Papaya

Table Of Content

  • पपीता
  • जलवायु और मृदा
  • पपीते की महत्वपूर्ण किस्में
  • पपीते की पौध तैयार करने की तकनीक तथा बीज की मात्रा
  • खेत की तैयारी तथा रोपण तकनीक
  • पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक
  • सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन तकनीक
  • अंत: वर्तीय फसलें
  • फलों की तुड़ाई तथा श्रेणीकरण एवं पैकिंग
  • पपीते में पौध संरक्षण (एकीकृत कीट प्रबंधन तकनीक)
  • पपीते में एकीकृत रोग प्रबंधन तकनीक
  • पपीते के फल एवं उपज
  • पपीते की उत्पादकता बढ़ाने के उपाय
  • पपीते के फलों से पपेन निकालने की विधि
  • पपेन का उत्पादन
  • पपीते के बगीचे में फर्टीगेशन तकनीक द्वारा पोषक तत्व प्रबंधन

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पपीता

पपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। पपीता को भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिन्सकाटेन को जाता है जिनके द्वारा पपीता के पौधे वेस्टइंडीज से सन् 1575 में मलेशिया लाया फिर वहां से भारत आया। बड़वानी में भी लगभग 958 हे. क्षेत्रफल में पपीतें की व्यावसायिक खेती की जा रही है। बड़वानी जिले की लाल तथा पीली किस्मे प्रसिद्ध हैं पपीते के फलो से पपेन तैयार किया जाता है जिसका प्रसंस्कृत उत्पाद हेतु उपयोग किया जाता है। पपीता प्यूरी/भरता का भी बडा निर्यातक है।

जलवायु और मृदा

पपीते के पौधे, एक उष्णकटिबंधीय फसल, 70°F-90°F (21-32°C) के बीच गर्म से गर्म तापमान में उगते और फलते हैं। वे ठंढ या ठंडे तापमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं, और 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे का तापमान पकने में देरी कर सकता है। ठंडे क्षेत्रों में, आप देर से पतझड़ में रोपाई शुरू कर सकते हैं और उन्हें सर्दियों में ग्रीनहाउस में रख सकते हैं। वसंत ऋतु में पाले का ख़तरा टल जाने के बाद, आप बाहर पौधे लगा सकते हैं।
राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड
मिट्टी एवं जलवायु - पपीता
पपीता 45 सेमी या मध्यम  गहराई वाली अच्छी जल निकासी वाली समृद्ध रेतीली दोमट मिट्टी में अच्छी तरह से उगता है...
पपीते को 5.5 से 6.5 पीएच वाली अच्छी जल निकासी वाली, समृद्ध, रेतीली दोमट या मध्यम काली मिट्टी की भी आवश्यकता होती है, जिसमें जलभराव न हो। उन्हें पानी की भी बहुत आवश्यकता होती है, इसलिए आपको उन्हें हर तीन से चार दिन में अच्छी तरह से पानी देना चाहिए, लेकिन पानी को मिट्टी के ऊपर जमा न होने दें। पपीते को तेज़, गर्म या शुष्क हवाओं वाले क्षेत्रों में या उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में नहीं उगाया जाना चाहिए, जिससे कॉलर-रॉट रोग हो सकता है।

पपीते की महत्वपूर्ण किस्में

पपीते की किस्मों का चुनाव खेती के उद्देश्य के अनुसार किया जाना चाहिए जैसे कि औद्योगिक रूप से महत्व की किस्में जिनके कच्चे फलों से पपेन निकाला जाता है, पपेन किस्में कहलाती हैं इस वर्ग में महत्वपूर्ण किस्में सी. ओ- 2 ए सी. ओ- 5 एवं सी. ओ- 7 है।

इसके साथ दूसरा महत्वपूर्ण वर्ग है टेबिल वैरायटी या जिनको पकी अवस्था में काटकर खाया जाता है। इस वर्ग को पुनः दो भागों में बांटा गया है पारम्परिक पपीते की किस्में :- पारंपरिक पपीते की किस्मों के अंतर्गत बड़वानी लाल, पीला, वाशिंगटन, मधुबिन्दु, हनीड्यू, कुर्ग हनीड्यू , को 1 एवं 3 किस्में आती हैं। नई संकर किस्में उन्नत गाइनोडायोसियस /उभयलिंगी किस्में :- इसके अंतर्गत निम्न महत्वपूर्ण किस्में आती  हैः- पूसा नन्हा, पूसा डेलिशियस, सी. ओ- 7 पूसा मैजेस्टी, सूर्या आदि।

पपीते की पौध तैयार करने की तकनीक तथा बीज की मात्रा

पपीते के 1 हेक्टेयर के लिए आवश्यक पौधों की संख्या तैयार करने के लिए परंपरागत किस्मों का 500 ग्राम बीज एवं उन्नत किस्मों का 300 ग्राम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है। पपीते की पौध क्यारियों एवं पालीथीन की थैलियों में तैयार की जा सकती है। क्यारियों में पौध तैयार करने हेतु क्यारी की लंबाई 3 मीटर, चौड़ाई 1 मीटर एवं ऊंचाई 20 सेमी रखें। प्लास्टिक की थैलियों में पौध तैयार करने के लिए 200 गज मोटी 20 गुना 15 सेमी आकार की थैलियाँ (जिनमें चारों तरफ एवं नीचे छेद किए गए हो ) में वर्मीकंपोस्ट, रेत, गोबर खाद तथा मिट्टी के 1:1:1:1 अनुपात का मिश्रण भरकर प्रत्येक थैली में 1 या 2 बीज बोंए।

खेत की तैयारी तथा रोपण तकनीक

पौध रोपण पूर्व खेत की तैयारी मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर 2-3 बार कल्टिवेटर या हैरो से जुताई करें तथा समतल कर लें पूर्ण रूप से तैयार खेत में 45*45*45 सेमी आकार के गढडे 2 गुना 2 मीटर (पंक्ति – पंक्ति एवं पौध से पौध )की दूरी पर तैयार करें।

पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक

200 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधा प्रतिवर्ष 3-4 बराबर भागों में बांटकर दें।

सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन तकनीक

पपीता के पौधो की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिटटी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीकी अपनाऐ।

अंत: वर्तीय फसलें

पपीते बाग में अंतःवर्तीय फसलों के रूप में दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि ली जा सकती। मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिण्डी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंतःवर्तीय फसलों के रूप में न उगायें।

फलों की तुड़ाई तथा श्रेणीकरण एवं पैकिंग

पपीत के पूर्ण रूप से परिपक्व फलों को जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डंठल सहित तुड़ाई करें। तुड़ाई के पश्चात् स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लें तथा सड़े गले फलों को अलग हटा दें।

पपीते में पौध संरक्षण (एकीकृत कीट प्रबंधन तकनीक)

एफिड– कीट का वैज्ञानिक नाम एफिस गोसीपाई माइजस परसिकी है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं तथा पौधे में मौजेक रोग के वाहक का कार्य करते है।

प्रबंधन तकनीक  – मिथाइल डेमेटान या डायमिथोएट की 2 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर पौध रोपण पश्चात् आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतर से पत्तियों पर छिड़काव करें।

लाल मकड़ी– इसे वैज्ञानिक भाषा में ट्रेट्रानायचस सिनोवेरिनस कहते है। यह पपीते का प्रमुख कीट है जिसके आक्रमण से फल खुरदुरे और काले रंग के हो जाते है तथा पत्तियाँ पर आक्रमण की स्थिति में फफूंद पीली पड़ जाती है।

प्रबंधन – पौधे पर आक्रमण दिखते ही प्रभावित पत्तियों को तोड़कर दूर गढढे में दबाऐं। वेटेबल सल्फर 2.5 ग्राम/ ली. या डाइकोफॉल 18.5 ईसी की 2.5 मिली या ओमाइट 1.5 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

पपीते में एकीकृत रोग प्रबंधन तकनीक

तना गलन (तने तथा जड़ के गलने की बीमारी ) – इस रोग का कारण पीथियम एफिनडरमेटम फाइटोफ्थरा पामीबोरा नामक फफूंद है जिसके कारण पौधे भूमि के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है धीर-धीरे गलन जड़ तक पहुँच जाती है इस कारण फफूंद सूख जाती है और पौधा मर जाता है। प्रबंधन के लिए जलनिकास में सुधार करें तथा रोग ग्रसित पौधों को खेत से निकालकर हटा दें उसके पश्चात् पौधों पर 1 प्रतिशत बोर्डो मिश्रण या काॅपर आक्सीक्लोराइड या ब्लाइटाकस दवा की 2 ग्रा / ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें तथा ड्रेंचिंग करें।

 

डम्पिंग ऑफ (आर्द गलन ) – यह रोग पपीते में नर्सरी अवस्था में आता है जिसका कारण पीथियम एफिनडरमेटस, पी. अल्टीमस फाइटोफ्थोरा पामीबोरा तथा राइजोक्टोनिया स्पी. के कारण होता है।
लक्षण- पौधे नीचे (जमीन की सतह के पास से )से गलकर मरने लगते है।
प्रबंधन – रोग से बचने के लिए पपीते के बीजों का उपचार बुवाई पूर्व सेरेसान या एग्रोसान जी एन से उपचारित करें तथा नर्सरी को फार्मेल्डिहाइड के 2.5 प्रतिशत घोल से ड्रेंचिंग करें या उपचारित करें।
रिंग स्पॉट वायरस – इस रोग का कारण विषाणु है जो कि माहू द्वारा फैलता है । इस रोग के गंभीर आक्रमण की स्थिति में 50-60 प्रतिशत तक हानि हो जाती है जिस कारण पत्तियों पर क्लोरोसिस दिखाई देता है पत्तियाँ कटी – कटी दिखाई देती है तथा पौधे की वृद्धि रूक जाती है।

