Bamboo

 

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बुनियादी जानकारी

जैसे आप जानते है बांस एक घासवर्गीय पौधा हैं, अंग्रेजी का ‘बम्बू’ शब्द भारतीय शब्द ‘मंबु’ या ‘बम्बु’ से उत्पन्न हुआ है। बाँस बहुत तेजी से बढ सकते है। कुछ प्रजातियों में तो यह एक दिन में 1 मीटर तक बढ जाता है। बाँस का सबसे उपयोगी भाग तना है। तनों की लंबाई 30 से 150 फुट तक एवं चौड़ाई 1/4 इंच से लेकर एक फुट तक होती है। बांस का उपयोग बल्ली, सीढ़ी, टोकरी,चटाई, बांस से बनी बोतल, फर्नीचर, खिलौने, कृषि यंत्र बनाने सहित अन्य साज-सज्जा का समान बनने के लिए किया जाता है। इसके अलावा कागज बनाने में इसका उपयोग होता है। अब तो घरों को आधुनिक लुक देने में भी बांस का प्रयोग किया जाने लगा है। इसके अलावा कहीं-कहीं इसकी खाने योग्य प्रजातियों से अचार भी बनाया जाता है। यह भारत मे सभी स्थानों मे पाए जाते है उडि़सा, कर्नाटक, तामिलनाडु, महाराट्र, केरल, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार तथा उतरी पश्चिमी राज्यों मे पाए जाते हैं।

बीज विशिष्टता

किस्मों का चयन-
बांस की लगभग 136 प्रजातियां होती हैं, जिसमें अलग-अलग काम के लिए कई बांस की किस्मों का उपयोग किया जाता है, इसमें लगभग 10 किस्म का उपयोग सबसे ज्यादा होता है। आपको यह देखकर प्रजाति का चुनाव करना होगा कि आप किस काम के लिए बांस की खेती करना चाहते हैं। अगर फर्नीचर के लिए बांस की खेती कर रहे हैं, तो इससे संबंधित प्रजाति का चुनाव करें।

बुवाई का समय

बांस की खेती के लिए पौधों की रोपाई का समय जुलाई महीने में होती है तीन महीने में ही बांस का पौधा प्रगति शुरू कर देता है । समय समय पर बांस के पौधे की काट छांट करनी चाहिए । बांस का पौधा तीन-चार साल में तैयार हो जाता है बांस के पौधे की कटाई छटाई अक्टूबर से दिसंबर तक की जा सकती है ।

दुरी

बांस का पौधा 3 से 4 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है।

बुवाई का तरीका

बीजों के माध्यम से नर्सरी तैयार करना तथा प्रकंदो द्वारा बुवाई की जाती हैं।

बीज की मात्रा

किसान एक हेक्टेयर में जरूरत और प्रजाति के हिसाब से लगभग 1500 से 2500 पौधे लगा सकते हैं।

भूमि की तैयारी एवं मृदा स्वास्थ्य

अनुकूल जलवायु –
बांस के पौधे विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता हैं। इसकी खेती को शुष्क जलवायु उपयुक्त होती हैं।
भूमि का चयन –बांस की खेती के लिए अच्छे जलनिकासी वाली बलुई मिट्टी उपयुक्त होती हैं, वैसे तो बांस की खेती कई प्रकार की मिट्टी में की जा सकती हैं।
खेत की तैयारी –
बांस की खेती के लिए रोपाई से पहले खेत को अच्छी तरह जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा और समतल कर देना चाहिए। उचित जलनिकास की व्यवस्था करनी चाहिए और खेत को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। उसके पश्चात खेत में आवश्यकतानुसार उचित आकार के गड्ढो की खुदाई करना चाहिए।

फसल स्प्रे और उर्वरक विशिष्टता

खाद एवं रासायनिक उर्वरक –
बांस के पौधे को बढ़वार के लिए विशेष पोषक तत्वों की आवश्यकता नहीं होती हैं। फिर भी उचित बढ़वार हेतु वर्मीकम्पोस्ट या गोबर की खाद खेत तैयारी के समय मिट्टी में मिला सकते हैं।

निराई एवं सिंचाई

खरपतवार नियंत्रण –
खरपतवार की रोकथाम के लिए समय समय पर आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करें।
सिंचाई –
पौधों की जल्दी बढ़वार के लिए सिंचाई आवश्यक होती हैं। पौधों की रोपाई के तुरंत बाद पानी की आवश्यकता होती हैं। भूमि में नमी के अभाव में इनकी वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।

कटाई एवं भंडारण

अंतर्वर्गीय फसल –
बांस का पौधा तीन-चार मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इसलिए इसके बीच की जगह पर अन्य फसल की खेती की जा सकती है। इससे किसान को अतिरिक्त आदमनी होगी। इसकी पत्तियों को चारे के रूप में पशुओं के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।
फसल की कटाई –
बांस की खेती 3 से 4 साल में तैयार हो जाती है। इसके चौथे साल में कटाई शुरू कर देनी चाहिए।


बांस की खेती के लिए सब्सिडी –

बांस की खेती के लिए सरकार की ओर से सरकारी नर्सरी से फ्री में पौधा उपलब्ध कराया जाएगा।
तीन साल में औसतन 240 रुपए प्रति प्लांट की लागत आएगी। इसमें से 120 रुपए प्रति प्लांट सरकार की ओर से दिए जाएंगे।
नार्थ ईस्ट को छोडक़र अन्य क्षेत्रों में इसकी खेती के लिए 50 फीसदी सरकार और 50 फीसदी किसान लगाएगा। 50 फीसदी सरकारी शेयर में 60 फीसदी केंद्र और 40 फीसदी राज्य की हिस्सेदारी होगी।
नार्थ ईस्ट में 60 फीसदी सरकार और 40 फीसदी किसान लगाएगा। 60 फीसदी सरकारी पैसे में 90 फीसदी केंद्र और 10 फीसदी राज्य सरकार का शेयर होगा।
बांस की खेती से फायदा –यदि आप एक हेक्टेयर में 1500 से 2500 पौधे लगाते हैं और इन पौधों के बीच अन्य फसल की उगाते हैं तो आपको 4 साल बाद करीब 3 लाख रुपए तक की कमाई होने लगेगी। बांस की खेती में खास बात यह है कि इसकी पौध करीब 40 साल तक चलती है इसे बार-बार लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे एक बार लगाने पर यह आपको कई सालों तक कमाई दे सकता है। इसके अलावा दूसरी फसलों के साथ खेत की मेड़ पर 4 गुणा 4 मीटर पर यदि आप बांस लगाते हैं तो एक हेक्टेयर में चौथे साल से करीब 30 हजार रुपए की कमाई होने लगेगी।

एक बार लगाएं 40 साल तक कमाएं

बांस की खेती करीब 40 साल तक बांस देती रहती है । सरकार की तरफ से इस फसल के लिए सब्सिडी भी दी जाती है । बांस की खेती के लिए खास मिट्टी की जरूरत नहीं होती जहां घास, वहां बांस हो सकता है किसान चाहे तो खेत की मेढ़ पर भी बांस लगा सकते हैं  इससे खेत का तापमान भी कम बना रहता है । जानवरों से भी खेत की सुरक्षा की जा सकती है । एक बार बांस की खेती पर पैसे लगाएं और पूरी जिंदगी कमाई करते रहें ।

बांस की खेती पर सब्सिडी

बांस की खेती पर किसानों को सरकार प्रति पौधा 120 रुपये की सहायता दी जाती है ।  3 साल में बांस के 1 पौधे की लागत 240 रुपये आती है यानी सरकार बांस की खेती (Bamboo Farming) में सब्सिडी के रूप में किसानों को आधी रकम दे रही है बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए भारत में राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) चलाया जा रहा है  साथ ही बांस की खेती के लिए सरकार की तरफ से 50% आर्थिक मदद भी जाती है । अधिक जानकारी के लिए अपने जिले के नजदीकी कृषि विभाग के कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं या राष्ट्रीय बांस मिशन का ऑफिशियल वेबसाइट https://nbm.nic.in/ को भी विजिट कर सकते हैं । एक अनुमान के मुताबिक बांस की खेती के लिए 1 पौधा 240 रुपये का मिलता है, जिस पर सरकार से 120 रुपये प्रति पौधा सब्सिडी मिल जाती है ।

