फसल अवशेष प्रबंधन परियोजना (₹ 1,000/- प्रति एकड़)

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योजना अवधि:

20 सितंबर 2024 से 30 नवंबर

योजना के उद्देश्य:

राज्य सरकार ने 2024-2025 के लिए फसल अपशिष्ट प्रबंधन योजना शुरू की है। इस योजना का उद्देश्य किसानों को धान की पराली को मौके पर और मौके पर ही प्रबंधित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

परियोजना के लाभ:

  • किसानों को प्रति एकड़ ₹1,000/- का प्रोत्साहन मिलेगा।
  • प्रत्याकर्षण राशि सीधे किसान के बैंक खाते में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से हस्तांतरित की जाएगी।
  • इस परियोजना से न केवल किसानों की आय बढ़ेगी। बल्कि यह प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में भी मदद करती है।

परियोजना से कैसे लाभ उठाएं:

  • किसानों को www.agriharyana.gov.in पर पंजीकरण कराना चाहिए
  • परियोजना में भाग लेने वाले किसान धान की पराली (पराली) नहीं जलाते हैं।

परियोजना के तहत प्रोत्साहनों का विवरण:

ऑफ-साइट प्रबंधन:

  • खेतों के बाहर चावल की पराली के प्रबंधन के लिए ₹ 1,000/- प्रति एकड़।
  • किसानों से सहमति प्राप्त करने के बाद एफपीओ या पंजीकृत संगठनों को प्रोत्साहन दिया जाता है।

ऑफ-साइट प्रबंधन:

  • खेतों के बाहर चावल की पराली के प्रबंधन के लिए ₹ 1,000/- प्रति एकड़।
  • किसानों से सहमति प्राप्त करने के बाद एफपीओ या पंजीकृत संगठनों को प्रोत्साहन दिया जाता है।

संचालन की प्रक्रिया:

  • ग्राम स्तरीय समिति भौतिक दौरे के माध्यम से क्षेत्र का निरीक्षण करेगी।
  • कृषि क्षेत्र से जीपीएस-आधारित छवियों का उपयोग करके संचालन की निगरानी की जाएगी।
  • जिला कार्यकारी समिति (डीएलईसी) प्रोत्साहन राशि को मंजूरी देगी और वितरित करेगी।

यह परियोजना न केवल किसानों की आय बढ़ाती है। बल्कि यह चावल की भूसी (पराली) को जलाने से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को भी रोकती है। यह संसाधनों के संरक्षण और कृषि स्थिरता को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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Pink Boll Worm (गुलाबी सुंडी)

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  • गुलाबी सुंडी
  • लक्षण
  • जीवन चक्र
  • गुलाबी सूंडी का जीवन चक्र 
  • इससे होने वाले नुकसान
  • इसकी रोकथाम के उपाय
  • सावधानियां
Search गुलाबी सुंडी लक्षण जीवन चक्र गुलाबी सूंडी का जीवन चक्र  गुलाबी सुंडी

पिंक बॉलवॉर्म एशिया का मूल निवासी है लेकिन दुनिया के अधिकांश कपास उगाने वाले क्षेत्रों में एक आक्रामक प्रजाति बन गई है। भारत के कई क्षेत्रों में कपास पर गुलाबी सुंडी एक प्रमुख कीट के रूप में उभर कर आती रही  है । कपास के सबसे बड़े दुश्मन पिंक बॉल वार्म (Pink Boll worm) यानी गुलाबी सुंडी कीट के आक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है । यह इल्ली कपास के बीजों को खाकर आर्थिक हानि पहुँचाती है । गुलाबी इल्ली का प्रकोप फसल के मध्य तथा देर की अवस्था में होता है । गुलाबी सुंडी की लटें फलीय भागों के अंदर छुपकर तथा प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती हैं जिसके कारण इस कीट से होने वाले नुकसान की पहचान करना कठिन होता है और फसल को अधिक नुकसान होता है। फसल का सीजन बदलने के बाद किसानों को लगता है कि अब सूंडी का प्रकोप खत्म हो चुका है। लेकिन केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान गुलाबी सूंडी का कीड़ा पूरी तरह नहीं मरता है यह लकड़ियों और खराब टिंडों में शांत होकर छिप जाता है कीड़ा सीजन आने पर जागता है । गुलाबी सूंडी का कीड़ा 2 किलोमीटर तक उड़कर जा सकता है तो आइये जानते है इसके  लक्षण, जीवन चक्र, नुकसान और उसकी रोकथाम के बारे में :-

लक्षण

प्रौढ़ अवस्था में कीट आकार में छोटे व रंग में गहरे भूरे होते हैं। इनकी अगली पंखों पर काले धब्बे होते हैं तथा पिछली पंख किनारों से झालरनुमा होती हैं । रात को सक्रिय रहने वाला कीट है नमी के वातावरण में यह बहुत एक्टिव हो जाता है और फसल की अन्तिम अवस्था तक बना रहता है ।  यह एक प्रौढ़ गहरे स्लेटी चमकीले रंग का 8 से 9 मि.मी. आकार वाला फुर्तीला कीट है। अंडे हल्के गुलाबी व बैंगनी रंग की झलक लिए होते हैं जो कि प्रायः नई विकसित पत्तियों व कलियों पर पाए जाते हैं । प्रारम्भिक अवस्था में लटों का रंग सफ़ेद होता है जो कि बाद में गुलाबी हो जाते हैं पूर्ण विकसित लटों की लम्बाई 10 से 12 मि.मी. होती है।

जीवन चक्र

प्रत्येक वर्ष नरमा के खेत में फूल आने के समय इसकी मादा पतंगों की पहली पीढी फुलगुड्डी पर या फिरॢ उनके नजदीकी टहनियों, छोटी व नई पत्तियों के निचले हिस्सों पर एक एक करके सफेद व चपटे अंडे देती हैं। इसके बाद वाली पीढियां अपने अंडे एक-एक करके ही फूलों के बाह्यपुंजदल पर देती हैं। सामान्यतौर पर 3 से 4 दिनों में इन अंडों से छोटी सूंडियाँ निकलती हैं, पर तापमान व नमी की अनुकूलता अनुसार यह अंड-विस्फोटन में समय अन्तराल भी हो सकता है। प्रारम्भिक अवस्था में ये सूंडियाँ हल्के सफेद रंग की होती हैं परन्तु बाद में इनका रंग गुलाबी हो जाता है जिसकी वजह से इसका नाम गुलाबी सुंडी पड़ा है। ये सूंडियां कपास की फसल में फूलगुड्डीयों व फूलों पर हमला करती हैं,ओर फूल के अंदर घुसती है,ओर वहीं रहने लगती हैं। सूंडियों से ग्रसित फूल के हिस्से आपस में जुड़ जाते है और पूरी तरह नही खुलते। कपास के ये ग्रसित फूल बनावट में फिरकी या गुलाब के फूल जैसे हो जाते हैं। शुरुआती अवस्था में ही ये छोटी सूंडियां छोटे-छोटे टिंडों में घुस कर कच्चे बिनौले (बीजों) को खाती हैं। टिंडे में घुसने के बाद ये अपने द्वारा बनाएं अपने सुराख को अपने मल से ही बंद कर देती है,जिससे इन पर किसी कीटनाशक का असर नही भी नही होता है,ओर इससे एक समस्या ओर है की जो छेद बंद किया जाता है उसमे फंगस का आक्रमण भी हो जाता है और समस्या दोगुनी हो जाती है। 

गुलाबी सूंडी का जीवन चक्र 

4 से 5 दिन में गुलाबी सूंडी का अंडा तैयार होता है -> -अगले 10 से 14 दिन में लारवा बनता है -> प्यूपा 8 से 13 दिन में तैयार हो जाता है -> 15 से 20 दिन में सूंडी प्रौढ़ अवस्था में पहुंचती है |

इससे होने वाले नुकसान इसकी रोकथाम के उपाय सावधानियां इससे होने वाले नुकसान

वे भोजन के माध्यम से नुकसान पहुंचाते हैं । गुलाबी सुंडी के नुकसान की पहचान अपेक्षाकृत कठिन होती है क्योंकि लटें फलीय भागों के अंदर छुपकर तथा प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती हैं । कपास में फूल लगने और फूल खिलने के दौरान इसका संक्रमण शुरू होता है । संक्रमित फूल गुलाब के फूल की तरह ही रोसेट फूल में बदल जाते हैं । संक्रमित फूल, कलियां और छोटे कपाल बॉल नीचे गिर जाते हैं । लार्वा बॉल में प्रवेश कर शाखाओं और बीजों को नुकसान पहुंचाती है ।  वे बीज पर भोजन करने के लिए कपास की लिंट को चबाते हैं  चूंकि कपास का उपयोग फाइबर और बीज के तेल दोनों के लिए किया जाता है इसलिए नुकसान दुगना होता है। बीजकोष के चारों ओर सुरक्षात्मक ऊतक का उनका विघटन अन्य कीड़ों और कवक के प्रवेश का एक पोर्टल है । कीट का सक्रिय काल मध्य जुलाई से मध्य अक्टूबर है।

