कैसे करें सब्जियों की पौध तैयारी

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सब्जियों की पौध तैयार करना
कैसे करें तैयारी
सब्जियों की पौध तैयार करना

अधिकतर सब्जी फसलें जैसे कि टमाटर, गोभी व प्याज जिनके बीज छोटे व पतले होते है उनकी स्वस्थ व उन्नत पौध तैयार कर लेना ही आधी फसल उगाने के बराबर होता है|स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए पौधशाला के स्थान का चयन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है इससे जुडी हुई अन्य बाते निम्नलिखित हैं :-

1. स्थान ऊंचाई पर होना चाहिए जहां से पानी का निकास उचित हो |

2. भूमि दोमट बलुई होनी चाहिए जिसका पीएच मान लगभग 6.5 हो |

3. स्थान पानी के स्रोत के समीप होना चाहिए |

4. स्थान खुले में होना चाहिए जहाँ सूर्य की पहली किरण पहुंचे |

5. स्थान देखरेख की दृष्टि से भी निकट होना चाहिए |

6. स्थान खेत के किनारे पर होना चाहिए ताकि कृषि कार्यों मे रुकावट न आए |

कैसे करें तैयारी

  • यदि भूमि का पहली बार उपयोग किया जा रहा है तो इसे फफूंद रहित करने के लिए इसका फारमेल्डिहाइड नामक रसायन से उपचार करना आवश्यक है इसका 25 मि.लि. से 1 लिटर पानी मे घोल बनाएं तथा पौधशाला के लिए चुने गए स्थान पर अच्छी तरह छिडकाव कर भिगोएँ  तत्पश्चात इस स्थान को पॉलिथीन चादर से अच्छी तरह ढँक दें | लगभग एक सप्ताह पश्चात् पॉलिथीन चादर हटाकर इस जगह की अच्छी तरह 3 – 4 बार जुताई व खुदाई कर खुला छोड़ दें जिससे रसायन का असर समाप्त हो जाए  इसके पश्चात् भूमि को अच्छी तरह भुरभुरा बनाएं तथा लगभग उपचार के 15 दिन पश्चात् बुवाई के लिए तैयार करें | यह उपचार कमरतोड़ तथा क्लेदगलन  (डैपिंग ऑफ) नामक बीमारी की रोकथाम में सहायता करेगा | क्यारी बनाते समय यह ध्यान रखे की प्रति 10 वर्ग मीटर के लिए लगभग 20 से 25 कि.ग्रा. सड़ी गली गोबर की खाद ट्राईकोडर्मा हाजिॅएनम के साथ 1:50 के अनुपात में मिलाकर 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 15 -25 ग्राम इंडोफिल एम 45 नमक फफूंदनासक और कोई भी उपलब्ध धूल कीटनाशक मिलाएं |
  • क्यारियाँ 15 -20 से. मी. ऊँची उठी होनी चाहिए | 
  • इनकी चौङाई लगभग 1 मीटर तथा लम्बाई 3 मीटर होनी चाहिए जो कि सुबिधा के अनुसार घटाई – बढाई जा सकती है |
  • बीज का उपचार बुवाई से पहले 2 – 3 ग्रा./कि. ग्रा. बीज की दर से कैप्टन, थीरम, बैवीस्टीन इत्यादि फफूंदनाशकों या ट्राईकोडर्मा हाजिॅएनम से करें जिससे डैपिंग ऑफ नामक बीमारी का प्रकोप कम होगा |
  • बुवाई 5 सें.मी. दूर पंक्तियाँ में 1 सें.मी. गहराई पर करें तथा पतली मिटटी की परत से ढकें | क्यारियों को सूखी घास से ढँक दें तथा फव्वारे से हल्की सिंचाई करें |
  • अंकुरण होने पर घास हटा दें तथा फव्वारे से हलकी सिंचाई से नमी बनायें रखें |
  • कीटों व कमरतोड़ रोग से बचाव के लिए 0.25 प्रतिशत इंडोफिल एम 45 या 2 ग्राम ट्राईकोडर्मा हाजिॅएनम प्रति लिटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें तथा 2 मि. लि. प्रति लिटर पानी के हिसाब से मेलाथीयोन या एण्डोसल्फान का छिडकाव समय-समय पर करते रहें|
  • जब पौधे 8 – 10 सें.मी. ऊँचे हो जायें तो 0.3 प्रतिशत यूरिया का छिडकाव करे. ताकि बढवार अच्छी हो |
  • खरपतवार का नियंत्रण हल्की निराई – गुडाई से प्रति सप्ताह करें तथा अवांछनीय पौधे भी निकाल दें |
  • 4 – 6 सप्ताह आयु वाले पौधे 12 – 15 से.मी. ऊँचे तथा रोपाई योग्य हो जाते हैं |
  • रोपाई से 3-4 दिन पूर्व सिंचाई रोक दें तथा उखाड़ने से एक घंटा पहले हलकी सिंचाई करें ऐसा करने से जड़ें नहीं टूटँगीं |
  • स्वस्थ पौध का रोपण सांयकाल में ही करें तथा हलकी सिंचाई करें |
  • एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पौध तैयार करने के लिए विभिन्न फसलों की बीज मात्रा व क्यारियों का आकार (वर्ग मी.) निम्नवत होगा :-

फसल

क्यारियां

बीज की मात्रा प्रति क्यारी (ग्रा.)