इन राज्यों में करें बांस की खेती

बांस की खेती करने के लिए सबसे पहले ये जान लें कि बांस की खेती के साथ दूसरी कोई फसल नहीं लगाई जा सकती यानी अगले 40 साल तक आपको उस एरिया से सिर्फ बांस का उत्पादन ही मिलेगा इसलिए कितनी जमीन पर बांस के पौधे लगाना चाहते हैं ये निर्धारित कर लें । एक्सपर्ट्स की मानें तो एक हेक्टेयर में बांस की खेती करने के लिए 1500 पौधों की रोपाई कर सकते हैं, जो अगले 3 साल में तैयार हो जाती है हालांकि बांस की हार्वेस्टिंग पूरी तरह से किसान के ऊपर निर्भर करती है ।
किसान बाजार भाव जानकर या अपनी आवश्यकतानुसार बांस की हार्वेटिंग जल्दी या कुछ सालों बाद भी ले सकते हैं । ये फसल खराब नहीं होती और समय के साथ इसकी क्वालिटी भी मजबूत हो जाती है । भारत में बांस की खेती के लिए मध्य प्रदेश, असम, कर्नाटक, नगालैंड, त्रिपुरा, उड़ीसा, गुजरात, उत्तराखंड व महाराष्ट्र आदि राज्यों में मिट्टी और जलवायु सबसे अनुकूल रहते हैं ।

OFFICIAL WEBSITE

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Watercress

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  • वॉटरक्रेस कैसे उगाएं
  • जलकुंभी की किस्में
  • जलकुम्भी बोना
  • जलकुम्भी का रोपण
  • रोपण के स्थान और उद्यान के प्रकार
  • जलकुम्भी की देखभाल कैसे करें
  • फसल की कटाई

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वॉटरक्रेस एक स्वादिष्ट सलाद फसल है, जो खनिजों और पोषक तत्वों से भरपूर है, और इसका स्वाद तीखा, चटपटा, थोड़ा तीखा होता है। इसे अकेले खाया जा सकता है, या अन्य सलाद सामग्री के साथ मिलाया जा सकता है, और एक स्वादिष्ट ठंडा सूप बनाया जा सकता है।

यह एक बारहमासी जलीय जड़ी बूटी या सलाद है, जो धीमी गति से बहते पानी के साथ प्राकृतिक रूप से उगता हुआ पाया जाता है। लेकिन, यदि आप इसे घर पर उगाना चाहते हैं, तो आपको अपनी स्वयं की धारा या इसी तरह के बहते पानी को स्थापित करने की आवश्यकता नहीं है! वॉटरक्रेस को किसी कंटेनर में या स्थायी रूप से गीली रहने वाली मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है।

वॉटरक्रेस कैसे उगाएं

वॉटरक्रेस हल्की छाया में रहना पसंद करता है लेकिन धूप वाली जगह पर अच्छी तरह से विकसित होगा बशर्ते मिट्टी या खाद गीली हो इसे पूरे वर्ष नम बनाए रखने की आवश्यकता होती है इसलिए यह नम या गीली मिट्टी या पानी से भरे गहरे तश्तरी में रखे कंटेनर में अच्छी तरह से बढ़ता है।

जलकुंभी को रसोई की चमकदार रोशनी वाली खिड़की पर रखे छोटे गमलों में भी उगाया जा सकता है ताकि ताज़ी पत्तियाँ आसानी से हाथ में आ सकें। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि आपके पास पूरे वर्ष पौधे उपलब्ध रहेंगे।

जलकुंभी की किस्में

वॉटरक्रेस की किस्में हमेशा उपलब्ध नहीं होती हैं लेकिन कई बीज कंपनियां वॉटरक्रेस के बीज की आपूर्ति करती हैं।

जलकुम्भी बोना

वसंत ऋतु में जब मिट्टी गर्म हो जाए तो खुले में बीज बोएं न्यूनतम तापमान 8°C (46°F) या बीजों को सीधे उन कंटेनरों में बोया जा सकता है जहां आप उन्हें उगाना चाहते हैं।

वर्ष की शुरुआत में पौधे लगाना शुरू करने के लिए जनवरी के मध्य से मार्च के अंत तक नम बीज बोने वाली खाद के गमलों या ट्रे में बीज बोएं। किसी प्रोपेगेटर या प्लास्टिक बैग से ढके गर्म स्थान पर रखें और 8-15°C (46-60°F) के स्थिर तापमान पर रखें।

जब पौधे संभालने लायक बड़े हो जाएं तो उन्हें 7.5-9 सेमी (3-3.5 इंच) के गमलों में रोपें।

उन्हें 10-14 दिनों के लिए धीरे-धीरे बाहरी परिस्थितियों में ढालकर सख्त करें और ठंढ के जोखिम के बाद 10-15 सेमी (4-6 इंच) की दूरी पर रोपें।

जलकुम्भी का रोपण

चूंकि वॉटरक्रेस पौधों को स्थायी रूप से नम मिट्टी की आवश्यकता होती है इसलिए सुनिश्चित करें कि आप भारी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ जैसे कि बगीचे की खाद या रोपण खाद खोदें और रोपण से पहले इसे मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दें।

रोपण छेद में रखें और गहराई को समायोजित करें ताकि इसे उसी गहराई पर लगाया जाए जैसा कि यह मूल रूप से बढ़ रहा था और रूटबॉल का शीर्ष मिट्टी की सतह के साथ समतल हो। खोदी गई मिट्टी में अधिक कार्बनिक पदार्थ मिलाएं और रोपण छेद भरें। अच्छी तरह से पानी डालें । एक कंटेनर में उगाने के लिए, 30 सेमी (12 इंच) के टब या गमले में 3-4 पौधे लगाएं।

आप किसी सुपरमार्केट या दुकान से वॉटरक्रेस भी खरीद सकते हैं। कोशिश करें और ऐसे पौधे खरीदें जिनमें पहले से ही छोटी सफेद जड़ें निकलनी शुरू हो गई हों और उन्हें छोटे गमलों में लगाएं। यदि आपके पास बिना जड़ों वाले कुछ पौधे हैं तो तनों को पानी से भरे जैम जार या बोतल में तब तक रखें जब तक जड़ें न बनना शुरू हो जाएं। फिर उन्हें पॉट कर दें ।

रोपण के स्थान और उद्यान के प्रकार

आँगन, कंटेनर, जल उद्यान, दलदल उद्यान।

जलकुम्भी की देखभाल कैसे करें

पौधों को अच्छी तरह से पानी देते रहें ताकि मिट्टी या खाद कभी न सूखे। यदि किसी कंटेनर में उगा रहे हैं तो उसके नीचे एक तश्तरी रखें और उसमें हमेशा पानी भरकर रखें समय-समय पर विशेष रूप से गर्म मौसम में तश्तरी से पानी हटा दें और खाद को स्थिर होने से बचाने के लिए उसे ताजे पानी से धो दें फिर तश्तरी बदलें और ऊपर से पानी डालें।

पूरे गर्मियों में संतुलित पौधों के भोजन के साथ मासिक तरल आहार पौधों को अच्छी तरह से विकसित करेगा और चुनने के लिए बहुत सारी पत्तियाँ पैदा करेगा।
पौधों की अच्छी पैदावार बनाए रखने के लिए जैसे ही फूल दिखें उन्हें हटा दें।

