Seed Subsidy Scheme

 

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  • बीज स्वावलंबन योजना से 50% तक अनुदान
  • मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना
  • समूह के किसानों को निशुल्क बीज
  • इन किसानों को अनुदान
  • कौन-कौन लाभ ले सकता है

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बीज स्वावलंबन योजना से 50% तक अनुदान
मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना
समूह के किसानों को निशुल्क बीज
बीज स्वावलंबन योजना से 50% तक अनुदान

मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना में 30-50 किसानों का समूह बनाया जाता है, जिन्हें आरएसएससी के माध्यम से फ्री बीज मिलते हैं. सामान्य किसानों को भी बीजों पर 50% तक अनुदान दिया जाता है.

मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना

अच्छी किस्म का बीज ही अच्छी फसल उत्पादकता निर्धारित कर सकता है, लेकिन उन्नत किस्मों के बीज बाजार में काफी महंगे बिकते हैं, जिन्हें खरीदना हर किसान के बस की बात नहीं. यही वजह है कि सरकार की ओर से इन बीजों पर अनुदान उपलब्ध करवाया जाता है. अलग-अलग राज्यों में बीज अनुदान योजनाएं चलाई जा रही हैं. इस कड़ी में राजस्थान सरकार ने भी किसान साथी योजना और मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन स्कीम चलाई है, जिसके तहत किसान और किसान समूहों को निशुल्क बीज वितरण किया जाता है, ताकि वे कम लागत में अच्छी उत्पादन ले सकें.

समूह के किसानों को निशुल्क बीज

मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना के तहत कृषि विभाग का लक्ष्य होता है 30 से 50 किसानों के समूह बनाना, ताकि वे आपसी सहयोग से खेती कर सकें. अब कृषि विभाग इन किसानों के समूहों को चिन्हित करते हैं और आरएसएससी के जरिए निशुल्क बीजों का वितरण किया जाता है. इसके बाद किसानों को प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं, जिसके बाद किसान बीज उत्पादन करके विक्रय कर सकें.

इन किसानों को अनुदान
कौन-कौन लाभ ले सकता है
इन किसानों को अनुदान

मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना के तहत लघु और सीमांत किसानों को 50% अनुदान पर बीज उपलब्ध करवाए जाते हैं, जबकि सामान्य किसानों को 25% अनुदान पर बीजों की आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है. कई बार राजस्थान की सरकार सेंट्रल स्कीम्स के साथ टाई अप करके किसानों को बीजों की निशुल्क मिनी किट उपलब्ध करवाती है.

इन योजनाओं में राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑइल पाम मिशन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन भी शामिल है. फसल के बीजों  का चयन  राजस्थान के अलग-अलग इलाकों की मिट्टी और जलवायु के आधार पर किया जाता है.

कौन-कौन लाभ ले सकता है

मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना के तहत एससी, एसटी, छोटे और सीमांत, गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने के वाले गरीब और आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के किसानों को प्राथमिकता से बीजों की मिनी किट का वितरण किया जाता है.

चाहे जमीन किसी के भी नाम हो, एक किसान परिवार की एक महिला सदस्य को भी राज्य सरकार की ओर से अलग से बीजों की मिनी किट देने का प्रावधान है. सिंचाई सुविधा की उपलब्धता वाले किसानों को भी प्राथमिकता से बीजों की मिनी किट वितरित की जाती है. अधिक जानकारी के लिए अपने जिले के कृषि विभाग के कार्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र में भी संपर्क कर सकते हैं|

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National Livestock Mission Scheme

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1. राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना क्या है?

National Livestock Mission (राष्ट्रीय पशुधन मिशन) मुख्य रूप से बैकयार्ड पोल्ट्री और छोटे जुगाली करने वाले (बकरी और भेड़) उत्पादन के साथ-साथ चारा संसाधन विकास और बीमा जैसे कुछ अन्य घटकों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की एक योजना है। यह एक व्यापक योजना है जो निश्चित रूप से रोजगार सृजन में वृद्धि करती है, खाद्य सुरक्षा में सुधार करती है और पशु उत्पादकता को बढ़ाएगी । वैसे तो यह योजना काफी पुरानी है लेकिन पिछले साल (2021) में पशुपालन विभाग द्वारा इसे फिर से संशोधित कर फिर से तैयार किया गया है। पशुधन क्षेत्र में विकास को प्रोत्साहित करने के लिए, इस क्षेत्र में शामिल 10 करोड़ किसानों के लिए पशुपालन को अधिक लाभदायक बनाना है। देश में खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए रोजगार, उद्यमिता और पशु उत्पादकता के विकास के उद्देश्य से National Livestock Mission योजना को वित्तीय वर्ष 2021-22 से संशोधित और पुनर्गठित किया गया है। क्षेत्र की वर्तमान आवश्यकता को देखते हुए एनएलएम योजना को वित्त वर्ष 2022-23 से संशोधित और पुन: व्यवस्थित किया गया है। ये स्कीम 2025-26 तक रहेगी और और ये स्कीम सभी राज्यों के लिए है |

2. राष्ट्रीय पशुधन मिशन की योजनाए

  • इसको तीन भागो में बांटा गया है
  • पहले भाग में नस्ल के विकास पर जोर दिया गया है जिसमें मुख्यता भेड़ बकरी सूअर और देसी मुर्गी की नस्लों को रखा गया है
  • दूसरा भाग फीड और फोल्डर विकास से संबंधित है जिसमें फीड बीज उन्नत बीज के उत्पादन को लेकर इकाइयां बनाई जाएंगी इसके अलावा फॉर द प्रोसेसिंग जैसे साइलेज है आदि से संबंधित प्रोजेक्ट्स दिए जाएंगे.
  • तीसरा भाग घटक नवाचार और विस्तार का होगा। जिसमे नए नए आधुनिक विचारो को आमत्रिंत किया जायेगा। और उनकी प्रचार प्रसार करने वाली संस्थाओ को स्पोर्ट किया जायेगा

3. आपके प्रोजेक्ट के चयन की प्रक्रिया

इसका संस्थागत संरचना के अंतर्गत सबसे पहले अधिकार प्राप्त समिति का गठन हुआ है इसमें केंद्रसरकार के पशुपालन विभाग के उच्च अधिकारी रहेंगे | सभी स्कीमों के लिए दिशानिर्देश और नीति को बनाने की जिम्मेदारी इस संस्था की रहेगी | नीति में कोई भी बदलाव के लिए यह कमेटी जिम्मेदार रहेगी| इसके नीचे दूसरी कमेटी आती है जिसे परियोजना स्वीकृति समितिया परियोजना अनुमोदन समिति (Project Approval Committee) कहा जाता है इसके बिना अप्रूव किए कोई भी सब्सिडी ग्रांट नहीं की जा सकती| इसके बाद राज्य स्तरीय कार्यकारिणी समिति का गठन होता है यह समिति आवेदकों से स्वीकृत एप्लीकेशन लेकर Project Approval Committee (PAC) को देती है और वह सब्सिडी अप्रूव करती है| इसके नीचे एक और समिति काम करती है जिसे State Implementing Agency (SIA) या राज्य कार्यान्वयन समिति कहते हैं असल में यह संस्था ही डायरेक्ट अभ्यर्थियों और आवेदकों के संपर्क में आती है इसी के जरिए से आपके एप्लीकेशन या आवेदन सब्सिडी के लिए केंद्र सरकार तक पहुंचाए जाते हैं|

4. State Implementing Agency (SIA) एजेंसी का काम

State Implementing Agency (SIA) एजेंसी का मुख्य काम यह होता है कि यह आवेदकों से उनके व्यवसाय के प्रस्ताव और आवेदन पत्र लेती है उसके बाद यह संस्था इन आवेदनों को भली-भांति जांच करती है और उनकी समीक्षा करती है यदि जांच के दौरान इस समिति को प्रोजेक्ट या आवेदन करने वाले में कोई कमी नजर आती है तो यह उसे रिजेक्ट कर देती है यदि State Implementing Agency (SIA) को प्रोजेक्ट समझ में आ जाता है और आवेदक के ऊपर इसे भरोसा हो जाता है तो यह बैंक से लोन के लिए उस प्रोजेक्ट को स्वीकृत कर देती है बैंक इस समिति की सिफारिश को दर्ज कर देते हैं और अमूमन लोन को प्रोजेक्ट के लिए स्वीकृति दे देते हैं एक बार लोन के लिए स्वीकृति मिल जाने के बाद State Implementing Agency (SIA) इस प्रोजेक्ट को State Level Executive Committee (SLEC) के पास भेज देती है| जब State Level Executive Committee (SLEC) को प्रोजेक्ट ठीक लगता है तो वो Project Approval Committee (PAC) से सब्सिडी के लिए सिफारिश करती है और सब्सिडी आवेदक के अकाउंट में आ जाती है|

5. सब्सिडी किसे मिलती है ?