इसकी रोकथाम के उपाय

घरेलु उपचार :-

  1. जिन किसानों ने पिछले सीजन की फसल की सूखी लकड़ी संभाल कर रखी है उसे अप्रैल माह से पहले किसी भी तरीके से आग से नष्ट कर दें।
  2. पिछली बार सूंडी के कारण जो टिंडे खराब हो गए थे या अधपके टिंडे थे उन्हें भी नष्ट कर दें। प्रभावित पौधों को बिच में उखाड़ कर जमीन में दबा दें ।
  3. लकड़ियों के ढेर को मच्छरदानी जैसी जाली, तिरपाल से पूरी तरह ढक दें ताकि सूंडी का पतंगा बाहर ना आ पाए और अंडे भी पनप ना सकें।
  4. खेत में बचे अधखुले, खराब टिंडों को नष्ट करने के लिए खेत में भेड़, बकरी आदि जानवरों को चरने दें
  5. सूंडी के प्रकोप वाले खेतों से लकड़ियों को नहीं ले जाना चाहिए और न ही कहीं एकत्र करें । संभव हो तो लकड़ियों को काट कर जमीन में मिला दें ।
  6.  बुआई के दौरान खेत के चारों ओर एक या दो लाइन नॉन बीटी नरमा या अरहर या रिफ्यूजी बीज खेत के चारों तरफ लगाने से गुलाबी सुंडी के प्रबन्धन में आसानी रहती है।

रासायनिक उपचार :

किसान फसल की बुआई के 60 दिनों के बाद नीम के बीजों का अर्क 5% + नीम का तेल ( 5 मिली॰/ली) को मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है। किसान कपास में गुलाबी सुंडी को ख़त्म करने के लिए रासायनिक दवाओं का प्रयोग कर सकते हैं इसके लिए किसान नीचे दिए गए कीटनाशकों में से किसी एक का प्रयोग करें :-

  1. साइपरमेथ्रिन 10 प्रतिशत ई.सी.- 1.0 मिली. प्रति लीटर पानी
  2. मेलिथियान 50 प्रतिशत  ई.सी. – 2.0 मिली. प्रति लीटर पानी
  3. साइपरमेथ्रिन 25 प्रतिशत ई.सी.- 0.4 मिली. प्रति लीटर पानी
  4. डेल्टामेथ्रिन 2.8 प्रतिशत ई.सी. – 1.0 मिली. प्रति लीटर पानी
सावधानियां

 

  1. तेज हवा या बारिश के टाइम स्प्रे न करें ।
  2. आँखों की सुरक्षा करें ।
  3. स्प्रे के बाद अपना हाथ, पैर और चेहरा अच्छी तरह से धोएं ।
  4. कीटनाशक का छिड़काव सुबह 11 बजे से पहले या शाम 5 बजे के बाद ही करें दोपहर को यह पतंगे सक्रिय नहीं होते हैं जिससे इनको नुकसान नहीं पहुंचता है ।
  5. कीटनाशकों के प्रयोग के समय किसी भी स्टिकर का प्रयोग अवश्य करें इससे कीटनाशक की क्षमता बहुत बढ़ जाती है स्प्रे के दौरान या स्प्रे करने के 8 से 12 घंटे के अंदर बारिश आ जाए दोबारा कीटनाशक का प्रयोग करें ।
  6. बच्चों की पहुच से दूर रखें ।
Posts प्रगतिशील किसान सम्मान योजनाभारत की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत‌ बनाए रखने में किसान भी अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन आज भी कहीं ना कहीं हमारे देश के किसानों के कार्य एवं मेहनत को सही सम्मान नहीं मिल पाता है। इसी बिंदु को मद्देनजर रखते हुए हरियाणा सरकार द्वारा अपने राज्य के प्रगतिशील किसानों….Click Hereभावान्तर भरपाई योजना का संक्षिप्त विवरणमण्डी में सब्जी व फल की कम कीमत के दौरान किसानों का निर्धारित संरक्षित मूल्य द्वारा ज़ोखिम को कम करना। कृषि में विविधिकरण के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना।बागवानी उत्पादकों के लिए मण्डी में उनके उत्पादन के कम दाम मिलने पर सरकार द्वारा भरपाई करने की एक अनूठी योजना..Click Hereमेरा पानी मेरी विरासत योजनाहरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी के द्वारा लॉन्च की गयी है | इस योजना के अंतर्गत हरियाणा के डार्क जोन में शामिल क्षेत्रों में धान की खेती छोड़ने तथा धान के स्थान पर अन्य विकल्पित फसलों की बुआई करने वाले किसानों को 7 हजार रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन धनराशि राज्य सरकार द्वारा प्रदान की जाएगी…Click Here Previous slide Next slide
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About transformer theft cases

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  • ट्रांसफार्मर
  • ट्रांसफार्मर चोरी या खराब होने पर
  • ट्रांसफार्मर चोरी या खराब होने पर कहां शिकायत करें
  • ट्रांसफार्मर कहां से मिलेगा

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ट्रांसफार्मर
ट्रांसफार्मर चोरी या खराब होने पर
ट्रांसफार्मर चोरी या खराब होने पर कहां शिकायत करें
ट्रांसफार्मर कहां से मिलेगा
ट्रांसफार्मर

Transformerट्रांसफार्मर एक उपकरण है जो विद्युत ऊर्जा को एक प्रत्यावर्ती-धारा सर्किट से एक या अधिक अन्य सर्किट में स्थानांतरित करता है, या तो वोल्टेज को बढ़ाता है (बढ़ाता है) या कम करता है (घटाता है)।

ट्रांसफार्मर पारस्परिक प्रेरण दो सर्किट को जोड़ता है। इसका उपयोग विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के माध्यम से विद्युत शक्ति संचरण के लिए भी किया जाता है। विद्युत शक्ति बिना किसी आवृत्ति संशोधन के भी स्थानांतरित की जाती है।

ट्रांसफार्मर चोरी या खराब होने पर

चंडीगढ़ः हरियाणा सरकार ने किसानों के हित में एक और बड़ा निर्णय लेते हुए ट्रांसफार्मर के चोरी/खराब होने की स्थिति में उनसे शुल्क न लेने का निर्णय लिया हैयह दिशा-निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू होंगे

हरियाणा विद्युत नियामक आयोग (एचईआरसी) के प्रवक्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि मुख्यमंत्री द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार 15 जनवरी, 2024 को अधिसूचित एचईआरसी विद्युत आपूर्ति संहिता विनियमन, 2014 में संशोधन किया गया है।

 संशोधन के अनुसार, अब उपभोक्ताओं से ट्रांसफार्मर के चोरी या प्राकृतिक आपदाओं से खराब होने की स्थिति में बदलने या मरम्मत करवाने के लिए किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा। जबकि पहले उपभोक्ताओं द्वारा ट्रांसफार्मर के वारंटी में खराब/चोरी होने पर उसकी कीमत का 20 प्रतिशत तथा वारंटी खत्म होने पर बदलने की स्थिति में ट्रांसफार्मर की कीमत का 10 प्रतिशत शुल्क जमा करवाया जाता था।

ट्रांसफार्मर बदलने या मरम्मत करने की एवज में किसानों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ता था, इसे देखते हुए ही सरकार ने किसानों को राहत पहुंचाने के लिए मौजूदा प्रावधानों को संशोधित किया है, ताकि किसानों पर अतिरिक्त लागत का बोझ न पड़े। इस कदम से प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत मिलेगी।

पूरी जानकारी के लिए पीडीएफ डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें

ट्रांसफार्मर चोरी या खराब होने पर कहां शिकायत करें

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने पुलिस विभाग को निर्देश दिया है कि यदि कोई किसान अपने खेत से वितरण ट्रांसफार्मर की चोरी की रिपोर्ट करता है तो तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए।

हरियाणा के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) शत्रुजीत कपूर ने राज्य के सभी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशकों, पुलिस आयुक्तों, पुलिस अधीक्षकों और रेंज अधिकारियों को पत्र लिखकर इन आदेशों का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है.

