हरियाणा मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना के अंतर्गत पात्र व्यक्ति को निमन्लिखित लाभ प्रदान किये जायेंगे :-
सब्जियों व मसलों के लिए 30,000 रुपए प्रति एकड़।
फलों के लिए 40,000 रुपए प्रति एकड़।
किसान का अंशदान बीमित राशि का 2.5 प्रतिशत होगा।
प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान की भरपाई हेतु एक विशेष योजना मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना के नाम से दिसंबर 2020 में शुरू की गई है।
मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना
बागवानी फसलों में प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाओं के कारण से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा सरकार द्वारा मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना की शुरुआत की गई है। इस योजना के तहत किसानों को प्रति एकड प्रीमीयम राशि 2.5 प्रतिशत सब्जियों मसालों के लिए 750 रूपये प्रति एकड़ व फलों के लिए 1000 रूपये प्रति एकड़ देना होगा। सब्जियों एवं मसालों के लिए न्यूनतम मुआवजा राशि प्रति एकड़ 15,000 रूपये व अधिकतम 30,000/- रूपये तथा फलों के लिए न्यूनतम मुआवजा राशि 20,000 रूपये व अधिकतम 40,000/- रूपये होगी। योजना में शामिल प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाएं
ओलावृश्टि, तापमान, पाला
ओलावृश्टि, तापमान, पाला जल कारक (बाढ़, बादल फटना, नहर/ड्रेन का टूटना, जलभराव) आंधी तूफान व आग
1. सरकार की खरीद से फसल के दाम बढते है :- जब सरकार न्यूनतम मूल्य तय कर फसलो को खरिदने लगती है तो बाजार में फसल के दाम बढ़ जाते हैं यही कारण है कि सरकार किसानों से एमएसपी पर फसल सही मूल्य पर खरीदती है |
2. फसल के लिए कोल्ड स्टोरेज का अभाव :- खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की रिपोर्ट के अनुसार 2021 मे देश में कुल फसल उत्पादन 311 MMT है जबकि कुल भंडारण क्षमता 145 MMT है यानि 166 MMT फसल को रखने के लिए जगह नहीं है | अगर किसानों की फसल सरकार नहीं खरीदती है कोल्ड स्टोरेज की कमी से फसल ख़राब होगी या किसानों को कम दाम पर फसल बेचनी पड़ेगी | 3. फसल की उपज पर मौसम की पावंदी :-
बाजार में किसी भी चीज की कीमत मांग और पूर्ति पर निर्भर करती है अब मानलीजिए कोई भी कंपनी गाडी बनाती है यदि वाहन की मांग बढ़ जाती है तो वाहन का उत्पादन और कीमत बढ़ाई या घटाई जाती है लेकिन किसानों को नहीं |फसल हमेशा एक तय चक्र में होती है इसे ऐसे समझें कि गेहूं की फसल की बुआई रबी के मौसम में यानी अक्टूबर से नवंबर तक ये फसल मार्च से अप्रैल तक तयार हो जाती है | ऐसे में फसल एकदम से बाजार में लेकर जाता है तो ज्यादा मात्रा होने से फसल की कीमत कम हो जाती है| इस समय कम कीमत पर खरीदार और निजी कंपनियां फसल खरीद करके स्टॉक कर लेती हैं इस तरह किमत नियंत्रण करना किसान के हाथ में नहीं रहता और सरकार के दखल की जरूरत पड़ती है|
4. किसानो के पास पुंजी का अभाव :-
भारतीय किसानों के प्रत्येक परिवार की औसत मासिक आय लगभग 10 हजार रुपये है |अधिकांश किसानों के पास एक फसल बुआई के बाद पैसे नहीं होते यही मुख्य कारण है कि फसल काटने के बाद अगली फसल बुआई से पहले फसल बेचना मजबूरी है
5. आय बढ़ाने के लिए किसानों को सब्सिडी :-
अमेरिका किसानों को आय बढ़ाने के लिए हर साल 42 लाख रुपये से ज्यादा की सब्सिडी देता है भारतीय किसानों को सालाना दी जाती है सिर्फ 15 हजार रुपये सब्सिडी| जब बाजार में फसल की कीमत कम हो जाती है तो सरकार कृषि अनुदान पर फसल खरीदती है ताकि किसानों की आय बढ़े
जी हां, कृषि वैज्ञानिक देवेन्द्र शर्मा का कहना है की अगर किसी देश में MSP लागु ना हो फिर व्यवसायी बाजार के हिसाब से कीमत तय करते हैं उन्हें इसे कोई लेना देना नहीं, फसल उत्पादन में किसान कितना खर्च करते हैं |
वह केवल बेहतर गुणवत्ता वाली फसल देखता है, कि उनको कम कीमत में कैसे मिलेगी तो इस प्रकार जब किसी भी राज्य में सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य में किसानो से फसल खरीदता है फिर राज्य के व्यवसायी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदारी करते हैं इस प्रकार किसानों को फसल का सही मूल्य मिलता है|
एमएसपी कृषि उत्पादन का न्यूनतम मूल्य है, जो किसानो को फसल पर मिलता है भले ही बाजार में फसल के दाम कम हो |इसके पीछे तर्क ये है कि उस फसल की कीमत में उतार चढ़ाव का असर किसानो पर ना हो उन्हें न्यूनतम मूल्य मिलता रहे|
सरकार हर फसल सत्र से पहले CACP यानि (कृषि लागत और प्रक्रिया की सिफ़ारिश पर MSP तय करती है ये एक तरह से किमतों में गिरावट पर किसानो को बचाने वाली बीमा पॉलिसी की तरह काम करती है
देश के किसानों को MSP की ज़रूरत की वजह…
1950 और 1960 के दशक की बात है उस समय किसानों को चिंता थी किसी फसल का बंपर प्रोडक्शन हो जाता था तो उन्हें सही कीमत नहीं मिल पाती थी इस वजह से किसान आंदोलन करने लगे |लगत तक नहीं निकल पाती थी ऐसे में भोजन प्रबंधन एक बड़ा संकट बन गया था किसानो के आंदोलन पर सरकार का नियंत्रण नहीं था|
1964 L K Jha के नेतृत्व में खाद्यान्न मूल्य समिति (food grains committee) बनाई गई| झा समिति की रिपोर्ट पर 1965 में भारतीय खाद्य निगम(FCI) सथपना हुई कृषि प्रक्रिया आयोग यानि(APC) बना|
दोनों संस्थाओं का काम, देश में खाद्य सुरक्षा को लेकर कानून बनाना में मदद करना था| FCI वह एजेंसी है जो एमएसपी पर फसल खरीद करता है पर अपने गोदाम में स्टोर करत है| PDS (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) के जरीये जनता तक फसल को रिययती दर पर पहुंचाती है|
PDS के तहत पूरे देश में लगभग 5 लाख उचित्त वैल्यू की दुकानें हैं जहां से रियायती दर पर फसल वितरित की जाती है
आँकड़े 2024-25 रबी सत्र के लिए है फसलो पर स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूला से MSP लागू हो तो सरकार पर कितना बोझ पड़ेगा ?