सब्सिडी लेने के लिए आवेदक कि कुछ एलिजिबिलिटी या पात्रता होती है जिससे समितियां यह निर्धारित करती हैं की उपरोक्त आवेदक को सहायता दी जानी चाहिए या नहीं इसमें सबसे पहला जो मापदंड होता है वह यह होता है कि जिस क्षेत्र में उधमी ने यह सब्सिडी अप्लाई की है उस क्षेत्र में उसका ज्ञान कितना है या फिर उसकी टीम में कोई तजुर्बेकार व्यक्ति उस क्षेत्र से है या नहीं या फिर कोई तकनीकी सलाहकार उनके साथ है या नहीं है इसके अलावा सब्सिडी के लिए सरकार द्वारा निर्धारित किए गए शेड्यूल बैंक से लोन की प्राप्ति भी एक आवश्यक मापदंड है साथ-साथ आवेदकों के पास या तो अपनी भूमि या फिर लीज पर ली गई भूमि का होना आवश्यक है इसके अलावा KYC डॉक्यूमेंट जैसे आधार पैन कार्ड आदि की जरूरत पड़ती है

6. उद्यमिता कार्यक्रमों की परियोजना स्वीकृति : सब्सिडी की ग्रांट किस प्रकार मिलती है

इसमें सबसे पहले व्यक्ति को एक एप्लीकेशन State Implementing Agency (SIA) के सामने प्रस्तुत करनी होती है जो NLM पोर्टल के माध्यम से भेजी जाती है यह एजेंसी एप्लीकेशन की भली-भांति जांच करती है और उसे शेड्यूल बैंक से लोन दिलाने के लिए सिफारिश करती है जब बैंक सिफारिश को स्वीकार करके लोन देने के लिए तैयार हो जाता है तो उसके बाद आवेदन को State Level Executive Committee (SLEC) के पास भेजा जाता है जो उसे केंद्र सरकार तक भेजती है केंद्र सरकार में पशुपालन विभाग (Animal Husbandry Department ) को यह आवेदन दिया जाता है जो सब्सिडी को Project Approval Committee (PAC) के माध्यम से आवेदक के खाते में जमा करा देते हैं यह सारा फंड ट्रांसफर सिडबी बैंक के माध्यम से होता है भारत सरकार का पशुपालन विभाग (Government Department of Animal Husbandry) के जरिए से सब्सिडी को सिडबी बैंक में बनाए गए आवेदक के खातों में जमा करती है वहां से सीधा उस सब्सिडी को आवेदक के खातों में भेजता है सब्सिडी लेने के लिए बैंक को लोन की किस्त आवेदक को देनी होती है जैसे ही लोन की किस्त आवेदक को मिल जाती है उस के बाद सब्सिडी आवेदक के खाते में आ जाती है |

7. पोल्ट्री के लिए किस प्रकार से सब्सिडी मिलती है

इस स्कीम में बैकयार्ड पोल्ट्री के उत्थान के लिए और नस्ल सुधार के लिए लोन दिया जाता है जिसमें सरकार का उद्देश्य यह रहता है कि बैकयार्ड पोल्ट्री जो कम लागत से की जा सकती है उसे बढ़ावा दिया जाता है इसके लिए आवेदकों को यह स्वयं सहायता समूह भी अप्लाई कर सकते हैं इसमें सरकार देसी मुर्गियों के पैरंट फॉर्म एच डी ब्रूडर कम मदर यूनिट हैचिंग एग्स और सिक्योरिंग यूनिट को लगाने के लिए प्रोत्साहित करती है इसमें केंद्र सरकार कुल 50% कैपिटल सब्सिडी देती है जिसका मतलब यह है कि फॉर्म बनाने के लिए और उसमें हेचरी या उससे संबंधित अन्य उपकरण खरीदने के लिए पैसे मिलते हैं इसमें 1000 तक पैरंट लेयर मुर्गियां रखने का प्रावधान है| बाकी की पूंजी आवेदक को बैंक के लोन से या फिर अपने आप से अपने पास से लगानी होती है इसमें किसी भी तरीके की कमर्शियल पोल्ट्री जैसे ब्रायलर या लेयर नहीं लगा सकते | केवल कम लागत में की जाने वाली देसी मुर्गियां इसमें पाली जाती हैं इसमें पूरे प्रोजेक्ट की लागत लगभग 50 लाख होती है जिसमें अधिकतम सब्सिडी 25 लाख तक केंद्र सरकार से मिल जाती है यह सब्सिडी उसी तरह से खाते में आती है जैसा कि पहले बताया जा चुका है

8. भेड़ और बकरी पालन के लिए मिलने वाली सब्सिडी

भेड़ और बकरी पालन के लिए सब्सिडी मिलने का तरीका वही है जो पहले बताया जा चुका है इसमें सरकार के मुख्य उद्देश्य यह है की उद्यमिता को भेड़ और बकरी पालन में बढ़ावा दिया जाए | इसके साथ साथ इसके टिकाऊ व्यापार मॉडल विकसित किए जाएं जिससे युवा पढ़े-लिखे बेरोजगार युवकों के लिए रोजगार को बढ़ावा दिया जा सके इसमें कोई भी व्यक्ति अप्लाई कर सकता है बकरी और भेड़ फार्म के लिए इकाई का आकार अनुदान की अधिकतम राशि

100 मादा और 5 नर 10 लाख
200 मादा और 10 नर 20 लाख
300 मादा और 15 नर 30 लाख
400 मादा और 20 नर 40 लाख
500 मादा और 25 नर 50 लाख

9. इस योजना में कौन कौन पात्र है

  • कोई भी व्यक्ति
  • किसान उत्पादक संगठन
  •  स्वयं सहायता समूह
  • पूर्व सहकारी संस्था
  • संयुक्त देयता समूह
  • धारा 8 कंपनियां

10. राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत बैंक का चुनाव कैसे करे

  • राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक
  • नाबार्ड से पुर्नवित्त प्राप्त अन्य पात्र संस्थाएँ
  • वाणिज्य बैंक
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक
  • राज्य सहकारी बैंक
  • राष्ट्रीय पशुधन मिशन में आवेदन करने की प्रक्रिया
  • यदि आप राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना में आवेदन करना चाहते हैं तो आपको इसके लिए सबसे पहले इसकी आधिकारिक
  • वेबसाइट https://nlm.udyamimitra.in/ पर जाकर अपना आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा योजना के संबंध में ज्यादा
  • जानकारी के लिए आप आपने क्षेत्र में निकटम पशुपालन विभाग एवं डेयरी विभाग बोर्ड से संपर्क कर योजना के संबंध में ज्यादा जानकारी ले सकते हैं।

11. राष्ट्रीय पशुधन मिशन ऑनलाइन आवेदन कैसे करें ?

  • राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना में ऑनलाइन आवेदन करने के लिए आपको सर्वप्रथम इस योजना की ऑफिसियल वेबसाइट पर जाना होगा ।
  • इस योजना का होम पेज खुलने के बाद आपको Apply Now के विकल्प पर क्लिक करना है |
  •  इसके बाद आपके सामने दो ऑप्शन दिखाई देंगे
    (1) उद्यमी के रूप में लॉगिन करें (2) सरकार / अन्य एजेंसियों के रूप में लॉगिन करें |
  • आपको आपके अनुसार विकल्प का चयन करना है |
  •  अब आपको रजिस्टर के विकल्प पर क्लिक करना है |
  • इसके बाद आपके सामने एक आवेदन फॉर्म खुलेगा इस फॉर्म में पूछी गई सभी जानकारी आपको ध्यान से भरनी है इसके बाद आपको एक बार फिर रजिस्टर के विकल्प पर क्लिक करना है |
  • फिर आपको Login के ऑप्शन पर क्लिक करना है और Login कर लेना |
  • इसके बाद आपके सामने आवेदन का ऑप्शन दिखाई देगा यह आपको क्लिक करना है
  • एक फिर आपके सामने एक आवेदन फॉर्म खुलेगा इसमें पूछी गई जानकारी अच्छे से दर्ज करे और फिर पूछे मांगे गए आवश्यक दस्तावेज को Upload कर देना है।
  • Upload करने के बाद आपको Submit कर देना है।
  • इस प्रकार से आप इस योजना में आसानी से ऑनलाइन आवेदन कर सकते है ।

12. आवेदन करते समय दस्तावेज की सूची

  • (नोट:- सूची में जिसके आगे स्टार लगा हुआ है वो दस्तावेज जरूरी है )

    1. विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर)* जिसमें परियोजना की लागत, वित्त के साधन,
      आवर्ती लागत, शुद्ध आय आदि(Detailed project report (DPR)* including cost of project, means of finance,
      recurring cost, net income etc.)
    2. भूमि दस्तावेज़ (स्वामित्व/पट्टा विलेख/किराया समझौता आदि)(Land document (Ownership / Lease deed/ Rent Agreement etc.)
    3. परियोजना स्थल की तस्वीरें(Photographs of project site)
    4. परियोजना में आवेदक की हिस्सेदारी का दस्तावेजी प्रमाण(Documentary proof of applicant’s share in the project)
    5. आवेदक के साथ जुड़ी/संलग्न किसानों की सूची जिसमें नाम, आधार शामिल है
      नंबर, मोबाइल नंबर और पता( List of farmers linked/attached with applicant comprising Name, Aadhar
      Number, Mobile No. and Address)
    6. आवेदक से संबंधित दस्तावेज(Documents related to Applicant)
    7. पैन कार्ड*(PAN card*)
    8. जीएसटी पंजीकरण प्रमाणपत्र(GST registration certificate)
    9. निगमन प्रमाणपत्र (कंपनी के मामले में)(Certificate of Incorporation (In case of company)
    10. साझेदारी विलेख (साझेदारी फर्म के मामले में)(Partnership Deed (In case of partnership firm)
    11. पता प्रमाण* (चुनाव आयोग फोटो आईडी कार्ड, बिजली बिल, पानी बिल,
      टेलीफोन बिल, पासबुक, किराया समझौता आदि)Address Proof* (Election Commission Photo ID card, Electricity Bill, Water Bill,
      Telephone Bill, Passbook, rent agreement etc.)
    12. पिछले तीन वर्षों के लेखापरीक्षित वार्षिक वित्तीय विवरण, यदि लागू हो(Last three years audited Annual financial statements, if applicable)
    13. पिछले तीन वर्षों का आयकर रिटर्न, यदि लागू हो(Last three years income tax returns, if applicable)
    14. पिछले छह महीने का बैंक स्टेटमेंट(Bank statement for last six months)
    15. बैंक मैंडेट फॉर्म के साथ रद्द किया गया चेक*
      सी. प्रमुख प्रमोटर से संबंधित दस्तावेज(Canceled cheque along with bank mandate form*
      C. Documents related to Key Promoter)
    16. पैन कार्ड*(PAN Card*)
    17. आधार कार्ड*(Aadhar Card*)
    18. पता प्रमाण * (चुनाव आयोग फोटो आईडी कार्ड, बिजली बिल, पानी बिल, टेलीफोन बिल, पासबुक, किराया समझौता आदि)(Address Proof * (Election Commission Photo ID card, Electricity Bill, Water Bill, Telephone Bill, Passbook, rent agreement etc.)
    19. फोटोग्राफ* जाति प्रमाण पत्र, यदि लागू हो( Photograph* Caste certificate, if applicable)
    20. शिक्षा प्रमाण पत्र(Education certificates)
    21. प्रशिक्षण प्रमाणपत्र(Training certificates)
    22. पहले की गई किसी भी पशुधन खेती गतिविधि के बारे में अनुभव पत्र/प्रमाण पत्र(Experience letter/ certificate about any livestock farming activities done earlier)