डीजीपी ने सभी थाना प्रभारियों को निर्देश दिया है कि अगर कोई किसान अपने खेत से वितरण ट्रांसफार्मर की चोरी की सूचना देता है तो तुरंत एफआईआर दर्ज करें।

यानि कि सबसे पहले किसान भाइयों को पास के पुलिस स्टेशन में ट्रांसफार्मर चोरी की एफआईआर(FIR-FIRST INFORMATION REPORT) यानि रिपोर्ट लिखानी होगी

 

COMPLAINT HANDLING PROCEDURE PDF

ट्रांसफार्मर कहां से मिलेगा

ट्रांसफार्मर चोरी/क्षति होने पर किसानों को नया ट्रांसफार्मर बिजली विभाग से मिलेगा

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Mukhyamantri Kisaan Kalyaan Yojanaमध्य प्रदेश की सरकार मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना भी राज्य के किसानों के लिए चलाई जा रही है केंद्र सरकार की एक प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना है। इस स्कीम में किसानों को वार्षिक छह हजार रुपये मिलते हैं।Click HereAyushman Sahakar Schemeआयुष्मान सहकार योजना को राष्ट्रीय विकास निगम के द्वारा देश के ग्रामीण क्षेत्रों मे स्वास्थ्य सेवाईं, सुविधाओ के बुनियादों ढंके मे सुधार लाने के लिए शुरू किया जा रहा है….Click HereRashtriya Gokul Mission (RGM)देसी बोवाइन नस्लों के विकास और संरक्षण के लिए दिसंबर 2014 से राष्ट्रीय गोकुल मिशन (आरजीएम) लागू किया जा रहा है। यह योजना दूध की बढ़ती मांग को पूरा करने और देश के ग्रामीण किसानों के लिए डेयरी को अधिक लाभकारी बनाने के लिए दूध उत्पादन …Click Here
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Oak(Baanj tree)

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बाँज या बलूत या शाहबलूत एक तरह का वृक्ष है जिसे अंग्रेज़ी में ‘ओक’ (Oak) कहा जाता है। बाँज (Oak) फागेसिई (Fagaceae) कुल के क्वेर्कस (quercus) गण का एक पेड़ है। इसकी लगभग ४०० किस्में ज्ञात हैं, जिनमें कुछ की लकड़ियाँ बड़ी मजबूत और रेशे सघन होते हैं। इस कारण ऐसी लकड़ियाँ निर्माणकाष्ठ के रूप में बहुत अधिक व्यवहृत होती है।

ओक के पेड़ का दूसरा नाम क्या है?

सामान्य नाम क्वेरकस लैटिन में “ओक” के लिए है, जो प्रोटो-इंडो-यूरोपीय *क्वेर्कवु-, “ओक” से लिया गया है, जो इंडो-यूरोपीय संस्कृति में एक और महत्वपूर्ण या पवित्र पेड़ “फ़िर” नाम का मूल भी है। कॉर्क ओक की छाल के लिए “कॉर्क” शब्द भी इसी तरह क्वेरकस से निकला है।

कैसे ओक के फल से ओक का पेड़ उगाएं

  • एकॉर्न (Acorn) चुनें और बोएं
  • सीडलिंग को ट्रांसप्लांट (Transplant) करें
  • बढ़ते हुए ओक के पेड़ की देखभाल करें

भाग
1
एकॉर्न (Acorn) चुनें और बोएं
Step 1 जब पतझड़ का मौसम शुरू हो तो आप एकॉर्न एकत्र करें:
पतझड़ की शुरुआत या उसके बीच में जब एकॉर्न पेड़ से नीचे न गिरे हों तब उनकी कटाई करना सबसे अच्छा होता है।[१] आप ऐसे एकॉर्न चुनें जिनमें कीड़े, छेद, और फंगस न हों। वे भूरे रंग के हों और उनमें हल्का सा हरापन बाकी हो तो अच्छा है।[२] लेकिन भिन्न टाइप के ओक के पेड़ों के एकॉर्न देखने में अलग-अलग तरह के हो सकते हैं। आमतौर पर जब एकॉर्न को कैप में से बिना फाड़े निकालना संभव हो जाता है तब एकॉर्न को एकत्र करने लिए तैयार माना जाता है।

  • नोट करें कि कैप एकॉर्न का हिस्सा नहीं है, वह केवल एक (अलग) सुरक्षात्मक कवर है। अगर आप एकॉर्न को फाड़े बिना कैप में से निकालेंगे तो उसे नुकसान नहीं पहुंचेगा।
  • संभव हो तो आप गर्मियों में सूटेबल पेड़ों को खोजें। आप ऐसे पेड़ों की खोज करें जो परिपक्व हों और आप जिनके एकॉर्न को एक सीढ़ी या लंबे डंडे की मदद से तोड़ सकें।
  • रेड ओक (red oak), जैसे कुछ किस्म के ओक के एकॉर्न एक साल के बजाय दो साल में परिपक्व होते हैं। गर्मियों में सूटेबल पेड़ों की खोज करते समय इस बात को ध्यान में रखें कि कुछ ओक के पेड़ों के एकॉर्न पतझड़ के मौसम में तैयार हो जायेंगे लेकिन बाकी पेड़ों के एकॉर्न अगले साल तक रेडी होंगे।

Step 2
एक “फ्लोट टेस्ट” (float test) करें: आपने जो एकॉर्न एकत्र करें हैं उनको एक पानी से भरी हुई बाल्टी में डालें। एक – दो मिनट इंतज़ार करें और उन्हें बैठने दें। फिर जो एकॉर्न ऊपर तैर रहे हों उनको निकालकर फेंक दें क्योंकि वे खराब हैं।

  • एक एकॉर्न इसलिए तैर रहा हो सकता है क्योंकि उसके अंदर किसी कीड़े या लार्वा ने उसमें बिल बनाकर हवा के लिए जगह बना दी है। इसी तरह फंगस की वजह से एकॉर्न तैर सकता है।
  • यदि आपको कभी कोई एकॉर्न छूने में नरम और पिलपिला लगे तो उसे फेंक दें। ऐसे एकॉर्न सड़े होते हैं।

Step 3
बाकी एकॉर्न को हाइबरनेट (hybernate) करें:
“अच्छे” वाले एकॉर्न को पानी में से निकालें और उनको सुखाएं। उनको एक बड़े ज़िप वाले बैग में लकड़ी के बुरादे (sawdust), वर्मीक्यूलाइट (एक पीले या भूरे रंग का मिनरल जिसे बढ़ते हुए पौधों के लिए नमी को बरक़रार रखने के माध्यम जैसे यूज़ किया जाता है), पीट मिक्स (peat mix) या अन्य कोई विकास का माध्यम जो नमी को बरक़रार रख सकता है, के साथ रखें। बड़े बैग्स में आप करीब 250 एकॉर्न फिट कर सकते हैं। बैग को फ्रिज में डेढ़ महीने या उससे ज्यादा समय के लिए – नए ओक के अंकुरित होने के लिए जितने समय की ज़रूरत हो, उतने दिन तक रखना चाहिए।

  • इस प्रक्रिया को स्तर-विन्यास (stratification) कहते हैं। इसमें बीज को ठंडे टेम्प्रेचर के संपर्क में रखा जाता है ताकि वह उन्हीं नेचुरल परिस्थितियों का अनुभव करे जो वह पेड़ से जमीन पर गिरने के बाद करता। ये बीज को वसंत में अंकुरित होने के लिए तैयार करता है।
  • समय-समय पर अपने एकॉर्न को चेक करें: आपने उनको जिस विकास के माध्यम में रखा है उसे केवल नम होना चाहिए। अगर वह ज्यादा गीला होगा तो एकॉर्न सड़ जायेंगे। यदि वह बहुत ज्यादा सूखा होगा तो हो सकता है कि एकॉर्न विकसित न हों।

Step 4 एकॉर्न के विकास पर नज़र रखें: जब वे फ्रिज में रखे हुए होंगे तब भी अधिकांश एकॉर्न नमी की उपस्थिति में अंकुरित होना शुरू कर देंगे। दिसम्बर (पतझड़ का अंतिम चरण, सर्दी का मौसम शुरू होने पर) की शुरुआत में उनकी जड़ें शेल में से बाहर निकलना शुरू कर सकती हैं। चाहें उनकी जड़ें शेल में से निकली हों या नहीं, करीब 40 – 45 दिनों तक स्टोर करने के बाद एकॉर्न बोने के लिए तैयार होते हैं।