लीफकर्ल – यह भी विषाणु जनित रोग है जो कि सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है जिस कारण पत्तियाँ मुड़ जाती है इस रोग से 70-80 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है।

नियंत्रण- स्वस्थ पौधो का रोपण करें। रोगी पौधों को उखाड़कर खेत से दूर गढढे में दबाकर नष्ट करें। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु अनुसंशित कीटनाशक का प्रयोग करें।

पपीते के फल एवं उपज

अच्छी तरह वैज्ञानिक प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 40-50 किलो उपज प्राप्त हो जाती है। पपीते की प्रति हेक्टेयर राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादकता 317 क्विं/हे. है।

संकर पपीते की खेती पर होने वाली आय व्यय का ब्यौरा (अनुमानित प्रति हेक्टेयर )

कुल लागत 165400
उत्पादन ( क्वि. / हे.) 900
विक्रय 405000
लाभ लागत अनुपात 2.44
शुद्ध लाभ 194600

पपीते की उत्पादकता बढ़ाने के उपाय

1. पपीते की व्यावसायिक खेती में उभयलिंगी किस्मों जैसे सूर्या ( भारतीय बागवानी अनु. सं. बैंगलोर ) सनराइज सोलो, रेडी लेडी -786 के साथ किचिन गार्डन के लिए पूसा नन्हा, कुर्ग हनीड्यू, पूसा ड्वार्फ, पंत पपीता 1, 2 एवं 3 के चयन को प्राथमिकता दें।

2. रसचूसक कीटों के प्रभाव वाले क्षेत्रो में पपीते को अक्टूबर में रोपण करें तथा पौधों की नर्सरी कीट अवरोधी नेट हाऊस के भीतर तैयार करें।

3. खाद व उर्वरक की संतुलित मात्रा 250 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम स्फुर तथा 250 -500 ग्राम पोटाश प्रति पौधा/वर्ष प्रयोग करें।

4. सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई पद्धिति अपनाऐं।

5. फसल में रसचूसक कीटों के नियंत्रण हेतु फेरामोन ट्रेप, प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें तथा नीम सत्व 4 प्रतिशत का छिड़काव करें।

6. पपीते के पौधों को 30 सेमी उठी मेड़ पर 2 गुणा 2 मीटर की दूरी पर रोपाई करें तथा अंतवर्तीय फसल के रूप में मिर्च , टमाटर बैंगन न लगाएं।

पपीते के फलों से पपेन निकालने की विधि

सामान्यत: पपेन को पपीते के कच्चे फलों से निकला जाता है | पपेन के लिए 90-100 दिन विकसित कच्चे फलों का चुनाव करें | कच्चे चुने हुए फलों से सुबह ३ मि.मी. गहराई के 3-4 चीरे गोलाई आकार में लगाएं  इसके पूर्व पौधों पर फलों से निकलने वाले दूध को एकत्रित करने के लिए प्लास्टिक के बर्तन को तैयार रखें |

फलों पर प्रथम बार के (चीरा लगाने के बाद ) 3-4 दिनों पश्चात पुन: चीरा लगाकर पपेन एकत्रित करें |

पपेन (दूध) प्राप्त होने के बाद उसमे 0.5 प्रतिशत पोटेशियम मेन्टाबाई सल्फेट परिरक्षक के रूप में मिलाये ताकि पपेन को ३-४ दिन तक सुरक्षित रखा जा सके पपेन को अच्छी तरह सुखाकर पपेन को प्रसंस्करण केंद्र भेजें |

पपेन का उत्पादन

इस प्रकार पपीते की पपेन के लिए उपयुक्त किस्मों सी ओ -2 एवं सी ओ – 5 के पौधों से 100 – 150 ग्राम पपेन प्रति पौधा प्रति वर्ष प्राप्त हो जाता है |

कच्चे पपेन को अच्छी तरह सुखाकर प्राप्त पाएं को प्रसंस्करण के लिए सयंत्र महाराष्ट्र के जलगॉव तथा येवला (नासिक ) में भेज दिया जाता है |

कच्चे फलों से पपेन निकालने के बाद उनसे अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे टूटी फ्रूटी, मुरब्बा बनाया जा सकता है तथा चीरा लगे पके फलों का जैम जेली मुरब्बा रास या गुदा जिसे प्यूरी कहते है बनाकर डिब्बाबंद किया जाता है | भारत पपीता प्यूरी का एक बड़ा निर्यातक है |

पपीते के बगीचे में फर्टीगेशन तकनीक द्वारा पोषक तत्व प्रबंधन

पपीते के पौधों जिनको फरवरी में उठी हुई क्यारी पर लगाया गया हो ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का उपयोग करें तथा जल विलेय उर्वरकों जैसे 19:19:19 को सिंचाई जल के साथ ड्रिप में देने से उर्वरक की बचत के साथ साथ उसकी उपयोग क्षमता में भी वृद्धि होती है तथा पौधों को आवश्यकतानुसार एवं शीघ्र पोषक तत्व उपलब्द्ध होने से उपज तथा गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है |

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Jimikand or Suran or Elephant yamजिमीकंद को एक औषधीय फसल के रूप में उगाया जाता है, किन्तु इसका इस्तेमाल हमारे घरो में सब्जियों के रूप में भी होता है। इसे ओल और सूरन के नाम से भी जाना जाता है । जिमीकंद की तासीर अधिक गर्म होती है, जिस वजह से इसका सेवन करने से खुलजी की शिकायत सुनने को मिलती है….Click Here Papayaपपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। पपीता को भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिन्सकाटेन को जाता है जिनके द्वारा पपीता के पौधे वेस्टइंडीज से सन् 1575 में मलेशिया लाया फिर वहां से भारत आया। बड़वानी में भी लगभग 958 हे….Click HereCurry leavesकरी पत्ते एक छोटे पर्णपाती सुगंधित झाड़ी का भाग होते हैं, जिसका वैज्ञानिक नाम मुरराया कोएनिगी होता है, जो रूटेशियाई कुल से संबंधित होता है। इसे प्राकृतिक औषधीय पौधा माना जाता है। दक्षिण एशिया इस पौधे का घर है, और यह श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन और भारत जैसे देशों में पाया जाता है। भारत में, यह हिमालय के नीचे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और असम जैसेClick Here
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  • परिचय
  • करी पत्ते में पोषक तत्वों की मात्रा
  • करी पत्ते के गुण
  • करी पत्ते के संभावित उपयोग
  • करी पत्ते कैसे इस्तेमाल करें ?
  • करी पत्ते के सेवन में बरती जाने वाली सावधानियां
  • करी पत्ते की किस्में
  • करी पत्ते के पौधे की बुवाई का मौसम
  • सिंचाई
  • करी पत्ते की उपज

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परिचय

करी पत्ते एक छोटे पर्णपाती सुगंधित झाड़ी का भाग होते हैं जिसका वैज्ञानिक नाम मुरराया कोएनिगी (Murraya koenigii) होता है जो रूटेशियाई कुल से संबंधित होता है। इसे प्राकृतिक औषधीय पौधा माना जाता है। दक्षिण एशिया इस पौधे का घर है और यह श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन और भारत जैसे देशों में पाया जाता है। भारत में यह हिमालय के नीचे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और असम जैसे राज्यों में पाया जाता है।

इस पौधे में चमकदार हरे पत्ते होते हैं जो वसंत, ग्रीष्म और मानसून के दौरान वृद्धि करते हैं और ये सर्दियों में गिर जाते हैं। तमिल और कन्नड़ साहित्य में ऐसे संदर्भ हैं जो मुरराय कोएनिगी को ‘करी’ के रूप में वर्णित करते हैं, जिसका अर्थ है सब्जियों के लिए स्वाद एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला ‘मसालेदार सॉस’। यह भारत में सबसे लोकप्रिय मसाला और छौंक के रूप में पहचाना जाता है। इसे आमतौर पर हिंदी में कड़ीपत्ता या मीठा नीम, तमिल में करुवेप्पिलई और मलयालम में करिवेप्पिले कहा जाता है।

करी पत्ते में पोषक तत्वों की मात्रा
सूखे और ताज़े दोनों तरह के करी पत्ते में अच्छे पोषक तत्व होते हैं और यह स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद होते हैं।

पोषक तत्वों की मात्रा ताज़ा करी पत्ते सूखे करी पत्ते
प्रोटीन (ग्राम) 6 12
कार्बोहाइड्रेट्स (ग्राम) 18.7 64.31
फ़ैट (ग्राम) 1 5.4
विटामिन C (मिलीग्राम) 4 4
कैरोटीन (माइक्रोग्राम) 7560 5292
कैल्शियम (मिलीग्राम) 830 2040
आयरन (मिलीग्राम) 0.93 12

