ्य :-
  • फसल स्प्रे और उर्वरक विशिष्टता :-
  • निराई एवं सिंचाई :-
  • कटाई एवं भंडारण :-

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बुनियादी जानकारी :-

लेमन घास या नींबू घास (Lemon Grass) एक सुगन्धित औषधीय पौधा है। जिसकी औसतन ऊंचाई 1-3 मीटर लंबा होता है। पत्ते 125 सैं.मी. लंबे और 1.7 सैं.मी. चौड़े होते हैं। इसका उपयोग मेडिसिन, कॉस्मेटिक और डिटरजेंट में किया जाता है। लेमन ग्रास से निकलने वाले तेल की बाजार में बहुत मांग है। लेमन ग्रास से निकलने वाला तेल कॉस्मेटिक्स, साबुन और तेल और दवा बनाने वाली कंपनियां उपयोग करती हैं, इस वजह से इसकी अच्छी कीमत मिलती है। इसे भारत, अफ्रीका, अमरीका और एशिया के उष्ण कटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। भारत में इसे मुख्यत पंजाब, केरला, आसाम, महांराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में उगाया जाता है।

बीज विशिष्टता :-

बुवाई का समय
लेमन घास की नर्सरी बेड तैयार करने का सबसे अच्छा समय मार्च-अप्रैल का महीना है।
प्रदेश में उगाया जाता है।

दुरी :-
कतार से कतार की दुरी 50×75 से.मी. तथा पौधों से पोधों की दुरी 30x 40 से.मी. रखे। 

बीज की गहराई :-
2-3  सैं.मी. की गहराई में बोयें।

बुवाई का तरीका :-
लेमन घास के बीज को नर्सरी बनाकर बोया जाता है। पौधों के कुछ बड़े होने पर इन्हें पौधशाला से उखाड़ कर अन्य जगह या खेत में रोपाई करते हैं। पौधे 2 महीने के बाद लगाने लायक हो जाते हैं।

बीज की मात्रा :-
एक हेक्टेयर के लिए 4 किलो बीज की जरूरत होती है।
बीज का उपचार
फसल को कांगियारी से बचाने के लिए नर्सरी में बुवाई से पहले बीजों को सीरेसन 0.2 % या एमीसान 1 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद बुवाई के लिए बीजों का प्रयोग करें।

भूमि की तैयारी एवं मृदा स्वास्थ्य :-

अनुकूल जलवायु :-
लेमन घास की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु उपयुक्त है। उच्च ताप तथा धूप की उपस्थिति से पौधे में तेल की मात्रा बढ़ती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।
भूमि का चयन :-
लेमन घास की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमि की जा सकती है। दोमट उपजाऊ मिट्टी अधिक अच्छी होती है, लेकिन लेमन घास को बालू युक्त चिकनी मिट्टी, लेटेराईट एवं बारानी क्षेत्रों में भी उपजाई जा सकती है। इस फसल की वृद्धि के लिए मिट्टी का पी एच 5.0 – 8.5 होनी चाहिए।

खेत की तैयारी:-
लेमन घास की बुवाई से पहले खेत की 2-3 बार अच्छी तरह जुताई कर लें। अंतिम जुताई के समय पाटा लगाकर खेत को समतल और भुरभुरा बना लें। जुताई के बाद उचित दुरी पर क्यारियाँ (मेड) बनाना चाहिए।

फसल स्प्रे और उर्वरक विशिष्टता :-

खाद एवं रासायनिक उर्वरक :-
फसल के अच्छे विकास के लिए जैविक विधि में रसायनिक खाद के बदले में केंचुआँ खाद/नादेप कम्पोस्ट, एजोटोबैक्टर, पी.एस.बी., करंज खल्ली दिया जाता है। तथा अजैविक विधि में खेत की तैयारी के समय कम्पोस्ट या गोबर की सड़ी खाद 20-25 टन प्रति हेक्टेयर देकर अच्छी तरह मिला दें। साथ ही नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश भी 150:40:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई समय एवं शेष मात्रा दो किस्तों में 2-2 माह बाद दें।