क्रिसिल बाज़ार इंटेलीजेंस एंड एनालिटिक्स के रिसर्च डायरेक्टर पूषन शर्मा ने दैनिक भास्कर को बताया की हमारे संस्थान की रिसर्च के अनुसर येदि सरकार एमएसपी वाली सभी 23 फसल का उत्पादन खरीदती है तो सरकारी खजाने पर इसका गहरा असर होगा अगर ये मानले की सरकार केवल मंडियो से उन फसलों को खरीदेगी, जिनकी खरीद एमएसपी के फॉलो होती है तो भी सरकार को वित्तीय वर्ष 2023 के लिए लगभग 6 लाख करोड़ रुपए की जरूरत है| एजेंसी के रिसर्च में एमएसपी वाली 23 में से 16 फसलो को ही सामिल किया गया ह |
ये वो फ़सल है, जिसका कुल उत्पादन में 90% हिसादारी है तो हो सकता है सरकार को रक्षा बजट कम करना होगा अथवा सरकार को टेक्स बहुत बढ़ाना पड़ेगा यही कारण है कि सरकार इसे लागू करने से बच रही है | एमएसपी लागू होने से 6 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च पर विशेषज्ञ का क्या कहना?
अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबिक ये सिर्फ अफ़वाह है और डराने वाली बात है 2024 में देश का कुल बजट 47 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा रहा| इसमे कृषि बजट सिर्फ 1.27 लाख करोड़ का है | अगर एमएसपी के लिए 2 लाख करोड़ तक अतिरिक्त पैसा भी लगता है तो सरकार को हिचकना नहीं चाहिए |सरकार किसानों से पूरी फसल नहीं खरीद सकती | MSP लागू होने पर सरकार को सिर्फ वही फसल खरीदनी होगी, जिसकी कीमत बाजार में एमएसपी से कम मिल रही हो| अगर सरकार किसानों से 10% फसल भी खरीदती है तो बाजार में फसल की कीमत बढ़ जाएगी| सरकार को इस ज्यादा से ज्यादा 1.80 लाख करोड़ रुपए का खर्च करना होगा| 10 लाख करोड़ रुपए खर्च होने की बात गलत है |
कृषि वैज्ञानिक देवेन्द्र शर्मा के मुताबिक एमएसपी लागू होने से कृषि से जुड़ी 50% आबादी को फायदा मिलेगा | 2016 में सरकार ने 7वा बेतन आयोग लागू किया तो 4.80 लाख करोड़ खर्च हुए इससे सिर्फ 4% से 5% आबादी को फ़ायदा हुआ था| सरकार अभी धान और गेहूं की सरप्लस, यानि जरुरत से ज्यादा खरीददारी कर रही है| नवंबर 2023 में सरकारी गोदाम FCIमें धान का स्टॉक 7.5 MT होना चाहिए था| जबकी इस बक्त FCI में 40 MT है| मतलब जरुरत से 5 गुना ज्यादा चावल का स्टॉक भारत में है अगर सभी फसलो पर एमएसपी लागू होता है तो किसान चावल और गेहूं की फसलें बजाएं दूसरी फसल पर शिफ्ट करेंगे|
इससे एफसीआई में दाल और तिलहन की कमी दूर होगी गेहूं और चावल का भी सरप्लस(अधिशेष) कम होगा सरकार अभी भी करीब 1.50 लाख करोड़ रुपये तक अतिरिक्त फसल की खरीददारी में खर्च करती है इतने ही पैसे में सरकार दूसरी फसल को एमएसपी कीमत पर खरीद सकती है |
किसान 2004 के स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिश और मुताबिक फ़सलों की कीमत चाहते हैं
एमएसपी लागू होने से देश को क्या फायदा ? MSP लागू होने पर एक दो साल समस्या बनी रहेगी लोग गेहूं और चावल ज्यादा पैदा करने लगेंगे | फलतः धीरे-धीरे किसान दूसरे फसल की तरफ शिफ्ट करेंगे | MSP लागू होने से देश को मुख्यरूप से दो फ़ायदे होंगे…
1.पर्यावरण के लिहाज से :- अभी देश में जिन फसलो पर एमएसपी मिलती है, किसान सिर्फ वही फसल उपजाते हैं अगर सारी फसल पर एमएसपी लागू हो तो जिन राज्यों में पानी कम है जैसा राजस्थान वाह किसान तिलहन और दलहन वाली कम पानी वाली फसल लगाएंगे और पानी के जलसतर भी ऊंचा होगा |
2.भारत आत्मनिर्भर होगा और अनाज की आयत घटेगा :- 2022-23 के मार्केटिंग(विपणन) सत्र (नवंबर-अक्टूबर) के दोरान देश में तिलहन का आयत तेजी से बढकर 164.66 लाख टन हो गया |इस तरह भारत ने अब तक का सबसे ज्यादा तिलहन आयत किया अगर देशभर में एमएसपी लागू हुआ तो किसान दलहन और तिलहन की उपज करेंगे इससे ये फसले दूसरे देश से आयत नहीं करनी पड़ेगी| MSP का सबसे ज्यादा लाभ देने वाले 5 राज्य
प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबिक MSP लागु होने से देश में मुख्यरूप से आम आदमी को दो तरह से फ़ायदा होगा…
1.अर्थव्यवस्था को रफ़्तार मिलेगी : देश की 50% से ज्यादा आबादी खेती पर निर्भर है| अगर एमएसपी लागू हुआ तो किसानो की आय बढेगी उनके खरीदने की क्षमता बढेगी | महँगाई ज़रूर बढ़ेगी लेकिन सरकार के पास सब्सिडी में खर्च होने वाला 2 लाख करोड़ रुपये तक बचेगा सरकार इस पैसे को बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर सकती है|
2.भूखमारी और कुपोषण भी घटेगा : MSP लागू होता है तो देश के ज्यादातर खेती से जुड़े लोगों की आय बढ़ेगी इससे वो फल, साग-सब्जी पर पेसा खर्च कर पाएंगे इससे कुपोषण घटेगा | सरकार को खाद्य सुरक्षा योजना के लिए सिर्फ 25 मिलियन टन फसल चाहिए इस तरह फसल के सरप्लस की समस्या कम हो जाएगी |