टेबल 1: प्रति 100 ग्राम करी पत्तों के पोषक तत्वों की मात्रा
करी पत्ते के गुण

आयुर्वेद के अनुसार, करी पत्ते के बहुत से फ़ायदेमंद गुण हो सकते हैं :- 

  • यह ब्लड प्रेशर कम करने वाले प्रभाव हो सकते हैं
  • इसमें एंटी बैक्टीरियल गतिविधि हो सकती है
  • इसमें एंटीवायरल गतिविधि हो सकती है
  • इसमें एंटीफंगल गतिविधि हो सकती है
  • इसमें एंटी प्रोटोज़ोअल गतिविधि हो सकती है
  • यह एक लैक्सटिव प्रभाव प्रदान कर सकता है (कब्ज में मदद करता है)
  • इसमें एंटी-डायरियल गतिविधि हो सकती है
  • इसमें घाव भरने की गतिविधि हो सकती है
  • इसमें एंटी- कैंसर गतिविधि हो सकती है
  • इसमें एंटी- डायबिटिक गतिविधि हो सकती है
  • इसमें सूजन रोकने वाली गतिविधि हो सकती है
  • यह एक एंटी ऑक्सिडेंट के रूप में कार्य कर सकता है
  • इसमें कोलेस्ट्रॉल कम करने का प्रभाव हो सकता है
  • इसमें एंटी अल्सर गतिविधि हो सकती है
  • इसमें एंटी- ट्यूमर गतिविधि हो सकती है।

करी पत्ते के संभावित उपयोग

करी पत्तों के संभावित उपयोग अलग-अलग स्वास्थ्य स्थितियों के लिए हो सकते हैं। कई अध्ययनों में करी के पत्तों के फ़ायदे इस प्रकार हैं :-

  1. डाइबिटीज़ के लिए करी पत्ते के संभावित उपयोग :-ब्लड शुगर के प्रबंधन में करी पत्तियों की प्रभावशीलता का अध्ययन 2012 में डुसाने एट अल द्वारा एक पशु मॉडल में किया गया था। यह ब्लड शुगर के स्तर में उल्लेखनीय कमी लाता है। पत्तियों के अर्क का यह ब्लड शुगर को कम करने वाला गुण,  ब्लड शुगर के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है। ये प्रभाव इंसुलिन के जैसे प्रभाव हो सकते हैं जो ब्लड शुगर को या तो अग्नाशय के इंसुलिन उत्पादन को बढ़ाकर या विशिष्ट एंजाइमों के कारण कोशिकाओं द्वारा ग्लूकोज अप-टेक करके कम कर सकता है। इससे पता चलता है कि करी पत्ता डायबिटीज़ मेलेटस के प्रबंधन में प्रभावी हो सकता है।

    डायबिटीज़ एक गंभीर बीमारी है और इसका उचित निदान किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से उपरोक्त जानकारी अपर्याप्त है क्योंकि ये अध्ययन मनुष्यों पर नहीं किए गए हैं हालांकि शरीर में ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने पर करी के पत्तों के सकारात्मक प्रभाव को दर्शाने के लिए अभी और अधिक मानव परीक्षणों को करने की आवश्यकता है। इसलिए डॉक्टरों से परामर्श लेना और इसे केवल दवा के रूप में लेना आवश्यक है।

    करी पत्तों और उनके असेंशियल ऑइल का फ़ायदा यह है कि वे सूजन कोशिकाओं के खिलाफ कार्य कर सकते हैं जब यह बाहरी सतही चोटों पर लगाया जाता है जैसे कि त्वचा छिलने, जलने और खरोंच, तो ये घाव भरने वाली गतिविधि दर्शा सकते हैं। पत्तियों से बने असेंशियल ऑइल का उपयोग क्रीम और अन्य योगों में किया जा सकता है जो धूप से सुरक्षा, त्वचा की चमक को बढ़ाने और खुरदरी त्वचा को मॉइस्चराइज़ करने के लिए प्रभावी हो सकते हैं। करी पत्ते का तेल त्वचा की समस्याओं जैसे कि फोड़े, मुहांसे, खुजली, रिंगवर्म, ज़ख़्मी पैर आदि से निपटने में भी सहायक हो सकते हैं।

    त्वचा के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए करी पत्तियों के लाभकारी प्रभावों को विकसित करने के लिए आगे के अध्ययनों की आवश्यकता है। इसलिए लोगों को करी के पत्तों से बने किसी भी हर्बल दवा के सेवन से पहले डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। इसके अतिरिक्त हम आपको सलाह देते हैं कि डॉक्टर से परामर्श किए बिना आयुर्वेदिक या हर्बल दवा के साथ चल रही दवाओं को बंद या प्रतिस्थापित न करें।

  2. ज़्यादा कोलेस्ट्रॉल के लिए करी पत्ते के संभावित उपयोग :-ज़ी एट अल द्वारा 2006 में किए गए एक पशु अध्ययन में करी पत्ते ने कुल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड (वसा) के स्तर को काफ़ी कम कर दिया। करी पत्ते की यह हाइपोलिपिडेमिक (लिपिड कम करने वाली) कार्य इसके एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण हो सकती है। यह कोलेस्ट्रॉल और कम डेंसिटी वाले लिपिड (खराब कोलेस्ट्रॉल) को कम करने में मदद कर सकता है इससे पता चलता है कि कोलेस्ट्रॉल और वसा के मेटाबोलिज़्म को कम करने में इसकी संभावित भूमिका हो सकती है।

    हालांकि ये अध्ययन मनुष्यों पर प्रभाव को समझने के लिए पर्याप्त नहीं हैं हमें मानव शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रबंधित करने में करी पत्ते के फ़ायदों के बारे में ज़्यादा जानकारी की आवश्यकता है। इसलिए, कोलेस्ट्रॉल की जांच के लिए करी पत्ते का उपयोग करने से पहले डॉक्टर से बात करना बेहतर होता है।

  3. लीवर के लिए करी पत्ते के संभावित उपयोग :-देसाई एट अल द्वारा 2012 में पशु मॉडल अध्ययन ने खुलासा किया कि करी पत्ते के रस ने लीवर एंजाइम के कार्य में काफ़ी वृद्धि की जो लीवर में लिपिड के ऑक्सीडैशन में सहायता करता है। रस ने लीवर की रक्षा करने वाले कार्य भी दिखाए जो लीवर की क्षति को रोकते हैं।

    ऊपर दी गई जानकारी अपर्याप्त है क्योंकि ये अध्ययन जानवरों पर किए गए हैं। हालांकि, मानव स्वास्थ्य पर करी पत्ते के फ़ायदों को जानने के लिए मनुष्यों पर और अध्ययन आवश्यक है। इसलिए, अपने संबंधित डॉक्टरों से परामर्श करना महत्वपूर्ण है।

  4. करी पत्ते के अन्य संभावित उपयोग :-
    • करी पत्ते का तेल विटामिन और कैल्शियम से भरपूर होता है और हड्डियों को मज़बूत करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, ऑस्टियोपोरोसिस (कमजोर हड्डियों) की संभावनाओं को कम कर सकता है और कैल्शियम की कमी को प्रबंधित कर सकता है।
    • मुरराया कोएनिगी की शाखाओं को ‘डाटम’ कहा जाता है। उनका उपयोग मसूड़ों को मज़बूत करने और दांतों को साफ़ करने के लिए किया जा सकता है।
    • बिरारी आर एट अल द्वारा 2010 में किए गए जानवरों के अध्ययन के अनुसार करी पत्ते का रस फ़ाइटोकेमिकल्स और डायटरी फ़ाइबर की उपस्थिति को दर्शाता है जो वज़न ठीक रखने और फ़ैट घुलनशीलता में मदद कर सकता है।

    हालांकि, कई स्वास्थ्य स्थितियों में करी पत्ते के फ़ायदों को दर्शाने वाले अध्ययन अपर्याप्त हैं और मानव स्वास्थ्य पर करी पत्ते के फ़ायदों की सही सीमा स्थापित करने के लिए आगे के अध्ययन की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त हर व्यक्ति इन जड़ी-बूटियों के प्रति अलग-अलग प्रतिक्रिया दे सकता है। इसलिए, किसी भी चिकित्सीय स्थिति के लिए करी पत्ते का उपयोग करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है।

करी पत्ते कैसे इस्तेमाल करें ?

