Chicory

 

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कासनी की खेती

कासनी की खेती कम समय में पैदावार देने के लिए तैयार हो जाती है, इसलिए इसे नगदी फसल भी कहते है | यह एक बहुपयोगी फसल है, जिसे चिकोरी और चिकरी के नाम से भी जानते है | कासनी की खेती हरे चारे के लिए की जाती है, इसके अलावा इसे औषधीय तौर पर कैंसर की बीमारी के लिए भी उपयोगी माना जाता है | इसकी जड़ो को भूनकर काफी में डालकर पिया जाता है, इससे काफी का स्वाद अलग ही मज़ा मिलता है | इसकी जड़े देखने में मूली की तरह ही होती है, तथा पौधों पर नीले रंग के फूल लगते है | जिनसे बीज तैयार होते है | इसके बीज आकार में काफी छोटे, हल्के और भूरे सफ़ेद रंग के होते है |
कासनी की फसल का उत्पादन कंद और दाने दोनों ही रूप में प्राप्त हो जाती है | इसकी जड़ो का सेवन करने से दिल की तेज धड़कन, पेट में परेशानी, भूख की कमी और कब्ज जैसी बीमारियों में लाभ प्राप्त होता है | भारत में कासनी की खेती मुख्य रूप से उत्तराखण्ड, पंजाब, कश्मीर और उत्तर प्रदेश में की जाती है | यदि आप भी कासनी की खेती कर अच्छा लाभ कामना चाहते है, तो इस लेख में आपको कासनी की खेती कैसे करे (Chicory Farming in Hindi) तथा कासनी (चिकोरी) की पहचान के बारे में जानकारी दी जा रही है |

कासनी की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु और तापमान

कासनी की खेती को किसी भी उपजाऊ मिट्टी में कर सकते है,किन्तु यदि आप इसकी खेती व्यापारिक तौर पर करना चाहते है, तो उसके लिए बलुई दोमट मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है, इससे उत्पादन अधिक मात्रा में प्राप्त होता है | जलभराव वाली भूमि में इसकी खेती नहीं की जा सकती है | सामान्य P.H. मान वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त मानी जाता है |
इसकी खेती में शीतोष्ण और समशीतोष्ण दोनों ही जलवायु उचित होती है | अधिक गर्म जलवायु में इसके पौधे अच्छे से विकास नहीं कर पाते है, तथा सर्दियों के मौसम में इसके पौधे अच्छे से वृद्धि करते है | सर्दियों में गिरने वाले पाले को भी इसका पौधा आसानी से सहन कर लेता है | इसकी फसल को अधिक वर्षा की आवश्यकता नहीं होती है | पौध अंकुरण के लिए इसके पौधों को 25 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है, तथा 10 डिग्री तापमान (Temperature) पर इसके पौधे अच्छे से वृद्धि करते है |

कासनी की उन्नत किस्में

सामान्य तौर पर कासनी की दो प्रजातियों को उगाया जाता है, जो अलग-अलग इस्तेमाल के लिए उगाई जाती है, जिनमे जंगली और व्यापारिक प्रजातियां शामिल है, जिनकी जानकारी इस तरह से है:-

जंगली प्रजाति

इस प्रजाति की कासनी को सामान्य रूप से चारे के लिए उगाया जाता है | इसमें निकलने वाली पत्ती स्वाद में कड़वी होती है | इसका पूर्ण विकसित पौधा कई बार कटाई के लिए तैयार हो जाता है, जिसमे निकलने वाले कंद कम मोटे पाए जाते है|

व्यापारिक प्रजाति

इस क़िस्म की कासनी को व्यापारिक फसल के लिए उगाया जाता है, जो पौध रोपाई के 140 दिन पश्चात् खुदाई के लिए तैयार हो जाती है | इसमें निकलने वाली जड़े स्वाद में मीठी होती है |

के 1

इस क़िस्म के पौधों का आकार सामान्य पाया जाता है, जिसकी जड़े आकार में लम्बी, मोटी और शंकु की भांति नोकदार होती है | इसकी जड़े भूरे रंग की होती है, जिसमे सफ़ेद रंग का गूदा पाया जाता है | इसकी जड़ो को बहुत ही सावधानी से उखाड़ना होता है |

के 13

इस क़िस्म की चिकोरी को हिमाचल प्रदेश में मुख्य तौर पर उगाया जाता है | इसके पौधों में जड़े मोटी और गठी हुई होती है, जिसमे सफ़ेद रंग का गुदा पाया जाता है | इसकी जड़े उखाड़ते समय बहुत कम टूटती है, जिस वजह से अच्छी मात्रा में उत्पादन प्राप्त हो जाता है |