टमाटर

10

35-40

बैंगन

15

35-40

शिमला मिर्च

12

115-120

मिर्च

12

125-150

फूल गोभी अगेती

मध्यम व

पछेती

10

10

10

60-70

40-50

35-40

ब्रोंकली

10

50-60

बंदगोभी

10

50-60

चाइनीज़ गोभी

10

60-75

गांठ गोभी

20

50-60

लैटट्यूस

10

40-50

प्याज

50

175-200

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दूध का बुखारदुग्ध ज्वर, या हाइपोकैल्सीमिया, कैल्शियम की कमी है। इस बीमारी का क्लिनिकल और सबक्लिनिकल रूप होता है और यह तब प्रभावित करता है जब गायें सबसे अधिक असुरक्षित होती हैं – संक्रमण अवधि के दौरान..Click Hereगलघोटू रोग के लक्षण बचाव एवं निदानगलघोटू (Hemorrhagic Septicemia ) एक घातक संक्रामक बीमारी है जो मुख्यत: गाय भैंस में मानसून के मौसम के दौरान होती है साधारण भाषा में गलघोटू रोग “घुरखा” , ” घोटुआ ” , ” डहका ” आदि के नाम से जाना जाता है…Click Here खुरपका मुँहपका रोगखुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है, खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसान दायक होती है…Click Here
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ड्रोन दीदी योजना

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हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है जिससे 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन सुलभ कराने का मौका मिला है। इस शानदार पहल का नाम है – ‘ड्रोन दीदी योजना’। इसके अंतर्गत महिला स्वयं सहायता समूहों को कृषि के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट काम के लिए ड्रोन किराए पर उपलब्ध कराया जाएगा। ये ड्रोन कृषि उपकरणों के प्रयोग के लिए खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले उर्वरकों के प्रसार के लिए होंगे। महिला स्वयं सहायता समूह इस योजना के तहत 2023-24 और 2025-26 के बीच इस्तेमाल के लिए ड्रोन प्राप्त करेंगे इसके साथ ही महिला ड्रोन पायलट्स को मासिक मानदेय भी प्रदान की जाएगी साथ ही साथ महिला ड्रोन सखियों को विशेष प्रशिक्षण भी मिलेगा।

महिला स्वयं सहायता समूह को कैसे मिलेगा यह सुविधा और इसके संबंधित सम्पूर्ण जानकारी के लिए इस आलेख को अंत तक पूरा पढ़ें :-

योजना का नाम ड्रोन दीदी योजना 2023
शुरुवात नरेंद्र मोदी जी के द्वारा
उद्देश्य किसानों को कृषि के उपयोग के लिए किराए पर ड्रोन उपलब्ध कराना

PM ड्रोन दीदी योजना क्या है ?

28 नवंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने एक नई क्रांतिकारी कदम की शुरुआत की है – ‘ड्रोन दीदी योजना’ के रूप में। इस योजना के अंतर्गत, 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन सुलभ कराने का मौका प्रदान किया गया है। केंद्र सरकार ने तय किया है कि आने वाले 4 वर्षों में महिला स्वयं सहायता समूहों को लगभग 1,261 करोड़ रुपए के मौद्रिक सहायता के साथ ड्रोन प्रदान किए जाएंगे।

इस योजना से देश के किसानों को कृषि के क्षेत्र में एक नई दिशा मिलेगी जिससे उन्हें ड्रोन का उपयोग करने का अद्वितीय अवसर मिलेगा। ड्रोन किराए पर उपलब्ध कराने से महिला स्वयं सहायता समूह और किसान दोनों को होगा लाभ। इसके माध्यम से नई तकनीकी उपायोगिता के साथ किसान अपनी खेती में सुधार कर सकेंगे और उर्वरकों और कीटनाशकों का सही तरीके से छिड़काव कर सकेंगे। Drone Didi Yojana ने एक नई क्रांति की शुरुआत की है, जो देश की कृषि सेक्टर में एक नया सुधार कर सकती है और महिलाओं को आत्मनिर्भरता की दिशा में मदद कर सकती है।

ड्रोन दीदी योजना उद्देश्य

प्रधानमंत्री द्वारा महिला स्वयं सहायता समूह ड्रोन योजना को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य है किसानों को खेती में प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के लिए ड्रोन उर्वरकों और कीटनाशकों के छिड़काव की दक्षता में सुधार करना। इसके तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन प्रदान किए जाएंगे जिससे किसान खेती में एक नए दौर में कदम रख सकते हैं।

इसके पश्चात् किसान स्वयं सहायता समूह से ड्रोन को किराए पर लेंगे और उन्हें खेती के लिए उपयोगी बनाएंगे यह उन्हें अधिक उत्पादक और सुरक्षित खेती करने में मदद करेगा इस योजना से न केवल स्वयं सहायता महिलाओं को ही लाभ होगा बल्कि किसानों को भी नवीनतम तकनीकों का उपयोग करने का अवसर मिलेगा जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी।

ड्रोन दीदी योजना लाभ व विशेषताएं

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा महिला स्वयं सहायता समूह ड्रोन योजना की शुरुआत की गई है।
  • इस योजना के माध्यम से 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन प्रदान किए जाएंगे।
  • स्वयं सहायता समूह को कृषि के इस्तेमाल के लिए किसानों को किराए पर ड्रोन उपलब्ध कराया जाएगा।
  • यह योजना एसएचजी की महिलाओं को स्थाई व्यवसाय और जीविका सहायता प्रदान करेगी, जिससे उन्हें प्रतिवर्ष कम से कम 1,00,000 रुपए की अतिरिक्त आय हासिल हो सकेगी।
  • इस योजना के तहत महिला को 15 दिन का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।
  • Women Self Help Group Drone Scheme के अंतर्गत चयनित महिला ड्रोन पायलट को हर महीने 15,000 रुपए मानदेय दिया जाएगा।
  • इस योजना के माध्यम से किसानों को किराए पर स्वयं सहायता समूह के माध्यम से ड्रोन मिलेगा जिससे वे अपनी खेती को बेहतर बना सकेंगे।
  • यह योजना किसानों को कृषि में एडवांस टेक्नोलॉजी और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सहायता करेगी।