निराई एवं सिंचाई :-

खरपतवार नियंत्रण :-
खरपतवार की रोकथाम के लिए आवश्यकतानुसार समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना चाहिए।
सिंचाई :-
लेमन घास के लिए जल की अधिक मात्रा की आवश्यकता नहीं होती है। बरसात में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। रोपाई के पश्चात भूमि में नमी होना जरूरी है। गर्मियों में 10 दिनों के अंतराल पर एवं सर्दियों में 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

कटाई एवं भंडारण :-

फसल की कटाई :-
लेमन घास लगाने के 3 से 5 महीने बाद इसकी पहली कटाई की जाती है। प्रति वर्ष 4-5 कटाई की जा सकती है। लेमन घास तैयार हुआ है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए इसे तोड़कर सूंघें, सूंघने पर नींबू की तेज खुशबू आए तो समझ जाएं कि ये तैयार हो गया है। जमीन से 5 से 8 इंच ऊपर इसकी कटाई करें।
कटाई के बाद :-
लेमन घास की कटाई के बाद तेल निकालने की प्रक्रिया की जाती है। तेल निकालने से पहले लैमन घास को सोडियम क्लोराइड के घोल में 24 घंटे के लिए रखें इससे फसल में खट्टेपन की मात्रा बढ़ती है। उसके बाद घास को छांव में रखे और बैग में पैक करके स्थानीय बाजारों में भेज दें। पकी हुई लैमन घास से कई तरह के उत्पाद जैसे लैमन घास तेल और लैमन घास लोशन बनाए जाते हैं।
उत्पादन :-
हरी घास का उपयोग तेल निकालने में होता है। पत्ती तना व पुष्प क्रम में तेल पाया जाता है। अत: पूरा ऊपरी भाग आसवन के लिए उपयोगी होता है। लगभग 10 से 25 टन/हे. हरीघास पैदा होती है। जिससे 60 से 80 कि.ग्राम तेल/हे. मिलता है। घास के ताजा वजन के आधार पर 0.35 प्रतिशत तेल उपलब्ध होता है।

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Pink Boll Worm (गुलाबी सुंडी)पिंक बॉलवॉर्म एशिया का मूल निवासी है, लेकिन दुनिया के अधिकांश कपास उगाने वाले क्षेत्रों में एक आक्रामक प्रजाति बन गई है। भारत के कई क्षेत्रों में कपास पर गुलाबी सुंडी एक प्रमुख कीट के रूप में उभर कर आती रही है। कपास में कपास के सबसे बड़े दुश्मन पिंक बॉल वार्म (Pink Boll worm) यानी गुलाबी सुंडी कीट के आक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता हैClick Hereकद्दू (Pumpkin)भूमि: कद्दू की खेती को करने के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है | कद्दू की फसल की अच्छी वृद्धि के लिए गर्म और आद्र दोनों ही जलवायु को उपयुक्त माना जाता है | इसकी फसल में अधिक पानी की आवश्यकता होती है, किन्तु अधिक जलभराव वाली भूमी को इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है ..Click Hereजई(Jaee)भूमि : जई सभी प्रकार की कृषि योग्य भूमि में पैदा हो सकती है | यह हर तरह की मिट्टी में उगाई जाती है। अच्छे जल निकास वाली चिकनी रेतली मिट्टी, जिस में जैविक तत्व हों, जई की खेती के लिए उचित मानी जाती है। जई की खेती के लिए 5-6.6 पी एच वाली मिट्टी बढ़िया होती है..Click Here
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Rosemary

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  • बुनियादी जानकारी
  • बीज विशिष्टता तथा भूमि की तैयारी
  • भूमि की तैयारी एवं मृदा स्वास्थ्य
  • फसल स्प्रे और उर्वरक विशिष्टता
  • निराई एवं सिंचाई
  • कटाई एवं भंडारण
  • फसल संबंधी रोग

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रोजमैरी (Rosemary)

 