  • करी पत्तों का इस्तेमाल इन तरीकों से किया जा सकता है:
    • ताज़ा पत्ते और सूखे पत्ते कढ़ी, सूप, मछली, मांस और अंडे के व्यंजनों में स्वाद और सुगंध डालते हैं।
    • ताज़ी पत्तियों के रस का सेवन नींबू और चीनी के साथ किया जा सकता है।
    • पत्तों का उपयोग टॉनिक बनाने में भी किया जा सकता है।

    करी पत्ते से बने किसी भी हर्बल सप्लीमेंट को लेने से पहले लोगों को एक सही डॉक्टर से परामर्श लेना ज़रूरी होता है। हम सलाह देते हैं कि आप किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर से परामर्श किए बिना आयुर्वेदिक या हर्बल दवाइयों के साथ अपनी वर्तमान दवाओं को न बदलें या न ही उन्हें बंद करें।

करी पत्ते के सेवन में बरती जाने वाली सावधानियां

  • सामान्य तौर पर, करी पत्ते का उपयोग करना सुरक्षित होता है। हालांकि, किसी भी समस्या से बचने के लिए सामान्य सावधानियां बरतने की ज़रूरत होती है।
    • ब्लड प्रेशर की दवाएं लेने वाले लोगों के लिए डॉक्टर की सलाह ज़रूरी है। विभिन्न अध्ययन की रिपोर्ट से पता चलता है कि जब करी पत्ते के रस को ब्लड प्रेशर की दवा के साथ लिया जाता है तो इसके नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। रस के तत्व दवा के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर कम हो सकता है। इसलिए जड़ी-बूटी और दवा दोनों को एक साथ लेने से बचना चाहिए।
    • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए करी पत्ते के सुरक्षित उपयोग का सुझाव देने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, डॉक्टर से परामर्श करने का सुझाव दिया जाता है।
    • कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण छोटे बच्चों और बड़े वयस्कों को करी पत्ते देते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए, जिससे शरीर में प्रतिक्रिया हो सकती है।

    आपको नियमित रूप से करी पत्ते का सेवन करते समय अपने डॉक्टर द्वारा दी गई सामान्य सावधानियों और निर्देशों का पालन करना चाहिए और आपको कभी भी प्राकृतिक फलों, सब्जियों और जड़ी-बूटियों के साथ स्वयं औषधि नहीं लेनी चाहिए।

करी पत्ते की किस्में

    • सेन कम्पास
    • धारवाड़-1
    • धारवाड़-2

करी पत्ते के पौधे की बुवाई का मौसम

करी पत्ते के फलों की उपलब्धता का मुख्य मौसम जुलाई-अगस्त है फलों के बीजों को गूदा कर नर्सरी बेड या पॉलीबैग में बोना चाहिए एक साल पुराना पौधा रोपने के लिए उपयुक्त होता है.

सिंचाई

रोपण के तुरंत बाद सिंचाई कर दी जाती है रोपण के तीसरे दिन दूसरी सिंचाई करें और फिर सप्ताह में एक बार सिंचाई करें करी पत्ते का पौधा अच्छी तरह से पनपने के लिए अच्छी जल निकासी वाली भूमि की आवश्यकता होती है.

करी पत्ते की उपज

पहले वर्ष के अंत में 250-400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की कटाई की जा सकती है व्यावसायिक रूप से भारत में इसके स्वास्थ्य लाभ और औषधीय महत्व और दैनिक उपयोग के कारण बाजार में करी पत्ते की बहुत अधिक मांग है |

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Sweet Potato (शकरकंद)शकरकंद (Sweet Potato) वीटा कैरोटिन का समृद्ध स्रोत है, और इसे एंटीऑक्सीडेंट और अल्कोहल के रूप में भी उपयोग किया जाता है। यह एक बारामासी बेल है, जिसके लोंब या दिल के आकर वाले पत्ते होते है। भारत में लगभग 2 लाख हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है। बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा इसके प्रमुख उत्पादक राज्य है….Click HereHow to grow taro plant at home(घर पर अरबी का पौधा कैसे उगाएं)क्या आप जानते हैं, अरबी एक खाने योग्य कंद वाली सब्जी का पौधा है, जिसका उपयोग रसोई में किया जाता है, घुइंया, टैरो रुट (Taro roots), कोलोकेसिया (Colocasia) इत्यादि नामों वाला अरबी एक स्वादिष्ट सब्जी का बारहमासी पौधा है…Click Hereखुम्ब की खेतीसदियों से खुम्ब (मशरुम) ने मनुष्य को आकर्षित किया है। इनके रंग-बिरंगे, सुन्दर फलनकाय सहज ही हमारा ध्यान खींच लेते हैं। मशरुम एक प्रकार का मांशल कवक है जो अत्यंत स्वादिष्ट एवं पौष्टिक शुद्ध शाकाहार भोजन है। प्रकृति में पाये जाने वाले सभी खुम्ब खाने योग्य नहीं हैं, उनमें से कुछ विषैले भी होते हैं….Click Here
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Sweet Potato (शकरकंद)

Table Of Content

  • बुनियादी जानकारी
  • बीज विशिष्टता
  • भूमि की तैयारी एवं मृदा स्वास्थ्य
  • फसल स्प्रे और उर्वरक विशिष्टता
  • निराई एवं सिंचाई
  • कटाई एवं भंडारण
  • फसल संबंधी रोग
  • काली जड़
  • भूरा जंग रोग
  • शकरकंद फसल के प्रकार और किस्में

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बुनियादी जानकारी

शकरकंद (Sweet Potato) वीटा कैरोटिन का समृद्ध स्रोत है और इसे एंटीऑक्सीडेंट और अल्कोहल के रूप में भी उपयोग किया जाता है। यह एक बारामासी बेल है जिसके लोंब या दिल के आकर वाले पत्ते होते है। भारत में लगभग 2 लाख हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है। बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा इसके प्रमुख उत्पादक राज्य है। भारत का शकरकंद (Sweet Potato) उत्पादन में 6 वाँ स्थान है।

बीज विशिष्टता

बुवाई का समय-
सिंचित स्थितियों में शकरकंदी+धान का फसली चक्र अपनाया जाता है। शकरकंदी की फसल दिसंबर-जनवरी महीने में धान की दूसरी कटाई के बाद बोयें।

दुरी-
पंक्तियों के बीच का दुरी 60 सैं.मी. और पौधों के बीच का दुरी 30 सैं.मी. का रखें|

बीज की गहराई-
गांठों की बिजाई 20-25 सैं.मी. गहराई पर बोयें |


बीज की मात्रा –

एक एकड़ में बुवाई के लिए 25,000-30,000 कटी हुई बेलों या 280-320 किलो गांठों का प्रयोग करें।


बीज का उपचार –

गांठों को प्लास्टिक बैग में डाल कर ज्यादा मात्रा वाले सल्फयूरिक एसिड में 10-40 मिनट के लिए भिगोये।

भूमि की तैयारी एवं मृदा स्वास्थ्य

जलवायु-
शकरकंद की खेती के लिए 21 से 27 डिग्री तापमान उपयुक्त माना जाता है। इसकी फसल शीतोष्ण और समशीतोष्ण जलवायु वाले स्थानों पर सफलतापुर्वक उगाई जाती है, और जहां पर 75 से 150 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा होती है वहां इसको आसानी से उगाया जा सकता है।


भूमि-

शकरकंद की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती हैं। इसके लिए रेतली और दोमट मिट्टी अधिक अनुकूल होती है।किन्तु यह ज्यादा उपजाऊ और अच्छे निकास वाली मिट्टी में बढिया उत्पादन देती है| इसकी खेती हल्की रेतली और भारी चिकनी मिट्टी में ना करें, क्योंकि इसमें गांठों का विकास अच्छी तरह से नहीं होता हैं| इसके लिए मिट्टी का pH 5.8-6.7 होना चाहिए|

खेत की तैयारी-

शकरकंद की खेती के लिए बुवाई से पहले खेत की 2-3 बार अच्छी तरह से जुताई करे। खेत को भुरभुरा, समतल और खरपतवार रहित तैयार करना चाहिए।

फसल स्प्रे और उर्वरक विशिष्टता

खाद एवं रासायनिक उर्वरक-
शकरकंद की खेती के लिए अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए प्रति हेक्टेयर निम्न प्रकार खाद एवं उर्वरक देनी चाहिए। गोबर की खाद – 200-250 कुन्टल प्रति हेक्टेयर, नाइट्रोजन – 50 किग्रा फास्फोरस – 50 किग्रा पोटाश – 50 किग्रा।

निराई एवं सिंचाई

खरपतवार नियंत्रण-
शकरकंद को ठंडे मौसम से बचाने के लिए अपनी पसंद के घासपात से ऊपर तक ढकें। इससे खरपतवार का उगना बंद हो जायेगा। खरपतवारों के अंकुरण से पहले मेट्रिब्यूज़िन 70% डब्लू पी 200 ग्राम या ऐलाक्लोर 2 लीटर प्रति एकड़ डालें|

सिंचाई –शुरू में शकरकंद को बहुत ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है। समय के साथ आप पानी की मात्रा कम कर सकते हैं और फिर हफ्ते में सिर्फ एक बार पानी डाल सकते हैं। शुरू में आपरोज़ पानी डालें फिर हर हफ्ते एक एक दिन कम करते जाएँ।

कटाई एवं भंडारण

फसल अवधि –
(Convolvulaceae – कोन्वोल्वूलाकेऐ) कुल का एकवर्षी पौधा है, पर यह अनुकूल परिस्थिति में बहुवर्षी सा व्यवहार कर सकता है। यह एक सपुष्पक पौधा है। इसके रूपान्तरित जड़ की उत्पत्ति तने के पर्वसन्धियों से होती है जो जमीन के अन्दर प्रवेश कर फूल जाती है और उन फूले हुए जड़ों में काफी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट इकट्ठा हो जाता है। जड़ का रंग लाल अथवा भूरा होता है एवं यह अपने अन्दर भोजन संग्रह करती है।

कटाई समय –शकरकंद की खुदाई नवम्बर में की जाती है खुदाई के समय खेत में नमी होने पर खुदाई करने में सुविधा रहती है।

उत्पादन क्षमता –
शकरकंद पैदावार किस्मों के अनुसार अलग-अलग होती है चूंकि सामान्य रूप से औसत पैदावार 15 से 25 टन प्रति हैक्टर तक देखी गयी है।