ड्रोन दीदी योजना पात्रताएं

  • योजना का लाभ केवल महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को मिलेगा।
  • एसएचजी में कम से कम 10 सदस्य होने चाहिए।
  • एसएचजी के सदस्यों की आयु 18 वर्ष से अधिक होनी चाहिए।
  • एसएचजी की सदस्यों की वार्षिक आय 5 लाख रुपये से कम होनी चाहिए।
  • एसएचजी के सदस्यों का स्थायी निवासी भारत का होना चाहिए।

ड्रोन दीदी योजना आवश्यक दस्तावेज

  • एसएचजी का पंजीयन प्रमाण पत्र
  • एसएचजी के सदस्यों की पहचान पत्र की प्रतियां
  • एसएचजी की वार्षिक आय का प्रमाण पत्र
  • एसएचजी का बैंक खाता पासबुक
  • एसएचजी के सदस्यों की फोटो
  • आधार कार्ड
  • पैन कार्ड
  • फोन नंबर
  • ईमेल आईडी
  • पासपोर्ट साइज की कलर फोटो
  • स्वयं सहायता ग्रुप का आईडी कार्ड
  • अन्य दस्तावेज

NOTE- ध्यान दें कि ये दस्तावेज केवल एक अनुमान हैं। योजना के लिए आवेदन करने से पहले, कृपया अपने राज्य के कृषि विभाग से आधिकारिक दस्तावेज़ीकरण की जानकारी प्राप्त करें।

ड्रोन दीदी योजना आवेदन प्रक्रिया

जिन महिलाओं ने स्वयं सहायता समूह ड्रोन योजना के तहत आवेदन करने का इरादा किया है उन्हें थोड़ा इंतजार करना होगा क्योंकि वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा इस योजना को शुरू करने की मंजूरी दी गई है इस समय इस योजना को लागू नहीं किया गया है लेकिन जैसे ही केंद्र सरकार द्वारा ड्रोन दीदी योजना को लागू किया जाएगा तो इस योजना के तहत आवेदन करने संबंधित जानकारी भी सार्वजनिक हो जाएगी तब तक हम आपको इस योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए आवेदन के संबंधित जानकारी प्रदान कर सकेंगे।

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खुरपका मुँहपका रोगखुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है, खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसान दायक होती है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु से होता है। यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलने वाला रोग है…Click Hereदुधारू पशुओं के प्रमुख रोग व उनका उपचारदुधारू पशुओं में अनेक कारणों से बहुत सी बीमारियाँ होती है सूक्ष्म विषाणु, जीवाणु, फफूंदी, अंत: व ब्रह्मा परजीवी, प्रोटोजोआ, कुपोषण तथा शरीर के अंदर की चयापचय (मेटाबोलिज्म) क्रिया में विकार आदि प्रमुख कारणों में है | इन बीमारियों में बहुत सी जानलेवा बीमारियां है कई बीमारियाँ पशु के उत्पादन पर कुप्रभाव डालती है…Click HerePink Boll Worm (गुलाबी सुंडी)पिंक बॉलवॉर्म एशिया का मूल निवासी है, लेकिन दुनिया के अधिकांश कपास उगाने वाले क्षेत्रों में एक आक्रामक प्रजाति बन गई है। भारत के कई क्षेत्रों में कपास पर गुलाबी सुंडी एक प्रमुख कीट के रूप में उभर कर आती रही है। कपास में कपास के सबसे बड़े दुश्मन पिंक बॉल वार्म…Click Here
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पशुओं में एंथ्रेक्स

 

 

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एंथ्रेक्स एक गैर-संक्रामक ज़ूनोटिक रोग है जो बीजाणु बनाने वाले जीवाणु बैसिलस एन्थ्रेसिस के कारण होता है। एंथ्रेक्स मुख्य रूप से घरेलू और जंगली शाकाहारी जानवरों को प्रभावित करता है। अचानक मृत्यु की विशेषता वाली नैदानिक विशेषताएं प्राकृतिक छिद्रों से असंगठित रक्त के रिसाव के साथ रक्तस्रावी बुखार के साथ अति तीव्र या तीव्र नैदानिक लक्षणों की शुरुआत के साथ ओवरलैप होती हैं। सामान्य नैदानिक परीक्षणों में सूक्ष्म परीक्षण संस्कृति और पीसीआर परख शामिल हैं। स्थानिक क्षेत्रों में जानवरों के लिए सबसे प्रभावी नियंत्रण रणनीति टीकाकरण है। रोगाणुरोधी चिकित्सा यदि प्रारंभिक चरण में दी जाए तो प्रभावी होती है। नियंत्रण उपायों में शवों का उचित निपटान दूषित सामग्रियों का कीटाणुशोधन और परिशोधन और पर्यावरण परिशोधन शामिल है।

एंथ्रेक्स एक गैर-संक्रामक ज़ूनोटिक रोग है जो बीजाणु बनाने वाले जीवाणु बैसिलस एन्थ्रेसिस के कारण होता है । एंथ्रेक्स जंगली और घरेलू शाकाहारी जानवरों (उदाहरण के लिए, मवेशी, भेड़, बकरी, ऊंट और मृग) में सबसे आम है, लेकिन इसे संक्रमित जानवरों के ऊतकों, दूषित पशु उत्पादों या कुछ शर्तों के तहत सीधे बी के संपर्क में आने वाले मनुष्यों में भी देखा जा सकता है। एन्थ्रेसीस बीजाणु। संक्रमण के मार्ग, मेजबान कारकों और संभावित तनाव-विशिष्ट कारकों के आधार पर, एंथ्रेक्स की विभिन्न नैदानिक अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं। शाकाहारी जीवों में, एंथ्रेक्स आमतौर पर उच्च मृत्यु दर के साथ तीव्र सेप्टीसीमिया का कारण बनता है, अक्सर रक्तस्रावी लिम्फैडेनाइटिस के साथ। कुत्तों, मनुष्यों, घोड़ों और सूअरों में, बीमारी आमतौर पर कम तीव्र होती है लेकिन फिर भी संभावित रूप से घातक होती है।