बुनियादी जानकारी

रोज़मेरी को हिंदी में गुलमेंहदी कहा जाता है। इस बारहमासी जड़ीबूटी का वैज्ञानिक नाम Rosamarinus officinalis है, लेकिन दुनिया में इसे सामान्यत: रोज़मेरी या गुलमेंहदी के नाम से ही जाना जाता है।रोजमेरी रसोईघर में सबसे अधिक पाए जाने वाली जड़ी-बूटियों में से एक है। यह भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उगाए जाने वाला चिकित्सीय पौधा है। यह 2-3 फीट ऊँचा बहुवर्षीय शाकीय पौधा है। इसकी पत्तियॉं सुई के आकार की 3-4 से.मी.तक लम्बी होती है। पत्तियों में सुगन्धित तेल पाया जाता है। इसके फूल नीले रंग के होते हैं । यह पुदीना परिवार लैमियेसी (Lameaceae) की प्रजाति का पौधा है। यह गर्म, कड़वा और अधिक कसैले स्वाद का होता है और सूप, सॉस, स्टॉज, रोस्ट्स और स्टफिंग आदि के लिए उपयोग किया जाता है। भारत में इसकी खेती हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, उत्तराखण्ड में की जा रही है।

 


बीज विशिष्टता तथा भूमि की तैयारी

बुवाई का समय :-
रोजमेरी की खेती अक्टूबर से फरवरी के बीच हो सकती है।
बुवाई का तरीका :-
रोजमेरी की बुवाई बीज द्वारा या कटिंग (कलम) विधि द्वारा की जाती है।


नर्सरी तैयार करना :-

बीज द्वारा प्रति हैक्टर (एक हेक्टेयर 2.471 एकड़ के बराबर होता है) 2 किलो बीज के अनुसार नर्सरी तैयार की जाती है। जिसके लिये 2 ग्राम बीज प्रति 1 वर्ग मी. भूमि में छिड़ककर रेत से ढक देते हैं। 14-15 ºC तापमान पर बीज का जमाव होता है। 8-10 सप्ताह में पौध रोपण हेतु तैयार हो जाते हैं। रोजमेरी का उत्पादन/प्रवर्धन कटिंग द्वारा भी किया जा सकता है।


पौधरोपण का तरीका :-

नर्सरी में तैयार पौध के खेत में 45 x 45 सेमी. दूरी पर रोपित करना चाहिये।


बीज की मात्रा :-

प्रति हैक्टेयर (एक हेक्टेयर 2.471 एकड़ के बराबर होता है) 30,000 पौध से अच्छी उपज प्राप्त होती है।

 


भूमि की तैयारी एवं मृदा स्वास्थ्य

अनुकूल जलवायु :-
रोजमेरी की फसल के लिए शीतोष्ण जहाँ वर्ष भर मौसम ठण्डा रहता है तथा पाला युक्त हो जलवायु उपयुक्त होती है।

भूमि का चयन :-
इसकी खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जा सकती है, लेकिन इसके लिए हल्की कंकड़ युक्त मृदा उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी :-
पौधरोपण से पहले खेत की अच्छी तरह से गहरी जुताई कर खेत में खाद डाल कर समतल और भुरभुरा कर लेना चाहिए तथा खेत में अच्छे जलनिकासी व्यवस्था करना चाहिए।

 


फसल स्प्रे और उर्वरक विशिष्टता

खाद एवं रासायनिक उर्वरक :-
रोजमेरी की अच्छी बढ़वार के लिए खेत तैयारी के समय 20 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद और 20 किलो ग्राम माइक्रो भू-पावर के अनुसार प्रति एकड़ में मिला देते है ध्यान रहे रोज़मेरी एक जड़ीबूटी है लिहाज़ा इसकी खेती में किसी भी तरह की रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके लिए आपको ऑर्गेनिक/Organic खाद तैयार करके ही खेती करनी चाहिए।

 