प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबिक MSP लागु करणे से बचने की दो मुख्य वजह है | पहली वजह ये है कि सरकार किसानों पर 2 लाख रुपये तक खर्च करने वाली इस योजना को लागू करने से डर रही है सरकार को लगता है कि इससे बोझ बढ़ेगा, लेकिन ऐसा नहीं है|
इसके अलावा एक बड़ी वज़ह ये है कि देश में लेबर कॉस्ट यानी मजदुरी कम रखने के लिए खाने की चीज की कीमत कम रखना जरूरी है | अगर सरकार MSP लागू करती है तो खाने पीने की सामान की कीमत बढेगी| इससे श्रम लागत बढ़ेगी घरो में काम करने वाले ड्राइवर, मजदूरों की मज़दूरी बढ़ेगी ,सरकार ऐसा नहीं चाहती है|
केंद्र सरकार के तरफ से केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि सरकार ने किसानों को लागत का 50 प्रतिशत से अधिक का मुनाफे के साथ समर्थन मूल्य जारी किए हैं। अखिल भारतीय औसत उत्पादन लागत पर अपेक्षित लाभ गेहूं के लिए 102 प्रतिशत, रेपसीड और सरसों के लिए 98 प्रतिशत, मसूर के लिए 89 प्रतिशत, चने के लिए 60 प्रतिशत, जौ के लिए 60 प्रतिशत और कुसुम के लिए 52 प्रतिशत है। रबी फसलों की इस बढ़ी हुई एमएसपी से किसानों के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित होगा और फसल विविधिकरण को प्रोत्साहन मिलेगा।
सरकार फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य उसकी लागत के अनुसार तय करती है। केंद्र सरकार ने सभी फसलों की औसत लागत को समर्थन मूल्य में जोड़ा है। जिसमें किराए के मानव श्रम, बैल श्रम / मशीन श्रम, भूमि में पट्टे के लिए भुगतान किया गया किराया, बीज, उर्वरक, खाद, सिंचाई शुल्क जैसे सामग्री इनपुट के उपयोग पर किए गए खर्च, उपकरणों एवं कृषि संबंधी भवनों पर मूल्यह्रास, कार्यशील पूंजी पर ब्याज, पंप सेट आदि के संचालन के लिए डीजल/बिजली, विविध खर्च और पारिवारिक श्रम का आरोपित मूल्य को शामिल किया गया है।
बता दें कि सरकार खाद्य सुरक्षा बढ़ाने, किसानों की आय में वृद्धि करने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए तिलहन, दलहन और श्रीअन्न/मोटे अनाजों की उपज बढ़ाने के क्रम में फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है। सरकार के अनुसार विपणन सीजन 2024-25 के लिए रबी फसलों के एमएसपी में वृद्धि की है, ताकि उत्पादकों को उनकी उपज के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जा सके।
राज्य सरकार ने गन्ने का मूल्य 372 रुपये से बढ़ाकर 386 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है, जो देश में सबसे अधिक है. इसके साथ ही सरकार ने गन्ना किसानों के भविष्य का ख्याल रखते हुए आगामी वर्ष के लिए 400 रुपये प्रति क्विंटल मूल्य देने की भी घोषणा की है. राज्य सरकार ने मेरी फसल मेरा ब्योरा पोर्टल के तहत पिछले 7 सीजन में 12 लाख किसानों के खातों में 85,000 करोड़ रुपये भेजे हैं. साथ ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 29.45 लाख किसानों ने 7656 करोड़ रुपये के बीमा का दावा किया है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसानों को अपनी फसल बेचने में असुविधा न हो, राज्य सरकार 7,000 करोड़ रुपये की लागत से गन्नौर, सोनीपत में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की बागवानी बाजार का निर्माण कर रही है। इसी तरह, राज्य सरकार पिंजौर में 150 करोड़ रुपये की लागत से सेब, फल और सब्जी मंडी का निर्माण कर रही है। इसके साथ ही सरकार ने नई और अतिरिक्त मंडियों के विकास पर 1074 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. 1,74,464 एकड़ में धान की खेती की जगह वैकल्पिक फसलों की खेती की जा रही है. इसके तहत राज्य सरकार ने किसानों को 7000 रुपये प्रति एकड़ की दर से 118 करोड़ रुपये की सहायता दी है. साथ ही सरकार ने भावांतर भरपाई योजना के तहत बाजरा किसानों के खाते में 836 करोड़ रुपये भेजे हैं. प्राकृतिक खेती योजना के तहत 11,043 किसानों को पंजीकृत किया गया है। इन्हें प्रशिक्षण देने के लिए गुरुकुल कुरूक्षेत्र, हमेती (जींद), मंगियाना (सिरसा) और घरौंडा में प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण केंद्र शुरू किए गए हैं। राज्य सरकार ने अटल किसान मजदूर कैंटीन योजना के माध्यम से 10 रुपये प्रति प्लेट पर भोजन उपलब्ध कराने के लिए 25 मंडियों में कैंटीन शुरू की है। प्रदेश की 108 मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार पोर्टल (ई-नाम) से जोड़ा गया है। साथ ही, पंचकुला, सेक्टर-20 और गुरुग्राम में किसान बाजार शुरू किए गए हैं। सरकार फसल प्रबंधन पर होने वाले खर्च को पूरा करने के लिए किसान को प्रति एकड़ 1000 रुपये की सब्सिडी दे रही है।
मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने शुक्रवार को कहा कि हरियाणा न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एमएसपी ) पर 14 फसलें खरीदने वाला देश का पहला राज्य है। गेहूं और धान के साथ-साथ सरकार 367 मंडियों के माध्यम से तिलहन, बाजरा, मूंग और अन्य खाद्यान्नों की भी खरीद कर रही है। हरियाणा में फिलहाल गेहूं, सरसों, जौ, चना, धान, मक्का, बाजरा, कपास, सूरजमुखी, मूंग, मूंगफली, अरहर, उड़द और तिल की खरीद एमएसपी पर हो रही है।
अधिकांश राज्य गेहूं, धान, कपास और गन्ना जैसी कुछ लोकप्रिय फसलों को एमएसपी पर खरीदते हैं।
जामुन एक सदाबहार वृक्ष है, जिसका पूर्ण विकसित पौधा 25 से 30 फ़ीट ऊँचा होता है | इसका पौधा एक बार लग जाने के पश्चात 50 से 60 वर्षो तक पैदावार दे देता है | जामुन को जमाली, राजमन, ब्लैकबेरी, और काला जामुन के नामों से भी जानते है | इसका पूरा ही वृक्ष काम में लाया जाता है, किन्तु इसके फलो को खाने में अधिक पसंद करते है | खाने के अलावा जामुन का उपयोग अनेक प्रकार की चीजों जेली, शरबत, जैम और शराब तथा अन्य चीजों को बनाने के लिए करते है |
आरम्भ में इसका फल काले रंग का होता है, जिसमे गहरे लाल रंग का गुदा होता है | जामुन के फलो में अम्लीय गुण होने के कारण यह स्वाद में कसेला होता है | इसके फलो का सेवन कर एनीमिया, मधुमेह, दाँत और पेट संबंधित समस्याओ में लाभ प्राप्त होता है | यदि आप भी जामुन की खेती करने का मन बना रहे है, तो इस लेख में आपको जामुन की खेती कैसे करें (Jamun Farming in Hindi) तथा जामुन कितने दिन में फल देता है? इसकी जानकारी दी जा रही है |
जामुन की खेती किसी भी उपजाऊ मिट्टी में की जा सकती है | किन्तु उचित जल निकासी वाली भूमि को जामुन की पैदावार के लिए उपयुक्त माना जाता है | इसकी खेती में पौधों को कठोर और रेतीली भूमि में नहीं उगाया जाता है | जामुन की खेती में भूमि का P.H. मान 5 से 8 के मध्य होना चाहिए |
जामुन का पौधा समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु वाला होता है | ठंडे प्रदेशो के अलावा जामुन के पौधों को कही भी उगाया जा सकता है | इसके विकसित वृक्ष पर गर्मी, सर्दी और वर्षा का कोई खास असर नहीं पड़ता है | किन्तु पौधों के लिए सर्दियों में गिरने वाला पाला अधिक हानिकारक होता है | इसके पौधे पर फल बारिश के मौसम में अच्छे से पकते है, तथा फूल बनने के दौरान बारिश की आवश्यकता नहीं होती है |
जामुन के पौधों को आरम्भ में अंकुरित होने के लिए 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है, तथा पौध विकास के लिए सामान्य तापमान जरूरी होता है |
इस क़िस्म की जामुन का उत्पादन भारत में अधिक मात्रा में किया जाता है | जिसमे निकलने वाले फलो का आकार बड़ा आयताकार और रंग गहरा बैंगनी होता है, जो स्वाद में मीठे और रसदार होते है | इसके फलो के अंदर छोटे आकार की गुठली पायी जाती है |
सी.आई.एस.एच. जे – 45
जामुन की इस क़िस्म को उत्तर प्रदेश में सेंट्रल फॉर सब-ट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर ऑफ़ लखनऊ द्वारा तैयार किया गया है, जिसे गुजरात और उत्तर प्रदेश में अधिक मात्रा में उगाया जाता है | इस क़िस्म में निकलने वाले फलो का आकार सामान्य मोटा और अंडाकार होता है, जो पकने के बाद गहरा काला और नीले रंग का हो जाता है | इसके पौधों में निकलने वाले फल स्वाद में मीठे और अधिक रसीले होते है |
री जामुन
यह क़िस्म पंजाब राज्य में अधिक मात्रा में उगाई जाती है | बारिश के मौसम में इस क़िस्म के पौधे अधिक मात्रा में फल देते है, तथा फलो का रंग नीला और गहरा जामुनी होता है | इसके फलो का आकार अंडाकार होता है, जो स्वाद में मीठे के साथ हल्के खट्टे होते है |
गोमा प्रियंका
जामुन की यह क़िस्म गुजरात के केन्द्रीय बागवानी प्रयोग केन्द्र गोधरा के माध्यम से तैयार की गयी है | जिसमे निकलने वाले फलो में गुदा अधिक मात्रा में पाया जाता है, जो स्वाद में कसेले होते है |
काथा
इस क़िस्म के फलो का आकार थोड़ा छोटा होता है, तथा देखने में गहरे बैंगनी होते है | जामुन की इस क़िस्म को किसान भाई बहुत की कम मात्रा में उगाया जाता है, क्योकि इसके फलो में गुदा बहुत ही कम मात्रा में पाया जाता है |
भादो
यह क़िस्म पछेती पैदावार के लिए उगाई जाती है, जिसमे निकलने वाले फल गहरे हरे रंग के होते है | यह क़िस्म बारिश के मौसम में पककर तैयार हो जाती है | इसके फलो का स्वाद हल्की मिठास लिए हुए खट्टा होता है |