बी एन्थ्रेसीस के बीजाणु कई वर्षों तक मिट्टी में जीवित रह सकते हैं। इस समय के दौरान, वे चरने वाले जानवरों के लिए संक्रमण का एक संभावित स्रोत हैं हालाँकि वे आम तौर पर लोगों के लिए संक्रमण के प्रत्यक्ष जोखिम का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। चरने वाले जानवर तब संक्रमित हो सकते हैं जब वे मिट्टी से पर्याप्त मात्रा में बीजाणु निगल लेते हैं। प्रत्यक्ष संचरण के अलावा, काटने वाली मक्खियाँ यांत्रिक रूप से बी एन्थ्रेसीस बीजाणुओं को एक जानवर से दूसरे जानवर तक पहुंचा सकती हैं। उत्तरार्द्ध तब होता है जब बारिश हो रही हो जिससे ऊंची मक्खी पैदा हो रही हो और मक्खियों को खाने के लिए 4-6 मरणासन्न या मृत मवेशी हों (उदाहरण के लिए, यदि एपिज़ूटिक के दौरान इंडेक्स रंच पर रिपोर्टिंग में देरी हुई हो)। संक्रमित पशुओं की हड्डी या अन्य भोजन से दूषित चारा उत्पादन पशुओं के लिए संक्रमण के स्रोत के रूप में काम कर सकता है, साथ ही दूषित मिट्टी के साथ गंदी घास भी। कच्चा या खराब पका हुआ दूषित मांस संक्रमण का एक स्रोत है दूषित मांस के सेवन से उत्पन्न होने वाला एंथ्रेक्स सूअरों, कुत्तों, बिल्लियों, मिंक, जंगली मांसाहारी और मनुष्यों में बताया गया है।

पशुओं में एंथ्रेक्स की एटियलजि (हेतुविज्ञान)और रोगजनन
घाव के टीकाकरण अंतर्ग्रहण या साँस लेने के बाद एंथ्रेक्स बीजाणु मैक्रोफेज को संक्रमित करते हैं अंकुरित होते हैं और बढ़ते हैं त्वचीय और जीआई संक्रमण में संक्रमण के स्थल पर और संक्रमण स्थल से निकलने वाले लिम्फ नोड्स में प्रसार हो सकता है। घातक विष और एडिमा विष बी एन्थ्रेसीस  द्वारा निर्मित होते हैं और क्रमशः स्थानीय परिगलन और व्यापक एडिमा का कारण बनते हैं, जो रोग के लगातार लक्षण हैं। जैसे-जैसे बैक्टीरिया लिम्फ नोड्स में बढ़ते हैं विषाक्तता बढ़ती है और बैक्टीरिया उत्पन्न हो सकता है। विष उत्पादन में वृद्धि के साथ प्रसारित ऊतक विनाश और अंग विफलता की संभावना बढ़ जाती है।

मृत्यु के बाद किसी जानवर से वानस्पतिक बेसिली निकलने के बाद (शव के फूलने, मैला ढोने वालों या पोस्टमॉर्टम परीक्षण द्वारा) हवा की ऑक्सीजन सामग्री स्पोरुलेशन को प्रेरित करती है। बीजाणु अत्यधिक तापमान रासायनिक कीटाणुशोधन और शुष्कन के प्रति अपेक्षाकृत प्रतिरोधी होते हैं। रक्त फैलने और वनस्पति कोशिकाओं के हवा के संपर्क में आने की संभावना के कारण शव परीक्षण को हतोत्साहित किया जाता है जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में बीजाणु पैदा होते हैं। मृत्यु और अपघटन के बाद तेजी से पीएच परिवर्तन के कारण एक खुले शव में वनस्पति कोशिकाएं बिना बीजाणु के तेजी से मर जाती हैं।

पशुओं में एंथ्रेक्स की महामारी विज्ञान

एंथ्रेक्स लगभग हर महाद्वीप पर रिपोर्ट किया गया है और यह तटस्थ या क्षारीय, शांत मिट्टी वाले कृषि क्षेत्रों में सबसे आम है। इन क्षेत्रों में, एंथ्रेक्स एपिज़ूटिक्स समय-समय पर अतिसंवेदनशील पालतू और जंगली जानवरों के बीच उभरते रहते हैं। ये एपिज़ूटिक्स आम तौर पर सूखे, बाढ़ या मिट्टी की गड़बड़ी से जुड़े होते हैं, और प्रकोप के बीच कई साल बीत सकते हैं। अंतरमहामारी अवधि के दौरान, छिटपुट मामले मिट्टी को दूषित रख सकते हैं। एंथ्रेक्स अब पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और अमेरिका में मिसिसिपी नदी के पूर्व के कुछ देशों में अनुपस्थित है।

अल्प निदान और अविश्वसनीय रिपोर्टिंग के कारण दुनिया भर में एंथ्रेक्स की वास्तविक घटना का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है। अमेरिका में जानवरों के बीच एंथ्रेक्स की सटीक घटना अज्ञात है। जानवरों में संक्रमण लगभग सभी राज्यों में देखा गया है, जिसकी आवृत्ति मध्यपश्चिम और पश्चिम में सबसे अधिक है। एंथ्रेक्स पश्चिम टेक्सास और उत्तर-पश्चिम मिनेसोटा में एन्ज़ूटिक है; दक्षिण टेक्सास, मोंटाना, पूर्वी उत्तर और दक्षिण डकोटा में छिटपुट; और कभी-कभार ही अन्यत्र देखा जाता है। 1900 के बाद से, अमेरिका में मानव एंथ्रेक्स की वार्षिक घटना सालाना ~130 मामलों से घटकर 2004-2005 में कोई भी मामला दर्ज नहीं हुआ है।