सफाई और सुखाने –
शकरकंद को ठंडे मौसम से बचाने के लिए अपनी पसंद के घासपात से ऊपर तक ढकें। इससे वीड्स का उगना बंद हो जायेगा, लताएँ बहुत ज्यादा नहीं बढ़ेंगी और ऊर्जा कंदों की उपज की ओर केन्द्रित हो जाएगी। नर्सरी से लताओं को काटने के बाद उसको दो दिनों तक छाया में रखा जाये, जिससे उनमें जड़ों का विकास अच्छा होता है। लताओं को बोरेक्स या मानोक्रोटोफास दवा 0.05 प्रतिशत के घोल में 10 मिनट तक डुबोना चाहिए। उसके बाद मुख्य खेत में लता लगाने के लिए उपयुक्त रहती हैं।

फसल संबंधी रोग


अल्टरनेरिया पत्ती का झुलसा रोग-
विवरण :  बारिश और कोहरा बीमारी के विकास को बढ़ाता है। फसल के मलबे पर मिट्टी में कवक जीवित रहता है लेकिन मलबे के विघटित होने पर मारा जाता है।
जैविक समाधान : ट्राइकोडर्मा (Trichoderma viride) का और वीटावैक्स मिश्रण प्रभावी रूप से आगे के संक्रमण (98.4% तक) में बाधा डालता है। मिक्स यूरिया @ 2 – 3% ज़िनब के साथ स्प्रे करे। बीज जनित इनोक्यूलम को कम करने के लिए फफूंदनाशक और गर्म पानी के उपचार का उपयोग किया गया है।
रासायनिक समाधान : अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट (Alternaria leaf spot) को नियंत्रित करने के लिए कवकनाशी सबसे व्यवहार्य रासायनिक नियंत्रण है। कवकनाशी के साथ बीज का इलाज करने से संक्रमण की संभावना को कम करने में भी मदद मिल सकती है। रोग को नियंत्रित करने के लिए ज़िनब और थीरम को सबसे प्रभावी पाया गया।

काली जड़

विवरण :- ब्लैक रूट थिएलावोप्सिस बेसिकोला (Thielaviopsis basicola) के कारण होती है, मुख्य रूप से फसल के बाद की बीमारी है रोग दुनिया भर में होता है और इसमें एक विस्तृत श्रृंखला होती है, जिसमें फलियां, आलू, और कुकुरबिट परिवारों के साथ-साथ कई आभूषण और वुडी पौधे भी शामिल हैं।


जैविक समाधान :-
रोपण के मौसम में देरी के मामले में, रोपण से पहले 30 मिनट के लिए गर्म पानी (51 डिग्री सेल्सियस पर) में इलाज करें।


रासायनिक समाधान :-
गर्म पानी (30 मिनट के लिए 50 डिग्री सेल्सियस) या गर्म ब्लीच (30 मिनट के लिए 0.1% सोडियम हाइपोक्लोराइट) में इसका इलाज करें। फसल चक्रण का अभ्यास करें। जमीन पर रोपण से 3-4 साल पहले छोड़ दें जहां बीमारी की पहचान की गई है।


भूरा जंग रोग

विवरण :- ब्राउन रस्ट फंगस प्यूकिनिया हेलियनथिश् (Puccinia helianthi Schw) के कारण होता है। जंग के साथ गंभीर संक्रमण बीज के आकार, सिर के आकार, तेल सामग्री और उपज में कमी का कारण बनता है। बढ़ते मौसम के दौरान कभी भी जंग लग सकती है जब तक कि पर्यावरण की स्थिति इसके लिए अनुकूल होती है।


जैविक समाधान :-
सहिष्णु और प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग | फसल चक्रण का पालन किया जाना चाहिए। पिछली फसल अवशेष नष्ट हो जाना चाहिए। फसल अवशेषों को निकालना।


रासायनिक समाधान :-
2 किलो / हेक्टेयर पर मैनकोजेब का छिड़काव करें।

शकरकंद फसल के प्रकार और किस्में

एक बड़ी आनुवंशिक परिवर्तनशीलता है और सैकड़ों पारंपरिक किस्में और भूमि की प्रजातियाँ विश्व स्तर पर उगाई जाती हैं, केवल कुछ का उपयोग व्यावसायिक खेती के लिए बड़े पैमाने के क्षेत्रों में किया जाता है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में शकरकंद की मुख्य रूप से खेती की जाने वाली दो किस्में ‘ज्वेल‘ और ‘ब्यूरेगार्ड‘ हैं।

शकरकंद की सभी किस्मों को उनके गूदे की बनावट
के आधार पर  2
मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है। इस प्रकार है :-
नम-मांसल श्रेणी (उदाहरण के लिए, यहां ब्योरगार्ड किस्म आती है)
शुष्क मांस वाली श्रेणी (उदाहरण के लिए, यहाँ ओ’हेनरी और हन्ना किस्म से संबंधित है)


शकरकंद की कुछ प्रसिद्ध किस्में हैं :-


ब्यूरेगार्ड :-
यह किस्म मध्यम से बहुत मीठे स्वाद के साथ हल्के गुलाबी छिलके और नारंगी गूदे वाले शकरकंद देती  है जिनकी भंडारण क्षमता अच्छी होती है
 हालांकि यह कई महत्वपूर्ण बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी है, यह जड़–गाँठ नेमाटोड और जीवाणु नरम सड़न के प्रति संवेदनशील है।


‘ज्वेल‘ :-
यह सबसे लंबे जीवन चक्र(135 दिनों तक) वाली किस्मों में से एक है जो उच्च पैदावार दे सकती है। उत्पादित शकरकंद में गहरी नारंगी–भूरी त्वचा और नारंगी गूदा और व्यापक
 भंडारण जीवन होता है। कई फसल कीटों और रोगों के प्रति अपेक्षाकृत अच्छे प्रतिरोध के कारण यह किस्म आम तौर पर किसानों द्वारा पसंद की जाती है। हालाँकि, यह मिट्टी के सड़ने के प्रति संवेदनशील है।


इवांगेलिन :-
इसकी त्वचा हल्की गुलाबी और चमकीला नारंगी मांस है। पौधे रूट नॉट नेमाटोड के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी हैं, लेकिन स्क्लेरोटियल ब्लाइट और बैक्टीरियल
रूट रोट के प्रति संवेदनशील हैं। ये शकरकंद अच्छे से संग्रहित होते हैं, लेकिन
त्वचा का रंग थोड़ा फीका पड़ जाता है।


जॉर्जिया जेट :-
 यह किस्म ठंड प्रतिरोधी है, और पौधे तेजी से बढ़ते हैं शकरकंद में हल्की गुलाबी–बैंगनी त्वचा और नारंगी गूदा होता है। वे ऊपर उल्लिखित किस्मों की तुलना में
कम मीठे हैं लेकिन पकाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त हैं। इसके अलावा, पौधे अपेक्षाकृत अधिक पैदावार देते हैं | यह शौकिया किसानों द्वारा सबसे पसंदीदा किस्मों में से एक है।


ओ’हेनरी :-
ब्यूरगार्ड किस्म से उत्पन्न होता है। इस किस्म के शकरकंद का गूदा और त्वचा सफेदमलाईदार और मीठा, हल्का स्वाद वाला होता है। 20वीं सदी के अंत में यह अपनी उच्च पैदावार और भंडारण क्षमता के कारण काफी लोकप्रिय था। यह प्रकार पकाने और तलने के लिए बिल्कुल उपयुक्त है।

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Sweet Potato (शकरकंद)शकरकंद (Sweet Potato) वीटा कैरोटिन का समृद्ध स्रोत है, और इसे एंटीऑक्सीडेंट और अल्कोहल के रूप में भी उपयोग किया जाता है। यह एक बारामासी बेल है, जिसके लोंब या दिल के आकर वाले पत्ते होते है। भारत में लगभग 2 लाख हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है। बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा इसके प्रमुख उत्पादक राज्य है….Click HereHow to grow taro plant at home(घर पर अरबी का पौधा कैसे उगाएं)क्या आप जानते हैं, अरबी एक खाने योग्य कंद वाली सब्जी का पौधा है, जिसका उपयोग रसोई में किया जाता है, घुइंया, टैरो रुट (Taro roots), कोलोकेसिया (Colocasia) इत्यादि नामों वाला अरबी एक स्वादिष्ट सब्जी का बारहमासी पौधा है…Click Hereखुम्ब की खेतीसदियों से खुम्ब (मशरुम) ने मनुष्य को आकर्षित किया है। इनके रंग-बिरंगे, सुन्दर फलनकाय सहज ही हमारा ध्यान खींच लेते हैं। मशरुम एक प्रकार का मांशल कवक है जो अत्यंत स्वादिष्ट एवं पौष्टिक शुद्ध शाकाहार भोजन है। प्रकृति में पाये जाने वाले सभी खुम्ब खाने योग्य नहीं हैं, उनमें से कुछ विषैले भी होते हैं….Click Here
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How to grow taro plant at home(घर पर अरबी का पौधा कैसे उगाएं)

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  • घर पर अरबी का पौधा कैसे उगाएं
  • अरबी का पौधा क्या है ?
  • अरबी का पौधा कब लगाना चाहिए ?
  • अरबी का पौधा कहाँ लगाएं
  • अरबी का पौधा लगाने के लिए मिट्टी
  • अरबी का पौधा लगाने के लिए गमले या ग्रो बैग का साइज
  • गमले में अरबी कैसे उगाएं
  • कंद से अरबी लगाने की विधि
  • अरबी के पौधे की देखभाल
  • अरबी के पौधों के लिए तापमान
  • अरबी की कटाई

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घर पर अरबी का पौधा कैसे उगाएं

क्या आप जानते हैं अरबी एक खाने योग्य कंद वाली सब्जी का पौधा है जिसका उपयोग रसोई में किया जाता है घुइंया, टैरो रुट (Taro roots), कोलोकेसिया (Colocasia) इत्यादि नामों वाला अरबी एक स्वादिष्ट सब्जी का बारहमासी पौधा है जिसे आप अपने घर पर गमले में आसानी से उगा सकते हैं तथा इस पौधे की देखभाल करना भी बेहद आसान है, इस लेख में हम आपको घर पर अरबी कैसे उगाएं से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी देंगे, अरबी क्या है, होम गार्डन के गमले में अरबी का पौधा कैसे लगाएं (arbi ka paudha kaise lagaen), कंद से अरबी उगाने की विधि तथा इसकी देखभाल के तरीके इत्यादि जानने के लिए आर्टिकल को पूरा पढ़ें।

अरबी का पौधा क्या है ?