फसल की कटाई

जब पौधे अच्छी तरह से विकसित हो जाएं तो कटाई शुरू करें और कैंची से टहनियों के ऊपरी हिस्से को काट दें। यह सुनिश्चित करने के लिए कि तने से ढेर सारी नई वृद्धि और पार्श्व अंकुर निकलें, पौधे को बहुत नीचे तक न काटें।

फूलों का मौसम गर्मी
पत्ते का मौसम वसंत गर्मियां शरद ऋतु सर्दियां
सूरज की रोशनी आंशिक छाया, पूर्ण सूर्य
मिट्टी के प्रकार खड़ियामय, चिकनी मिट्टी, दोमट, बलुई
मिट्टी का पी.एच तटस्थ
मिट्टी की नमी ख़राब ढंग से सूखा हुआ
परम ऊंचाई 15 सेमी (6 इंच) तक
परम प्रसार 15 सेमी (6 इंच) तक
चरम ऊंचाई का समय 3-4 महीने

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Fennelमसाला फसलों में सौंफ का अपना विशिष्ट स्थान है। ये अपनी खुशबू के कारण लोकप्रिय होने के साथ ही औषधी के रूप में भी पहचानी जाती है। इसका सब्जियों में प्रयोग होने के साथ ही आचार बनाने में भी किया जाता है। यदि इसके औषधीय महत्व की बात करें तो इसे कई रोगों में दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है…Click HereBambooबांस का उपयोग बल्ली, सीढ़ी, टोकरी,चटाई टोकरी, बांस से बनी बोतल, फर्नीचर, खिलौने, कृषि यंत्र बनाने सहित अन्य साज-सज्जा का समान बनने के लिए किया जाता है। इसके अलावा कागज बनाने में इसका उपयोग होता है। अब तो घरों को आधुनिक लुक देने में भी बांस का प्रयोग किया जाने लगा है…Click Here Watercressवॉटरक्रेस एक स्वादिष्ट सलाद फसल है, जो खनिजों और पोषक तत्वों से भरपूर है, और इसका स्वाद तीखा, चटपटा, थोड़ा तीखा होता है। इसे अकेले खाया जा सकता है, या अन्य सलाद सामग्री के साथ मिलाया जा सकता है, और एक स्वादिष्ट ठंडा सूप बनाया जा सकता है…Click Here
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Jimikand or Suran or Elephant yam

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  • जिमीकंद की खेती (Elephant Foot Yam Farming) से सम्बंधित जानकारी
  • जिमीकंद की खेती के लिए उपयुक्त मिटटी, जलवायु और तापमान (Yam Cultivation Suitable Soil, Climate and Temperature)
  • जिमीकंद की उन्नत किस्मे
  • सूरन की खेती की तैयारी और उवर्रक की मात्रा (Yam Field Preparation and Fertilizer)
  • जिमीकंद के बीजो की रोपाई और सिंचाई (Yam Seeds Sowing and Irrigation)
  • जिमीकंद के खेतो में खरपतवार नियंत्रण (Jimikand Fields Weed Control)
  • जिमीकंद के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Yam Plants Diseases and their Prevention)
  • जिमीकंद के कंदों की खुदाई, पैदावार और लाभ (Yam Tubers Digging, Yield and Benefits)

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जिमीकंद की खेती (Elephant Foot Yam Farming) से सम्बंधित जानकारी

जिमीकंद को एक औषधीय फसल के रूप में उगाया जाता है, किन्तु इसका इस्तेमाल हमारे घरो में सब्जियों के रूप में भी होता है।  इसे ओल और सूरन के नाम से भी जाना जाता है । जिमीकंद की तासीर अधिक गर्म होती है, जिस वजह से इसका सेवन करने से खुलजी की शिकायत सुनने को मिलती है किन्तु वर्तमान समय में जिमीकंद की कुछ ऐसी उन्नत किस्मे आ गई है जिन्हे खाने से किसी तरह की खुजली नहीं होती है । इसके फल कंद के रूप में भूमि के अंदर ही विकास करते है ।

जिमीकंद के फलो में कैल्शियम, खनिज, फास्फोरस, कार्बोहाइड्रेट जैसे कई प्रमुख तत्व पाए जाते है जिस वजह से इसे खाने के अलावा आयुर्वेदिक दवाओं में भी इस्तेमाल किया जाता है । जिमीकंद को बवासीर, दमा, उबकाई, फेफड़ो की सूजन, पेचिस और पेट दर्द जैसी कई बीमारियों से राहत पाने के लिए उपयोग में लाया जाता है । आज के समय में जिमीकंद को व्यापारिक रूप में अधिक उगाया जा रहा है । यदि आप भी जिमीकंद की खेती कर अच्छा लाभ कमाना चाहते है, तो यहाँ आपको जिमीकंद की खेती कैसे होती है (Elephant Foot Yam Farming in Hindi) सूरन की खेती को करने की जानकारी से अवगत कराया गया है ।

जिमीकंद की खेती के लिए उपयुक्त मिटटी, जलवायु और तापमान (Yam Cultivation Suitable Soil, Climate and Temperature)

जिमीकंद की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी को उचित माना जाता है इस तरह की मिट्टी में इसके पौधे अच्छे से विकास करते है किन्तु जल-भराव वाली भूमि में इसकी खेती को नहीं करना चाहिए क्योकि जलभराव की स्थिति में इसके पौधे अच्छे से विकास नहीं कर पाते है । इसकी खेती में 6-7 P.H. मान वाली भूमि की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त जिमीकंद के पौधे उष्ण और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में अच्छे से वृद्धि करते है किन्तु इसकी फसल को बारिश के मौसम में नहीं उगाना चाहिए ।

इसके पौधे गर्मी और सर्दी के मौसम में अच्छे से विकास करते है तथा इसके पौधों के बीज के अच्छे अंकुरण के लिए 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है । इसके बाद पौधा जैसे-जैसे विकास करता है वैसे-वैसे इसे सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है । यह अधिकतम 35 डिग्री के तापमान को सहन कर सकता है ।

जिमीकंद की उन्नत किस्मे

  1. गजेन्द्र किस्म के पौधे :-इस किस्म को कृषि विज्ञान केंद्र संबलपुर द्वारा तैयार किया गया है । इसके पौधों में कम गर्मी वाले फल लगते है जिन्हे खाने से शरीर में खुजली नहीं होती है । पौधों की इस किस्म को बारिश के मौसम में नहीं उगाया जाता है । इसमें एक पौधे में केवल एक ही फल निकलता है तथा फल के अंदर हल्का नारंगी रंग का गूदा पाया जाता है । यह प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 80 टन की पैदावार देता है ।
  2. एम – 15 किस्म का पौधा :-पौधे की इस किस्म को श्री पद्मा के नाम से भी जानते है । इसके फलो की तासीर कम गर्मी वाली होती है जिससे इसे खाने से खुजली जैसी शिकायत नहीं होती है । इसमें भी एक पौधे में एक ही फल प्राप्त होता है । एक हेक्टेयर के खेत में यह 70 से 80 टन की पैदावार देता है । यह दक्षिण भारत में अधिक उगाई जाने वाली फसल है।
  3. संतरागाछी किस्म के पौधे :-इस किस्म के एक पौधे में कई फल पाए जाते है । इन फलो की तासीर हलकी गर्म होती है, जिससे इन्हे खाने पर हलकी खुजली जैसी समस्या देखने को मिल सकती है । इसकी फसल 5 से 6 महीने में पैदावार देना आरम्भ कर देती है । यह प्रति हेक्टेयर में 50 टन की सामान्य पैदावार देने वाली किस्म है ।
  4. संतरा गाची किस्म के पौधे :-इस किस्म के पौधों को भारत के पूर्वी राज्यों में अधिक उगाया जाता है । इसके एक पौधे में कई छोटे कंद प्राप्त हो जाते है । इस किस्म के सूरन का स्वाद खाने में हल्का कड़वा मालूम होता है जिस वजह से इसे खाने में गले में थोड़ी तीक्ष्णता हो सकती है । इस किस्म के पौधे प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 50 से 75 टन की पैदावार देते है ।