दूषित शवों या पशु उत्पादों के संपर्क के बाद मानव मामले हो सकते हैं। उन क्षेत्रों में जहां घरेलू वध और स्वच्छता संबंधी समस्याएं मौजूद हैं, प्रत्येक प्रभावित गाय के परिणामस्वरूप 10 मानव मामले होने का अनुमान है। इन सेटिंग्स में मानव रोग का जोखिम अधिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं में तुलनात्मक रूप से कम है, आंशिक रूप से क्योंकि लोग संक्रमण के प्रति अपेक्षाकृत प्रतिरोधी हैं।

पशुओं में एंथ्रेक्स के नैदानिक ​​निष्कर्ष

नैदानिक पाठ्यक्रम पेराक्यूट से क्रोनिक तक होता है। पेराक्यूट रूप (मवेशियों और भेड़ों में आम) की विशेषता अचानक शुरुआत और तेजी से घातक पाठ्यक्रम है। मवेशियों, भेड़ों और बकरियों में, लड़खड़ाहट, सांस की तकलीफ, कांपना, गिरना, कुछ ऐंठन वाली हरकतें और बीमारी की एक संक्षिप्त अवधि के बाद मृत्यु हो सकती है।

मवेशियों और भेड़ों के तीव्र एंथ्रेक्स में, बुखार की अचानक शुरुआत होती है और उत्तेजना की अवधि होती है जिसके बाद सुस्ती, स्तब्धता, श्वसन या हृदय संबंधी परेशानी, लड़खड़ाहट, दौरे और मृत्यु होती है। अक्सर, बीमारी का क्रम इतना तेज़ होता है कि बीमारी नज़र नहीं आती और जानवर मृत पाए जाते हैं। शरीर का तापमान 41.5°C (107°F) तक पहुंच सकता है चिंतन बंद हो जाता है दूध का उत्पादन काफी कम हो जाता है और गर्भवती पशु का गर्भपात हो सकता है। शरीर के प्राकृतिक छिद्रों से खूनी स्राव हो सकता है। कुछ संक्रमणों की विशेषता स्थानीयकृत चमड़े के नीचे की सूजन होती है और सूजन काफी व्यापक हो सकती है। सबसे अधिक बार शामिल होने वाले क्षेत्र गर्दन वक्ष और कंधों का उदर पहलू हैं।

घोड़ों में एंथ्रेक्स तीव्र हो सकता है। नैदानिक लक्षणों में बुखार, ठंड लगना, गंभीर पेट का दर्द, एनोरेक्सिया, अवसाद, कमजोरी, खूनी दस्त, और गर्दन, उरोस्थि, पेट के निचले हिस्से और बाहरी जननांग में सूजन शामिल हो सकते हैं। मृत्यु आमतौर पर बीमारी के लक्षण दिखने के 2-3 दिनों के भीतर हो जाती है।

यद्यपि वे एंथ्रेक्स के प्रति अपेक्षाकृत प्रतिरोधी हैं सूअरों में बी एन्थ्रेसीस के अंतर्ग्रहण के बाद तीव्र सेप्टीसीमिया विकसित हो सकता है जो अचानक मृत्यु ऑरोफरीन्जाइटिस या आमतौर पर हल्के जीर्ण रूप की विशेषता है। ऑरोफरीन्जियल एंथ्रेक्स की विशेषता गले में तेजी से बढ़ती सूजन है जिससे दम घुटने से मृत्यु हो सकती है। जीर्ण रूप में सूअरों में बीमारी के प्रणालीगत नैदानिक लक्षण होते हैं और उपचार से धीरे-धीरे ठीक हो जाते हैं बाद में कुछ लोगों को वध करने पर (स्पष्ट रूप से स्वस्थ जानवरों के रूप में) ग्रीवा लिम्फ नोड्स और टॉन्सिल में एंथ्रेक्स संक्रमण के प्रमाण मिले हैं। आंतों की भागीदारी को शायद ही कभी पहचाना जाता है और इसमें एनोरेक्सिया, उल्टी, दस्त (कभी-कभी खूनी), या कब्ज की गैर-विशिष्ट नैदानिक विशेषताएं होती हैं।

कुत्तों, बिल्लियों और जंगली मांसाहारियों में एंथ्रेक्स वैसा ही होता है जैसा सूअरों में देखा जाता है। जंगली शाकाहारी जानवरों में बीमारी और घावों का अपेक्षित कोर्स प्रजातियों के अनुसार अलग-अलग होता है लेकिन अधिकांश भाग के लिए मवेशियों में एंथ्रेक्स जैसा होता है।

पोस्टमॉर्टम घाव

कठोर मोर्टिस अक्सर अनुपस्थित या अधूरा होता है। मुंह, नासिका छिद्रों और गुदा से गहरे रंग का रक्त निकल सकता है साथ ही सूजन और तेजी से शरीर सड़ सकता है। यदि शव को अनजाने में खोला जाता है तो सेप्टिकैमिक घाव स्पष्ट होते हैं रक्त गहरा और गाढ़ा होता है और आसानी से जमने में विफल रहता है। पेट और वक्ष की सीरोसल सतहों के साथ-साथ एपिकार्डियम और एंडोकार्डियम पर विभिन्न आकार के रक्तस्राव आम हैं। एडेमेटस लाल रंग का बहाव आमतौर पर विभिन्न अंगों के सीरोसा के नीचे, कंकाल मांसपेशी समूहों के बीच और उपकटिस में मौजूद होता है। रक्तस्राव अक्सर जीआई पथ म्यूकोसा के साथ होता है और अल्सर विशेष रूप से पेयर के पैच पर मौजूद हो सकते हैं। बढ़ी हुई गहरी लाल या काली, मुलायम, अर्धतरल प्लीहा आम है। यकृत, गुर्दे और लिम्फ नोड्स आमतौर पर संकुचित और बढ़े हुए होते हैं। यदि खोपड़ी खोली जाती है तो मेनिनजाइटिस का पता चल सकता है।