13. प्रोजेक्ट रिपोर्ट कैसे तैयार करे

  • आप अपने नजदीकी CA अथवा agriprojectrepor.com टीम से संपर्क करके अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवा सकते है इस प्रोजेक्ट
    रिपोर्ट का निर्धारित शुल्क लिया जायेगा जो सिर्फ आपको प्रोजेक्ट रिपोर्ट प्रदान करेगा।

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आधिकारिक वेबसाइट

आवेदन यहाँ करे

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Gramin Bhandaran Yojana

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आप सभी लोग जानते हैं कि हमारे देश में किसानों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि वह अपने भंडारण बना सकें। इसी बात को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने ग्रामीण भंडारण योजना आरंभ की है। आज हम आपको इस लेख के माध्यम से ग्रामीण भंडारण योजना से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने जा रहे हैं। जैसे ग्रामीण भंडारण योजना क्या है? इसका उद्देश्य, विशेषताएं, लाभ, पात्रता, आवेदन प्रक्रिया आदि तो दोस्तों यदि आप ग्रामीण भंडारण योजना से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको हमारे इस लेख को अंत तक पढ़ना होगा।

कई बार ऐसा होता है की फसल को सुरक्षित ना रख पाने के कारण किसानों को अपनी फसल को कम दामों में बेचना पड़ता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ग्रामीण भंडारण योजना आरंभ की है। इस योजना के अंतर्गत किसानों की फसल को सुरक्षित रखने के लिए भंडारण का निर्माण किया जाएगा। भंडारण का निर्माण किसान खुद भी कर सकते हैं तथा किसानों से जुड़े संस्थाएं भी कर सकती है। इस योजना में किसानों को भंडार गृह का निर्माण करने के लिए लोन प्रदान किया जाएगा तथा लोन पर सब्सिडी भी दी जाएगी।

ग्रामीण भंडारण योजना

इस योजना के अंतर्गत क्षमता का निर्णय उद्यमी द्वारा किया जाएगा। लेकिन सब्सिडी प्राप्त करने के लिए गोदाम की क्षमता न्यूनतम 100 टन होनी चाहिए और अधिकतम 30,000 टन होनी चाहिए। यदि क्षमता 30,000 टन से ज्यादा है या फिर 100 टन से कम है तो इस योजना के अंतर्गत सब्सिडी नहीं दी जाएगी। कुछ विशेष मामले में 50 टन क्षमता तक पर भी सब्सिडी प्रदान की जाएगी। पर्वतीय क्षेत्रों में 25 टन क्षमता वाले ग्रामीण गोदाम को भी सब्सिडी प्रदान की जाएगी। इस योजना के अंतर्गत लोन चुकाने की अवधि 11 साल है।

ग्रामीण भंडारण योजना का विवरण

योजना का नाम ग्रामीण भंडारण योजना
किस ने लांच की केंद्र सरकार
लाभार्थी किसान
उद्देश्य किसानों को भंडार ग्रह प्रदान करना।
साल 2023
आधिकारिक वेबसाइट https://www.nabard.org/

ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत सब्सिडी मिलने का आधार

  • प्लेटफार्म
  • भीतरी सड़क
  • चार दिवारी
  • गुणवत्ता प्रमाणन
  • पैकेजिंग
  • ग्रेडिंग
  • अतिरिक्त जल निकासी प्रणाली का निर्माण
  • गोदाम में निर्माण की पूंजी लागत
  • वेयरहाउसिंग सुविधाएं आदि

ग्रामीण भंडारण योजना का उद्देश्य

ग्रामीण भंडारण योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों के लिए भंडार ग्रह का निर्माण करना है। जिससे कि किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सके और वह अपनी फसल को कम दामों में बेचने के लिए मजबूर ना हो। इस योजना के माध्यम से किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा और उन्हें परेशानियों का सामना भी नहीं करना पड़ेगा।

ग्रामीण भंडारण योजना के लाभार्थी

  • किसान
  • कृषक/उत्पादक समूह
  • प्रतिष्ठान
  • गैर सरकारी संगठन
  • स्वयं सहायता समूह
  • कंपनियां
  • निगम
  • व्यक्ति
  • सरकारी संगठन
  • परिसंघ
  • कृषि उपज विपण समिति

ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत सब्सिडी कि दरें

  • एससी/एसटी उद्यमी तथा इन समुदायों से संबंधित संगठन या फिर पूर्वोत्तर राज्य, पर्वतीय क्षेत्र में स्थित जगह पर परियोजना की पूंजी लागत का एक तिहाई हिस्सा सब्सिडी के रूप में प्रदान किया जाएगा। जिसकी अधिकतम सीमा तीन करोड़ रुपए है।
  • 25% तक की सब्सिडी परियोजना की पूंजी पर प्रदान की जाएगी यदि निर्माण कराने वाला व्यक्ति किसान है या फिर किसान ग्रेजुएट है या फिर किसी सहकारी संगठन से संबंध रखता है। इस स्थिति में अधिकतम राशि 2.25 करोड़ होगी।
  • अन्य सभी श्रेणियों में व्यक्ति, कंपनियों और निगम आते हैं जिसमें परियोजना पूंजी की लागत का 15% सब्सिडी प्रदान की जाएगी। इस स्थिति में अधिकतम राशि 1.35 करोड़ रुपए है।
  • यदि गोदाम का जीर्णोद्धार एनसीडीसी की सहायता से किया जाएगा तो लागत का 25% सब्सिडी के रूप में प्रदान किया जाएगा।

ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत परियोजना की पूंजी लागत

  • 1000 टन क्षमता के गोदाम के लिए:- बैंक द्वारा प्रदान की गई मुलयांकित परियोजना लागत या वास्तविक लागत या फिर 3500 रुपए प्रति टन इन में से जो भी कम है।
  • 1000 टन से ज्यादा क्षमता वाले गोदाम:- बैंक द्वारा प्रदान की गई मूल्यांकन परियोजना लागत या फिर वास्तविक लागत या फिर 1500 रुपए प्रति टन इनमें से जो भी कम हो।

ग्रामीण भंडारण योजना के मुख्य तथ्य

  • गोदाम में कुछ सुविधाएं जैसे की पक्की सड़क, जल निकासी की व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था, समान लाने उतारने की व्यवस्था आदि होना अनिवार्य है।
  • सभी रोशनदान तथा खिड़कियां पक्षियों से सुरक्षित होनी चाहिए।
  • सारे दरवाजे, खिड़कियां वायु अवरोधक होनी चाहिए।
  • गोडाउन कीटाणुओं से सुरक्षित होना चाहिए।
  • भंडार गृह का निर्माण सीपीडब्ल्यूडी या फिर सीपीडब्ल्यूडी- के के दिशा निर्देशों के अनुसार होना चाहिए।
  • अपनी मर्जी से कहीं भी भंडार ग्रह का निर्माण कर सकता है।
  • ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत आवेदक को गोदाम के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य है।
  • भंडार ग्रह 1000 टन से ज्यादा है तो उससे सीडब्ल्यूसी से मान्यता प्राप्त करनी जरूरी है।
  • गोदाम की ऊंचाई 4-5 मीटर से कम नहीं होनी चाहिए।
  • इस योजना के अंतर्गत गोदाम इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार बनना चाहिए।
  • ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत आवेदक को वैज्ञानिक भंडारण का निर्माण करना होगा।
  • इस योजना के अंतर्गत आवेदक के पास खुद की जमीन होना अनिवार्य है।
  • गोदाम की क्षमता का निर्णय इस योजना के अंतर्गत आवेदन पर निर्भर किया गया है।
  • गोदाम नगर निगम की सीमा क्षेत्र से बाहर होना अनिवार्य है।

ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत आने वाले बैंक

  • अर्बन कोऑपरेटिव बैंक
  • रीजनल रूरल बैंक
  • कमर्शियल बैंक
  • नॉर्थ ईस्टर्न डेवलपमेंट फाइनेंस कॉरपोरेशन
  • स्टेट कोऑपरेटिव एग्रीकल्चरल एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक
  • स्टेट कोऑपरेटिव बैंक
  • एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट फाइनेंस कमेटी

ग्रामीण भंडारण योजना के दस्तावेज़ ( पात्रता )

  • इस योजना का लाभ किसान तथा कृषि से जुड़े संगठन उठा सकते हैं
  • योजना का पात्र होने के लिए आवेदक को भारत का स्थायी निवासी होना अनिवार्य है
  • आधार कार्ड
  • राशन कार्ड
  • बैंक अकाउंट डिटेल्स
  • मोबाइल नंबर
  • पासपोर्ट साइज फोटो
  • निवास प्रमाण पत्र

ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत आवेदन करने की प्रक्रिया

  • ग्रामीण भंडारण योजना
    • अब आपके सामने होम पेज खुल कर आएगा।
    • होम पेज पर आपको अप्लाई नाउ के बटन पर क्लिक करना होगा।
    • अब आपके सामने आवेदन फॉर्म खुलकर आएगा।
    • आपके इस आवेदन फॉर्म में पूछी गई सभी जानकारी दर्ज करनी होगी।
    • इसके पश्चात आपको सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों को अटैच करना होगा।
    • अब आपको सबमिट के बटन पर क्लिक करना होगा।
    • इस प्रकार आप ग्रामीण भंडारण योजना के अंतर्गत आवेदन कर पाएंगे।