यह बारहमासी शाकाहारी पौधा है जिसका वैज्ञानिक नाम कोलोकेसिया एस्कुलेंटा (colocasia esculenta) है इसे घुइंया, टैरो रुट (Taro roots), कोलोकेसिया इत्यादि कई अन्य नामों से भी जाना जाता है अरबी का पौधा 3-4 फीट तक लम्बा तथा इसकी पत्तियां बड़ी होती हैं जो बिल्कुल हाथी के कान के समान दिखाई देती हैं अरबी एक प्रकार की सब्जी वाला पौधा है जिसकी जड़ें (कंद) तथा पत्तियां दोनों ही खाने योग्य होती हैं।

अरबी का पौधा कब लगाना चाहिए ?

गर्म और आर्द्र जलवायु होने पर अरबी के पौधे को किसी भी समय उगाया जा सकता है वसंत (फरवरी-अप्रैल) का मौसम अरबी लगाने के लिए बेस्ट समय होता है आप मध्य वसंत में अरबी का पौधा लगा सकते हैं जब मौसम तथा मिट्टी गर्म हो गई हों। अरबी को अच्छी तरह से विकसित होने के लिए आदर्श तापमान 20°C से 35°C के बीच होता है। 10°C से नीचे के तापमान में अरबी का पौधा नहीं पनपता है।

अरबी का पौधा कहाँ लगाएं

सूर्य प्रकाश की फिल्टर्ड धूप या आंशिक छाया में अरबी के पौधे अच्छी तरह पनपते हैं अगर आप इसे अपने घर के बगीचे में उगाना चाहते हैं तो किसी ऐसी जगह को चुनें जहाँ अरबी के पौधे को कम से कम 4-6 घंटे की धूप मिल सके। अगर आप अरबी के पौधे को इनडोर उगाना चाहते हैं तो किसी आंशिक धूप वाली खिड़की के पास पौधे को लगाना उचित होगा। बरसात के समय आप अरबी लगे हुए गमलों को ऐसे स्थान पर रखें, जहाँ उसे वर्षा का अधिक पानी प्राप्त हो सके।

अरबी का पौधा लगाने के लिए मिट्टी

गमले में अरबी का पौधा लगाने के लिए आप अच्छी गुणवत्ता वाली पॉटिंग सॉइल (Potting Soil) का चुनाव कर सकते हैं अगर आप बगीचे की मिट्टी का उपयोग कर रहें हैं तो सबसे पहले उसकी गुणवत्ता में सुधार करने के लिए 60% गार्डन की मिट्टी में 40% रेत तथा जैविक खाद को मिला सकते हैं टैरो रुट (अरबी) सब्जी का पौधा लगाने के लिए निम्न प्रकार की मिट्टी सबसे उपयोगी होती है :-
5.5-7.0 पीएच मान वाली अम्लीय मिट्टी
अच्छी जल निकासी व नमी वाली उपजाऊ मिट्टी
नोट – अरबी लगाने के लिए सबसे बेस्ट मिट्टी दोमट मिट्टी (रेत तथा मिट्टी का मिश्रण) है।

अरबी का पौधा लगाने के लिए गमले या ग्रो बैग का साइज

गमले में अरबी का पौधा उगाने के लिए बड़े आकार के गमले या ग्रो बैग की आवश्यकता होती है आप जितना बड़ा गमला उपयोग करते हैं उतने ही ज्यादा अरबी के पौधे लगा सकते हैं एक आयताकार बड़े गमले या ग्रो बैग में आप अरबी के 3 कंद लगा सकते हैं। गमले या ग्रो बैग में अतिरिक्त जल निकास के लिए तली में छिद्र होना सुनिश्चित करें।

गमले में अरबी कैसे उगाएं

गार्डन या गमले की मिट्टी में अरबी को मुख्य रूप से पौधे की शाखाओं, कंद, बीज या विभाजन के द्वारा उगाया जा सकता है इसके अतिरिक्त आप अपने नजदीक की नर्सरी से अरबी के पौधे खरीदकर भी अपने घर में लगा सकते हैं, लेकिन सामान्यतः कंद से अरबी को लगाना सबसे आसान व सरल विधि है।

कंद से अरबी लगाने की विधि

गमले या ग्रो बैग में अरबी के पौधे लगाने के लिए निम्न स्टेप्स फॉलो करें :-
अरबी लगाने के लिए बड़े आकार के गमले या ग्रो बैग को चुनें।
अब गमले में पॉटिंग मिश्रण या तैयार की हुई मिट्टी भरें तथा गमले को ऊपर से 2 इंच खाली रखें।
अब कंद को मिट्टी की सतह में लगभग 4 इंच गहराई पर लगाएं, ध्यान रखें कंद की जड़ें मिट्टी में नीचे की ओर होना चाहिए।
लगाए हुए टैरो रूट (कंद) को मिट्टी की पतली परत से ढंक दें।
अब कंद लगाए हुए गमले में ऊपरी सतह पर बजरी या कंकड़ पत्थर डाल दें, ताकि मिट्टी में जलभराव न हो और नमी बरकरार रहे।
ध्यान रखें अरबी कंद लगे हुए गमले को अंकुरण तक, छाया वाले स्थान पर रखें।
गमले की मिट्टी में लगातार नमीं बनाएँ रखें, लगभग 10-15 दिन में कंद से अंकुर निकलने लगेंगे।
अंकुरण के पश्चात गमले को किसी गर्म स्थान पर आंशिक धूप वाली जगह में रखें, ताकि अरबी के पौधों का विकास स्वस्थ व तेजी से हो।
ठण्ड के मौसम में अरबी के पौधों को घर के अन्दर उगाना चाहिए ताकि वे स्वस्थ रहें।
होम गार्डन या इनडोर गमले की मिट्टी में अरबी का पौधा लगाने के बाद उसके स्वस्थ विकास व तेज वृद्धि के लिए पौधों की उचित तरीके से देखभाल करने की जरूरत होती है, आइये जानते हैं अरबी के पौधे की सही ढंग से देखभाल करने के तरीकों के बारे में।

अरबी के पौधे की देखभाल

अच्छी वृद्धि व स्वस्थ तरीके से अरबी के पौधों को बड़ा करने के लिए निम्न तरीके से देखभाल की जानी चाहिए, जैसे:-


पानी :–

गमले में लगे हुए अरबी के पौधों को स्वस्थ व तेजी से बढ़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी की जरूरत होती है, क्योंकि ये पौधे नमी में उगना पसंद करते हैं। अरबी के कंद लगे हुए गमले की मिट्टी में लगातार नमी का स्तर कंद व पत्तियों को स्वादिष्ट बनाता है। अरबी के वयस्क पौधे सूखा प्रतिरोधी अर्थात कम पानी की स्थिति में उगने वाले होते हैं, लेकिन इसके युवा पौधों को अधिक पानी की आवश्यकता होती है, पर ध्यान रखें जरूरत से ज्यादा पानी देने पर अरबी के पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं। मिट्टी को हर समय नम रखना महत्वपूर्ण है।


धूप :–

स्वस्थ पत्तियों व जड़ों को विकसित करने के लिए अरबी के पौधों को अच्छी मात्रा में सूर्य-प्रकाश की आवश्यकता होती है, लेकिन अधिक धूप अरबी की कुछ किस्मों को नुकसान पहुंचा सकती है, ये पौधे फिल्टर्ड धूप या आंशिक छाया में अच्छी तरह पनपते हैं।


उर्वरक :–

अरबी के पौधे भारी फीडर होते हैं, इन पौधों को बेहतर तरीके से विकसित होने के लिए अच्छे पोषण की आवश्यकता होती है और अंकुरण के बाद से ही ये पोषक तत्वों को लेना शुरू कर देते हैं, अरबी के पौधों के स्वस्थ विकास व तेजी से बढ़ने के लिए पौधों को हर 3-4 सप्ताह में पोटेशियम युक्त उर्वरक देना चाहिए, इसके लिए आप कम्पोस्ट टी, चायपत्ती की खाद, समुद्री शैवालों से बना सीविड फर्टिलाइजर इत्यादि का उपयोग कर सकते हैं।


कीट संरक्षण :–

एफिड्स, रेड स्पाइडर माइट्स, टैरो बीटल, टैरो लीफ ब्लाइट और डाउनी मिल्ड्यू इत्यादि कीट अरबी के पौधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसीलिए इन कीटों से अरबी के पौधे को सुरक्षित रखने के लिए आपको प्रभावी कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए कीटनाशकों के रूप में आप नीम तेल, कीटनाशक साबुन या होममेड पेस्टीसाइड इत्यादि का इस्तेमाल कर सकते हैं