सूरन की खेती की तैयारी और उवर्रक की मात्रा (Yam Field Preparation and Fertilizer)

यदि आप जिमीकंद की अच्छी पैदावार प्राप्त करना चाहते है तो उसके लिए आपको जिमीकंद के बीजो को खेत में लगाने से पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लेना चाहिए इसके लिए खेत की अच्छे से गहरी जुताई कर कुछ दिनों के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दे ताकि खेत की मिट्टी में अच्छे से धूप लग सके । इसके बाद खेत में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पुरानी गोबर की खाद को डाल कर फिर से अच्छे से जुताई कर गोबर को मिट्टी में मिला देना चाहिए ।

इसके बाद खेत में अंतिम जुताई के समय पोटाश 50 KG, 40 KG यूरिया और 150 KG डी.ए.पी. की मात्रा अच्छे से मिलाकर खेत में छिड़ककर फिर से दो तीन तिरछी जुताई कर देनी चाहिए जिससे खाद अच्छी तरह से मिट्टी में मिल जाये । इसके बाद खेत में पानी लगा कर पलेव कर देना चाहिए । कुछ दिनों के पश्चात जब खेत की मिट्टी सूखी दिखाई देनी लगे तब कल्टीवेटर लगा कर जुताई करवा दे । इसके बाद बीज रोपाई के लिए नालियों को बना कर तैयार कर लेना चाहिए ।

जिमीकंद के बीजो की रोपाई और सिंचाई (Yam Seeds Sowing and Irrigation)

जिमीकंद के बीजो को खेत में लगाने से पूर्व उन्हें अच्छे से उपचारित कर लेना चाहिए । बीजो के उपचारण के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लीन या इमीसान की उचित मात्रा का घोल बना कर उसमे आधे घंटे के लिए इन बीजो को डूबा देना चाहिए । चूंकि सूरन के बीज इसके फलो से ही तैयार होते है । इसलिए इसके पूरी तरह से पके हुए फलो को कई भागो में काटा जाता है उसके बाद बीजो को उपचारित कर खेत में लगाया जाता है । इसके एक बीज का वजन तक़रीबन 250 से 500 GM के मध्य होता है जिस वजह से प्रति हेक्टेयर खेत में 50 क्विंटल बीज की आवश्यकता होती है ।

जिमीकंद के बीजो को तैयार की गई नालियों में लगा देना चाहिए । इसके अतिरिक्त कुछ किसान भाई इसके बीजो की रोपाई गड्डो को तैयार कर उसमे लगाते है । सूरन की फसल को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है इसलिए बीजो की रोपाई के बाद तुरंत सिंचाई कर देनी चाहिए तथा बीजो के अनुकरण तक खेत में नमी को बरक़रार रखने के लिए सप्ताह में दो बार सिंचाई करनी चाहिए । सर्दियों के मौसम में इसके पौधों को 15-20 दिन सिंचाई की आवश्यकता होती है, वही बारिश के मौसम में जरूरत पड़ने पर ही इसके पौधों की सिंचाई करनी चाहिए ।

जिमीकंद के खेतो में खरपतवार नियंत्रण (Jimikand Fields Weed Control)

जिमीकंद के खेत में सामान्य खरपतवार नियंत्रण की आवश्यकता होती है । इसके लिए बीजो की रोपाई से तक़रीबन 15 दिन बाद प्राकृतिक तरीके से निराई-गुड़ाई कर खरपतवार पर नियंत्रण करना चाहिए । जिमीकंद के पौधों को लगभग तीन से चार नीलाई गुड़ाई की आवश्यकता होती है । जिन्हे समय-समय पर खरपतवार दिखाई देने पर कर देना चाहिए ।

जिमीकंद के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम (Yam Plants Diseases and their Prevention)

  1. जिमीकंद भृंग किस्म के रोग :-इस किस्म का रोग पौधों की पत्तियों और शाखाओ में देखने को मिलता है । यह एक तरह का कीट रोग होता है । जिसमे हल्के भूरे रंग की सुंडी होती है । यह सुंडी ही पौधों की पत्तियों और शाखाओ को खा कर नष्ट कर देती है जिससे पौधा ख़राब होकर गिर जाता है जिससे पैदावार अधिक प्रभावित होती है । पौधों को इस रोग से बचाने के लिए नीम के काढ़े को माइक्रो झाइम के साथ मिश्रित कर छिड़काव करना चाहिए ।
  2. झुलसा रोग :-इस किस्म के रोग जीवाणु जनित होते है । यह सितम्बर के माह में पौधों की पत्तियों पर आक्रमण करता है जिससे पौधे की पत्तिया हल्के भूरे रंग की दिखाई देने लगती है । इस रोग के अधिक प्रभावित होने पर पत्तिया भूरे रंग की होकर गिरने लगती है, जिससे पौधा वृद्धि करना बंद कर देता है । इंडोफिल या बाविस्टीन की उचित मात्रा का छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है ।
  3. तना गलन रोग :-इस तरह का रोग अक्सर जल-भराव की स्थिति में देखने को मिलता है । इस तरह के रोग से बचाव के लिए खेत में जल-भराव की स्थिति न पैदा होने दे । यह जड़ गलन रोग पौधे के तने को जमीन के पास से गला कर नष्ट कर देता है । कैप्टान दवा का उचित में मात्रा में पौधों की जड़ो में छिड़काव कर इस रोग की रोकथाम की जा सकती है ।
  4. तम्बाकू की सुंडी रोग :-यह एक कीट जनित रोग होता है, तम्बाकू सुंडी का लार्वा सुंडी के रूप में आक्रमण करता है । इसका लार्वा हल्के भूरे रंग का होता है,जो पौधों की पत्तिया खाकर उसे नष्ट कर देता है । यह रोग जून और जुलाई के माह में अधिक आक्रमण करता है । पौधों पर लगने वाले इस रोग से बचाव करने के लिए मेन्कोजेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता है ।

जिमीकंद के कंदों की खुदाई, पैदावार और लाभ (Yam Tubers Digging, Yield and Benefits)

जिमीकंद के पौधे 6 से 8 महीने में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाती है । जब इसके पौधों की पत्तिया सूखकर गिरने लगे तब इसके फलो को खुदाई कर निकल लेना चाहिए । इसके बाद उन्हें साफ पानी से धो देना चाहिए । धोये हुए फलो को छायादार जगह में अच्छे से सूखा लेना चाहिए इसके बाद इन्हे बाजारों में लेकर जाकर बेच देना चाहिए ।

जिमीकंद के एक हेक्टेयर के खेत में तक़रीबन 70 से 80 टन की पैदावार प्राप्त हो जाती है । जिमीकंद का बाजार भाव 2000 रूपए प्रति क्विंटल के आसपास होता है जिस हिसाब से किसान भाई इसकी एक बार की फसल से लगभग 4 लाख तक की कमाई कर सकते है ।

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Fennelमसाला फसलों में सौंफ का अपना विशिष्ट स्थान है। ये अपनी खुशबू के कारण लोकप्रिय होने के साथ ही औषधी के रूप में भी पहचानी जाती है। इसका सब्जियों में प्रयोग होने के साथ ही आचार बनाने में भी किया जाता है। यदि इसके औषधीय महत्व की बात करें तो इसे कई रोगों में दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है…Click HereBambooबांस का उपयोग बल्ली, सीढ़ी, टोकरी,चटाई टोकरी, बांस से बनी बोतल, फर्नीचर, खिलौने, कृषि यंत्र बनाने सहित अन्य साज-सज्जा का समान बनने के लिए किया जाता है। इसके अलावा कागज बनाने में इसका उपयोग होता है। अब तो घरों को आधुनिक लुक देने में भी बांस का प्रयोग किया जाने लगा है…Click Here Watercressवॉटरक्रेस एक स्वादिष्ट सलाद फसल है, जो खनिजों और पोषक तत्वों से भरपूर है, और इसका स्वाद तीखा, चटपटा, थोड़ा तीखा होता है। इसे अकेले खाया जा सकता है, या अन्य सलाद सामग्री के साथ मिलाया जा सकता है, और एक स्वादिष्ट ठंडा सूप बनाया जा सकता है…Click Here
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Table Of Content