संपर्क जानकारी

हमने अपने इस लेख के माध्यम से आपको ग्रामीण भंडारण योजना से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर दी है। यदि आप अभी भी किसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे हैं तो आप हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करके या फिर ईमेल के माध्यम से अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं। हेल्पलाइन नंबर तथा ईमेल आईडी कुछ इस प्रकार है।

Helpline Number- 022-26539350

Email [email protected]

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पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग

पशुधन बीमा योजना

पशुधन बीमा योजना, एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसे 10वीं पंचवर्षीय योजना के 2005-06 और 2006-07 और 11वीं पंचवर्षीय योजना के 2007-08 के दौरान 100 चयनित जिलों में पायलट आधार पर लागू किया गया था। यह योजना देश के 100 नये चयनित जिलों में 2008-09 से नियमित आधार पर क्रियान्वित की जा रही है। योजना के तहत संकर नस्ल और अधिक दूध देने वाले मवेशियों और भैंसों का बीमा उनके मौजूदा बाजार मूल्य के अधिकतम मूल्य पर किया जा रहा है। बीमा के प्रीमियम पर 50% तक की सब्सिडी दी जाती है। सब्सिडी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठा रही है. अधिकतम तीन वर्ष की पॉलिसी के लिए प्रति लाभार्थी अधिकतम 2 पशुओं पर सब्सिडी का लाभ प्रदान किया जा रहा है। यह योजना गोवा को छोड़कर सभी राज्यों में संबंधित राज्यों के राज्य पशुधन विकास बोर्डों के माध्यम से कार्यान्वित की जा रही है। इस योजना को पायलट अवधि के दौरान कवर किए गए 100 पुराने जिलों और स्वदेशी मवेशियों, याक और मिथुन सहित पशुधन की अधिक प्रजातियों तक विस्तारित करने का प्रस्ताव है।

पशुधन बीमा योजना किसानों और पशुपालकों को मृत्यु के कारण उनके पशुओं की किसी भी संभावित हानि के खिलाफ सुरक्षा तंत्र प्रदान करने और लोगों को पशुधन बीमा के लाभ को प्रदर्शित करने और इसे अंतिम रूप से लोकप्रिय बनाने के दोहरे उद्देश्य से तैयार की गई है। पशुधन और उनके उत्पादों में गुणात्मक सुधार प्राप्त करने का लक्ष्य।

पशुधन बीमा योजना के कार्यान्वयन के लिए दिशानिर्देश

पशुधन क्षेत्र राष्ट्रीय, विशेषकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। पशुधन के पालन-पोषण से प्राप्त पूरक आय गरीब और भूमिहीन किसानों को जीविका प्रदान करने के अलावा, फसल उत्पादन की अनिश्चितताओं का सामना करने वाले किसानों के लिए सहायता का एक बड़ा स्रोत है।

पशुधन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए, यह महसूस किया गया है कि रोग नियंत्रण और पशुओं की आनुवंशिक गुणवत्ता में सुधार के लिए अधिक प्रभावी कदम उठाने के साथ-साथ, किसानों और पशुपालकों को ऐसे पशुओं के अंतिम नुकसान के खिलाफ सुनिश्चित सुरक्षा का एक तंत्र तैयार करने की आवश्यकता है। इस दिशा में, सरकार ने पशुधन बीमा पर एक नई केंद्र प्रायोजित योजना को मंजूरी दी जिसे 10वीं योजना के दौरान पायलट आधार पर लागू किया गया था। 2008-09 से यह योजना 11वीं पंचवर्षीय योजना अर्थात 2011-12 के अंत तक 100 नए चयनित जिलों में एक नियमित योजना के रूप में कार्यान्वित की जा रही है। 

कार्यान्वयन एजेंसी

पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग कृत्रिम गर्भाधान के साथ-साथ अधिग्रहण के माध्यम से मवेशियों और भैंसों के आनुवंशिक उन्नयन लाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय मवेशी और भैंस प्रजनन परियोजना (एनपीसीबीबी) की केंद्र प्रायोजित योजना लागू कर रहा है।  देशी जानवर एनपीसीबीबी को राज्य पशुधन विकास बोर्डों जैसी राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों (एसआईए) के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है। एनपीसीबीबी और पशुधन बीमा के बीच तालमेल लाने के लिए, बाद वाली योजना को भी एसआईए के माध्यम से लागू किया जाएगा। लगभग सभी राज्यों ने एनपीसीबीबी को चुना है। उन राज्यों में जो एनपीसीबीबी लागू नहीं कर रहे हैं या जहां कोई एसआईए नहीं हैं, पशुधन बीमा योजना राज्य पशुपालन विभागों के माध्यम से लागू की जाएगी।

कार्यकारी प्राधिकारी

राज्य पशुधन विकास बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी इस योजना के लिए कार्यकारी प्राधिकारी भी होंगे। उन राज्यों में जहां ऐसे कोई बोर्ड नहीं हैं, निदेशक, पशुपालन विभाग योजना के कार्यकारी प्राधिकारी होंगे। सीईओ को जिले में पशुपालन विभाग के वरिष्ठतम अधिकारी के माध्यम से योजना को विभिन्न जिलों में लागू करवाना होगा इस प्रयोजन के लिए आवश्यक निर्देश राज्य सरकार द्वारा जारी किये जायेंगे। प्रीमियम सब्सिडी, पशु चिकित्सकों को मानदेय का भुगतान, पंचायतों के माध्यम से जागरूकता सृजन आदि के लिए केंद्रीय धनराशि एसआईए के पास रखी जाएगी। योजना के कार्यकारी प्राधिकारी के रूप में, मुख्य कार्यकारी अधिकारी योजना के कार्यान्वयन और निगरानी के लिए जिम्मेदार होंगे। CEO के मुख्य कार्य होंगे:-

  1. भारत सरकार के पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार सावधानीपूर्वक और केंद्रीय निधियों का प्रबंधन करना।
  2. योजना को लागू करने के लिए बीमा कंपनियों से कोटेशन मंगाना, उनसे बातचीत करना और उपयुक्त कंपनी (कंपनियों) का चयन करना।
  3. चयनित बीमा कंपनी/कंपनियों के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर करना।
  4. बीमा कंपनी को सब्सिडी प्रीमियम का भुगतान (अग्रिम, यदि कोई हो और उसके बाद के समायोजन सहित)।
  5. पशु चिकित्सकों (सरकारी/निजी) की जिलेवार सूची तैयार करना और उसे बीमा कंपनी और संबंधित पंचायती राज निकायों को उपलब्ध कराना।
  6. आम जनता के साथ-साथ उन अधिकारियों के बीच जागरूकता पैदा करना जिनकी सेवाओं को योजना के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हो सकता है।
  7. क्षेत्रीय निरीक्षण करना और केंद्रीय टीमों द्वारा क्षेत्र निरीक्षण की सुविधा भी प्रदान करना।
  8. पशु चिकित्सकों को मानदेय के भुगतान के लिए पशुपालन विभाग के प्रभारी जिला अधिकारियों को धनराशि जारी करना।
  9. केंद्र/राज्य सरकारों को प्रस्तुत करने के लिए नियमित निगरानी और रिपोर्ट तैयार करना।
  10. योजना के कुशल कार्यान्वयन के लिए ऐसे अन्य कार्यों की आवश्यकता है।

राज्य सरकारों के प्रधान सचिव/प्रभारी पशुपालन सचिव/राज्य पशुपालन विभाग के निदेशक योजना के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक सीईओ/जिला स्तर के अधिकारी को जनशक्ति और अन्य रसद सहायता के संदर्भ में पर्याप्त बुनियादी ढांचे की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे। . (बीमा कार्य के लिए सीईओ/जिला प्रभारी अधिकारी का सटीक नाम, पदनाम, पता केंद्र सरकार को उपलब्ध कराया जाएगा और इसे जिले के भीतर और विशेष रूप से जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा। कोई भी परिवर्तन) सीईओ के नाम और पदनाम के बारे में भी सभी संबंधितों को उचित रूप से सूचित किया जाएगा।) योजना के प्रभावी कार्यान्वयन और निगरानी के लिए, यदि राज्यों को आवश्यकता महसूस होती है, तो पशुपालन के क्षेत्र में रुचि रखने वाले अधिकारियों/संगठनों को शामिल करते हुए एक जिला समिति का गठन किया जा सकता है। यदि रुचि हो तो डेयरी सहकारी समितियों को भी शामिल किया जा सकता है और जहां भी संभव हो योजना को लागू करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।

जिन जिलों में योजना लागू की जाएगी

इस योजना को देश के 100 नव चयनित जिलों में नियमित आधार पर लागू किया जाना है। यह योजना केवल संकर नस्ल और अधिक दूध देने वाले मवेशियों और भैंसों तक ही सीमित रहेगी। इस प्रयोजन के लिए चयनित जिलों की सूची अनुबंध-I में दी गई है। योजना इन्हीं जिलों में लागू की जानी है।