सी.आई.एस.एच. जे – 37
इस क़िस्म को उत्तर प्रदेश के सेंट्रल फॉर सब-ट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर ऑफ़ लखनऊ के माध्यम से तैयार किया गया है | इसमें निकलने वाले फल गहरे काले रंग के होते है, जो बारिश के मौसम में पैदावार देने के लिए जाने जाते है | इसमें फलो की गुठलिया आकार में छोटी तथा गुदा मीठा और रसदार होता है |
जामुन का पूर्ण विकसित पौधा 50 वर्षो तक पैदावार दे देता है | इसके लिए खेत में पौध रोपाई से पूर्व खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लिया जाता है | इसके लिए सबसे पहले खेत की गहरी जुताई कर पुरानी फसल के अवशेषों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया जाता है | खेत की जुताई के पश्चात् उसमे पानी लगाकर पलेव कर दे | पलेव करने के कुछ दिन बाद रोटावेटर लगाकर खेत में मौजूद मिट्टी के ढेलो को तोड़ कर भुरभुरा कर दिया जाता है | इस भुरभुरी मिट्टी में पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है |
इसके बाद पौधों की रोपाई के लिए समतल खेत में 5 से 7 मीटर की दूरी रखते हुए दो फ़ीट गहरे और एक मीटर चौड़े व्यास वाले गड्डे तैयार कर लिए जाते है | इन गड्डो में जैविक और रासायनिक खाद की उचित मात्रा को मिट्टी में मिलाकर गड्डो में भरना होता है | जैविक खाद के रूप में 10 से 15 KG पुरानी सड़ी गोबर की मात्रा को मिट्टी में अच्छे से मिलाकर गड्डो में भर दिया जाता है | गड्डो में खाद को डालने के बाद उनकी गहरी सिंचाई कर दी जाती है |
इसके अलावा पौधों को आरम्भ में रासायनिक खाद एन. पी. के. की 100 GM की मात्रा का छिड़काव पौधों पर वर्ष में तीन बार करना होता है, तथा पूर्ण विकसित पौधे को वर्ष में चार बार 50 से 60 की मात्रा को देना होता है|
जामुन के पौधों की रोपाई बीज और कलम से तैयार पौध के माध्यम से की जाती है | इसके लिए किसानभाई बीज से नर्सरी में पौधों को तैयार कर सकते है, या किसी सरकारी रजिस्टर्ड नर्सरी से भी पौधों को खरीद सकते है | नर्सरी से ख़रीदे गए पौधे 3 से 4 महीने पुराने और बिल्कुल स्वस्थ होने चाहिए | बीज के रूप में रोपाई के लिए खेत में तैयार गड्डो में एक से दो बीजो को 5 CM की गहराई में लगाना होता है | इन बीजो को खेत में लगाने से पूर्व उन्हें उपचारित अवश्य कर ले, इससे बीजो में रोग लगने का खतरा कम हो जाता है |
इसके अलावा यदि आप पौध रोपाई पौध के माध्यम से करना चाहते है, तो उसके लिए आपको खेत में तैयार गड्डो में एक छोटा सा गड्डा बनाकर पौधों को लगाना होता है | गड्डो में पौधों की रोपाई के पश्चात् उन्हें मिट्टी से अच्छी तरह से ढक देते है |
इसके पौधों की रोपाई के लिए अनुकूल तापमान बारिश के मौसम को माना जाता है | इसके अलावा यदि आपने रोपाई बीज के माध्यम से की है, तो आपको बीजो की रोपाई बारिश के मौसम से पहले करनी होती है | इस दौरान बीजो की रोपाई फ़रवरी से मार्च माह के अंत तक की जा सकती है |
जामुन के पौधों को आरम्भ में अधिक सिंचाईकी आवश्यकता होती है | इस दौरान पौधों की पहली सिंचाई पौध रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है | गर्मियों के मौसम में जामुन के पौधों को सप्ताह में एक बार पानी देना होता है, तथा सर्दियों के मौसम में 15 दिन के अंतराल में पानी देना चाहिए | आरम्भ में इसके पौधों को सर्दियों में गिरने वाले पाले से बचाना होता है, तथा बारिश के मौसम में पौधों को पानी की बहुत कम जरूरत होती है | पूर्ण विकसित पौधों को वर्ष में 5 से 6 सिंचाई की आवश्यकता होती है |
जामुन की फसल मेंखरपतवार नियंत्रण के लिए प्राकृतिक विधि निराई – गुड़ाई विधि का इस्तेमाल किया जाता है | जामुन की फसल में पहली गुड़ाई पौध रोपाई के 18 से 20 दिन पश्चात् की जाती है | आरम्भ के वर्ष में इसके पौधों को 7 से 8 गुड़ाई की ही आवश्यकता होती है |
जामुन के पौधों को पैदावार देने में 5 वर्ष से भी अधिक का समय लग सकता है | इस दौरान यदि किसान भाई चाहे तो पौधों के मध्य ख़ाली पड़ी भूमि में कम समय में तैयार होने वाली सब्जी, मसाला फसलों को उगाकर अतिरिक्त कमाई भी कर सकते है | इससे किसानो को जामुन की पैदावार प्राप्त होने तक आर्थिक स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा |
इंडोसल्फान या क्लोरपीरिफॉस का छिड़काव पौधों पर करे|
2.
पत्ती झुलसा
कीट
एम-45 का उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर करे |
3.
फल और फूल झड़न
कीट
जिब्रेलिक एसिड का छिड़काव पौधों पर करे |
4.
फल छेदक
पत्ता जोड़ मकड़ी
नीम के पानी या नीम के तेल का छिड़काव पौधों पर करे |
5.