अरबी के पौधों के लिए तापमान

टैरो रुट या अरबी के पौधों को अच्छी तरह बढ़ने के लिए 20°C-35°C का तापमान सबसे आदर्श होता है इस तरह का तापमान होने पर ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं लेकिन इससे कम या अधिक तापमान होने पर आपको अपने पौधों को बचाने के लिए उचित प्रयास करने चाहिए अत्याधिक ठण्डे मौसम में अपने अरबी के पौधों को घर के अन्दर उगाना सही होता है इसके अतिरिक्त अधिक गर्म वातावरण से अरबी के पौधों को बचाने के लिए आप किसी छायादार कपड़े या  शेड नेट से पौधों को छाया दे सकते हैं।

अरबी की कटाई

अरबी लगाने के बाद पौधे मौसम के आधार पर 7-12 महीनों में पूर्ण परिपक्व हो जाते हैं। जब पत्तियाँ नीचे गिरने लगें तब आप अपने अरबी के कंदों को मिट्टी से बाहर निकाल लें। अगर आप अरबी को साग के रूप में उपयोग करना चाहते हैं तो अपनी जरुरत के अनुसार पत्तों को काट लें, कटाई के बाद नए पत्ते फिर निकलेंगे ऐसा कर आप कई बार पत्तियों की कटाई कर सकते हैं।
उपर्युक्त लेख में आप जान गये होंगे कि अरबी क्या है तथा रसोई में अरबी के उपयोग के लिए इसके कंद या पत्तियों की कटाई कैसे की जानी चाहिए,अरबी के पौधे को कंद से उगाने की विधि तथा इसकी देखभाल के तरीके अपनाकर आप भी अरबी के पौधे को अपने होम गार्डन में या इनडोर गमले में बड़ी ही आसानी से उगा सकते हैं साथ ही इस स्वादिष्ट सब्जी का उपयोग कर सकते हैं।

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पशुओं में एंथ्रेक्सएंथ्रेक्स एक गैर-संक्रामक ज़ूनोटिक रोग है जो बीजाणु बनाने वाले जीवाणु बैसिलस एन्थ्रेसिस के कारण होता है। एंथ्रेक्स मुख्य रूप से घरेलू और जंगली शाकाहारी जानवरों को प्रभावित करता है। अचानक मृत्यु की विशेषता वाली नैदानिक ​​विशेषताएं, प्राकृतिक छिद्रों से असंगठित रक्त के रिसाव के साथ, रक्तस्रावी बुखार के साथ अति तीव्र या तीव्र नैदानिक ​​लक्षणों की शुरुआत के साथ ओवरलैप होती हैं….Click Here अफारा रोग (Tympany)अफारा रोग पशुओं में आमतौर और अचानक होने वाली बीमारी है। यह रोग पशुओं में ज्यादा खाने या दूषित खाने के कारण होता है। इस रोग में पशु के पेट में एसिडिटी अमोनिया, कार्बनडाई ऑक्साइड, मीथेन जैसी दूषित गैस बन जाती हैं इससे पशु बेचैन हो कर बैठ जाता है या एक साइड लेट जाता है पैर पटकने लगता है….Click Here दूध का बुखारदुग्ध ज्वर तब उत्पन्न होता है जब गायें ब्याने के समय पर्याप्त कैल्शियम एकत्र करने में असमर्थ होती हैं। इस पृष्ठ का उद्देश्य डेयरी किसानों के लिए (उप)नैदानिक ​​दूध बुखार को नियंत्रित करने की चुनौती की बेहतर समझ प्रदान करना है। निदान और सलाह के लिए हमेशा अपने पशुचिकित्सक से परामर्श लें….Click Here
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घर पर परवल का पौधा कैसे उगाएं(How to grow Parwal plant at home)

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  • परवल के पौधे के अन्य नाम
  • परवल का पौधा उगाने सम्बंधित जानकारी
  • परवल प्लांट उगाने का सही समय क्या है?
  • परवल का पौधा उगाने के लिए आवश्यक सामग्री
  • घर पर परवल का पौधा उगाने के लिए गमला
  • परवल का पौधा उगाने के लिए मिट्टी
  • घर पर परवल का पौधा लगाने की विधियाँ
  • परवल के बीज लगाने की विधि
  • कटिंग से परवल का पौधा कैसे लगाएं
  • परवल की कटिंग लगाने की विधि
  • रूट सकर्स द्वारा परवल कैसे उगाएं
  • परवल के पौधे की देखभाल कैसे करें
  • बेल के लिए सहारा
  • कीट व रोग
  • परवल के फल कब और कैसे तोड़ें

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परवल (Pointer gaurd), जिसका वानस्पतिक नाम ट्राइकोसैंथेस डायोइका (Trichosanthes dioica) है, यह कुकुरबिटेसी परिवार (Cucurbitaceae) का बारहमासी पौधा हैं। पॉइंटेड लौकी या परवल एक उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय बेल वाली सब्जी का पौधा है, जिसे बढ़ने के लिए सहारे की आवश्यकता होती है। परमल, परवल, पॉइंटेड लौकी, परोरा, पोटोल आदि कई नामों वाली यह सब्जी, पोषकतत्वों और खनिजों से भरपूर होने के कारण और ताज़ा तथा स्वादिष्ट खाने के लिए लोग इसे अपने घरों में उगाना पसंद करते हैं। यदि आप भी इस सब्जी को अपने घर या गार्डन में उगाना चाहते हैं, तो  इस आर्टिकल में आप जानेंगे, कि घर पर कटिंग से या बीज से परवल कैसे उगाएं, परमल की बेल को उगाने का सही समय और परवल के पौधे की देखभाल कैसे करें? घर पर परवल के पौधे उगाने की जानकारी पाने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें।

परवल के पौधे के अन्य नाम

बेल वाली सब्जी परवल को पोटोल (Potol), परोरा (Parora), परमल, Kambupudalai आदि नामों से भी जाना जाता है।

परवल का पौधा उगाने सम्बंधित जानकारी

  • वानस्पतिक नाम – ट्राइकोसैंथेस डायोइका (Trichosanthes dioica)
  • फैमिली – कुकुरबिटेसी परिवार (Cucurbitaceae)
  • बीज लगाने का समय – फरवरी से सितंबर तापमान – 20-35 डिग्री सेल्सियस
  • मिट्टी – 5 से 6.7 ph वाली पॉट साइज़ – 15 इंच की लम्बाई और चौड़ाई वाला पॉट
  • सूर्य का प्रकाश – पूर्ण सूर्य प्रकाश
  • पौधे का प्रकार – बेल वाला बारहमासी पौधा
  • हार्वेस्टिंग टाइम – कटिंग से लगाने पर 4-5 महीने और बीज से उगाने पर 5 महीने से अधिक का समय

परवल प्लांट उगाने का सही समय क्या है?

यदि आप जानना चाहते हैं, परवल कब लगाएं? तो हम आपको बता दें, कि परवल एक मध्यम गर्म और आर्द्र जलवायु वाला पौधा है, जो कि ठंडे तापमान में ग्रो नहीं कर पाता है। परवल के पौधे के बीज वसंत से गर्मी के मौसम अर्थात फरवरी-जुलाई के महीने के बीच लगाने का समय सबसे अच्छा होता है। आप परवल की कटिंग को फरवरी से सितंबर माह के बीच किसी भी समय अपने होम गार्डन में लगा सकते हैं।

परवल का पौधा उगाने के लिए आवश्यक सामग्री

घर पर परवल का पौधा उगाने के लिए आपको निम्न चीजों के आवश्यकता होगी:-

  • परवल के बीज या परवल के पौधे की कटिंग
  • सीडलिंग ट्रे या स्माल पॉट
  • ग्रो बैग
  • पॉटिंग मिक्स
  • वॉटर कैन
  • जैविक खाद या गोबर की खाद
  • बागवानी उपकरण

घर पर परवल का पौधा उगाने के लिए गमला

पॉइंटेड लौकी या परवल का पौधा बेल के रूप में बढ़ता है, इसलिए इस पौधे की लम्बाई अधिक होती है। घर पर इस पौधे को उगाने के लिए आपको एक ऐसे पॉट या ग्रो बैग की आवश्यकता होगी, जो पौधे को ठीक तरह सहारा दे सके। परवल के पौधे पर्याप्त जल निकासी वाले, 15 इंच चौड़ाई और गहराई वाले पॉट या ग्रो बैग में अच्छी तरह से उग सकते हैं।

इस वेजिटेबल प्लांट को उगाने के लिए आप निम्न साइज़ के ग्रो बैग चुन सकते हैं;-

  • 15 x 15 इंच (W x H)
  • 18 x 15 इंच (W x H)
  • 18 x 15 इंच (W x H)
  • 24 x 15 इंच (W x H)
  • 30 x 15 इंच (W x H)

परवल का पौधा उगाने के लिए मिट्टी

परोरा सब्जी प्लांट या परवल की बेल को उगाने के लिए अधिक उपजाऊ, खादयुक्त रेतीली दोमट मिट्टी, जिसका पीएच स्तर 5.5 से 6.7 ph के बीच हो सबसे अच्छी होती है। यदि आप पॉट या कंटेनर में परवल के पौधे उगा रहे हैं तो अच्छी जल निकासी वाली कार्बनिक पदार्थों से युक्त ढीली मिट्टी का उपयोग करें।