बीमा कंपनियों का चयन

प्रतिस्पर्धी प्रीमियम दरों, पॉलिसी जारी करने की आसान प्रक्रियाओं और दावों के निपटान के संदर्भ में अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए, मुख्य कार्यकारी अधिकारी को बीमा कंपनी (कंपनियों) और नियमों और शर्तों पर निर्णय लेने का अधिकार होगा। बीमा कंपनी का चयन करते समय, प्रस्तावित प्रीमियम दरों के अलावा, उनकी सेवाएं प्रदान करने की क्षमता, नियम और शर्तें और सेवा दक्षता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। सीईओ उन सार्वजनिक और निजी सामान्य बीमा कंपनियों से लिखित रूप में कोटेशन आमंत्रित करेंगे जिनका राज्य या राज्य के बड़े हिस्से में काफी व्यापक नेटवर्क है। योजना के सफल और कुशल कार्यान्वयन और पशुधन मालिकों के बीच योजना को लोकप्रिय बनाने के लिए सीईओ को बीमा कंपनियों के साथ बातचीत करके बीमा कंपनी/कंपनियों का चयन करना चाहिए। यदि कोई बीमा कंपनी बीमित पशु की मृत्यु के अलावा किसी भी प्रकार की विकलांगता के लिए कवर की पेशकश कर रही है, तो ऐसे प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है, हालांकि, ऐसे अतिरिक्त जोखिम कवरेज के लिए प्रीमियम में कोई सब्सिडी प्रदान नहीं की जाएगी। पशु की मृत्यु के अलावा जोखिम कवरेज के कारण प्रीमियम की पूरी लागत लाभार्थियों द्वारा वहन की जानी है। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, सीईओ को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस प्रीमियम दर पर सहमति हुई है वह प्रतिस्पर्धी है। किसी भी परिस्थिति में प्रीमियम की दर वार्षिक पॉलिसियों के लिए 4.5% और तीन साल की पॉलिसियों के लिए 12% से अधिक नहीं होनी चाहिए। सामान्यतः एक जिले में बीमा का कार्य एक ही बीमा कंपनी को सौंपा जाना चाहिए। हालाँकि, प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने और योजना को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से एक जिले में एक से अधिक बीमा कंपनियों को काम करने की अनुमति दी जा सकती है, यदि अन्य नियम और शर्तें समान रहती हैं। दावे के निपटान में चूक या बीमा कंपनियों की ओर से सेवाओं में किसी भी प्रकार की कमी को बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के ध्यान में लाया जा सकता है जो इस संबंध में देश में एक नोडल प्राधिकरण है।

पशुचिकित्सकों की भागीदारी

योजना के सफल कार्यान्वयन के लिए ग्रामीण स्तर पर पशु चिकित्सकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्हें योजना के तहत कवर किए जाने वाले जानवरों की पहचान और जांच, उनके बाजार मूल्य का निर्धारण, बीमित जानवरों की टैगिंग और अंत में दावा किए जाने पर पशु चिकित्सा प्रमाण पत्र जारी करने के काम से जोड़ा जाना है। इसके अलावा, वे किसानों और पशुपालकों के संपर्क में रहकर योजना को बढ़ावा देने और लोकप्रिय बनाने में भी मदद कर सकते हैं। जहां तक संभव हो, केवल राज्य सरकार के साथ काम करने वाले पशु चिकित्सक ही शामिल हो सकते हैं। भारतीय पशु चिकित्सा परिषद से पंजीकृत निजी पशु चिकित्सक केवल तभी शामिल हो सकते हैं जब सरकारी पशु चिकित्सक उपलब्ध न हों। पशुपालन विभाग के जिला अधिकारी द्वारा प्रत्येक जिले के लिए ऐसे पशु चिकित्सकों की एक सूची तैयार की जाएगी। पशु चिकित्सकों की सूची जिले के लिए चयनित बीमा कंपनी के साथ-साथ संबंधित पंचायती राज निकायों को भी उपलब्ध करायी जायेगी

बीमा पॉलिसी कवर की शुरूआत और प्रीमियम सब्सिडी का समायोजन

योजना की प्रभावकारिता के बारे में पशु मालिकों के बीच विश्वास पैदा करने के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि पॉलिसी कवर पशु की पहचान, पशु चिकित्सक द्वारा उसकी जांच, उसके मूल्य का आकलन और उसकी टैगिंग जैसी बुनियादी औपचारिकताओं के पूरा होने के बाद प्रभावी हो पशु मालिक द्वारा बीमा कंपनी या उसके एजेंट को प्रीमियम का 50% भुगतान के साथ चयनित बीमा कंपनी को इस पर सहमति देनी होगी हालाँकि, यह संभव है कि बीमा कंपनी बीमा अधिनियम में एक प्रावधान बता सकती है कि बीमा कवर केवल तभी प्रभावी हो सकता है जब पूरे प्रीमियम का अग्रिम भुगतान किया जाए। इस समस्या से निपटने के लिए एक ऐसी व्यवस्था की जा सकती है जिसके तहत सीईओ द्वारा सीधे बीमा कंपनी को एक निश्चित राशि का अग्रिम भुगतान किया जाए। यह राशि 3 महीने की अवधि में बीमा किए जाने वाले अपेक्षित जानवरों की संख्या के प्रीमियम के 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए। बीमा कंपनी को अपनी ओर से अपनी शाखाओं को निर्देश जारी करना चाहिए कि जब भी पशु मालिक द्वारा प्रीमियम का 50% भुगतान किया जाए, तो उन्हें इस अग्रिम से शेष 50% को उचित रूप से समायोजित करके पॉलिसी जारी करनी चाहिए। बीमा कंपनी को जारी की गई पॉलिसियों का मासिक विवरण तैयार करना चाहिए, जिसमें प्रत्येक जानवर के मूल्यांकित मूल्य और प्रत्येक जिले के लिए सरकारी हिस्सेदारी को पशुपालन विभाग के जिला अधिकारी द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित किया जाना चाहिए और सीईओ को प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि उतनी राशि की भरपाई की जा सके। सीईओ द्वारा बीमा कंपनी को। बीमा कंपनी को अग्रिम भुगतान के लिए तीन माह की अवधि में बीमित पशुओं की संख्या प्राप्त करने का लक्ष्य यथार्थवादी आधार पर होना चाहिए तथा अग्रिम धनराशि की वसूली संबंधित बीमा कंपनी द्वारा की गई बाद की प्रगति के आधार पर होनी चाहिए।

योजना के अंतर्गत शामिल किये जाने वाले पशु और लाभार्थियों का चयन

वे सभी मादा मवेशी/भैंस जो प्रति स्तनपान कम से कम 1500 लीटर दूध देती हैं, उन्हें अधिक दूध देने वाली माना जाएगा और इसलिए उन्हें उनके मौजूदा बाजार मूल्य के अधिकतम मूल्य पर योजना के तहत बीमा कराया जा सकता है। किसी अन्य बीमा योजना के अंतर्गत आने वाले पशुओं को इस योजना के अंतर्गत कवर नहीं किया जाएगा। सब्सिडी का लाभ प्रति लाभार्थी दो पशुओं तक सीमित है और अधिकतम तीन वर्ष की अवधि के लिए एक पशु के एकमुश्त बीमा के लिए दिया जाना है। किसानों को तीन साल की पॉलिसी लेने के लिए प्रोत्साहित करना होगा जो बाढ़ और सूखे आदि जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर बीमा का वास्तविक लाभ प्राप्त करने के लिए अधिक किफायती और उपयोगी होने की संभावना है। हालांकि, यदि कोई पशुपालक इसे पसंद करता है वैध कारणों से तीन वर्ष से कम अवधि के लिए बीमा पॉलिसी है, तो योजना के तहत सब्सिडी का लाभ उन्हें भी उपलब्ध होगा, इस प्रतिबंध के साथ कि पॉलिसी के आगे विस्तार के लिए कोई सब्सिडी उपलब्ध नहीं होगी। लाभार्थियों की पहचान के लिए एनपीसीबीबी के फील्ड प्रदर्शन रिकॉर्डर को भी शामिल किया जा सकता है। ग्राम पंचायतें लाभार्थियों की पहचान करने में बीमा कंपनियों की सहायता करेंगी।

पशु के बाजार मूल्य का निर्धारण

किसी जानवर का बीमा उसके मौजूदा बाजार मूल्य की अधिकतम कीमत पर किया जाएगा। बीमा कराए जाने वाले पशु की बाजार कीमत का आकलन लाभार्थी, अधिकृत पशु चिकित्सक और बीमा एजेंट द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा।

बीमित पशु की पहचान

बीमा दावे के समय बीमित पशु की उचित और विशिष्ट पहचान करनी होगी। इसलिए, जहां तक ​​संभव हो कान (ईयर टैगिंग) फुलप्रूफ होनी चाहिए। पॉलिसी लेते समय कान (इयर) टैगिंग की पारंपरिक पद्धति या माइक्रोचिप ठीक करने की नवीनतम तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। पहचान चिह्न लगाने का खर्च बीमा कंपनियों द्वारा वहन किया जाएगा और इसके रखरखाव की जिम्मेदारी संबंधित लाभार्थियों पर होगी। टैगिंग सामग्री की प्रकृति और गुणवत्ता पर लाभार्थियों और बीमा कंपनी द्वारा परस्पर सहमति व्यक्त की जाएगी। पशु चिकित्सक लाभार्थियों को उनके दावे के निपटान के लिए निर्धारित टैग की आवश्यकता और महत्व के बारे में मार्गदर्शन कर सकते हैं ताकि वे टैग के रखरखाव की उचित देखभाल कर सकें।

बीमा की वैधता अवधि के दौरान मालिक का परिवर्तन

पशु की बिक्री या अन्यथा पशु को एक मालिक से दूसरे मालिक को हस्तांतरित करने के मामले में, बीमा पॉलिसी की समाप्ति से पहले, पॉलिसी की शेष अवधि के लिए लाभार्थी का अधिकार नए मालिक को हस्तांतरित करना होगा। पशुधन नीति के हस्तांतरण के तौर-तरीके और स्थानांतरण के लिए आवश्यक शुल्क और बिक्री विलेख आदि बीमा कंपनी के साथ अनुबंध करते समय तय किए जाने चाहिए।