क्रोनिक एंथ्रेक्स वाले सूअरों में घाव आमतौर पर टॉन्सिल ग्रीवा लिम्फ नोड्स और आसपास के ऊतकों तक ही सीमित होते हैं क्षेत्र के लसीका ऊतक बढ़े हुए हैं और कटी हुई सतह पर ईंट-लाल रंग के धब्बेदार सैल्मन हैं। टॉन्सिल की सतह पर डिप्थीरिटिक झिल्ली या अल्सर मौजूद हो सकते हैं। शामिल लसीका ऊतकों के आसपास का क्षेत्र आम तौर पर जिलेटिनस और सूजनयुक्त होता है। मेसेन्टेरिक लिम्फ नोड्स से जुड़े एक क्रोनिक आंत्र रूप को भी पहचाना जाता है।

पशुओं में एंथ्रेक्स का उपचार, नियंत्रण और रोकथाम

  • टीकाकरण
  • एंथ्रेक्स संक्रमित शवों का प्रबंधन
  • रोगाणुरोधी चिकित्सा

एंथ्रेक्स को टीकाकरण कार्यक्रमों में तेजी से पता लगाने और रिपोर्टिंग, संगरोध, उपनैदानिक रूप से प्रभावित जानवरों के उपचार (पोस्टएक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस) और संदिग्ध और पुष्टि किए गए मामलों को जलाने या दफनाने के माध्यम से नियंत्रित किया जाता है। उत्पादन पशुओं में स्थानिक क्षेत्र में चरने वाले सभी जानवरों के वार्षिक टीकाकरण और एपिज़ूटिक्स के दौरान नियंत्रण उपायों के कार्यान्वयन द्वारा एंथ्रेक्स को बड़े पैमाने पर नियंत्रित किया जा सकता है। नॉनएनकैप्सुलेटेड स्टर्न-स्ट्रेन वैक्सीन का उपयोग लगभग सार्वभौमिक रूप से उत्पादन पशु टीकाकरण के लिए किया जाता है। टीकाकरण उस मौसम से कम से कम 2-4 सप्ताह पहले किया जाना चाहिए जब प्रकोप की आशंका हो क्योंकि यह एक जीवित क्षीणित बीजाणु टीका है टीकाकरण के 1 सप्ताह के भीतर रोगाणुरोधकों को प्रशासित नहीं किया जाना चाहिए प्रकोप के दौरान डेयरी मवेशियों के टीकाकरण से पहले स्थानीय कानूनों द्वारा आवश्यक सभी प्रक्रियाओं की समीक्षा की जानी चाहिए और उनका पालन किया जाना चाहिए। वर्तमान में अमेरिका और यूरोप में लाइसेंस प्राप्त और उपयोग किए जाने वाले मानव एंथ्रेक्स टीके कृत्रिम रूप से उगाए गए बी एन्थ्रेसीस के फिल्टरेट पर आधारित हैं ।

एंथ्रेक्स संक्रमित शवों का प्रबंधनडॉ. डोमेनिको गैलांटे के सौजन्य से।उत्पादन पशुओं में होने वाले नुकसान को कम करने के लिए प्रारंभिक उपचार और निवारक कार्यक्रम का जोरदार कार्यान्वयन आवश्यक है। जोखिम वाले जानवरों को सभी संभावित ऊष्मायन संक्रमणों को रोकने के लिए तुरंत लंबे समय तक काम करने वाले रोगाणुरोधी के साथ इलाज किया जाना चाहिए इसके बाद उपचार के 7-10 दिनों के बाद टीकाकरण किया जाना चाहिए। प्रारंभिक उपचार या टीकाकरण के बाद बीमार होने वाले किसी भी जानवर को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए और एक महीने बाद दोबारा टीकाकरण किया जाना चाहिए। रोगाणुरोधी दवाओं और टीके का एक साथ उपयोग अनुचित है, क्योंकि अमेरिका में जानवरों के लिए उपलब्ध व्यावसायिक टीके जीवित टीके हैं। जानवरों को उस स्थान से दूर किसी अन्य चरागाह में ले जाया जाना चाहिए जहां शव पड़े थे और किसी भी संभावित मिट्टी संदूषण की संभावना थी। संदिग्ध दूषित फ़ीड को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए। यदि बीमारी के प्रारंभिक चरण में इलाज किया जाए तो घरेलू उत्पादन वाले जानवर पेनिसिलिन के प्रति अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं। विभाजित खुराकों में प्रतिदिन दी जाने वाली ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन भी प्रभावी है। एमोक्सिसिलिन, क्लोरैम्फेनिकॉल, सिप्रोफ्लोक्सासिन, डॉक्सीसाइक्लिन, एरिथ्रोमाइसिन, जेंटामाइसिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन और सल्फोनामाइड्स सहित अन्य रोगाणुरोधकों का भी उपयोग किया जा सकता है, लेकिन पेनिसिलिन और टेट्रासाइक्लिन की तुलना में उनकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन क्षेत्रीय परिस्थितियों में नहीं किया गया है।

उपचार और टीकाकरण के अलावा, बीमारी को रोकने और इसके प्रसार को रोकने के लिए विशिष्ट नियंत्रण प्रक्रियाएं आवश्यक हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं :-