पत्तियों पर सुंडी रोग
सुंडी
डाइमेथोएट या फ्लूबैनडीयामाइड का छिड़काव पौधों पर करे |
जामुन कितने दिन में फल देता है, और लाभ
जामुन के पौधों को पैदावार देने में 8 वर्षा का समय लग जाता है | इसके पौधों पर फूल निकलने के डेढ़ माह पश्चात् फल आना शुरू कर देते है| जब इसके पौधों पर लगे फल बैंगनी और काले रंग के दिखाई देने लगे है, उस दौरान उनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए| जामुन के फलो की तुड़ाई रोज की जाती है| फलो को तोड़ने के बाद उन्हें पानी से धोकर साफ कर ले | इसके बाद उन्हें जालीदार टोकरी में रख ले| इस दौरान यदि कोई फल ख़राब दिखाई दे तो उसे अलग कर लेना चाहिए|
जामुन के पूर्ण विकसित पौधे से 80 से 90 KG का उत्पादन प्राप्त हो जाता है| एक एकड़ के खेत में तक़रीबन 100 से अधिक पेड़ो को लगाया जा सकता है| जिससे 10,000 KG का उत्पादन प्राप्त हो जाता है| जामुन का बाज़ारी भाव 60 से 80 रूपए प्रति किलो होता है, जिससे किसान भाई इसकी एक बार की पैदावार से 6 से 8 लाख तक की अच्छी कमाई कर लाभ प्राप्त सकते है| लिया गया लेख
फूल गोभी या रोमनेस्क ब्रोकली
रोमनेस्को ब्रोकली क्या है ?
रोमनेस्को ब्रोकली के बीज कब लगाएं
होम गार्डन में रोमनेस्को को उगाने की सामग्री
घर पर रोमनेस्को को उगाने की विधि
गमले में रोमनेस्को उगाने के लिए मिट्टी
फूल गोभी या रोमनेस्क ब्रोकली
दुनिया विचित्र चीजों से भरी हुई है, जहाँ हर समय कुछ न कुछ अजीबो गरीब देखने या सुनने को मिलता ही रहता है, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी सब्जी के बारे में बताने जा रहें हैं, जो दिखने में सबसे अलग एवं विचित्र है, इस अनोखी दिखने वाली सब्जी का नाम रोमनेस्को ब्रोकली या रोमन फूलगोभी है, इसके खूबसूरत आकार एवं हेल्थ बेनिफिट के कारण भारत एवं अन्य कई देशों में लोग इसे अपने घर पर बड़े शौंक से उगाते हैं। तो आईये जानते हैं कि आप इस खूबसूरत डिजाईन वाली विचित्र रोमनेस्को सब्जी या रोमन फूलगोभी को अपने होम गार्डन में कैसे उगा सकते हैं। रोमनेस्को ब्रोकली के बीजों को कैसे उगाएं, गमले में रोमनेस्को फूलगोभी को उगाने की विधि तथा सब्जी की देखभाल करने का तरीका जानने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें।
रोमनेस्को ब्रोकली क्या है ?
रोमनेस्को को रोमन फूलगोभी या रोमनेस्क ब्रोकली के नाम से भी जाना जाता है, यह अनोखे आकार वाली सब्जी मूल रूप से इटली में उगाई जाती है, लेकिन इसके खूबसूरत आकार एवं हेल्थ बेनिफिट के कारण यह अमेरिका एवं अन्य कई देशों में भी उगाई जाने लगी है। इसके विचित्र दिखने के पीछे की वजह इसके पिरामिड जैंसी आकृति वाले टूटे-फूटे फूल हैं, यह दिखने में जितनी अनोखी होती है, खाने में उतनी ही लाजवाब और स्वादिष्ट भी होती है।
साइंटिफिक स्टडी में पता चला है कि रोमनेस्को फूलगोभी में ये जो दानेदार आकृतियाँ दिखाई देती हैं वास्तव में वो फूल बनना चाहती हैं, लेकिन फूल की जगह बड्स में ट्रांसफॉर्म हो जाती हैं। इस वजह से यह दुनिया की सबसे विचित्र एवं अनोखी सब्जी कहलाती है। रोमनेस्को कोलीफ्लावर आपकी सेहत के लिए भी काफी ज्यादा फायदेमंद है, इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन C, विटामिन K, कैरोटिनायड्स एवं डायटरी फाइबर होते हैं।
रोमनेस्को ब्रोकली के बीज कब लगाएं
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रोमन ब्रोकली या रोमनेस्को एक ठंडे मौसम वाली सब्जी है, जिसे आप सितम्बर से नवम्बर एवं जनवरी से फरवरी के महीनों में अपने होम गार्डन या टेरेस गार्डन के गमले या ग्रो बैग में बीज की बुवाई कर उगा सकते हैं।
होम गार्डन में रोमनेस्को को उगाने की सामग्री
दुनिया की सबसे विचित्र सब्जी रोमनेस्को को आप अपने होम गार्डन में बड़ी ही सरलता से उगा सकते हैं, इसके लिए बस आपको नीचे लिखी सामग्री की आवश्यकता होगी:
सीडलिंग ट्रे (Seedling Tray)
24×12 इंच का HDPE ग्रो बैग (24×12 Inch HDPE Grow Bag)
बढ़िया उर्वरता वाली मिट्टी (Good Fertility Soil)
श्रेष्ठ गुणवत्ता रोमनेस्को बीज (Best Quality Romanesco Seeds)
आर्गेनिक फर्टिलाइजर (Organic Fertilizer)