  • मौसम और जलवायु
  • किस्में
  • मिट्टी की आवश्यकता
  • बीज दर
  • बुआई और रोपण की विधियाँ
  • खेत की तैयारी
  • रिक्ति
  • प्रत्यारोपण
  • खाद एवं उर्वरक
  • सिंचाई
  • निराई-गुड़ाई
  • छंटाई
  • प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (पीजीआर) का उपयोग
  • प्लांट का संरक्षण
  • कटाई
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खरबूजा
मौसम और जलवायु
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मिट्टी की आवश्यकता
बीज दर
खरबूजा

खरबूजा ( कुकुमिस मेलो ) एक फल की फसल है जिसकी खेती भारत में किसानों द्वारा विशेष रूप से गर्मी के मौसम में व्यापक रूप से की जाती है। यह गर्म मौसम की फसल है जो अपने अनोखे स्वाद के लिए जानी जाती है। यह फल अपनी उच्च जल सामग्री के लिए जाना जाता है और इसका शरीर पर ठंडा प्रभाव पड़ता है। वे विटामिन ए और सी से भरपूर होते हैं । अपरिपक्व फलों का उपयोग सब्जियों के रूप में किया जाता है और उनके बीज खाने योग्य होते हैं। इसका उपयोग मिठाइयां बनाने में किया जाता है । भारत में खरबूजा मुख्य रूप से पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और मध्य प्रदेश में उगाया जाता है। चीन और तुर्की के बाद भारत दुनिया में खरबूजे का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक  है ।

मौसम और जलवायु

खरबूजा अधिकतर नवंबर से फरवरी तक उगाया जाता है। बीज के अंकुरण के लिए इष्टतम तापमान 23 – 25°C है और इसके विकास और फल के विकास के लिए आवश्यक तापमान लगभग 20 – 32°C है। फल पकने की अवस्था में उच्च तापमान और कम आर्द्रता फल की मिठास और सुगंध को बढ़ा देगी। गर्म रातें फल के पकने में तेजी लाएंगी। खरबूजे सूखे के प्रति सहनशील होते हैं लेकिन पाले के प्रति संवेदनशील होते हैं। उच्च आर्द्र परिस्थितियाँ डाउनी फफूंदी, एन्थ्रेक्नोज और फ्रूटफ्लाई जैसे कीड़ों जैसी बीमारियों की घटना और प्रसार को बढ़ावा देंगी।

किस्में

किस्में/संकर विशेषताएँ

मधुरजा खरबूजा
  • मधु रस प्रकार का फल
  • परिपक्वता: 55 से 60 दिन (मधुरस से 5 से 7 दिन पहले)
  • फल का वजन – 1.0 से 1.25 किलोग्राम
  • बहुत सुंदर रंग और सुगंध
  • मध्यम गुहिका वाले हल्के जालीदार फल
  • 12 से 15% टीएसएस
ऊर्जा काजरी खरबूजा 
  • खोल का रंग नारंगी है
  • 60 से 65 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है
  • औसत वजन 1.2 से 1.5 किग्रा
  • अनुमानित बीज संख्या- 100
मृदुला खरबूजा
  • यह किस्म उपजाऊ और जल्दी तैयार होने वाली है
  • हल्के पीले छिलके वाला गोल फल
  • औसत फल का वजन: 1.5 – 2 किग्रा
  • फलों की तुड़ाई: फूल आने के 40 दिन बाद
  • गिरी सफेद, कोमल और सुगंध और अद्वितीय स्वाद के साथ बहुत मीठा होता है
ऊर्जा यूएस-111 खरबूजा
  • गिरी का रंग नारंगी है
  • 60 से 65 दिन में तैयार हो जाता है
  • औसत वजन 1.2 से 1.5 किग्रा
  • अनुमानित बीज संख्या- 50
एनएस 910 खरबूजा 
  • परिपक्वता के सापेक्ष दिन (डीएस) – हरा: 60-65
  • फल का वज़न (किलो): 1.5-2.0
  • फल का आकार: अंडाकार
  • फलों पर जाल लगाना: अच्छा
  • गिरी का रंग गहरा
  • गिरी की बनावट: अच्छा
  • बीज गुहा: छोटा
  • टीएसएस %: 13-14
सानवी खरबूजा
  • आकार: चिकनी, सुनहरी-पीली त्वचा के साथ ग्लोब के आकार का
  • वज़न: लगभग 1-1.5 किग्रा
  • इसका नारंगी गूदा 14-16% ब्रिक्स के साथ कुरकुरा होता है
  • जल्दी पकने वाला, उगाने और फल लगाने में आसान और बुआई के 70-75 दिन बाद काटा जा सकता है
  • ऋतु – देर से ख़रीफ़, शुरुआती गर्मी
एमएच 38 खरबूजा
  • फल मध्यम आकार का, गोल, थोड़ा पसलीदार, नारंगी छिलके वाला और बारीकी से जालीदार होता है
  • फल का गूदा गाढ़ा, गहरा नारंगी और अच्छी सुगंध वाला मीठा होता है
  • फल का वजन: 1.8 से 2.0 किग्रा
  • मृदु एवं चूर्णिल फफूंदी रोगों के प्रति मध्यम रूप से सहनशील
  • चीनी सामग्री टीएसएस: 12⁰ ब्रिक्स
  • कटाई: बुआई के 70-80 दिन से शुरू होती है
रुद्राक्ष अर्जुन खरबूजा
  • नारंगी मीठा गूदा
  • चीनी सामग्री: 13 – 15 %
  • कठोर जालीदार बाहरी त्वचा
  • आकार/आकार: गोल
  • वजन: 1.5 – 2.5 किलो
  • परिपक्वता: 65 – 70 दिन
  • उपज: लगभग 20 – 25 टन/एकड़
एफबी मिष्ठान एफ1 हाइब्रिड मस्कमेलन
  • फल का गूदा: नारंगी गूदे के साथ घनी जालीदार सुगंध और स्वाद में मीठा
  • टीएसएस: 12 – 15%
  • फल का वजन: 1 – 2 किग्रा
  • पहली कटाई के दिन: रोपाई के बाद परिपक्वता के लिए 70-75 दिन
  • फ्यूजेरियम और वायरस से होने वाली बीमारियों के प्रति अच्छी सहनशीलता, लंबे परिवहन के लिए अच्छा

मिट्टी की आवश्यकता

खरबूजे की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थों से भरपूर अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी आदर्श होती है। मिट्टी का पीएच 6.5 – 7.5 के बीच हो सकता है। खरबूजा मिट्टी की अम्लता के प्रति थोड़ा सहनशील है लेकिन उच्च नमक सांद्रता वाली मिट्टी को सहन नहीं कर सकता है। हल्की मिट्टी फलों की परिपक्वता को बढ़ाती है, जिससे फसल जल्दी तैयार हो जाती है। भारी मिट्टी में बेलों की अच्छी वृद्धि होती है, लेकिन फसल/फल के पकने में देरी होती है।

बीज दर

400 – 600 ग्राम/एकड़

बुआई और रोपण की विधियाँ
खेत की तैयारी
रिक्ति
प्रत्यारोपण
खाद एवं उर्वरक
बुआई और रोपण की विधियाँ