  • उपयुक्त नियामक अधिकारियों की अधिसूचना
  • संगरोध का कठोर प्रवर्तन (टीकाकरण के बाद, खेत से बाहर जाने से 2 सप्ताह पहले, वध के लिए जाने पर 6 सप्ताह)
  • मृत जानवरों, मल, बिस्तर, या अन्य दूषित सामग्री का दाह संस्कार (अधिमानतः) या गहरे दफन द्वारा शीघ्र निपटान
  • बीमार पशुओं को अलग करना और स्वस्थ पशुओं को दूषित क्षेत्रों से हटाना
  • अस्तबलों, बाड़ों, दूध देने वाले खलिहानों और उत्पादन पशुओं पर उपयोग किए जाने वाले उपकरणों की सफाई और कीटाणुशोधन
  • कीट विकर्षक का उपयोग
  • बीमारी से मृत जानवरों को खाने वाले सफाईकर्मियों पर नियंत्रण
  • रोगग्रस्त जानवरों को संभालने वाले लोगों द्वारा अपनी सुरक्षा और बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए सामान्य स्वच्छता प्रक्रियाओं का अवलोकन करना

दूषित मिट्टी को पूरी तरह से कीटाणुरहित करना मुश्किल है, लेकिन यदि स्तर अत्यधिक नहीं है तो फॉर्मल्डिहाइड सफल होगा। इस प्रक्रिया में आम तौर पर मिट्टी हटाने की आवश्यकता होती है।

मानव संक्रमण को उत्पादन पशुओं में संक्रमण को कम करने, संभावित रूप से संक्रमित उत्पादन पशुओं या पशु उत्पादों के साथ मानव संपर्क को कम करने के लिए पशु उत्पादन और वध की पशु चिकित्सा पर्यवेक्षण, और, कुछ सेटिंग्स में, या तो पूर्व या बाद के एक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस द्वारा नियंत्रित किया जाता है। उन देशों में जहां एंथ्रेक्स आम है और उत्पादन पशुओं में टीकाकरण कवरेज कम है, मनुष्यों को उन उत्पादक जानवरों और पशु उत्पादों के संपर्क से बचना चाहिए जिनका वध से पहले और बाद में निरीक्षण नहीं किया गया था। सामान्य तौर पर, अचानक मरने वाले जानवरों के मांस, आपातकालीन वध के माध्यम से प्राप्त मांस और अनिश्चित उत्पत्ति के मांस के सेवन से बचना चाहिए।

एंथ्रेक्स के खिलाफ नियमित टीकाकरण उन व्यक्तियों के लिए संकेत दिया जाता है जो बी एन्थ्रेसिस संस्कृतियों की बड़ी मात्रा या सांद्रता या एयरोसोल उत्पादन की उच्च क्षमता वाली गतिविधियों से जुड़े काम में लगे हुए हैं। नैदानिक नमूनों के नियमित प्रसंस्करण में मानक जैव सुरक्षा स्तर 2 प्रथाओं का उपयोग करने वाले प्रयोगशाला कर्मचारियों को बी एन्थ्रेसीस बीजाणुओं के संपर्क में आने का खतरा नहीं है।

आयातित जानवरों की खाल, फर, हड्डी का भोजन, ऊन, जानवरों के बाल, या बाल के संपर्क में आने वाले श्रमिकों के लिए जोखिम उद्योग मानकों और आयात प्रतिबंधों में सुधार से कम हो गया है। इस समूह के लोगों के लिए नियमित प्री-एक्सपोज़र टीकाकरण की सिफारिश केवल तभी की जाती है जब ये मानक और प्रतिबंध एंथ्रेक्स बीजाणुओं के संपर्क को रोकने के लिए अपर्याप्त हों।

जानवरों के मामले कम होने के कारण अमेरिका में पशुचिकित्सकों को नियमित टीकाकरण की अनुशंसा नहीं की जाती है। हालाँकि, उन क्षेत्रों में संभावित रूप से संक्रमित जानवरों को संभालने वाले पशु चिकित्सकों और अन्य उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए टीकाकरण का संकेत दिया जा सकता है जहां एंथ्रेक्स के मामलों की अधिक घटना होती है।

सीडीसी अनुशंसा करता है कि जैव आतंकवाद हमले के जवाब में बी एन्थ्रेसीस बीजाणुओं के बार-बार संपर्क में आने का जोखिम उठाने वालों को टीका लगाया जाए। उन समूहों में कुछ आपातकालीन प्रथम उत्तरदाता, संघीय उत्तरदाता और प्रयोगशाला कर्मचारी शामिल हैं। अन्य आबादी के लिए आतंकवादी हमले की आशंका में टीकाकरण की अनुशंसा नहीं की जाती है।

मनुष्यो के लिए , बी एन्थ्रेसिस बीजाणुओं के एरोसोल एक्सपोज़र के बाद पोस्टएक्सपोज़र प्रोफिलैक्सिस की सिफारिश की जाती है । प्रोफिलैक्सिस में रोगाणुरोधी चिकित्सा, रोगाणुरोधी चिकित्सा और टीकाकरण का संयोजन और कभी-कभी मोनोक्लोनल एंटीबॉडी शामिल हो सकते हैं।

प्रमुख बिंदु

  • बैसिलस एन्थ्रेसीस अत्यधिक प्रतिरोधी बीजाणु बनाता है जो दशकों तक पर्यावरण में बना रह सकता है और चरने वाले जानवरों को संक्रमित कर सकता है।
  • एंथ्रेक्स स्पष्ट नैदानिक ​​लक्षणों के बिना विकसित होता है, जिसमें तीव्र या अतितीव्र सेप्टीसीमिया और प्राकृतिक छिद्रों से असंगठित रक्त के रिसाव के कारण अचानक मृत्यु हो जाती है।
  • मनुष्य आमतौर पर संक्रमित जानवरों, शवों या पशु उत्पादों के संपर्क में आने के बाद संक्रमण का शिकार होते हैं।
  • यदि संक्रमण के प्रारंभिक चरण में ही रोगाणुरोधकों से उपचार किया जाए तो यह प्रभावी होता है।
  • नियंत्रण उपायों में शवों का सही निपटान, दूषित सामग्रियों का कीटाणुशोधन और परिशोधन और पर्यावरण का परिशोधन शामिल है।
  • बीमारी को नियंत्रित करने और रोकने के लिए उजागर जानवरों और मनुष्यों का टीकाकरण सबसे अच्छा अभ्यास है।
  • बैसिलस एन्थ्रेसीस जैव-आतंकवाद एजेंट के रूप में संभावित उपयोग से पशु और मानव रोग के लिए चिंता का विषय है।