जैविक कीटनाशक (Organic Insecticide)
गार्डनिंग टूल्स (Gardening Tools)
घर पर रोमनेस्को को उगाने की विधि
विचित्र डिजाईन वाली रोमनेस्को को उगाने के लिए विंटर सीजन को सही समय माना जाता है, यह सब्जी 10°C से 30°C तापमान में अच्छी तरह से ग्रोथ करती है और बढ़िया उपज देती है। तो आईये जानते हैं कि इस अनोखी सब्जी को आप आसानी से अपने गार्डन में कैसे उगा सकते हैं:
गमले में रोमनेस्को उगाने के लिए मिट्टी
किसी भी क्रॉप की अच्छी उपज के लिए उच्च उर्वरता वाली मिट्टी का होना बहुत जरूरी होता है, जिसे आप घर पर ही तैयार कर सकते हैं, इसके लिए 50% सामान्य मिट्टी, 30% गोबर खाद, 10% रेत और 10% कोकोपीट को अच्छे से मिलाकर मिश्रण बनायें, फिर इस पॉटिंग माप को सीडलिंग ट्रे और ग्रो बैग में भरें और मिट्टी नम करने के लिए वाटरिंग कैन की मदद से पानी अवश्य दें।
रोमनेस्को के बीजों को सीडलिंग ट्रे में लगाएं
रोमनेस्को के पौधे लगाने के लिए ग्रो बैग या गमला
रोमनेस्को के लिए पानी
गमले में रोमनेस्को उगाने के लिए धूप
ग्रो बैग में लगे रोमनेस्को के लिए आर्गेनिक खाद
रोमनेस्को ब्रोकली में कीट नियंत्रण
रोमनेस्को के बीजों को सीडलिंग ट्रे में लगाएं
सीडलिंग ट्रे में पॉटिंग मिट्टी भरने के बाद आप इसमें 0.5 इंच की गहराई में बीज बोयें एवं नमी के लिए पानी अवश्य दें। सीडलिंग ट्रे में बीज बोने से अंकुरण दर काफी तेज़ हो जाती है और सीड के नष्ट होने की सम्भावना काफी कम रहती है और पौधे को ट्रांसप्लांट करने पर रूट प्रूनिंग के कारण पौधे की ग्रोथ भी काफी अच्छी होती है। सीडलिंग ट्रे में रोमनेस्को के बीज बोने के बाद लगभग 7 से 14 दिनों में सीड जर्मीनेट हो जाते हैं। रोमनेस्को के सीड जर्मीनेशन के लिए आवश्यक तापमान 12°C से 24°C होना जरूरी है।
रोमनेस्को के पौधे लगाने के लिए ग्रो बैग या गमला
सीडलिंग ट्रे में बीजों की बुवाई के बाद लगभग 25 से 30 दिनों में पौधा प्रत्यारोपण के लिए रेडी हो जाता है। आप गमले या ग्रो बैग में रोमानेस्को पौधे को ट्रांसप्लांट कर सकते हैं। रोमनेस्को को लगाने के लिए ग्रो बैग या गमले की गहराई कम से कम 12 इंच की होनी चाहिए, क्योंकि रोमन ब्रोकली या रोमनेस्को की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं। अतः आप इस विचित्र डिजाईन वाली सब्जी रोमनेस्को के लिए 18×12 या 24×12 इंच के ग्रो बैग का यूज कर सकते हैं, इस ग्रो बैग में आप रोमनेस्को के 2 से 4 पौधे लगा सकते हैं।
रोमनेस्को के लिए पानी
ग्रो बैग में पौधे को ट्रांसप्लांट करने के बाद समय पर और जरूरत के हिसाब से पानी दें, क्योंकि जरूरत से ज्यादा पानी पौधे की जड़ों को नष्ट कर सकता हैं। अतः जब पौधे छोटे हों, तो उन्हें दो दिन में एक बार ही पानी देना चाहिए, एवं जब पौधे बड़े हो जायें तब डेली बेसिस पर पौधों को पानी देना जरूरी हो जाता है, लेकिन ध्यान रहे पौधों को पानी हमेशा सुबह या शाम के समय ही दें एवं ओवरवाटरिंग से बचें।
गमले में रोमनेस्को उगाने के लिए धूप
ग्रो बैग में लगे रोमनेस्को प्लांट की ग्रोथ के लिए पूर्ण सूर्य प्रकाश की आवश्यकता होती है, अतः इन पौधों को ऐसी जगह पर लगाएं या गमलों को ऐसी जगह पर रखें, जहाँ इनको रोजाना लगभग 6 से 8 घंटे की धूप प्राप्त हो सके।
ग्रो बैग में लगे रोमनेस्को के लिए आर्गेनिक खाद
रोमनेस्को प्लांट की अच्छी ग्रोथ के लिए ग्रोइंग स्टेज के अनुसार आप पौधे को जैविक खाद दे सकते हैं। रोमन ब्रोकली या रोमनेस्को को ट्रांसप्लांट करने के 4 से 5 दिनों के बाद आप प्लांट ग्रोथ प्रमोटर (PGP) लिक्विड फर्टिलाइजर का प्रयोग करें, इसके बाद प्रत्येक 3 से 4 सप्ताह में प्लांट की ग्रोथ एवं रोमनेस्को के हेड के विकास के लिए आर्गेनिक प्रोम (फास्फोरस रिच आर्गेनिक मेन्योर) एवं सरसों खली के मिश्रण का प्रयोग करें।
रोमनेस्को ब्रोकली में कीट नियंत्रण
रोमन फूलगोभी या रोमनेस्को में एफीड्स एवं अन्य कीटों का प्रकोप हो सकता है, इन कीटों से बचने के लिए आप आर्गेनिक पेस्टिसाइड का प्रयोग कर सकते हैं। पौधे में कीटों या रोगों के शुरुआती लक्षण दिखने पर आप नीम तेल का छिड़काव कर सकते हैं।
रोमनेस्को को हार्वेस्ट कब करें ?