दावों का निपटान

बीमाधारक को अनावश्यक कठिनाई से बचाने के लिए दावे के निपटान की विधि बहुत सरल और शीघ्र होनी चाहिए। बीमा कंपनी के साथ अनुबंध करते समय अपनाई जाने वाली प्रक्रिया/दावे के निपटान के लिए आवश्यक दस्तावेजों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए। दावा देय होने की स्थिति में, अपेक्षित दस्तावेज जमा करने के 15 दिनों के भीतर बीमा राशि का भुगतान किया जाना चाहिए। पशु का बीमा करते समय, सीईओ को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दावों के निपटान के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं अपनाई जाएं और आवश्यक दस्तावेज सूचीबद्ध किए जाएं और उन्हें पॉलिसी दस्तावेजों के साथ संबंधित लाभार्थियों को उपलब्ध कराया जाए।

योजना की प्रभावी मॉनिटरिंग

योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए विभिन्न चरणों में कड़ी निगरानी की आवश्यकता है। निगरानी वित्तीय रिलीज, बीमाकृत पशुओं की संख्या और बीमा के प्रकार के संदर्भ में होनी चाहिए। केंद्र और राज्य स्तर पर निगरानी बेहद जरूरी है. प्रभावी मॉनिटरिंग के लिए सीईओ को विशेष प्रयास करने होंगे। राज्य सरकार में प्रभारी सचिव पशुपालन/राज्य पशुपालन निदेशक योजना के कार्यान्वयन की समय-समय पर समीक्षा करेंगे।

पशु चिकित्सकों को मानदेय का भुगतान

योजना में पशु चिकित्सा पदाधिकारी की भागीदारी प्रारंभ से अंत तक है योजना की सफलता के लिए उनकी सक्रिय रुचि और समर्थन आवश्यक है। इसे देखते हुए पशु चिकित्सकों को इन गतिविधियों को पूरे मन से करने के लिए प्रेरित करने के लिए कुछ प्रोत्साहन प्रदान करना आवश्यक है। किसी भी बीमा के मामले में पशु का बीमा करने के चरण में प्रति पशु 50/- रुपये और पशु चिकित्सा प्रमाण पत्र जारी करने के चरण में (पोस्टमार्टम आयोजित करने सहित, यदि कोई हो) प्रति पशु 100/- रुपये का भुगतान करने का निर्णय लिया गया है। एसआईए को मानदेय भुगतान के लिए आवश्यक राशि केंद्र सरकार उपलब्ध कराएगी। सीईओ को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बोर्ड प्रत्येक तिमाही के अंत में पशु चिकित्सा चिकित्सकों को बीमाकृत पशुओं की संख्या और उस तिमाही में उनके द्वारा जारी किए गए पशु चिकित्सा प्रमाणपत्रों के आधार पर भुगतान करेगा।

प्रचार

योजना नई है और संबंधित अधिकारियों सहित लोगों को योजना के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। इसलिए, जनता के साथ-साथ इसमें शामिल मशीनरी को भी योजना और उसके लाभों के बारे में जागरूक करना होगा। पैम्फलेट, पोस्टर, दीवार पेंटिंग, रेडियो वार्ता, टीवी क्लिपिंग आदि किसानों के बीच योजना के तहत अपने उच्च उपज वाले जानवरों का बीमा करने के लाभों के बारे में जागरूकता पैदा करने में मदद करेंगे। व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए विशेष अवसरों जैसे पशु मेलों आदि पर भी प्रचार अभियान चलाया जायेगा। पंचायती राज संस्थाओं को बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार में शामिल किया जायेगा योजना के बारे में जानकारी प्रसारित करने और किसानों को बीमा के लिए पहचान हेतु अपने पशुओं की पेशकश करने के लिए आमंत्रित करने का कार्य मध्यवर्ती पंचायतों को सौंपा जाएगा। इस प्रयोजन के लिए सीईओ को प्रत्येक मध्यवर्ती पंचायत के लिए 5000/- रुपये से अधिक की सहायता प्रदान करने का अधिकार है (नकद और प्रचार सामग्री दोनों के रूप में)।

बीमा एजेंटों को कमीशन

योजना के कुशल कार्यान्वयन के लिए बीमा एजेंट की सक्रिय और समर्पित भागीदारी सबसे आवश्यक है। बीमा कंपनी को एजेंट को उनकी प्रीमियम आय में से कम से कम 15% प्रीमियम राशि का भुगतान करने के लिए राजी किया जाना चाहिए। बीमा कंपनी के साथ अनुबंध करते समय कार्यान्वयन एजेंसी को यह सुनिश्चित करना होगा।

अनुबंध- मैं

2008-09 से 2011-12 के दौरान पशुधन बीमा योजना के अंतर्गत शामिल 100 जिलों की सूची

क्रमांक। राज्य/जिले का नाम
1 आंध्र प्रदेश (8)
  1 खम्मम*#
  2 अनंतपुर*
  3 आदिलाबाद*
  4 कुरनूल*
  5 नेल्लोर*
  6 कडप्पा*
  7 महबूबनगर*
  8 वारंगल*
2 अरुणाचल प्रदेश (2)
  9 पश्चिम सियांग
  10 पूर्वी सियांग
3 असम (2)
  11 नगांव
  12 कामरूप
4 बिहार (5)
  13 गया#
  14 भोजपुर
  15 नालन्दा
  16 वैशाली
  17 छपरा
5 छत्तीसगढ़ (2)
  18 धमतरी
  19 राजनांदगांव #
6 गुजरात (6)
  20 वडोदरा
  21 जूनागढ़
  22 राजकोट
  23 भावनगर
  24 अहमदाबाद
  25 कच्छ
7 हरियाणा (5)
  26 करनाल
  27 फरीदाबाद
  28 सिरसा
  29 कैथल
  30 सोनीपत
8 हिमाचल प्रदेश (2)
  31 शिमला
  32 हमीरपुर
9 जम्मू एवं कश्मीर (2)
  33 उधमपुर
  34 अनंतनाग
10 झारखंड (2)
  35 गोड्डा
  36 हज़ारीबाग़ #
11 कर्नाटक (4)
  37 बेलगाम*
  38 गुलबर्गा
  39 मैसूर
  40 हसन*
12 केरल (2)
  41 कोल्लम
  42 इद्दुकी
13 मध्य प्रदेश (6)
  43 सीधी
  44 रीवा
  45 बालाघाट #
  46 सीहोर
  47 देवास
  48 इंदौर
14 महाराष्ट्र (6)
  49 गोंदिया #
  50 नागपुर
  51 भंडारा
  52 यवतमाल*
  53 जलना
  54 वर्धा
15 मणिपुर (2)
  55 थौबल
  56 पश्चिम इंफाल
16 मेघालय (2)
  57 पश्चिम गारो हिल्स
  58 जयन्तिया हिल्स
17 मिजोरम (2)
  59 सैहा
  60 कोलासिब
18 नागालैंड (2)
  61 कोहिमा
  62 वोखा
19 उड़ीसा (2)
  63 पुरी
  64 संबलपुर #
20 पंजाब (6)
  65 गुरदासपुर
  66 जालंधर
  67 होशियारपुर
  68 बठिंडा
  69 मोगा
  70 मानसा
21 राजस्थान (6)
  71 चित्तौड़गढ़
  72 नागौर
  73 भीलवाड़ा
  74 जोधपुर
  75 बीकानेर
  76 श्रीगंगानगर
22 सिक्किम (2)
  77 पश्चिम सिक्किम
  78 उत्तरी सिक्किम
23 तमिलनाडु (5)
  79 विल्लुपुरम
  80 तिरुनेलवेली
  81 तिरुचरापल्ली
  82 धर्मपुरी
  83 थिरुवन्नमलाई
24 त्रिपुरा (1)
  84 दक्षिण त्रिपुरा
25 उत्तर प्रदेश (12)
  85 मथुरा
  86 देवरिया
  87 जौनपुर
  88 सीतापुर
  89 सुल्तानपुर
  90 हरदोई
  91 गोंडा
  92 खेरी
  93 बिजनौर
  94 गाजीपुर
  95 रायबरेली
  96 सोनभद्र #
26 उत्तराखंड (2)
  97 देहरादून
  98 नैनीताल
27 पश्चिम बंगाल (2)
  99 हुगली
  100 जलपाईगुड़ी

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नारियल की खेती का परिचय

देवी-देवताओं की पूजा अर्चना हो या कोई अन्य मांगलिक कार्य, नारियल के बिना अधूरा है। अत:nkनारियल भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। वाल्मीकि रामायण में नारियल का वर्णन किया गया है। आराध्य फल होने के साथ-साथ दैनिक जीवन में भी नारियल का एक अहम स्थान है। इस तरह नारियल के संस्कृतिक महत्व के साथ-साथ इसका आर्थिक महत्व भी है। नारियल से भारत के छोटे किसानों का जीवन जुड़ा हुआ है। इस वृक्ष का कोई ऐसा अंग नहीं है जो उपयोगी न हो। नारियल का फल पेय, खाद्य एवं तेल के लिए उपयोगी है। फल का छिलका विभिन्न औद्योगिक कार्यो में उपयोगी है तथा पत्ते एवं लकड़ी भी सदुपयोगी हैं। इन्हीं उपयोगिताओं के कारण नारियल को कल्पवृक्ष कहा जाता है।

भारत वर्ष में नारियल की खेती एवं उद्योग के समेकित विकास के लिए भारत सरकार ने 1981 में नारियल विकास बोर्ड का गठन किया। इसका मुख्यालय केरल के कोच्ची शहर में है और इसके 3 क्षेत्रीय कार्यालय पटना (बिहार) स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के नियंत्रणाधीन 5 राज्य स्तरीय केंद्र हैं जो उड़ीसा के भुवनेश्वर, पश्चिम बंगाल के कलकत्ता, मध्य प्रदेश के कोंडेगाँव, असम के गुवाहटी तथा त्रिपुरा के अग्रत्तला में स्थित है। राज्य स्तरीय केन्द्रों के अतिरिक्त 4 प्रदर्शन-सह-बीज उत्पादन प्रक्षेत्र, सिंहेश्वर (बिहार), कोंडेगाँव (मध्य प्रदेश), अभयपुरी (असम), बेलबारी (त्रिपुरा) भी पटना क्षेत्रीय कार्यालय के तकनीकी मार्गदर्शन में कार्यरत हैं। यहाँ से नारियल सम्बन्धी तकनीकी जानकारी किसानों को उपलब्ध कराई जाती है।