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ड्रोन दीदी योजना15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन सुलभ कराने का मौका मिला है। पहल का नाम है – ‘ड्रोन दीदी योजना’। इसके अंतर्गत महिला स्वयं सहायता समूहों को कृषि के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट काम के लिए ड्रोन किराए पर उपलब्ध कराया जाएगा। ये ड्रोन कृषि उपकरणों के प्रयोग के लिए खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले उर्वरकों के प्रसार के लिए होंगे। महिला स्वयं सहायता समूह इस योजना के तहत….Click Here मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजनाबागवानी फसलों में प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाओं के कारण से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा सरकार द्वारा मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना की शुरुआत की गई है। इस योजना के तहत किसानों को प्रति एकड प्रीमीयम राशि 2.5 प्रतिशत सब्जियों मसालों के लिए 750 रूपये प्रति एकड़ व फलों के लिए 1000 रूपये प्रति एकड़ देना होगा..Click Hereराष्ट्रीय हरित भारत मिशन या ग्रीन इंडिया मिशनहरित भारत मिशन या ग्रीन इंडिया (GIM) मिशन स्पष्ट रूप से परिभाषित लक्ष्यों, पैमानों, कार्यान्वयन समय और मील के पत्थर के साथ-साथ मात्रात्मक परिणाम और सेवा स्तरों वाली एक परियोजना है, जो सामान्यतः एक “मिशन मोड” परियोजना होती है।
इस पहल का उद्देश्य पांच मिलियन हेक्टेयर वन और वृक्षों के आवरण….Click Here

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अफारा रोग (Tympany)

Table Of Content

  • अफारा रोग
  • अफारा रोग के प्रमुख लक्षण
  • अफारा रोग के कारण
  • अफारा रोग से बचाव
  • पशु में अफारा होने पर अन्य अफारानाशक औषधियां

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अफारा रोग से बचाव

अफारा रोग
अफारा रोग के प्रमुख लक्षण
अफारा रोग के कारण
अफारा रोग से बचाव
पशु में अफारा होने पर अन्य अफारानाशक औषधियां
अफारा रोग

अफारा रोग पशुओं में आमतौर और अचानक होने वाली बीमारी है। यह रोग पशुओं में ज्यादा खाने या दूषित खाने के कारण होता है। इस रोग में पशु के पेट में एसिडिटी अमोनिया, कार्बनडाईऑक्साइड, मीथेन जैसी दूषित गैस बन जाती हैं।

इस गैस का दबाव छाती पर पड़ता है और पशु को सांस लेने में तकलीफ़ होती है। इससे पशु बेचैन हो कर बैठ जाता है या एक साइड लेट जाता है पैर पटकने लगता है। अगर इस अवस्था में तुरंत इलाज नहीं किया जाए तो पशु कुछ घंटों में मर भी जाता है।

अफारा रोग के प्रमुख लक्षण

    • पशु को सांस लेने में कठिनाई होना।
    • जुगाली करना बंद कर देना।
    • पशु का पेट बायें और अधिक फूल जाना।
    • खाना और पानी पीना बंद कर देना।
    • ज़मीन पर लेट कर पाँव पटकना।
    • पशु के फुले हुए पेट पर धीरे धीरे देने से ढ़ोल जैसी डब डब आवाज़ करना।

अफारा रोग के कारण

    • खाने में अचानक बदलाव करना।
    • ज्यादा मात्रा में हरा और सुख चारा और दाना खा लेना।
    • चारे भूसे के साथ कीड़े और जहरीले जानवर खा जाना।
    • दूषित पानी पी लेना।
    • बिनौले जैसे तैलीय आहार का देना।
    • हरा चारा बरसीम को खेत से काटकर सीधे पशु को खिलाना

अफारा रोग से बचाव

चारा भूसा आदि खिलाने से पहले पानी पिलाएं। प्रतिदिन पशु को कुछ देर खुला चरने दें। पशुओं को दूषित चारा, दाना भूसा और पानी न दें। हरा चारा जैसे बरसीम ज्वार रजका बाजरा काटने के बाद कुछ समय पड़ा रहने दें उसके बाद खिलाएं। पशु को लगातार भोजन ना दें कम से कम 20 मिनट का अन्तराल जरूर दें। हरा चारा पूरी तरह पकने के बाद ही खिलाएं। अचानक पशु के खानपान में परिवर्तन नहीं करें।

पशु में अफारा होने पर अन्य अफारानाशक औषधियां

अफारानाशक दवाइयों के नाम :-

1. Afron एफ़्रोन :

यह बड़े पशुओं को जैसे बैल भैंसे आदि को एक लीटर गुनगुने पानी में 50 ग्राम मिलाकर नाल द्वारा दिया जाना चाहिए।

2. GARLILL :

यह पाचन क्रिया में गड़बड़ी होने पर लाभदायक है। इसे 10 ग्राम की मात्रा में मुंह के द्वारा देना चाहिए।

3. TIMPOL टीम्पोल :

यह भी एक आयुर्वेदिक दवाई है। इसे 25 से 80 ग्राम गुनगुने पानी या LINSID तेल के साथ दिन में दो बार देना चाहिए।
4. TYMPLAX टाईम्पलेक्स :
यह पेट में वायु गोला, अफारा आदि में काम आती है। इसे 100मिली. की मात्रा में देना चाहिए।

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