  • अंकुरों या सीडलिंग्स (seedlings) को सावधानीपूर्वक हैंडल करें क्योंकि उनकी नयी जड़ों को आसानी से नुकसान पहुँच सकता है।

Step 5
हर एकॉर्न को एक पॉट या कंटेनर में बोयें:
आप अपने पौधों के लिए काफी छोटी साइज़ के, करीब 2” (5 cm) व्यास वाले बागवानी के पॉट्स लें (आप चाहें तो बड़े स्टायरोफोम के कप्स या दूध के कार्टन्स भी ले सकते हैं)। उनमें अच्छी क्वालिटी की गमले में डालने वाली मिट्टी या पॉटिंग सॉइल भरें (कुछ लोग उनमें पिसी हुई स्फाग्नम मॉस – milled sphagnum moss – डालने की सलाह देते हैं)।[५] ) पानी डालने के लिए उनके ऊपर के हिस्से में करीब 1” (2.5 cm) जगह छोड़ दें। एकॉर्न को सतह के ठीक नीचे इस तरह बोयें कि उनके जड़ वाले हिस्से नीचे की ओर हों।

  • यदि आप स्टायरोफोम कप या दूध का कार्टन यूज़ कर रहे हैं तो कप की साइड्स में, नीचे के हिस्से के पास छेद बनायें ताकि पानी बाहर निकल सके।
  • अगर आप पसंद करें तो एकॉर्न को यार्ड में गाड़ें। उसकी जड़ को एक कम गहरे छेद में गाड़ें और सूटेबल समृद्ध व नरम सॉइल पर एकॉर्न को धीरे से एक तरफ टक करें। ये तरीका तभी काम करेगा जब मुख्य जड़ मज़बूत व लंबी होगी और काफी हद तक एकॉर्न से अलग हो चुकी होगी। लेकिन आपको सतर्क रहना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से चूहे, गिलहरियां, वगैरह सीडलिंग को नष्ट कर सकते हैं। जानवरों से बचने के लिए सीडलिंग के चारोंओर एक बैरियर लगाना सबसे अच्छा होता है।

Step 6
सीडलिंग को पानी दें:
अंकुरित बीज में पानी डालें जब तक वह कंटेनर के नीचे के छेदों में से बाहर निकलने लगे। आने वाले हफ्तों में अक्सर पानी डालें और मिटटी को कभी भी सूखने न दें। सीडलिंग के जीवन की इस अवस्था में आपको उसे घर के अंदर रखना चाहिए। उसे एक ऐसी खिड़की की देहली पर रखें जो दक्षिण दिशा में स्थित हो। वहां पर वह सर्दियों की धूप को सोख सकेगी। इस समय हो सकता है कि आप सीडलिंग को जमीन के ऊपर जल्दी विकसित होते हुए न देखें। पौधा अपने जीवन के पहले चरण में अपनी मुख्य जड़ को मिट्टी की सतह के नीचे विकसित करता है।

  • यदि आप दक्षिणी गोलार्द्ध में रहते हैं तो आपको सीडलिंग को एक ऐसी खिड़की की देहली पर रखना चाहिए जो उत्तर दिशा में स्थित हो।
  • अगर आपकी सीडलिंग को पर्याप्त सूरज की रोशनी नहीं मिल रही है तो आप उस कमी को पूरा करने के लिए इंडोर ग्रो लाइट (indoor grow light) इस्तेमाल करें।

भाग 2 सीडलिंग को ट्रांसप्लांट (Transplant) करें
Step 1 पौधे के विकास का रिकॉर्ड रखें:
1
पौधे के विकास का रिकॉर्ड रखें:
बागवानी करने वाले लोग अगली स्टेप के बारे में अलग-अलग राय देते हैं। कुछ लोग सीडलिंग को कुछ हफ्तों तक कप या पॉट में उगाने के बाद सीधे जमीन में बोने की सलाह देते हैं। दूसरे लोगों की ये राय है कि पौधे को एक दिन थोड़ी देर के लिए बाहर के वातावरण में रखना चाहिए फिर अगले दिन थोड़ी ज्यादा देर तक बाहर रखना चाहिए। इस तरह उसे बाहर रखने का समय कुछ दिनों तक बढ़ाते रहना चाहिए। उसे बाहर के मौसम के संपर्क में लाने के बाद जमीन में बोना चाहिए।बाकी लोग ये सलाह देते हैं कि सीडलिंग को पहले एक बड़े पॉट में ट्रांसफर करना चाहिए। उसे थोड़े दिन बड़े पॉट में उगने देना चाहिए फिर जमीन में बोना चाहिए। ऐसे सीडलिंग को जमीन में कब बोना है ये तय करने का कोई भी निश्चित तरीका नहीं है, लेकिन आप कुछ गुणों के आधार पर सही फैसला कर सकते हैं। प्रत्यारोपण या ट्रांसप्लांट करने लायक पौधे –

    • 4” से 6” (10 cm – 15 cm) लंबे होते हैं और उनके पत्तियां होती हैं।
    • उनकी जड़ें सफेद और स्वस्थ दिखती है।
    • उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वे अपने कंटेनर से ज्यादा बड़े हो गए हैं।
    • उनकी मुख्य जड़ काफी विकसित हो चुकी है।
    • कुछ हफ्तों या महीनों तक उगाये जा चुके हैं।

Step 2 सीडलिंग को बाहर बोने से पहले उसे मज़बूत बनायें:
अगर आप सीडलिंग को बाहर के मौसम की आदत डाले बिना बाहर बोयेंगे तो वह मर जाएगी। सीडलिंग को जमीन में बोने से 1 या 2 हफ्ते पहले कुछ घंटों के लिए बाहर रखें। एक या दो हफ्ते में हर दिन उसे बाहर रखने का समय बढ़ाते जाएँ। फिर आपकी सीडलिंग बाहर बोने के लिए तैयार हो जाएगी।

      • ध्यान रखें कि आपकी सीडलिंग हवा से सुरक्षित रहे और हवा उसे नष्ट न कर सके।

Step 3 बोने के लिए एक जगह चुनें:उसके लिए एक सही जगह चुनना बहुत ज़रूरी है। एक ऐसी जगह चुनें जहाँ उसे बढ़ने के लिए पर्याप्त स्थान मिले और वह बड़े होने के बाद किसी के लिए बाधा न बने। अपने ओक के पेड़ के लिए एक उचित स्थान चुनते समय आपको इन बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  • धूप की उपलब्धता – बाकी पौधों की तरह ओक में भी प्रकाश संश्लेषण या फोटोसिंथेसिस होती है यानी कि वह धूप की सहायता से फूड बनाता है, उसे जीवित रहने के लिए धूप की ज़रूरत होती है। इसलिए उसको छाया वाली जगह पर नहीं बोना चाहिए।
  • पास में मौजूद फूटपाथ, पानी की लाइन, गड़े हुए पाइप्स, वगैरह – आप ये नहीं चाहेंगे कि जब आपके यार्ड में काम करने की ज़रूरत हो तो आपके पेड़ को नष्ट कर दिया जाये।
  • पूरी तरह से बढ़ने के बाद पेड़ कितनी छाया देगा – यदि आप चाहते हैं कि ओक का पेड़ बड़े होकर आपके घर को छाया दे तो आप उसे अपने घर के पश्चिम (west) या दक्षिण पश्चिम (southwest) हिस्से में बोयें। ऐसा करने से वह गर्मियों में सबसे ज्यादा और सर्दियों में सबसे कम छाया देगा।
  • नोट – दक्षिण गोलार्द्ध में छाया पाने के लिए पेड़ को आपके घर की पश्चिम या उत्तर पश्चिम (northwest) साइड पर होना चाहिए।
  • आसपास के पेड़-पौधे – पौधों की धूप, नमी, और अन्य साधनों को प्राप्त करने के लिए आपस में होड़ रहती है। अपने कम उम्र वाले ओक के पौधे को ऐसी जगह पर न बोयें जहाँ बहुत सारे पेड़- पौधे हैं, नहीं तो, वह कभी भी परिपक्व नहीं हो पायेगा।