निराई एवं सिंचाई

खरपतवार नियंत्रण :-
खरपतवार की रोकथाम के लिए समय-समय पर आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करना चाहिए।
सिंचाई :-
रोज़मेरी की खेती के लिए सिंचाई आवश्यकता अनुसार करना बहुत ज़रूरी है। रोज़मेरी की खेती के लिए बुआई के तुरन्त बाद 3-4 बार लगातार सिंचाई करनी होती है और बाद में समय-समय पर सिंचाई करते रहना चाहिये।

 


कटाई एवं भंडारण

फसल की कटाई :-
पहले साल में बुवाई के 4 माह बाद 50 प्रतिशत फूल आने पर कोमल भाग को काट कर हर्ब्स एकत्र कर ली जाती है। प्रथम वर्ष में दो बार तथा तीसरे वर्ष से साल में तीन से चार बार हर्ब्स प्राप्त की जाती है।

उत्पादन :-
सूखी हर्बेज से 0.7-3 प्रतिशत 85-100 किलों प्रति हैक्टर, प्रतिवर्ष तेल मिलता है। तेल प्रति हेतु प्रत्येक आसवन में 3 घंटे लगते हैं।

 


फसल संबंधी रोग

  1. Cottony soft rot

    विवरण :- रोग का उद्भव गर्म, आर्द्र परिस्थितियों का पक्षधर है घावों पर सफेद, भुलक्कड़ कवकनाशी उगता है, जिससे इस रोग का नाम कॉटनी सॉफ्ट रोट पड़ा है। मायसेलियम में बड़े, गहरे रंग के स्क्लेरोटिया बनते हैं।


    जैविक समाधान :-
    रोग की शुरुआत में नीम के तेल का 10,000 पीपीएम छिड़काव करें।


    रासायनिक समाधान :-
    कॉटनी सॉफ्ट रॉट रोग के प्रभावी नियंत्रण के लिए प्रणालीगत कवकनाशी की सिफारिश की जाती है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं; गियरलॉक टर्बो (GEARLOCK TURBO ) 250WP

  2. crown gall

    विवरण :- क्राउन पित्त एक पौधे की बीमारी है जो मिट्टी में रहने वाले जीवाणु, एग्रोबैक्टीरियम टूमफेशियन्स के कारण होती है। जीवाणु मुख्य रूप से गुलाब परिवार में जड़ों, टहनियों और यूरोपियनस और अन्य झाड़ियों की शाखाओं पर असामान्य वृद्धि या पित्त का कारण बनता है। जीवाणु पौधों की कोशिकाओं के तेजी से विकास को उत्तेजित करता है जिसके परिणामस्वरूप गॉल होते हैं।


    जैविक समाधान : –
    एक बार जब क्राउन गॉल खुल जाते हैं, तो पित्त और पित्त के आसपास के छाल के ऊतकों को हटाना वर्तमान में उपलब्ध सबसे प्रभावी उपचार है। उपचार जो पित्त के आसपास की छाल को मारते या हटाते हैं, वे बहुत अच्छे नियंत्रण में होते हैं। एग्रोबैक्टीरियम टूमफैसिएन्स (पूर्व में ए रेडियोबैक्टर) का K-84 स्ट्रेन, जो क्राउन पित्त रोगज़नक़ द्वारा संक्रमण को रोकने में उपयोग के लिए उपलब्ध है, एक उत्कृष्ट जैविक नियंत्रण एजेंट है।


    रासायनिक समाधान :-

    कई काष्ठीय पौधों पर गलों का उपचार रसायनों के मिश्रण से किया जा सकता है जो विषैला होते हैं और क्राउन पित्त ऊतकसुरक्षित होते हैं। मिश्रण, जिसे वर्तमान में गैलेक्स नाम से विपणन किया जाता है, को पहले बैक्टिसिन के रूप में बेचा गया था। यह गुलाब के मुकुट के गलों पर सफलता के साथ प्रयोग किया गया है। टेलोन® सी-35 या टेलोन® सी-35 के साथ फ्यूमिगेट करें और इसके बाद क्राउन पित्त से पीड़ित जगहों पर क्लोरोपिक्रिन लगाएं।