  • भारत के दक्षिणी और मध्य भाग में इसकी बुआई अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है। खरबूजा आमतौर पर सीधे बीज बोया जाता है और रोपाई की जाती है। बेहतर अंकुरण के लिए बीज को बोने से पहले 12-24 घंटे तक पानी में भिगोना चाहिए। खरबूजे के बीज गड्ढों और ऊँची क्यारियों में बोए जाते हैं जबकि नदी के किनारे की खेती में इन्हें खाइयों में बोया जाता है। बुआई से पहले, बीजों को ट्राइकोडर्मा विराइड पाउडर 1.25 ग्राम/लीटर पानी या स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस 5-10 मिली प्रति 50 मिली पानी या मेटलैक्सिल 4% + मैनकोज़ेब 64% डब्ल्यू पी 1-1.5 ग्राम/लीटर पानी से उपचारित करें।
  • पॉलिथीन की थैलियों में उगाए गए अंकुरों से उगाई गई अगेती फसल सीधे बोई गई फसलों की तुलना में 15 से 20 दिन पहले पक जाती है।
  • सीधी बुआई अंकुर स्थापना
    गड्ढा उठा हुआ बिस्तर पाली बैग विरोध करता है
    * लगभग 60 सेमी चौड़े, 60 सेमी लंबे और 45 सेमी गहरे गड्ढे खोदे जाने हैं। गड्ढे लगभग 1.5 – 2 मीटर की दूरी पर होने चाहिए। उन्हें FYM या अच्छी तरह से विघटित खाद से भरें।
    * प्रत्येक गड्ढे में 1-1.5 सेमी की गहराई पर 5-6 बीज बोयें। बीजों को मिट्टी से ढक दें।

* स्थापना के बाद, प्रत्येक गड्ढे में केवल 2 या 3 पौधों को ही बढ़ने दिया जाएगा जबकि बाकी अन्य को उखाड़ दिया जाएगा।

* 3-4 मीटर चौड़ी क्यारियाँ तैयार करें।
* क्यारियों के दोनों ओर टीलों के बीच 60 सेमी की दूरी पर 2 बीज/बीज बोएं।* आधार पर छिद्रित 15 सेमी x 10 सेमी आकार के पॉलिथीन बैग को मिट्टी: एफवाईएम या मिट्टी: एफवाईएम: गाद (यदि मिट्टी रेतीली है) के बराबर अनुपात से भरा जाना चाहिए।
* बीज 1.5 सेमी से अधिक गहरा नहीं बोना चाहिए.* संरक्षित परिस्थितियों में पौध को प्रोट्रे में उगाया जा सकता है।
* 98 सेल्स वाले प्रोट्रेज़ का उपयोग किया जा सकता है।

* प्रति कोशिका 1 – 2 बीज बोए जा सकते हैं।

खेत की तैयारी

मुख्य खेत को बारीक जुताई करनी चाहिए और 2.5 मीटर की दूरी पर लंबी नालियाँ बनानी चाहिए।

रिक्ति

पौधों को 5-6 फीट की दूरी वाली पंक्तियों में लगभग 2-3 फीट की दूरी पर रखें।

प्रत्यारोपण

कम से कम 2-3 असली पत्तियों वाले 20-30 दिन पुराने पौधों का प्रत्यारोपण करें। सीडलिंग को खाँचों के किनारों या मेड़ की निचली आधी ऊँचाई पर प्रत्यारोपित किया जाता है, ताकि पौधों को पर्याप्त सिंचाई या नमी उपलब्ध हो सके रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करें ।

खाद एवं उर्वरक

खेत की तैयारी के समय गोबर की खाद और नीम की खली डाली जा सकती है। एन की आधी खुराक, पी और के की पूरी खुराक को बेसल के रूप में लगाया जा सकता है जबकि शेष एन को बुआई के 4 सप्ताह बाद मिट्टी चढ़ाते समय लगाया जा सकता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रयोग से पौधों की वृद्धि को बढ़ावा मिलता है, फलों की उपज, गूदा और छिलके की मोटाई बढ़ती है। खरबूजे के लिए उर्वरक की सामान्य अनुशंसित खुराक 32:24:12 किग्रा/एकड़ है।

पुष्टिकर/पोषक उर्वरक खुराक (प्रति एकड़)
जैविक FYM 8 टन
नीम की खली 40 किग्रा
तापस पुष्टि ऑल प्लांट न्यूट्रिएंट मिक्स 2 – 3 मिली/लीटर
जैव उर्वरक Azospirillum बीज उपचार: 10 मिली सन बायो एज़ोस + ठंडा गुड़ का घोल (प्रति किलोग्राम बीज के लिए)। मिट्टी में प्रयोग: 50-100 किलोग्राम एफवाईएम/खाद के साथ 1 लीटर सन बायो एज़ोस।

ड्रिप: 5 – 10 मिली/लीटर पानी

फॉस्फोबैक्टीरिया (सन बायो फॉसी) मिट्टी में प्रयोग: 10 मिली सन बायो फॉसी + 50 – 100 किलोग्राम खाद  फर्टिगेशन: 1- 2 ली
एन यूरिया (या) 70 किग्रा
अमोनियम सल्फेट 156 किग्रा
पी सिंगल सुपर फॉस्फेट (या) 150 किग्रा
डबल सुपर फॉस्फेट 75 किग्रा
के म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (या) 20 किग्रा
पोटाश का सल्फेट 24 किग्रा
सूक्ष्म पोषक तत्व गैसिन पियरे ग्रीन लेबल मैग्नीशियम (एमजी 2%, एस 5%) 2-3 मिली/लीटर पानी
बोरोन 20 1 ग्राम/लीटर पानी

सिंचाई
निराई-गुड़ाई
छंटाई
प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (पीजीआर) का उपयोग
प्लांट का संरक्षण
सिंचाई

खरबूजे को बार-बार लेकिन हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है, खासकर फसल के विकास के शुरुआती चरणों में। सीधी बोई गई फसल के लिए, यदि मिट्टी में पर्याप्त नमी हो तो पहली सिंचाई में देरी हो सकती है। रोपाई की गई फसल के लिए सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद की जाती है इसके बाद साप्ताहिक अंतराल पर सिंचाई की जा सकती है। फलों के पकने के समय अर्थात जब सुबह शिराओं पर मुरझाहट दिखाई दे तो सिंचाई अत्यंत आवश्यक होने पर की जा सकती है। फल पकने पर अत्यधिक सिंचाई बंद कर देनी चाहिए, अन्यथा फल की मिठास कम हो जाएगी। मिट्टी के प्रकार और बढ़ते मौसम के आधार पर पूरे फसल मौसम के लिए कुल 7-11 सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है।

फलों की बेहतर गुणवत्ता, बीमारी और खरपतवार के संक्रमण को कम करने और जल संरक्षण के लिए  ‘ड्रिप सिंचाई’ की सिफारिश की जाती है।

निराई-गुड़ाई

  • खरपतवार नियंत्रण के लिए खेत में कभी भी पानी नहीं भरने देना चाहिए। यदि संभव हो तो ड्रिप सिंचाई स्थापित की जा सकती है
  • प्रारंभिक विकास अवस्था के दौरान खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए
  • जब एन को शीर्ष ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग किया जाए तो निराई और मिट्टी चढ़ाना चाहिए
  • बेल की वृद्धि के प्रारंभिक चरण के दौरान, हल्की निराई-गुड़ाई की सलाह दी जाती है।

छंटाई

पौधे की वृद्धि और फल लगने में सुधार के लिए मुख्य तने पर 7 वीं गांठ तक के द्वितीयक अंकुर हटा दें छंटाई से उपज और फल की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिलती है।

प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (पीजीआर) का उपयोग

प्रयोग के चरण: वी इगेटिव, फूल और फल विकास चरण (आवेदन से पहले उत्पाद लेबल भी देखें)