Step 4 जगह को बोने के लिए तैयार करें:
एक अच्छा स्पॉट चुनने के बाद आप वहां पर 3 फुट (0.9 m) के घेरे को साफ करें और छोटे-मोटे पेड़-पौधों को हटायें। एक खुरपा (shovel) से मिट्टी को करीब 10” (25 cm) की गहराई तक पलटें और उसके बड़े ढेलों को तोड़ें।[९] यदि मिट्टी नम न हो तो उसे खुद नम बनायें, नहीं तो, बारिश होने के बाद पौधे को बोयें।

Step 5 एक छेद खोदें : अपने 3 फुट (0.9 m) के घेरे के बीच में एक 1 फुट – 2 फुट (30 cm – 61 cm) गहरा और 1 फुट (30 cm) चौड़ा छेद खोदें। छेद की सही गहराई आपकी सीडलिंग की मुख्य जड़ की नाप पर निर्भर करेगी। उसे इतना गहरा होना चाहिए कि जड़ उसमें ठीक से फिट हो जाये।

Step 6 ओक को ट्रांसप्लांट करें : ओक के पौधे को आपने जो छेद बनाया है उसमें धीरे से इस तरह रखें कि उसकी मुख्य जड़ नीचे और पत्तियां ऊपर हों। पक्का करें कि छेद काफी गहरा है और उसमें मुख्य जड़ के लिए पर्याप्त जगह है। मिट्टी को वापस पौधे के चारोंओर डालें और उसे हल्के से पैक करें। सीडलिंग को बोने के बाद उसमें पानी डालें।

  • आपको मिट्टी को ओक की सीडलिंग के चारों ओर उससे दूर स्लोप (slope) करते हुए पैक करना चाहिए ताकि पानी पेड़ की ट्रंक पर बैठा न रहे, जो काफी नुकसानदेह हो सकता है।
  • पेड़ के चारोंओर करीब 1 फुट (0.3 m) गीली घास (mulch) का घेरा बनायें ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे और जंगली घास या वीड्स को उगने का प्रोत्साहन न मिले। ध्यान रखें कि वह पेड़ की स्टेम को न छुए।
  • उसको बोने में सफल होने के लिए आप एक ही एरिया में कई एकॉर्न रख सकते हैं। ऐसे में आप 2 कम उम्र वाले सीडलिंग एकॉर्न को, 2 x 2 फुट (61 cm x 61 cm) एरिया को साफ करके, सीधे जमीन में बोयें और उनके ऊपर 1” या 2” (2.5 cm – 5 cm) मिट्टी डालें।

भाग
3 बढ़ते हुए ओक के पेड़ की देखभाल करें

1 कम उम्र वाले ओक के पेड़ों को सुरक्षित रखें : ओक के पेड़, खासतौर से यंग और नाज़ुक पेड़ शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन का स्रोत होते हैं। चूहे और गिलहरियां अक्सर एकॉर्न को खाते हैं और उनको आसानी से जमीन में से निकाल लेते हैं। पत्तियों को खाने वाले जानवर जैसे कि खरगोश, हिरन, वगैरह भी छोटी सीडलिंग को खा सकते हैं। इसलिए आपको अपने यंग पेड़ों को जानवरों से बचाने के लिए कुछ स्टेप्स लेनी चाहिए। आप यंग पेड़ों को चिकन वायर (chicken wire) लगाकर सुरक्षित रखें या उनकी स्टेम के चारोंओर एक मज़बूत प्लास्टिक की फेंस लगायें ताकि जानवर उनके पास न पहुँच सकें।

  • अगर आप जिस एरिया में रहते हैं वहां आमतौर पर हिरन घूमते रहते हैं तो आपको पेड़ के ऊपर के हिस्से में भी किसी तरह का बैरियर लगाने की ज़रूरत हो सकती है।
  • आप पेड़ को एफिड्स (aphids) और जून बग्स (June bugs), जैसे अनेक प्रकार के कीटों से बचाने के लिए कीटनाशकों या पेस्टिसाइड्स (pesticides) को यूज़ कर सकते हैं। पेस्टिसाइड को सावधानीपूर्वक चुनें। केवल ऐसे पेस्टिसाइड इस्तेमाल करें जो आपके पेड़ और परिवार के लिए नुकसानदेह न हों।

2 सूखे मौसम में पेड़ों को पानी दें : यदि सतह की मिट्टी एकदम सूख जाये तब भी ओक के पेड़ की लंबी मुख्य जड़ मिट्टी में से काफी गहराई तक पानी सोख सकती है। आमतौर पर ओक के पेड़ में सर्दियों और गीले महीनों में पानी डालने की ज़रूरत नहीं होती है। लेकिन जब ओक के पेड़ यंग होते हैं तब गर्म और सूखे मौसम से उनको नुकसान पहुँच सकता है। जब तरुण ओक के पेड़ों को पानी की सबसे ज्यादा ज़रूरत हो तब उनको पानी देने के लिए ड्रिप इरीगेशन सिस्टम (drip irrigation system) सबसे अच्छा होता है। हर एक या दो हफ्ते बाद आप पेड़ में ड्रिप इरीगेशन सिस्टम के ज़रिये करीब 38 L (10 गैलन) पानी डालें। दो साल के लिए आप उसे सबसे गर्म और सूखे महीनों में सींचें। जैसे-जैसे पेड़ बड़ा हो आप उसे सींचने की आवृत्ति(frequency) को कम करते जाएँ।

  • याद रखें कि आपको पेड़ के नीचे के हिस्से या बेस के चारोंओर पानी को एकत्र नहीं होने देना चाहिए। आप इरीगेशन सिस्टम को इस तरह सेट करें कि पानी पेड़ के चारोंओर ड्रिप करे लेकिन सीधे उसकी बेस पर न गिरे। पानी के कारण वह जगह सड़ सकती है।

3 जैसे-जैसे पेड़ बड़ा हो जाये उसकी कम देखरेख करें :जब ओक का पेड़ बड़ा होने लगेगा और उसकी जड़ें गहरी हो जाएँगी तो आपको उसकी कम देखभाल करनी पड़ेगी। समय के साथ वह इतना बड़ा और लंबा हो जायेगा कि जानवर उसे नष्ट नहीं कर सकेंगे। उसकी जड़ें इतनी गहराई तक चली जाएँगी कि अगर आप उसको गर्मियों में पानी नहीं देंगे तब भी वह जीवित रह सकेगा। धीरे-धीरे, कई सालों बाद, आप पेड़ की कम देखरेख कर सकते है (तब आपको उसे सूखे महीनों में पानी देने और जानवरों से बचाने के आलावा इतना काम नहीं होगा)। आखिरकार, आपका ओक का पेड़ बिना किसी समस्या के अपने आप पनपने लगेगा। आपने जीवन भर के लिए खुद को और अपनी फैमिली को जो गिफ्ट दी है उसका आनंद लें|

  • आपका ओक का पेड़ 20 साल के अंदर एकॉर्न उत्पन्न करना शुरू कर सकता है। लेकिन ये उसकी जाति पर निर्भर करता है। वह 50 साल से पहले अपनी पूरी क्षमता से एकॉर्न पैदा करना नहीं शुरू करेगा।

सलाह

  • जमीन में एक खूंटा लगाकर सीडलिंग के चारोंओर एक स्क्रीन लगायें ताकि जानवर उसे न खा सकें।
  • आसपास देखें और पक्का करें कि वह एकॉर्न एक आकर्षक और स्वस्थ पेड़ का है। यदि पेरेंट (parent) पेड़ में कोई खराबी हो तो कोई दूसरा पेड़ जो देखने में ज्यादा अच्छा हो उसके एकॉर्न को लें।
  • चाहें जितना भी समय लगे, आप निराश न हों। आप जिस बड़े ओक के पेड़ को देख रहे हैं वह भी आपके एकॉर्न की तरह कभी एक छोटा सा एकॉर्न था।
  • लापरवाही न करें और छोटे पौधे को पानी देना न भूलें, नहीं तो, वह मुरझा जायेगा।
  • सर्दियों में सीडलिंग को अंदर रखें। अगर आप उसे पतझड़ में उगा रहे हैं तो उसे वसंत तक अंदर रखें।
  • पतझड़ के समय ओक के छोटे पेड़ों के भी पत्ते झड़ जाते हैं। इसलिए अगर सारी पत्तियां भूरी हो जाएँ या गिर जाएँ तो आप निराश न हों। वसंत के आने का इंतज़ार करें।

चीजें जिनकी आपको आवश्यकता होगी

  • बलूत के बीज या एकॉर्न (हरे)।
  • प्लास्टिक बैग ।
  • फ्रिज ।
  • लकड़ी का बुरादा ।
  • उगाने के लिए एक पॉट ।
  • अच्छी मिट्टी ।
  • पानी डालने का कैन ।

पेड़ की विशेषता क्या है?