जलवायु एवं भूमि

नारियल खेती की सफलता रोपण सामग्री, अपनाई गई विधि एवं इसकी वैज्ञानिक देखभाल पर निर्भर करती है। गुणवत्तामूलक पौधों का चुनाव करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि बिचड़े की उम्र 9-18 माह के बीच हो तथा उनमें कम से कम 5-7 हरे भरे पत्ते हों। बिचड़ों के गर्दनी भाग का घेरा 10-12 सें.मी. हो तथा पौधे रोगग्रस्त न हों। चयनित जगह पर अप्रैल-मई माह में 7.5 x 7.5 मीटर (25 x 25 फीट) की दूरी पर 1 x 1 x 1 मीटर आकार के गड्ढे बनाए जाते हैं। प्रथम वर्षा होने तक गड्ढा खुला रखा जाता है जिसे 30 किलो गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट एवं सतही मिट्टी को मिलाकर इस तरह भर दिया जाता है कि ऊपर से 20 सें.मी. गड्ढा खाली रहे। शेष बची हुई मिट्टी से पौधा लगाने के बाद गड्ढे के चारों ओर मेढ बना दिया जाता है ताकि गड्ढे में वर्षा का पानी इकट्ठा न हो।

नारियल लगाने का उपयुक्त समय जून से सितम्बर तक के महीने हैं, लेकिन जहाँ सिंचाई की व्यवस्था हो वहाँ जाड़े तथा भारी वर्षा का समय छोड़कर कभी भी पौधा लगाया जा सकता है। उपरोक्त विधि से तैयार किये गये गड्ढे के ठीक बीचों-बीच खुरपी या हाथ से नारियल फल के आकार का गड्ढा बनाकर पौधों को रखकर चारों ओर से मिट्टी से भर दिया जाता है तथा मिट्टी को पैर से अच्छी तरह से दबा दिया जाता है। यदि लगाने का समय वर्षाकाल न हो तो पौधा लगाने के उपरांत सिंचाई आवश्यक होती है। गड्ढों में नारियल बिचड़ों का रोपण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि बिचड़ों के ग्रीवा स्थल से 2 इंच व्यास के बीजनट अंश को मिट्टी से नहीं ढका जाय, अन्यथा बिचड़ों में श्वसन क्रिया ठीक से नहीं होने के कारण उसकी वृद्धि पर कुप्रभाव पड़ सकता है। साथ ही पौधे के मरने की भी सम्भावना बढ़ जाती है। जिन क्षेत्रों में दीमक या ग्रब्स का प्रकोप हो वहाँ गड्ढा भरते समय 10 ग्राम फॉरेट/थाइमेट मिट्टी के साथ मिला दें।

किस्में

नारियल की किस्मों को दो वर्गो में बांटा गया है जो लम्बी एवं बौनी किस्म के नाम से जानी जाती है। इन दोनों किस्मों के संस्करण से जो किस्में बनाई गई है वे संकर किस्म के नाम से जानी जाती है। गैर-परम्परागत क्षेत्रों के सिंचित क्षेत्रों हेतु ऊँची एवं संकर किस्में अनुशंसित हैं, जबकि पर्याप्त सिंचाई-सुविधाएँ न होने पर केवल ऊँची किस्मों का उपयोग लाभप्रद है। बौनी किस्में गैर-परम्परागत क्षेत्रों की जलवायु के लिए उपयुक्त नहीं पायी गई है। फिर भी विशेष देखरेख में बौनी किस्मों की खेती भी संभव है।

लम्बी किस्मों की उपजातियों में पश्चिम तटीय लम्बी प्रजाति, पूर्व तटीय लम्बी प्रजाति, तिप्तुर लम्बी प्रजाति, अंडमान लम्बी प्रजाति, अंडमान जायंट एवं लक्षद्वीप साधारण प्रमुख हैं। बौनी किस्मों की उपजातियों में चावक्काड ऑरेंज बौनी प्रजाति एवं चावक्काड हरी बौनी प्रजाति प्रचलित हैं। संकर किस्मों की उपजातियों में मुख्य हैं लक्षगंगा, केरागंगा एवं आनंद गंगा।

पौध रोपण

नारियल खेती की सफलता रोपण सामग्री, अपनाई गई विधि एवं इसकी वैज्ञानिक देखभाल पर निर्भर करती है। गुणवत्तामूलक पौधों का चुनाव करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि बिचड़े की उम्र 9-18 माह के बीच हो तथा उनमें कम से कम 5-7 हरे भरे पत्ते हों। बिचड़ों के गर्दनी भाग का घेरा 10-12 सें.मी. हो तथा पौधे रोगग्रस्त न हों। चयनित जगह पर अप्रैल-मई माह में 7.5 x 7.5 मीटर (25 x 25 फीट) की दूरी पर 1 x 1 x 1 मीटर आकार के गड्ढे बनाए जाते हैं। प्रथम वर्षा होने तक गड्ढा खुला रखा जाता है जिसे 30 किलो गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट एवं सतही मिट्टी को मिलाकर इस तरह भर दिया जाता है कि ऊपर से 20 सें.मी. गड्ढा खाली रहे। शेष बची हुई मिट्टी से पौधा लगाने के बाद गड्ढे के चारों ओर मेढ बना दिया जाता है ताकि गड्ढे में वर्षा का पानी इकट्ठा न हो।

नारियल लगाने का उपयुक्त समय जून से सितम्बर तक के महीने हैं, लेकिन जहाँ सिंचाई की व्यवस्था हो वहाँ जाड़े तथा भारी वर्षा का समय छोड़कर कभी भी पौधा लगाया जा सकता है। उपरोक्त विधि से तैयार किये गये गड्ढे के ठीक बीचों-बीच खुरपी या हाथ से नारियल फल के आकार का गड्ढा बनाकर पौधों को रखकर चारों ओर से मिट्टी से भर दिया जाता है तथा मिट्टी को पैर से अच्छी तरह से दबा दिया जाता है। यदि लगाने का समय वर्षाकाल न हो तो पौधा लगाने के उपरांत सिंचाई आवश्यक होती है। गड्ढों में नारियल बिचड़ों का रोपण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि बिचड़ों के ग्रीवा स्थल से 2 इंच व्यास के बीजनट अंश को मिट्टी से नहीं ढका जाय, अन्यथा बिचड़ों में श्वसन क्रिया ठीक से नहीं होने के कारण उसकी वृद्धि पर कुप्रभाव पड़ सकता है। साथ ही पौधे के मरने की भी सम्भावना बढ़ जाती है। जिन क्षेत्रों में दीमक या ग्रब्स का प्रकोप हो वहाँ गड्ढा भरते समय 10 ग्राम फॉरेट/थिमेट मिट्टी के साथ मिला दें।

पौधों की देखभाल

नव रोपित बिचड़ों को अत्यधिक ठंडक एवं गर्म हवा (लू) से बचाव हेतु समुचित छाया एवं सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक है। रोपण के बाद 2 वर्ष की अवधि तक तना व बीजनट का गर्दनी भाग खुला रखें क्योंकि समुचित वृद्धि के लिए गर्दनी भाग पर हवा का संचार जरूरी है।

नारियल के वयस्क वृक्षों की उत्पादकता बनाये रखने के लिए ग्रीष्म तथा अनावृष्टि काल में सिंचाई बहुत जरूरी है। आवश्यकतानुसार 3-4 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। जल की मात्रा पौधों की उम्र एवं उसके विकास पर निर्भर है।

खाद एवं उर्वरक

लंबी अवधि तक अधिक उत्पादन के लिए अनुशंसित मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का नियमित प्रयोग आवश्यक है। वयस्क नारियल पौधों को प्रतिवर्ष प्रथम वर्षा के समय जून में 30-40 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग करें। इसके अलावा निम्न सारणी के अनुसार उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा का नियमित प्रयोग करें।

सिंचित क्षेत्रों के लिए उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा प्रति पौधा प्रति वर्ष (ग्रा./पौधा)

पौधों की उम्र

उपयोग किये जाने वाले उर्वरकों की मात्रा
यूरिया सिंगल सुपर फास्फेट म्यूरेट ऑफ़ पोटाश
प्रथम वर्ष (पौधा लगाने के तीन माह बाद)

100

200

200

द्वितीय वर्ष

333

666

666

तृतीय वर्ष

666

1332

1332

चतुर्थ वर्ष एवं तदुपरान्त

1000

2000

2000

उपरोक्त उर्वरकों की मात्रा एक पेड़ हेतु एक वर्ष के लिए अनुशंसित है जिसे तीन किस्तों में विभाजित करके देने से उर्वरकों की अधिकतम उपयोग होता है। उर्वरकों की तीन किस्तों में से प्रथम क़िस्त के रूप में उपरोक्त मात्रा का आधा भाग (50%) वर्षा ऋतु के आरम्भ में तथा द्वितीय एवं तृतीय क़िस्त के रूप में एक चौथाई (25%) मात्रा क्रमश: सितम्बर माह में तथा शेष एक चौथाई (25%) मात्रा मार्च में दी जानी चाहिए। वयस्क पौधों को खाद एवं उर्वरक मुख्य तने से 1-1.5 मीटर की दूरी पर पेड़ के चारों तरफ देना चाहिए। पाँच वर्ष से कम उम्र के पौधों के लिए उम्र के अनुसार उपरोक्त दूरी कम करनी चाहिए।