दुनिया की सबसे विचित्र सब्जी रोमनेस्को को आप बीज की बुवाई के बाद से लगभग 75 से 100 दिनों में हार्वेस्ट कर सकते हैं। जब इसका हेड 5 से 7 इंच व्यास का हो जाये, तब आप समझ जाइये कि रोमनेस्को ब्रोकली हार्वेस्टिंग के लिए तैयार है।
स्विस चार्ड चुकंदर के परिवार का सदस्य है जिसको उसके चमकीले और रंगीन तनों के लिए जाना जाता है। इसके तने पीला, गुलाबी, लाल, नारंगी और सफेद रंगो के होते हैं। इसके पत्ते और तने दोनों को कच्चा या पकाके खाया जाता है।
ताजा स्विस चार्ड को कच्चा सलाद, टॉर्टिला रैप, सूप या ऑमलेट में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके पत्ते और डंठल को आमतौर पर खाना पकाने के लिए उबाला जाता है जिससे इसकी कड़वाहट कम हो जाती है।
इसमें कई पोषक तत्व पाये जाते हैं जिसके कारण यह सेहत के लिए फायदेमंद होता है। विटामिन ए, विटामिन के, विटामिन सी, विटामिन ई, कैल्शियम, मैग्नीशियम, तांबा, जस्ता, सोडियम, फास्फोरस और बहुत कम कैलोरी पाये जाते है। इस सब्जी से कैंसर से लड़ने में मदद, रक्तचाप को कम करने में, मोटापे, मधुमेह, हृदय रोग के खतरे को कम करने में, स्वास्थ्य सुधार करने में, ऊर्जा में वृद्धि और वजन कम करती है।
स्विस चार्ड की अधिक किस्में नहीं हैं लेकिन फोर्ड हुक नामक किस्म की खेती सफलतापूर्वक उत्तरी भारत या दिल्ली के निकट अधिक की जाती है। अन्य किस्मों में ब्राइट येलो, फोर्डहुक, लुकुलस और रूबी आदि है।
स्विस चार्ड एक पौष्टिक सब्जी है जो ठंडी और गर्म दोनों मौसमों में अच्छी तरह से उपज देती है लेकिन ठंड का मौसम इसकी खेती के लिए सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि यह बसंत और पतझड़ के ठंडे तापमान के दौरान आसानी और जल्दी से बढ़ता है। स्विस चार्ड की खेती गर्मियों में भी की जाती है लेकिन गर्मियों में इसका विकास धीरे होता है। 20°-30° सेल्सियस तापमान पर इसके पत्ते अधिक बनते हैं।
इसे सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है लेकिन दोमट या हल्की बलुई दोमट जिसका pH मान 6.5-7.5 हो और जल-निकास प्रबंध अच्छा हो, इसकी खेती के लिए उपयुक्त होता हैं।
स्विस चार्ड की खेती के लिए खेत की मिट्टी के अनुसार उसे तैयार किया जाता है। चिकनी मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए 1-2 जुताई और अन्य मिट्टी में जितनी बार में मिट्टी भुरभुरा हो जाये उतनी बार जुताई करनी पड़ती है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या ट्रेक्टर से करनी चाहिए जिससे खेत में मौजूद खरपतवार खत्म हो जाये। खेत पानी निकास का प्रबंध अच्छे से कर ले।
खेत जुताई करने के बाद मिट्टी में अच्छे से प्रति हेक्टर 10-12 टन गोबर, 120 किलो नाइट्रोजन, 80 किलो फास्फोरस तथा 60 किलो पोटाश मिला दे। अन्तिम जुताई के समय फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा दे और बचे हुए बाकि नाइट्रोजन को 2-3 बार में पत्तियों को तोड़ने के बाद टोप-ड्रेसिंग के रूप में दे।
उत्तरी भारत में सितम्बर-अक्टूबर और पहाड़ी जगहों में मार्च-अप्रैल का महीना बीज बोने के लिए उपयुक्त रहता है। बीज से पौध बनाने के लिए प्रति हैक्टर 4-5 किलो और सीधे बोने के लिये 6-8 किलो काफी होते हैं।
पौधा तैयार करने के लिए बीज को पंक्तियों में बोया जाता है। 2 पंक्तियों के बीच की दुरी 1-2 सेंटीमीटर और 2 बीजो के बीच की दूरी 2-3 मिलीमीटर होनी चाहिए। जब पौधे में 2-4 पत्तियां आ जाये तो उसे क्यारियों में रोप देना चाहिए।
पौधा रोपने के लिए 2 पंक्तियों के बीच की दुरी 30 सेंटीमीटर और 2 पौधों के बीच की दूरी 20-25 सेंटीमीटर होनी चाहिए। पौधों को शाम के वक्त रोपना चाहिए और सिंचाई भी कर दे। जब पौधे को खेत में रोपने के लिए उखाड़े तब उसे पहले ही हल्की सिंचाई कर लें जिससे पौधों की जड़ों को नुकसान ना पहुंचे।
पहली सिंचाई बीज और पौधे रोपने के तुरंत बाद कर दे और उसके बाद की सिचाई जरुरत के अनुसार करे। स्विस चार्ड एक पत्तेदार सब्जी है जिस कारण से इसे अधिक पानी की जरूरत होती है। हफते में 1-2 बार सिंचाई कर देनी चाहिए।
सिचाई के बाद खरपतवार उग आते है जो पौधों के विकास को कम कर सकते है इसीलिए हर सिचाई के बाद निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए। गुड़ाई करने से मिट्टी का वायु-संचार बना रहता है और अगर कोई पौधा ख़राब हो जाये तो उसे दोबारा भी रोपा जा सकता है।
आमतौर पर इसकी खेती के शुरुआत में उखटा और पौध सड़न की परेशानी देखने को मिलती है जिसके रोकथाम के लिए फफूंदीनाशक दवा बेवस्टीन छिड़का जाता है। इसके अलावा एफिड या चेचा, माहू छोटे कीट की परेशानी देखने को मिलती है जिसके रोकथाम के लिए नुवान, एण्डोसल्फान या मेटासिस्टॉक्स का 1% का घोल बनाकर छिड़का जाता है।
कटाई :
जब पत्ते बड़े और तोड़ने लायक हो जायें तो सबसे पहले बाहर या नीचे के पत्तों को तेज चाकू से काटना चाहिए। कटे हुए पत्तो का बंडल बना ले और उन्हें बाजार में बेच दे। इस पौधे पर कई बार पत्तियां लगती हैं तथा एक हफते में 2-3 बार तुड़ाई हो जाती है। स्विस-चार्ड प्रति पौधा 400 ग्राम तथा प्रति हैक्टर 150-200 क्विंटल उपज दे सकता है। लिया गया लेख