  3. Downey Mildew


    विवरण :-
    डाउनी मिल्ड्यू, पौधों की बीमारी, विशेष रूप से ठंडे आर्द्र क्षेत्रों में, ओमीकोटा फ़ाइलम के कई कवक जैसे जीवों के कारण होती है।


    जैविक समाधान : –
    उपचारित बीजों ने अंकुर की शक्ति को बढ़ाया और डाउनी मिल्ड्यू रोगज़नक़ के स्पोरुलेशन को रोक दिया। पी. फ्लोरेसेंस ने बीज उपचार और पर्ण अनुप्रयोग दोनों द्वारा डाउनी फफूंदी रोग को नियंत्रित किया, लेकिन जब बीज उपचार के बाद पर्ण आवेदन किया गया तो प्रभावकारिता काफी अधिक थी। बीज उपचार अकेले पत्ते लगाने से बेहतर था।


    रासायनिक समाधान :-
     डाउनी फफूंदी को नियंत्रित करने के लिए कई कवकनाशी उपलब्ध हैं, जिनमें संरक्षक और उन्मूलन कवकनाशी दोनों शामिल हैं। मौसम की शुरुआत में पौधों को संक्रमण से बचाने के लिए क्लोरोथालोनिल, कॉपर-आधारित यौगिकों और मैनकोज़ेब सहित, अकेले इस्तेमाल किया जा सकता है।

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Dragon Fruit FarmingDragon Fruit Farming: कमलम या ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) औषधीय गुणों से परिपूर्ण एक बारहमासी कैक्टस है| इसकी खेती से सालाना 10 लाख रुपये तक कमाई की जा सकती है…Click HereWhat is a ATMA schemeजिला स्तर पर एटीएमए जिला स्तर पर सभी प्रौद्योगिकी प्रसार गतिविधियों के लिए तेजी से जिम्मेदार होगा। इसका जिले में कृषि विकास से जुड़े सभी संबंधित विभागों, अनुसंधान संगठनों, गैर-सरकारी संगठनों और एजेंसियों के साथ जुड़ाव होगा…Click HereParsnipपार्सनिप एक कूल-सीजन द्विवार्षिक सब्जी वाला पौधा है, लेकिन इसे आमतौर पर वार्षिक सब्जियों के रूप में उगाया जाता है। ये गाजर के समान दिखते हैं और अक्सर सफेद रंग के एवं मोटे होते हैं । पार्सनिप किसी भी रसोई व्यंजन को पौष्टिक और मीठा स्वाद देते हैं, इसके साथ ही इस जड़ वाली सब्जी का उपयोग आप साइड डिश के रूप में भी कर सकते हैं…Click Here
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Artichoke

Table Of Content

  • आर्टिचोक की खेती
  • फायदे
  • कैसे इस्तेमाल करें
  • जलवायु एवं मिट्टी
  • खेत की तैयारी
  • रोपाई
  • सिंचाई
  • कटाई

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आर्टिचोक की खेती

परिचय :-  आर्टिचोक एक दुष्प्राप्य सब्जी है, जो ज्यादातर दक्षिण अमेरिका, दक्षिण और मध्य यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। यह एक एस्ट्रोव परिवार का शाकाहारी, बड़े पुष्पक्रम वाला, बारहमासी पौधा है।
अपने परिपक्व रूप में, इसका फूल एक थीस्ल जैसा दिखता है जो खिलकर बैंगनी या नीले रंग का हो जाता है। आर्टिचोक के पौधे की लम्बाई 2 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचता है, इसीलिए इसे उगाने के लिए ज्यादा जगह की जरुरत होती है। इसके पौधे में खाने वाले भाग कम होते हैं।