ओक के पेड़ 150 फीट (45 मीटर) तक ऊंचे हो सकते हैं। उनके तने मोटे और शाखाएँ बड़ी होती हैं जो दूर तक फैली होती हैं। पत्तियों के किनारे गोल, खुरदरे या चिकने हो सकते हैं। ओक के पेड़ पर एक ही पेड़ पर नर और मादा फूल लगते हैं।वृक्ष का सामान्य अर्थ ऐसे पौधे से होता है जिसमें शाखाएँ निकली हों, जो कम से कम दो-वर्ष तक जीवित रहे, जिससे लकड़ी प्राप्त हो। वृक्ष की एक जड़ होती है जो प्रायः ज़मीन के अन्दर होती है, तथा जड़ से निकलकर तना तथा पत्तियां हवा में रहते हैं। यह प्रदूषण कम करने में कारगर सिद्ध हुआ है।

ओक का पेड़ क्यों खास है?

ओक के पेड़ पौधों, कीड़ों, पक्षियों और अन्य जानवरों के विविध मिश्रण को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जहाँ भी वे उगते हैं, जो जंगलों को स्वस्थ रखने में मदद करता है। वे वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे उन्हें भोजन और घर का स्रोत प्रदान करते हैं।
ओक के पेड़ न केवल लचीले और तेजस्वी होते हैं, बल्कि वे ज्ञान, साहस और धीरज का भी प्रतीक हैं । पेड़ की ऊँचाई, लंबी उम्र और गहरी जड़ें यह सुनिश्चित करती हैं कि यह अपने पूरे जीवनकाल में कई घटनाओं को देखता और अनुभव करता है। एक ओक का पेड़ आपकी संपत्ति में एक अनूठा स्पर्श जोड़ सकता है और कई वर्षों तक जीवित रह सकता है।

ओक की पहचान कैसे करें?

ओक के पेड़ की पहचान करने के लिए, ऐसी छाल की तलाश करें जो सख्त, भूरे और पपड़ीदार हो, और जिसमें गहरे खांचे और लकीरें हों। इसके अलावा, पेड़ की पत्तियों की जाँच करें कि क्या उनमें लोब और साइनस पैटर्न है, जो ओक के पत्तों की खासियत है।

सबसे लोकप्रिय ओक का पेड़ कौन सा है?

विभिन्न प्रकार के मौसम और मिट्टी को सहन करने के कारण ओक के पेड़ का सबसे आम प्रकार सफेद ओक (क्वेरकस अल्बा) है।

ओक के पेड़ कितने प्रकार के होते हैं

यह बांज के पेड़ का बीज,जिधर 40,50* डिग्री सेल्सियस तापमान रहता है वहां इनका लगा सकते हैं 10, 10 फीट की दूरी में लगभग 100 पेड़ लगादो यकीन मानिए 500 मीटर तक के दायरे में 20 से 22 डिग्री सेल्सियस तक टेंपरेचर रहेगा | यह वृक्ष जल का साथी है जहां होगा वहां पानी को बरसना ही पड़ेगा इनकी कोई खास देखभाल भी नहीं करनी होती इन पेड़ों की वजह से 5 से 10 सालों में आपका एरिया ऐसा हो जाएगा जैसे हिमालय की ठंडी घाटी हो|

अंग्रेजों ने जिसे पहचाना, अपनों ने उसे नकारा, बांज का पेड़ कर सकता है मालामाल!

उत्तराखंड के जंगलों में पाये जाने वाले बांज के पेड़ की गुणवत्ता को 18वीं सदी में अंग्रेजों ने पहचान लिया था. बांज के टसर से विश्व स्तरीय सिल्क उत्पादन होता है. लेकिन समय के साथ नीति नियंताओं की अनदेखी के कारण बांज अपनी पहचान खोने लगा. इसके अद्भुत गुणों के कारण एक बार फिर से सरकार बांज के जंगलों का सर्वे करा रही है. ताकि प्रदेश में इससे विश्व स्तरीय सिल्क का उत्पादन किया जा सके.
बांज का पेड़ (Oak) न केवल प्राकृतिक जल स्रोतों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, बल्कि इसे पहाड़ के कई संस्कारों में पूजनीय भी माना जाता है. अब तक आपने बांज के पेड़ का उपयोग चारा पत्ती के अलावा सीमित रूप में ही देखा होगा. लेकिन बांज के पेड़ का एक ऐसा भी उपयोग हो सकता है, जिससे उत्तराखंड देश में नहीं, बल्कि विश्व भर में अपना एक अलग आयाम स्थापित कर सकता है.

बांज के वैश्विक उपयोग को अंग्रेजों ने पहचाना था

उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के निदेशक प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट बताते हैं कि देश में पहली दफा वर्ष 1858 में अंग्रेजों ने देहरादून सहित समूचे उत्तराखंड के क्षेत्र को सिल्क उत्पादन के दृष्टिकोण से बेहद मुफीद पाया था. बिष्ट कहते हैं कि अंग्रेजों के एक शोधकर्ता दल जिसके प्रमुख डॉक्टर हटन थे, उन्होंने पाया कि देहरादून की जलवायु और भौगोलिक अनुकूलता शहतूती रेशम (mulberry silk) के लिए बिल्कुल अनुकूल है और यहां पर विश्वस्तर की गुणवत्ता वाले सिल्क का उत्पादन किया जा सकता है|

बांज वृक्ष से टसर सिल्क उत्पादन

अच्छी बात यह थी कि टसर सिल्क ऐसा सिल्क था, जो खासतौर से उत्तराखंड के मूल वृक्ष बांज से प्राप्त होता है. इसकी उत्तराखंड में भरपूर मात्रा है. हालांकि, इतिहासकार कहते हैं कि यह अफसोस की बात है कि उत्तराखंड में बहुतायत मात्रा में पाए जाने वाले बांज के जंगलों में मौजूद जिस टसर सिल्क को अंग्रेजो ने पहचान लिया था, कालांतर के बाद उसके बारे में आज तक बेहद कम ही चर्चा की गई. आज तक बांज केवल पशुओं के चारा पत्ती तक ही सीमित रह गया |

जल स्रोतों की महत्वपूर्ण कड़ी बांज

यह तथ्य ऐतिहासिक है कि जहां पर जल स्रोत होते हैं, उसी के आसपास मानवीय सभ्यता भी पनपती है. यही वजह है कि आज भी पहाड़ों पर जब कोई नवजात जन्म लेता है या फिर विवाह संस्कार होता है तो घर या गांव के पास मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत को पूजा जाता है. साथ ही जल स्रोत पर मौजूद पेड़ को भी पूजा जाता है. प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट बताते हैं कि बांज के इसी गुण की वजह से इस पेड़ को देव तुल्य माना जाता है |
उत्तराखंड में मौजूद बांज से प्राप्त होने वाले टसर सिल्क की गुणवत्ता का अंग्रेज शोधकर्ता 18वीं सदी में ही कर चुके थे. भले ही इसके बाद इस विषय पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई, लेकिन आज भी जानकार बताते हैं कि उत्तराखंड में 1800 मीटर से लेकर 2000 मीटर तक की ऊंचाई पर पाए जाने वाले बांज के पेड़ से दुनिया का सबसे बेहतर टसर सिल्क मिलता है |

बांज कार्बन का शोषण करता है

यही नहीं बांज के पेड़ के प्राकृतिक प्रभाव के बारे में भी प्रोफेसर बिष्ट बताते हैं कि बांज का पेड़ चौड़ी पत्ती वाला पेड़ है. यह अधिक मात्रा में कार्बन का शोषण करता है और उतनी ही अधिक मात्रा में ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है. साथ ही बांज का पेड़ भू क्षरण यानी धरती के कटाव और भूस्खलन को भी रोकता है|

उत्तराखंड में बांज पर सर्वे जारी

उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर से मिली जानकारी अनुसार पहले चरण में 5 जिले उत्तरकाशी, देहरादून, नैनीताल, उधम सिंह नगर और पिथौरागढ़ का सर्वे किया गया है. वहीं दूसरे चरण में अब 3 जिले पौड़ी गढ़वाल, चमोली और बागेश्वर के सर्वे का काम जारी है. तीसरे चरण में बचे हुए आखिरी 5 जिले रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, अल्मोड़ा, चंपावत और हरिद्वार का सर्वे किया जाएगा. इस तरह से पूरे प्रदेश में बांज के पेड़ों की उपलब्धता पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी. इस रिपोर्ट में टसर सिल्क का उत्पादन करने वाले अलग-अलग वर्ग के बांज के पेड़ों का सेटेलाइट मैपिंग के जरिए डाटा कलेक्ट किया जा रहा है

तीन जिलों में बांज की उपलब्धता

वर्तमान में बागेश्वर, पौड़ी गढ़वाल और चमोली जिले में दूसरे चरण का सर्वे जारी है. सर्वे में अब तक बागेश्वर में 10,317.68 हेक्टेयर, चमोली जिले में 15,896.94 हेक्टेयर और पौड़ी गढ़वाल में 1,408.93 हेक्टेयर भूमि पर बांज के जंगल उपलब्ध हैं. इस तरह से इन तीनों जिलों में कुल 27,623.55 हेक्टेयर भूमि पर बांज की उपलब्धता है. रेशम विभाग U-SAC और NESAC शिलांग के साथ मिल कर स्टडी कर रहा है|

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नम: पार्वती पतये!