घर पर परवल का पौधा लगाने की विधियाँ

परवल के पौधे उगाने की प्रमुख विधियाँ निम्न है:-

  • बीज द्वारा
  • कटिंग द्वारा
  • रूट सकर्स द्वारा

परवल के बीज लगाने की विधि

यदि आप घर पर बीज से परवल का पौधा उगाना चाहते हैं तो हम आपको बतायेंगे कि परवल के पौधे को बीज से कैसे उगाएं गमले में परवल के बीज लगाने की विधि निम्न है:-

  • सबसे पहले परवल की अच्छी किस्म के बीजों को चुनें।
  • अब चुनें हुए गमले को कार्बनिक पदार्थों से युक्त मिट्टी से भरें, मिट्टी भरते समय ध्यान रहे कि गमला ऊपर से 3-4 इंच खाली हो।
  • गमले के बीचों बीच परवल के बीजों को 1 इंच की गहराई पर बोयें।
  • बीज लगाने के बाद गमले में वॉटर पंप या वॉटरिंग कैन की मदद से पानी डालें।
  • बीज लगे हुए गमले को धूप वाले स्थान पर रखें।
  • परवल के बीज को अंकुरित होने के लिए कम से कम 20 डिग्री सेल्सियस या इससे अधिक  तापमान की आवश्यकता होती है, उचित तापमान मिलने पर 10-14 दिनों में  बीज अंकुरित हो जायेगा।
  • बीज अंकुरण के पश्चात जब पौधे 4-6 बड़े हो जाएँ, तब इन परवल के पौधों को एक दूसरे के बीज लगभग 50 सेमी की दूरी बनाते हुए प्रत्यारोपण कर दें। ध्यान रहे परवल के पौधे अधिक फैलते हैं, इसलिए पौधों को अधिक दूर-दूर लगाएं और बेल को बढ़ने के लिए सहारा दें।

कटिंग से परवल का पौधा कैसे लगाएं

परवल के पौधे को कटिंग से उगाना काफी आसान होता है। इस विधि में सबसे पहले नर्सरी से या 1-2 साल पुराने परवल के पौधे की कटिंग प्राप्त करके उसे किसी पॉट या गमले में लगाया जाता है।

परवल की कटिंग लगाने की विधि

होम गार्डन में परवल के पौधे को कटिंग से उगाने की विधि निम्न प्रकार है :-

  • सबसे पहले कम से कम 1 साल पुरानी परमल की परिपक्व बेल से 1-2 फीट की कटिंग काट लें या फिर नर्सरी से कटिंग प्राप्त करें।
  • कटिंग लेते समय यह सुनिश्चित करें कि कटिंग में कम से कम 8-10 लीफ नोड हों।
  • परवल की कटिंग के निचले हिस्से से पत्तियों को हटा दें।
  • अब चुने हुए गमले या पॉट में पॉटिंग मिक्स या तैयार की हुई मिट्टी भरें।
  • कटिंग लगाने से पहले यह सुनिश्चित करें, कि मिट्टी नमी युक्त हो।
  • गमले के बीचों बीच कटिंग की 3-4 नोड को मिट्टी के अन्दर लगभग 2 इंच गहरा दबाएँ। या गमले में कटिंग हो रखकर, ऊपर से 2 इंच मिट्टी से ढक दें।
  • इसके बाद गमले में वाटर पंप की मदद से पानी डालें।
  • कटिंग लगे हुए गमले को धूप वाले स्थान पर रखें।
  • लगभग 1-2 सप्ताह में आपकी कटिंग में जड़ें विकसित हो जायेंगी, और परवल की बेल बढ़ने लगेगी।

रूट सकर्स द्वारा परवल कैसे उगाएं

परवल के पौधे में रूट सकर्स पाए जाते हैं जिनके द्वारा भी इस बेल वाले पौधे को लगाया जा सकता है। इस विधि से परवल के पौधे को लगाने के लिए शुरूआती वसंत के समय पुराने पौधे से रूट सकर्स को खोदकर मिट्टी से बाहर निकालें फिर उसे किसी गमले या ग्रो बैग में लगाएं और पर्याप्त पानी देकर उस पौधे की देखभाल करें।

परवल के पौधे की देखभाल कैसे करें

यदि आपने घर पर बेल वाले परवल के पौधे को उगाया है तो उस बेल को पूरी तरह विकसित होने और उसमें फल लगने के लिए आपको उसकी देखभाल करनी होगी। परवल के पौधे की देखभाल करने के तरीके निम्न हैं:-

  1. पानी :–परवल के पौधे को गर्मियों और शुष्क मौसम के दौरान नियमित रूप से पानी दें। हालांकि यह पौधा कुछ हद तक सूखे को भी सहन कर सकता है। सर्दियों के मौसम में परवल के पौधे को पानी की आवश्यकता कम होती है लेकिन जब पौधे में फूल और फल आने लगे तो मिट्टी को हर दूसरे दिन पानी दें। परवल के पौधे की मिट्टी को समान रूप से नम बनाएं रखें लेकिन मिट्टी में जलभराव न होने दें।
  2. सूर्य का प्रकाश :–  परवल मध्यम गर्म और शुष्क वातावरण वाला पौधा है जो पूर्ण सूर्य के प्रकाश में तेजी से बढ़ता है हालांकि यह पौधा आंशिक छाया में भी वृद्धि कर सकता हैं लेकिन उस स्थिति में पौधे पर फल नहीं लगते। परवल के पौधे की अच्छी वृद्धि और अधिक फल-फूल लाने के लिए 5-6 घंटे की धूप आवश्यक होती है।
  3. तापमान :–परवल का पौधा उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण जलवायु को पसंद करता है। इस पौधे को अच्छी तरह से बढ़ने और अधिक मात्रा में फल लगने के लिए सबसे उपयुक्त तापमान 20-35 डिग्री सेल्सियस है। परवल का पौधा कम या ठंडे तापमान को सहन नहीं कर पाता है, इसलिए ठण्ड के समय इस बेल वाले पौधे की प्रूनिंग की जानी चाहिए, जिससे पौधा ठण्ड के बाद दोबारा वृद्धि कर पाए।
  4. उर्वरक :–परवल का पौधा लगाते समय मिट्टी में गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट मिलाएं यदि परमल के पौधे में अच्छी तरह से वृद्धि नहीं हो रही है या आपका पौधा कमजोर है तो आप इस पौधे की मिट्टी में नियमित समयांतरल से जैविक खाद डाल सकते हैं जिससे पौधे में अधिक फल भी लगेंगे। परवल के पौधे फूल आने और अधिक फल लगने के लिए आप पोटाश, बोनमील, मस्टर्ड केक जैसे फास्फोरस रिच ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर डाल सकते हैं।

बेल के लिए सहारा

परवल का पौधा बेल के रूप में विकसित होता है और इस पौधे को जमीन से उचित ऊंचाई पर रखने के लिए किसी सहारे की आवश्यकता होती है क्योंकि यदि पत्तियां मिट्टी को स्पर्श करेंगीं तो पौधे में फंगस या कवक जैसे संक्रमण रोग हो सकते हैं इसलिए इस पौधे को अच्छी तरह बढ़ने के लिए रस्सी, क्रीपर नेट, ट्रेली या बांस का सहारा लेना होता है।

कीट व रोग

दो सबसे प्रमुख कीट जो परवल के पौधे को प्रभावित करते हैं :-

  • ब्लिस्टर बीटल (Blister Beetle)
  • रेड बिटर बीटल (Red Bitter Beetle)

परवल के पौधे में होने वाले रोग :-

  • डाउनी मिल्ड्यू (Downy Mildew)
  • मोज़ेक वायरस (Mosaic Virus)
  • रूट-नॉट निमेटोड (Root-Knot Nematode)
  • फ्रूट रॉट (Fruit Rot)

इन कीटों और रोगों से छुटकारा पाने के लिए, परवल के पौधे पर जैविक कीटनाशक तेल या नीम के तेल का छिड़काव करें और पौधे की नियमित रूप से जाँच करें। पानी देते समय परवल के पौधे को गीला न करें।

परवल के फल कब और कैसे तोड़ें

यदि आपने परवल का पौधा कटिंग से लगाया है तो इस पौधे में फल लगने में लगभग 3 से 4 महीने अर्थात 90-120 दिनों का समय लग सकता है और यदि आपने बीज से परवल का पौधा उगाया है तो इस पौधे में फल लगने में 5 महीने से भी अधिक समय लग सकता है। यदि आपने वसंत के मौसम अर्थात फरवरी के महीने में इस पौधे को लगाया है तो मई-जून के समय आप इस पौधे से परमल के फलों की हार्वेस्टिंग कर सकते हैं। परवल मध्यम गर्म तापमान वाला पौधा है, जिसमें बरसात के मौसम में अधिक फल आते हैं। परवल के फल को पूरी तरह पकने से पहले काट लें अन्यथा उनका स्वाद खराब हो सकता है।

परवल के पौधे में सफेद धारियों वाले 2-4 इंच छोटे या लंबे हरे फल होते हैं जो मोटे या गोल होते हैं और जाली पर उगते हैं। हार्वेस्टिंग के बाद परवल के फल ज्यादा देर तक न रखें नहीं तो खराब हो सकते हैं। आप इन्हें फ्रिज में 2-3 दिन तक स्टोर करके रख सकते हैं।

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