फायदे

फायदे:- इसका सेवन सेहत के लिए गुणकारी माना जाता है क्यूंकि इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ए, बी, फाइबर, हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया, इथेनॉल और एंटीहाइपरग्लिसेमिक आदि पाये जाते हैं।
इसे खाने से पाचन, कैंसर, ह्रदय रोग, मधुमेह, वजन कम करने में, लिवर से टॉक्सिन बाहर निकालने में, सूजन आदि में मदद करता है। इसका इस्तेमाल दवाईयां बनाने के लिए भी किया जाता है। इसके दवाइयों से यूरोलिथियासिस, पित्ताशय की पथरी, एलर्जी जैसे रोगों का इलाज किया जाता है।
पॉलीफेनोल जो आर्टिचोक का हिस्सा है पित्त उत्पादन में वृद्धि का कारण बनता है। जिन लोगो को कोलेसिस्टिटिस, कम एसिडिटी और कम प्रेशर है उन्हें आर्टिचोक खाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।

कैसे इस्तेमाल करें

आर्टिचोक में अखरोट की तरह का स्वाद होता है। इसे पकाने के लिए कई चरणों में काटा जाता है। बहुत युवा आर्टिचोक को कच्चा या आधा पका के और बड़े पुष्पक्रम को उबाल के खाया जाता है। वहीं मध्यम आर्टिचोक का इस्तेमाल नमकीन बनाने के लिए किया जाता है। पूरी तरह से खुले फल खाने योग्य नही होते।
इसे मुख्य और साइड डिश दोनों तरीके से खाया जाता है। इसका इस्तेमाल सलाद, पिज्जा और कुछ जगहों पे मिठाइयाँ बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

जलवायु एवं मिट्टी

इसके पौधे को सूरज की बहुत आवश्यकता होती है इसलिए इसकी खेती ऐसे जगहों पे की जाती है जहाँ का तापमान गर्म हो। इसके पौधे को ठंड और कोहरे से बचाना चाहिए।
इसकी खेती नम जलवायु वाले स्थानों में, ढलानों पर या उच्च बेड पर 60-80 इंच की गहराई पर जल निकासी वाले जगहों पे की जाती है। इसे उपयुक्त मात्रा में पानी दे लेकिन जड़ों और खेत को गीला ना रखें।

खेत की तैयारी

रोपण से पहले, खेत को अच्छी तरह गहरा जुताई कर दे और मिट्टी में जैविक उर्वरक मिला दे। यदि मिट्टी खराब है, तो मौसम के बीच में उर्वरक की आवश्यकता होती है।

रोपाई

यदि आपकी जलवायु परिस्थितियों में कम से कम 90-100 दिनों की गर्म अवधि है तो आप फरवरी के अंत से मार्च की शुरुआत तक बीजों को बो दे। ऐसे में अगस्त – सितंबर के अंत तक पहली फसल प्राप्त कर सकते है।
अन्यथा वसंत के शुरुआत में एक वयस्क पौधे में से शाखाओं को काट ले ( हर 3 पूर्ण पत्तियों के गठन के बाद ही शाखाओं को काटे ) और प्रत्येक शाखा को एक दूसरे से लगभग 1-1.5 मीटर की दूरी पर रोपे।

सिंचाई

बड़ी और रसदार फल प्राप्त करने के लिए गर्मियों में इसे सप्ताह में कम से कम 3 बार सिंचाई की जानी चाहिए। सुनिश्चित करे की रोपण के दौरान अच्छी जल निकासी हो। सिंचाई के बाद मिट्टी की नमी बनी रहनी चाहिए।

कटाई

,कटाई:- कटाई फूलों के विभिन्न चरणों में की जाती है। चूँकि अलग अलग चरण के फल का अलग अलग इस्तेमाल है उसे उसके अलग अलग चरण पे तोडना चाहिए। किसान के लिए कटाई के क्षण को पकड़ना महत्वपूर्ण है।
जब फूल के ऊपरी भाग थोड़ा झुकना शुरू कर दे तो उसे तोड़ लेना चाहिए। जब फूल के शीर्ष पर नीली पंखुड़ी दिखाई दे, तो इसका मतलब है कि फल अतिवृद्धि हो चूका है। ऐसे में इसे नहीं खाना चाहिए।

लेख से लिया गया

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