हर हर महादेव!

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, मुख्यमंत्री श्रीमान योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे सहयोगी शिवराज सिंह चौहान, भागीरथ चौधरी जी, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, विधान परिषद के सदस्य और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री भूपेंद्र चौधरी जी, प्रदेश सरकार के अन्य मंत्रीगण, जनप्रतिनिधिगण और विशाल संख्या में आए हुए मेरे किसान भाई-बहन, काशी के मेरे परिवारजनों,

चुनाव जीते के बाद आज हम पहली बार बनारस आयल हई। काशी के जनता जनार्दन के हमार प्रणाम।

बाबा विश्वनाथ और मां गंगा के आशीर्वाद से, काशीवासियों के असीम स्नेह से, मुझे तीसरी बार देश का प्रधान सेवक बनने का सौभाग्य मिला है। काशी के लोगों ने मुझे लगातार तीसरी बार अपना प्रतिनिधि चुनकर धन्य कर दिया है। अब तो मां गंगा ने भी जैसे मुझे गोद ले लिया है, मैं यहीं का हो गया हूं। इतनी गर्मी के बावजूद, आप सभी यहां बड़ी संख्या में आशीर्वाद देने आए और आपकी ये तपस्या देख करके सूर्य देवता भी थोड़ा ठंडक बरसाने लग गए। मैं आपका आभारी हूं, मैं आपका ऋणी हूं।

 

साथियों,

भारत में 18वीं लोकसभा के लिए हुआ ये चुनाव, भारत के लोकतंत्र की विशालता को, भारत के लोकतंत्र के सामर्थ्य को, भारत के लोकतंत्र की व्यापकता को, भारत के लोकतंत्र के जड़ों की गहराई को दुनिया के सामने पूरे सामर्थ्य के साथ प्रस्तुत करता है। इस चुनाव में देश के 64 करोड़ से ज्यादा लोगों ने मतदान किया है। पूरी दुनिया में इससे बड़ा चुनाव कहीं और नहीं होता है, जहां इतनी बड़ी संख्या में लोग वोटिंग में हिस्सा लेते हैं। अभी मैं जी-7 की बैठक में हिस्सा लेने के लिए इटली गया था। जी-7 के सारे देशों के सारे मतदाताओं को मिला दें, तो भी भारत के वोटर्स की संख्या उनसे डेढ़ गुना ज्यादा है। यूरोप के तमाम देशों को जोड़ दें, यूरोपियन यूनियन के सारे मतदाताओं को जोड़ दें, तो भी भारत के वोटर्स की संख्या उनसे ढाई गुना ज्यादा है। इस चुनाव में 31 करोड़ से ज्यादा महिलाओं ने हिस्सा लिया है। ये एक देश में महिला वोटर्स की संख्या के हिसाब से पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है। ये संख्या अमेरिका की पूरी आबादी के आसपास है। भारत के लोकतंत्र की यही खूबसूरती, यही ताकत पूरी दुनिया को आकर्षित भी करती है, प्रभावित भी करती है। मैं बनारस के हर मतदाता का भी लोकतंत्र के इस उत्सव को सफल बनाने के लिए आभार व्यक्त करता हूँ। ये बनारस के लोगों के लिए भी गर्व की बात है। काशी के लोगों ने तो सिर्फ MP नहीं, बल्कि तीसरी बार PM भी चुना है। इसलिए आप लोगों को तो डबल बधाई।

साथियों,

इस चुनाव में देश के लोगों ने जो जनादेश दिया है, वो वाकई अभूतपूर्व है। इस जनादेश ने एक नया इतिहास रचा है। दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में ऐसा बहुत कम ही देखा गया है कि कोई चुनी हुई सरकार लगातार तीसरी बार वापसी करे। लेकिन इस बार भारत की जनता ने ये भी करके दिखाया है। ऐसा भारत में 60 साल पहले हुआ था, तब से भारत में किसी सरकार ने इस तरह हैट्रिक नहीं लगाई थी। आपने ये सौभाग्य हमें दिया, अपने सेवक मोदी को दिया। भारत जैसे देश में जहां युवा आकांक्षा इतनी बड़ी है, जहां जनता के अथाह सपने हैं, वहां लोग अगर किसी सरकार को 10 साल के काम के बाद फिर सेवा का अवसर देते हैं, तो ये बहुत बड़ी Victory है, बहुत बड़ा विजय है और बहुत बड़ा विश्वास है। आपका ये विश्वास, मेरी बहुत बड़ी पूंजी है। आपका ये विश्वास मुझे लगातार आपकी सेवा के लिए, देश को नई ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत करने की प्रेरणा देता है। मैं दिन रात ऐसे ही मेहनत करूंगा, आपके सपनों को पूरा करने के लिए आपके संकल्पों को पूरा करने के लिए मैं हर प्रयास करूंगा।

साथियों,

मैंने किसान, नौजवान, नारी शक्ति और गरीब, इन्हें विकसित भारत का मजबूत स्तंभ माना है। अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत मैंने इन्हीं के सशक्तिकरण से की है। सरकार बनते ही सबसे पहला फैसला, किसान और गरीब परिवारों से जुड़ा फैसला लिया गया है। देशभर में गरीब परिवारों के लिए 3 करोड़ नए घर बनाने हों, या फिर पीएम किसान सम्मान निधि को आगे बढ़ाना हो, ये फैसले करोड़ों-करोड़ों लोगों की मदद करेंगे। आज का ये कार्यक्रम भी विकसित भारत के इसी रास्ते को सशक्त करने वाला है। आज इस खास कार्यक्रम में काशी के साथ-साथ काशी से ही देश के गांव के लोग जुड़े हैं, करोड़ों किसान हमारे साथ जुड़े हुए हैं और ये सारे हमारे किसान, माताएं, भाई-बहनें आज इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे हैं। मैं, अपनी काशी से हिन्‍दुस्‍तान के कोने-कोने में, गांव-गांव में, आज टेक्‍नॉलोजी से जुड़े हुए सभी किसान भाई-बहनों का, देश के नागरिकों का अभिवादन करता हूं। थोड़ी देर पहले ही देशभर के करोड़ों किसानों के बैंक खाते में पीएम किसान सम्मान निधि के 20 हज़ार करोड़ रुपए पहुंचे हैं। आज 3 करोड़ बहनों को लखपति दीदी बनाने की तरफ भी बड़ा कदम उठाया गया है। कृषि सखी के रूप में बहनों की नई भूमिका, उन्हें सम्मान और आय के नए साधन, दोनों सुनिश्चित करेंगे। मैं अपने सभी किसान परिवारों को, माताओं-बहनों को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

साथियों,

पीएम किसान सम्मान निधि, आज दुनिया की सबसे बड़ी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम बन चुका है। अभी तक देश के करोड़ों किसान परिवारों के बैंक खाते में सवा 3 लाख करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं। यहां वाराणसी जिले के किसानों के खाते में भी 700 करोड़ रुपए जमा हुए हैं। मुझे खुशी है कि पीएम किसान सम्मान निधि में सही लाभार्थी तक लाभ पहुंचाने के लिए टेक्नोलॉजी का बेहतर इस्तेमाल हुआ है। कुछ महीने पहले ही विकसित भारत संकल्प यात्रा के दौरान भी एक करोड़ से अधिक किसान इस योजना से जुड़े हैं। सरकार ने पीएम किसान सम्मान निधि का लाभ पाने के लिए कई नियमों को भी सरल किया है। जब सही नीयत होती है, सेवा की भावना होती है, तो ऐसे ही तेजी से किसान हित के, जनहित के काम होते हैं।