प्रोडक्ट का नाम सामग्री मात्रा बनाने की विधि फ़ायदे
इसाबियन जैव उत्तेजक अमीनो एसिड और पोषक तत्व पत्ते: 2 मि.ली./लीटर पानी
  • जड़ वृद्धि और कलियों के जोरदार विकास को बढ़ावा देता है, अधिक फूल आने को प्रेरित करता है
  • परागण और जल्दी फल लगने में मदद करता है।
  • फसल की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार होता है
होशी सुमितोमो जिबरेलिक एसिड 0.001% एल 1.25 मिली/लीटर पानी
  • फूल और फल का गिरना कम करता है
  • फूलों के उत्पादन को बढ़ावा देता है, फल बढ़ाता है और फसल की पैदावार बढ़ाता है
कात्यायनी अल्फा नेफ्थाइल एसिटिक एसिड  अल्फा नेफ़थाइल एसिटिक एसिड 4.5% एसएल 1 – 1.5 मिली/4.5 लीटर पानी
  • पुष्पन को प्रेरित करता है
  • फूलों की कलियों और कच्चे फलों को झड़ने से रोकता है
  • फलों का आकार बढ़ाने, फलों की गुणवत्ता और उपज बढ़ाने और सुधारने में मदद करता है

प्लांट का संरक्षण

खरबूजे में कीटों का प्रबंधन :-

प्रोडक्ट का नाम तकनीकी सामग्री मात्रा बनाने की विधि
फल का कीड़ा
तापस फल मक्खी जाल फेरोमोन लालच 6 – 8 प्रति एकड़
कोराजेन कीटनाशक क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5% एससी 0.3 मिली/लीटर
एफिड्स और थ्रिप्स
टी.स्टेन्स निम्बेसीडीन एज़ार्डिरेक्टिन 300 पी.पी.एम 6 मिली/लीटर पानी
पॉलीट्रिन सी 44 ईसी कीटनाशक  40% (प्रोफेनोफोस) + 4% (साइपरमेथ्रिन) ईसी 2 मिली/लीटर पानी
सिवान्टो बायर कीटनाशक फ्लुपाइराडिफ्यूरोन 17.09% एसएल 2 मिली/लीटर पानी
पत्ती खोदनेवाला
इकोनीम प्लस एज़ाडिरैक्टिन 10000 पीपीएम 1.5 – 2.5 मिली/लीटर पानी
वोलियम टारगो 45 ग्राम/लीटर क्लोरेंट्रानिलिप्रोल + 18 ग्राम/लीटर एबामेक्टिन 1 मिली/लीटर पानी
बेनेविया कीटनाशक सायनट्रानिलिप्रोल 10.26% आयुध डिपो 1.7 से 2.0 मिली/लीटर पानी

खरबूजे में रोगों का प्रबंधन :-

प्रोडक्ट का नाम तकनीकी सामग्री मात्रा बनाने की विधि
कोमल फफूंदी
अनंत डॉ.बैक्टो फ़्लुरो (जैव कवकनाशी) स्यूडोमोनास प्रतिदीप्ति पर आधारित 2.5 मिली/लीटर पानी
फ्लिक सुपर कीटनाशक डाइमेथोमोर्फ 12 % + पायराक्लोस्ट्रोबिन 6.7 % डब्लूजी 3 ग्राम/लीटर पानी
ज़ैम्प्रो कवकनाशी एमेटोक्ट्राडिन 27% + डाइमेथोमोर्फ 20.27% एससी 1.6 – 2 मिली/लीटर पानी
anthracnose
इकोनीम प्लस एज़ाडिरैक्टिन 10000 पीपीएम 1.5 – 2.5 मिली/लीटर पानी
बाविस्टिन कवकनाशी कार्बेन्डाजिम 50% डब्लू.पी 0.6 ग्राम/लीटर पानी
कोसाइड कवकनाशी कॉपर हाइड्रॉक्साइड 53.8% डीएफ 2 ग्राम/लीटर पानी
विल्ट
इकोनीम प्लस एज़ाडिरैक्टिन 10000 पीपीएम 1.5 – 2.5 मिली/लीटर पानी
रोको कवकनाशी थायोफैनेट मिथाइल 70% WP 0.5 ग्राम/लीटर पानी
पाउडर रूपी फफूंद
वैनप्रोज़ वी-क्योर कवकनाशी प्लस जीवाणुनाशक यूजेनॉल, थाइमोल, पोटेशियम लवण, धनायनित सतह एजेंट, सोडियम लवण और संरक्षक 1.5 – 2 ग्राम/लीटर पानी
फ्लिक सुपर कीटनाशक डाइमेथोमोर्फ 12 % + पायराक्लोस्ट्रोबिन 6.7 % डब्लूजी 3 ग्राम/लीटर पानी
मेरिवोन कवकनाशी फ्लक्सापायरोक्सैड 250 जी/एल + पायराक्लोस्ट्रोबिन 250 जी/एल एससी 0.4 – 0.5 मिली/लीटर

कटाई
भंडारण
कटाई

  • अर्ध-पर्ची अवस्था: फल उपयोग के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होते हैं, लेकिन दूर के बाजार में उपयोग के लिए अच्छे होते हैं। तने से फल तोड़ने के लिए हल्के दबाव की आवश्यकता होती है
  • पूर्ण-पर्ची चरण: फल उपयोग के लिए पूरी तरह से तैयार हैं और स्थानीय बाजार के लिए भी सर्वोत्तम हैं। फल को तने से अलग करने के लिए दबाव की आवश्यकता नहीं होती है
  • कस्तूरी स्वाद: पकने पर, फल एक सुखद कस्तूरी स्वाद उत्पन्न करते हैं
  • रंग में परिवर्तन: फल पकने की अवस्था में छिलका मुलायम हो जाता है, फल की त्वचा का रंग हरे से पीला हो जाता है
  • पूर्ण जाल: फल की सतह पर जाल जैसी संरचना विकसित हो जाती है।

भंडारण

खरबूजा जल्दी खराब होने वाला फल है और इसे कमरे के तापमान में केवल 2 – 4 दिनों तक ही भंडारित किया जा सकता है। इन्हें कोल्ड स्टोर में 2-4 डिग्री सेल्सियस और 85-90% सापेक्ष आर्द्रता पर 2-3 सप्ताह तक भंडारित किया जा सकता है।

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Jimikand or Suran or Elephant yamजिमीकंद को एक औषधीय फसल के रूप में उगाया जाता है, किन्तु इसका इस्तेमाल हमारे घरो में सब्जियों के रूप में भी होता है। इसे ओल और सूरन के नाम से भी जाना जाता है । जिमीकंद की तासीर अधिक गर्म होती है, जिस वजह से इसका सेवन करने से खुलजी की शिकायत सुनने को मिलती है….Click Here Papayaपपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। पपीता को भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिन्सकाटेन को जाता है जिनके द्वारा पपीता के पौधे वेस्टइंडीज से सन् 1575 में मलेशिया लाया फिर वहां से भारत आया। बड़वानी में भी लगभग 958 हे….Click HereCurry leavesकरी पत्ते एक छोटे पर्णपाती सुगंधित झाड़ी का भाग होते हैं, जिसका वैज्ञानिक नाम मुरराया कोएनिगी होता है, जो रूटेशियाई कुल से संबंधित होता है। इसे प्राकृतिक औषधीय पौधा माना जाता है। दक्षिण एशिया इस पौधे का घर है, और यह श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन और भारत जैसे देशों में पाया जाता है। भारत में, यह हिमालय के नीचे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और असम जैसेClick Here
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Lotus cucumber

Table Of Content

  • कमल ककड़ी (Lotus Cucumber) की खेती से सम्बंधित जानकारी
  • कमल ककड़ी क्या होती है ?
  • कमल ककड़ी की खेती कैसे करे (Lotus Cucumber Cultivation)
  • कमल ककड़ी बीज अंकुरण (Lotus Cucumber Seed Germination)
  • कमल ककड़ी के पौधों का रख-रखाव (Lotus Cucumber Plants Maintenance)
  • कमल ककड़ी के फायदे व नुक्सान (Lotus Cucumber Benefits and Harms)