उपरोक्त उर्वरकों के अलावा जिन क्षेत्रों में बोरॉन नामक सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी हो उन क्षेत्रों में 50 ग्राम प्रति वयस्क पेड़ प्रति वर्ष बोरोक्स के प्रयोग करने से शिखर अवरुद्ध (क्राउन चोकिंग) रोग का डर नहीं रहता है। इसके अलावा मैग्नीशियम नामक सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी वाले क्षेत्रों में मैग्नीशियम सल्फेट 500 ग्राम प्रति वयस्क पेड़ प्रति वर्ष देना लाभदायक माना गया है।

निराई-गुड़ाई

नारियल बाग़ में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए नियमित निराई-गुड़ाई एवं जुताई आवश्यक है। इन क्रियाओं से खरपतवार नियंत्रण तो होता ही है, साथ ही जड़ों में वायु का संचालन पर्याप्त रूप में होता है। आच्छादन कृषि के माध्यम से मिट्टी की आर्द्रता बनी रहती है, मृदाक्षय नहीं होता है तथा इससे भूमि में जैविक पदार्थो की उपलब्धता में वृद्धि होती है। इसके लिए मूंग, उड़द, बिना काँटोंवाली छुईमुई, लाजवंती, केलोपोगोनियम, स्टाइलोसेन्थस, सेसबेनिया इत्यादि की बुआई कर सकते हैं।

अन्तर्वर्ती एवं मिश्रित फसल (बहुस्तरीय फसलन प्रणाली)

नारियल के बाग़ में अनेक प्रकार की अन्तर्वर्ती तथा मिश्रित फसलें उगाने की अनुशंसा की जाती है। इन फसलों से नारियल उत्पादकों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। अन्तर्वर्ती तथा मिश्रित फसलों का चयन करते समय उस क्षेत्र की कृषि-जलवायु की स्थिति, विपणन की सुविधा तथा परिवार की आवश्यकता को ध्यान में रखना आवश्यक है। अन्तर्वर्ती तथा मिश्रित फसलों के रूप में केला, अनानास, ओल, मिर्च, शकरकंद, पपीता, नींबू, हल्दी, अदरक, मौसम्बी, टेपीओका, तेजपात, पान तथा फूल एवं सजावटी पौधे बड़ी सफलतापूर्वक उगाये जा सकते हैं। बहुस्तरीय नारियल आधारित प्रणाली अपनाने से उपरोक्त लाभ के अलावा प्राकृतिक रूप में जमीन में उपलब्ध पोषक तत्वों का उपयोग तथा जमीन से ऊपर प्राकृतिक स्रोत जैसे सूर्य का प्रकाश, वायुमण्डलीय नेत्रजन इत्यादि का भरपूर उपयोग होता है। साथ ही नारियल पौधों को दिए गए खाद, उर्वरक, पानी इत्यादि जो नारियल पौधों के जरूरत से ज्यादा है, का सदुपयोग हो जाता है।

नारियल के मुख्य कीट एवं व्याधियाँ

नारियल की अच्छी पैदावार के लिए खाद एवं पानी के अलावा पौध-सुरक्षा उपाय अपनाने की भी अत्यधिक आवश्यकता है। नारियल में पाये जाने वाले कुछ प्रमुख कीट एवं व्याधियाँ इस प्रकार हैं-

कीट एवं उनका नियंत्रण  

गैंडा भृंग (रिनोसिरस बीटल) :- 

इस कीट से आक्रमणग्रस्त कोंपल को पूर्णरूप से खुलने पर पत्ते ज्यामितीय ढंग से कटे हुए दिखाई देते हैं। इन कीटों को अंकुशों में फंसाकर बाहर निकाल देना चाहिए। प्रभावित वृक्ष की ऊपरी तीन पत्तियों के पर्णकक्ष में 25 ग्राम सेविडॉल 8 जी में 200 ग्राम महीन बालू रेत मिश्रित कर मई, सितम्बर व दिसम्बर के महीनों में भर दें साथ ही साथ बागान साफ़-सुथरा रखें।

लाल ताड धुन (रेड पाम वीविल) :- 

यह कीट तने पर छिद्र कर देता है इन छिद्रों से भूरे रंग का चिपचिपा स्राव निकलता दिखाई देता है। इन छिद्रों से कीट द्वारा चबाये हुए पेड़ के रेशे भी बाहर निकलते हैं। नियंत्रण हेतु तने को किसी भी प्रकार की क्षति या घाव होने से रोके तथा उपस्थित छिद्रों में 2-3 सल्फास की गोलियाँ अथवा पेट्रोल से भींगी रुई रखकर छिद्रों को कोलतार से बंद कर दें। इसके अतिरिक्त आक्रमणग्रस्त पेड़ों में 1 प्रतिशत कार्बोरिल या 0.1 प्रतिशत एंडो सल्फान का एक कीप द्वारा तने में इंजेक्शन दें।

कोरिड बग :- 

इस कीट के प्रकोप से मादा फूलों की वृद्धि नहीं होती है तथा अविकसित फल गिरने लगते हैं कभी-कभी फल विकसित होने पर भी उस में पानी या गिरि नहीं होती है। इसके बचाव के लिए निषेचन की क्रिया समाप्त होने पर 0.1 प्रतिशत कार्बरिल या एंडोसल्फान का छिड़काव करें।

कोकोनट माइट :- 

इसका प्रभाव विकसित हो रहे फलों पर ज्यादा देखा गया है जिसके कारण फलों का रंग बदरंग हो जाता है और उसका आकार बिगड़ जाता है। माइट का प्रकोप फल विकास के साथ ही शुरू हो जाता है अत: इसके नियंत्रण के लिए फलों के छोटे अवस्था में ही नीमाजोल 3 मि.ली./ली. पानी में घोल कर 2 छिड़काव करें तथा पौधों के जड़ों के पास की नीमाजोल का प्रयोग करें।

रोग एवं उनका नियंत्रण

महाली, फल सड़न एवं नट फ़ॉल (फल गिराव) :- 

इस बीमारी के कारण मादा फूल एवं अपरिपक्व फल गिरते है इसके चलते नव विकसित फलों तथा बुतामों (बटन) के डंठलों के समीप घाव दिखाई देते हैं जो अंतत: आंतरिक उत्तकों के नाश के परिणामी होते हैं।

प्रबंधन :-

इसके नियंत्रण के लिए नारियल के मुकुट पर एक प्रतिशत बोर्डो मिश्रण या 0.5 प्रतिशत फाइटोलॉन नामक दवा का छिड़काव एक बार वर्षा प्रारंभ होने के पूर्व और पुन: दो माह के अंतराल पर करना चाहिए।

बडरॉट अथवा काली सड़न :-

इस बीमारी में कोंपल (केंद्रस्थ पत्ती) जो कृपाण सदृश होती है झुकी तथा मुर्झाई हुई दृष्टिगोचर होती है। जब बीमारी अपने उत्कर्ष पर पहुंचती है तो केन्द्रस्थ पत्ती मुर्झा कर नीचे झुक जाती है और अंतत: नारियल का सम्पूर्ण मुकुट नीचे गिर जाता है और नारियल का वृक्ष अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर देता है। मुकुट के कोमल पर्णाधार के सड़ने से सड़े अण्डों की सी दुर्गंध निकलती है।

प्रबंधन :-

मुकुट के सभी आक्रान्त ऊतकों को निकाल कर 10 प्रतिशत बोर्डोपेस्ट का लेप करें और जब तक नये प्ररोह(टहनी) नहीं प्रस्फुटित हो तब तक यह रक्षात्मक कवच बने रहने दें। आक्रांत नारियल के पड़ोसी नारियल वृक्षों के मुकुट पर एक प्रतिशत बोर्डो मिश्रण का छिड़काव कर उन्हें रक्षात्मक कवच पहनावें तथा बीमारी के संभावित समय में प्राय: एक प्रतिशत बोर्डो मिश्रण का छिड़काव बार-बार करते रहे।

क्राउन चोकिंग :- 

यह रोग साधारणतया देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में ही देखा गया है। इस रोग से कम उम्र के पौधे ज्यादा प्रभावित होते है। इसका मुख्य लक्षण यह है कि इससे कोमलतम पत्ते का समुचित विकास रुक जाता है एवं प्राकृतिक आकार विकृत होने लगता है। कुछ दिनों के बाद रोग अधिक प्रभावकारी हो जाता है और कोमलतम पत्ते खुलते नहीं, फलस्वरूप ये छड़ी का आकार धारण कर लेते हैं।

प्रबंधन :-

यह रोग जमीन में बोरॉन नामक पोषक तत्व की कमी से होता है। इस रोग से बचाव के लिए उर्वरक एवं खाद की अनुशंसित मात्रा के साथ 50 ग्राम बोरॉक्स प्रतिवर्ष प्रति पौधा मिला दें। यदि रोग पुराना हो तो उपर्युक्त मात्रा साल में दो बार दी जा सकती है।

नारियल आधारित उत्पाद एवं हस्तशिल्प

खोपरा (सूखीगरी), नारियल तेल, सुखाया नारियल चूर्ण (डेसिक्केटिड नारियल), नारियल क्रीम एवं दूध, नेटा –डी-कोको, नारियल ताड़ी एवं गुड़, नारियल रेशा (कोयर), सक्रियित कार्बन, नारियल खोपड़ी चूर्ण एवं कोयला, नारियल पेड़ के विविध भागों से निर्मित हस्तशिल्प आदि मुख्य एवं सह-उत्पाद हैं जिन पर आधारित उद्योग एवं कुटीर धंधों को अपनाकर कृषक परिवार के सदस्य, बेरोजगार युवक एवं कारीगर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उपरोक्त उत्पादों के अलावा नारियल का कच्चा फल ‘डाब’ दक्षिणी राज्यों के अतिरिक्त उड़ीसा, पश्चिम बंगाल एवं असम में भी नारियल कृषकों को अधिकाधिक आमदनी उपलब्ध करने का अच्छा स्रोत है। डाब पानी जो कि प्रोटीन एवं विटामिनों से परिपूर्ण है मानव की प्यास बुझाने के अलावा अनेक बीमारियों को भी दूर करता है।

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