भाइयों और बहनों,

21वीं सदी के भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक ताकत बनाने में पूरी कृषि व्यवस्था की बड़ी भूमिका है। हमें वैश्विक रूप से सोचना होगा, ग्लोबल मार्केट को ध्यान में रखना होगा। हमें दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भर बनना है। और कृषि निर्यात में अग्रणी बनना है। अब देखिए, बनारस का लंगड़ा आम, जौनपुर की मूली, गाजीपुर की भिंडी, ऐसे अनेक उत्पाद आज विदेशी मार्केट में पहुंच रहे हैं। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट और जिला स्तर पर एक्सपोर्ट हब बनने से एक्सपोर्ट बढ़ रहा है और उत्पादन भी एक्सपोर्ट क्वालिटी का होने लगा है। अब हमें पैकेज्ड फूड के ग्लोबल मार्केट में देश को नई ऊंचाई पर ले जाना है और मेरा तो सपना है कि दुनिया की हर डायनिंग टेबल पर भारत का कोई न कोई खाद्यान्न या फूड प्रॉडक्ट होना ही चाहिए। इसलिए हमें खेती में भी ज़ीरो इफेक्ट, ज़ीरो डिफेक्ट वाले मंत्र को बढ़ावा देना है। मोटे अनाज-श्री अन्न का उत्पादन हो, औषधीय गुण वाली फसल हो, या फिर प्राकृतिक खेती की तरफ बढ़ना हो, पीएम किसान समृद्धि केंद्रों के माध्यम से किसानों के लिए एक बड़ा सपोर्ट सिस्टम विकसित किया जा रहा है।

भाइयों और बहनों,

यहां इतनी बड़ी संख्या में हमारी माताएं-बहनें उपस्थित हैं। माताओं-बहनों के बिना खेती की कल्पना भी असंभव है। इसलिए, अब खेती को नई दिशा देने में भी माताओं-बहनों की भूमिका का विस्तार किया जा रहा है। नमो ड्रोन दीदी की तरह ही कृषि सखी कार्यक्रम ऐसा ही एक प्रयास है। हमने आशा कार्यकर्ता के रूप में बहनों का काम देखा है। हमने बैंक सखियों के रूप में डिजिटल इंडिया बनाने में बहनों की भूमिका देखी है। अब हम कृषि सखी के रूप में खेती को नई ताकत मिलते हुए देखेंगे। आज 30 हज़ार से अधिक सहायता समूहों को कृषि सखी के रूप में प्रमाणपत्र दिए गए हैं। अभी 12 राज्यों में ये योजना शुरू हुई है। आने वाले समय में पूरे देश में हज़ारों समूहों को इससे जोड़ा जाएगा। ये अभियान 3 करोड़ लखपति दीदियां बनाने में भी मदद करेगा।

भाइयों और बहनों,

पिछले 10 वर्षों में काशी के किसानों के लिए केंद्र सरकार ने और राज्‍य सरकार ने पिछले 7 साल से राज्‍य सरकार को मौका मिला है। पूरे समर्पण भाव से काम किया है। काशी में बनास डेरी संकुल की स्थापना हो, किसानों के लिए बना पेरिशेबल कार्गो सेंटर हो, विभिन्न कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र हों, या इंटीग्रेटेड पैक हाउस हो, आज इन सब के कारण काशी और पूर्वांचल के किसान बहुत मजबूत हुए हैं, उनकी कमाई बढ़ी है। बनास डेय़री ने तो बनारस और आसपास के किसानों और पशुपालकों का भाग्य बदलने का काम किया है। आज ये डेयरी हर रोज करीब 3 लाख लीटर दूध जमा कर रही है। अकेले बनारस के ही 14 हजार से ज्यादा पशुपालक, ये हमारे परिवार इस डेयरी के साथ रजिस्टर्ड हो चुके हैं। अब बनास डेयरी अगले एक डेढ़ साल में काशी के ही 16 हजार और पशुपालकों को अपने साथ जोड़ने जा रही है। बनास डेयरी आने के बाद बनारस के अनेकों दूध उत्पादकों की कमाई में भी 5 लाख रुपए तक की वृद्धि हुई है। हर साल किसानों को बोनस भी दिया जा रहा है। पिछले साल भी 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का बोनस पशुपालकों के बैंक खाते में भेजा गया था। बनास डेयरी अच्छी नस्ल की गिर और साहीवाल गायों को भी किसानों को दे रही है। इससे भी उनकी आमदनी बढ़ी है।

साथियों,

बनारस में मछलीपालकों की आय बढ़ाने के लिए भी हमारी सरकार लगातार काम कर रही है। पीएम मत्स्य संपदा योजना से सैकड़ों किसानों को लाभ हो रहा है। उन्हें अब किसान क्रेडिट कार्ड की भी सुविधा मिल रही है। यहां पास में चंदौली में करीब 70 करोड़ की लागत से आधुनिक फिश मार्केट का निर्माण भी किया जा रहा है। इससे भी बनारस के मछली पालन से जुड़े किसानों को मदद मिलेगी।

साथियों,

मुझे खुशी है कि पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना को भी बनारस में जबरदस्त सफलता मिल रही है। यहां के करीब-करीब 40 हजार लोग इस योजना के तहत रजिस्टर हुए हैं। बनारस के 2100 से ज्यादा घरों में सोलर पैनल लग चुका है। अभी 3 हजार से ज्यादा घरों में सोलर पैनल लगाने का काम चल रहा है। जो घर पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना से जुड़े हैं उनमें से ज्यादातर को डबल फायदा हुआ है। उनका बिजली बिल तो जीरो हो ही गया है, 2-3 हजार रुपए की कमाई भी होने लगी है।

साथियों,

बीते 10 सालों में बनारस शहर और आसपास के गांवों में कनेक्टिविटी का जो काम हुआ है, उससे भी बहुत मदद हुई है। आज काशी में देश के सबसे पहले सिटी रोप वे प्रोजेक्ट का काम अपने आखिरी पड़ाव तक पहुंच रहा है। गाजीपुर, आजमगढ़ और जौनपुर के रास्तों को जोड़ती रिंग रोड विकास का रास्ता बन गई है। फुलवरिया और चौकाघाट के फ्लाईओवर बनने से जाम से जूझने वाले बनारस के आप लोगों को बहुत राहत हुई है। काशी, बनारस और कैंट के रेलवे स्टेशन अब एक नए रूप में पर्यटकों और बनारसी लोगों का स्वागत कर रहे हैं। बाबतपुर एयरपोर्ट का नया रूप ना सिर्फ यातायात बल्कि व्यापार को भी बहुत सहूलियत दे रहा है। गंगा घाटों पर होता विकास, बीएचयू में बनती नई स्वास्थ्य सुविधाएं, शहर के कुंडों का नवीन रूप, और वाराणसी में जगह-जगह विकसित होती नई व्यवस्था काशी वासियों को गौरव की अनुभूति कराती हैं। काशी में स्पोर्ट्स को लेकर जो काम हो रहा है, नए स्टेडियम का जो काम हो रहा है, वो भी युवाओं के लिए नए मौके बना रहा है।

साथियों,

हमारी काशी संस्कृति की राजधानी रही है, हमारी काशी ज्ञान की राजधानी रही है, हमारी काशी सर्वविद्या की राजधानी रही है। लेकिन इन सब के साथ-साथ काशी एक ऐसी नगरी बनी है, जिसने सारी दुनिया को ये दिखाया है कि ये हेरिटेज सिटी भी अर्बन डेवलपमेंट का नया अध्याय लिख सकती है। विकास भी और विरासत भी का मंत्र काशी में हर तरफ दिखाई देता है। और इस विकास से सिर्फ काशी का लाभ नहीं हो रहा है। पूरे पूर्वांचल के जो परिवार काशी में अपने कामकाज और जरूरतों के लिए आते हैं। उन सभी को भी इन सारे कामों से बहुत मदद मिलती है।

साथियों,

बाबा विश्वनाथ की कृपा से काशी के विकास की ये नई गाथा, अनवरत चलती रहेगी। मैं एक बार फिर, देशभर से जुड़े सभी किसान साथियों का, सभी किसान भाई-बहनों का हृदय से अभिवादन करता हूं, बधाई देता हूं। काशीवासियों का भी मैं फिर से, हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।

नम: पार्वती पतये!

हर हर महादेव!

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