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कमल ककड़ी (Lotus Cucumber) की खेती से सम्बंधित जानकारी

कमल ककड़ी की खेती सब्जी के लिए की जाती है । कमल के पौधों में लगने वाला फूल जितना लोकप्रिय है, उतने ही खास उस पौधे के बाक़ी हिस्से भी है । कमल के फूल के अलावा बीज और जड़ो को भी काफी पसंद किया जाता है जिसमे इसके बीजो से मिलने वाला मखाना सेहत को बेहतर बनाने में सहायता प्रदान करता है, तो वही इसकी जड़े जिसे कमल ककड़ी कहते है यह स्वाद में भी अच्छा और सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है । कमल ककड़ी में फास्फोरस, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम, फाइबर और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व मौजूद होते है जिन्हे सेहत और स्वास्थ की नज़र से काफी अच्छा माना जाता है ।

कमल ककड़ी का सेवन सब्जी के अलावा अचार बनाकर भी करते है । किसान भाई कमल ककड़ी का उत्पादन कर अच्छी कमाई भी कर रहे है । यदि आप भी कमल ककड़ी की खेती करने की सोच रहे है तो इस लेख में आपको कमल ककड़ी क्या होता है ? कमल ककड़ी की खेती कैसे करे तथा कमल ककड़ी के फायदे व नुक्सान क्या होते है इसकी जानकारी दी जा रही है ।

कमल ककड़ी क्या होती है ?

कमल ककड़ी मुख्य रूप से कमल की जड़ होती है जिसे मानव आहार के लिए इस्तेमाल किया जाता है । कमल ककड़ी को अंग्रेजी भाषा में लोटस कुकम्बर (Lotus Cucumber) या कमल जड़ (Lotus Root) कहा जाता है ।  लुम्बो न्यूसीफेरा जल में रहने वाला एक पौधा है, जिसे भारत में कमल के रूप में जानते है । इसकी जड़ो को व्यंजन बनाने के लिए उपयोग में लाते है जो कमल ककड़ी कहलाती है । कमल एक बारहमासी जलीय पौधा होता है जिसकी जड़े बेलनाकार व भूरे रंग की होती है ।

पौधे का सबट्रेनियन या सुपाच्य प्रकंद ही कमल ककड़ी होती है । कमल ककड़ी में कई पौष्टिक आहार मौजूद होते है जिसमे कई गुण होते है कमल ककड़ी का सेवन स्वास्थ के नजरिये से काफी बेहतर होता है यह प्रोटीन और फाइबर  का एक बेहतर स्रोत है जिसे अलग-अलग जगहों पर डिश बनाकर इस्तेमाल किया जाता है ।

कमल ककड़ी की खेती कैसे करे (Lotus Cucumber Cultivation)

वर्ष में तीन बार कमल ककड़ी की फसल उगाई जा सकती है किसान भाई अपने खेतो में तालाब बनाकर कमल ककड़ी के बीजो की बुवाई करते है जिससे एक एकड़ के खेत में उन्हें 50 से 60 क्विंटल कमल ककड़ी का उत्पादन आसानी से मिल जाता है । कमल ककड़ी का स्थानीय बाज़ारो में भाव 10 से 20 रूपए प्रति किलो होता है तथा भारत के दक्षिण क्षेत्रों में इसी कमल ककड़ी की कीमत 80 से 100 रूपए प्रति किलो होती है ।

उत्तर भारत में रहने वाले किसान इसकी खेती करना ज्यादा पसंद करते है वह लोग कमल ककड़ी का उत्पादन कर जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र राज्यों में बेचकर अच्छी कमाई करते है क्योकि इन राज्यों में इसकी बहुत अधिक मांग रहती है । किसान ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर बड़ी मात्रा में कमल ककड़ी का निर्यात बड़े व्यापारियों तक करते है जिसके बाद व्यापारियों द्वारा किसानो को माल की कीमत उनके बैंक खाते में भेज दी जाती है ।

कमल के पौधों के लिए 21-35 डिग्री का तापमान जरूरी होता है इसका अर्थ यह है कि तालाब में धुप ठीक तरह से लगनी चाहिए । इसके अतिरिक्त 35 डिग्री से अधिक तापमान होने पर छाया के लिए शेड का इस्तेमाल कर सकते है ।

कमल ककड़ी बीज अंकुरण (Lotus Cucumber Seed Germination)

कमल के बीज का अंकुरण से लेकर उत्पादन तक की प्रक्रिया काफी लंबी होती है आरम्भ में इसके बीजो को अंकुरित करने के लिए गुनगुने पानी में बीजो को डाल देते है तथा बीजो के अंकुरित होने तक प्रतिदिन पानी को बदलते रहना होता है ।

इसके बाद अंकुरित हुए बीजो को खास तरह की मिट्टी, बजरी या नदी की रेत पर लपेटना होता है इसे पूरी तरह से नहीं ढकना होता है धीरे-धीरे अंकुरित बीजो को मिट्टी के शीर्ष पर दबाया जाता है इसके बाद आप जिस बर्तन या पॉट में इन्हे रखना चाहते है उसे पानी से पूरा भरे दे तथा कुछ दिनों के पश्चात् पौधों को बर्तन से हटाकर तालाब में रखना होता है और फिर अच्छी तरह से एक मीटर तक पानी को भरना होता है यदि तालाब में पहले से ही पानी भरा हुआ है तो इस बात का जरूर ध्यान रखे कि तालाब ज्यादा गहरा न हो ।

कमल ककड़ी के पौधों का रख-रखाव (Lotus Cucumber Plants Maintenance)

इसके पौधों का ठीक तरह से रख-रखाव करना भी जरूरी होता है इसके लिए पौधों पर पीली पत्ती दिखाई देने पर उन्हें तोड़ कर हटा दे  पूरी तरह से तैयार पौधों की जड़े बेलनाकार और मजबूत हो जाती है इन जड़ो को ही कमल ककड़ी कहते है । पूर्ण रूप से तैयार पौधों की जड़ो को तोड़कर बाजार में बेचने के लिए भेज दिया जाता है ।

कमल ककड़ी के फायदे व नुक्सान (Lotus Cucumber Benefits and Harms)

  • कमल ककड़ी का भोजन के साथ उपयोग तनाव कम करने में सहायता प्रदान करता है ।
  • कमल ककड़ी हमारी त्वचा और बालो को मजबूती देता है ।
  • इसका सेवन करने से जल प्रतिधारण को रोकने और वजन घटाने में मदद मिलती है ।
  • कमल ककड़ी ब्लड प्रेसर को बढ़ने से रोकता है ।
  • कमल ककड़ी में फाइबर की उचित मात्रा पाई जाती है, जो पाचन बढ़ाने में सहायता करता है ।
  • कमल ककड़ी का सेवन करने से हमें सूजन, खासी, दस्त, कैंसर से लड़ने, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने तथा मुहासों से छुटकारा पाने में सहायता मिलती है ।
  • कमल ककड़ी का सेवन हमारे लिए किसी भी तरह से हानिकारक नहीं होता है, बस हमें इसे पकाकर, उबालकर और फ्राई करके खाना चाहिए, कच्चे से रूप में इसका सेवन न करे ।
  • कमल ककड़ी में ऐसे कोई भी घटक नहीं पाए जाते है, जिससे यह कहा जा सके कि इसका सेवन हमारे शरीर को किसी तरह से हानि पहुँचाता है ।
  • इसके सेवन करने में बस एक बात का ध्यान रखना होता है कि नियमित मात्रा में ही कमल ककड़ी का सेवन करना चाहिए ।

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