चिकोरी के खेत की तैयारी और उवर्रक

कासनी की खेती में भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसलिए फसल को लगाने से पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार कर ले | इसके लिए सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हलो से गहरी जुताई कर दी जाती है, इससे खेत में मौजूद पुरानी फसल के अवशेष पूरी तरह से नष्ट हो जाते है | जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है | इससे खेत की मिट्टी में सूर्य की धूप ठीक तरह से लग जाती है, और मिट्टी में मौजूद हानिकारक जीव नष्ट हो जाते है |
कासनी के खेत में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद डालनी होती है | इसके बाद कल्टीवेटर के माध्यम से खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दे | इससे खेत की मिट्टी में गोबर की खाद अच्छी तरह से मिल जाती है | खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी लगा दिया जाता है, और जब खेत का पानी ऊपर से सूखा दिखाई देने लगता है, उस दौरान रोटावेटर लगाकर खेत की फिर से जुताई कर दी जाती है | इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, मिट्टी के भुरभुरा होने के पश्चात् पाटा लगाकर खेत को समतल कर दे | इससे खेत में जलभराव नहीं होगा |
इसके अतिरिक्त यदि आप कासनी की फसल के लिए रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहते है, तो उसके लिए आपको चार बोरे एन.पी.के. की मात्रा प्रति हेक्टेयर की हिसाब से खेत की आखरी जुताई के समय छिड़क दे | इसके अलावा अगर आप फसल की पहली कटाई कर चुके है, तो उसके बाद आपको दूसरी कटाई से पूर्व 20 KG यूरिया का छिड़काव खेत में करना होता है | व्यापारिक तौर पर की गई फसल के लिए जड़ विकास के दौरान 25 KG यूरिया की मात्रा को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में छिड़कना होता है |

कासनी के बीजो की रोपाई का सही समय और तरीका

कासनी के दोनों ही तरह के उपयोग में लायी जाने वाली फसल के लिए बीज की रोपाई छिड़काव विधि द्वारा की जाती है | सघन रोपाई में बीजो को सीधा खेत में छिड़क दिया जाता है, तथा व्यापारिक रूप में बीजो को मिट्टी में मिलाकर छिड़कना होता है| दानो को खेत में छिड़कने के पश्चात उन्हें हल्के हाथो से मिट्टी में कुछ गहराई पर दबा दिया जाता है| इसके अलावा खेत में उचित दूरी पर मेड़ो को भी तैयार कर सकते है, जिससे बीज आसानी से अंकुरित हो सके| इसके बीजो की रोपाई के लिए अगस्त का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है | यदि आप चाहे तो सामान्य तौर पर पैदावार प्राप्त करने के लिए बीज रोपाई जुलाई माह के अंत तक भी कर सकते है|

कासनी के पौधों की सिंचाई

कासनी के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है, इसकी प्रारंभिक सिंचाई बीज रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है | आरम्भ में बीज अंकुरण के लिए खेत में नमी की आवश्यकता होती है, उस दौरान खेत में पानी देते रहना होता है | चारे के रूप में की गई फसल के लिए पौधों को 5 से 7 दिन के अंतराल में पानी देना होता है, तथा व्यापारिक रूप से की गई फसल के लिए पौधों की वृद्धि के समय 20 दिन के अंतराल में पानी देना होता है |

कासनी के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण

कासनी के पौधों पर खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक विधि द्वारा किया जाता है, इसके लिए इसकी पहली गुड़ाई बीज रोपाई के 25 दिन बाद की जाती है, तथा बाद की गुड़ाई को 20 दिन के अंतराल में करना होता है |

कासनी के पौधों में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम

    1. बालदार सुंडी :-

इस क़िस्म का रोग कासनी के पौधों पर पैदावार के दौरान आक्रमण करता है | इस रोग की सुंडी पौधों की पत्तियों को हानि पहुंचाती है | जिससे पौधा विकास करना बंद कर देता है | इस रोग से पौधों को बचाने के लिए नीम के तेल या सर्फ के घोल का छिड़काव पौधों पर करना होता है |

  • जड़ गलन :-

 

इस क़िस्म का रोग कासनी के पौधों पर नमी की वजह से देखने को मिलता है | इस रोग से प्रभावित फसल में पैदावार अधिक प्रभावित होती है | इस रोग से बचाव के लिए खेत में जलभराव न होने दे | इसके अतिरिक्त खेत की पहली जुताई के समय नीम की खली का छिड़काव खेत में करना होता है |

कासनी के फसल की कटाई, पैदावार और लाभ

हरे चारे के रूप में उगाई गई फसल की कटाई बीज रोपाई के 25 से 30 दिन बाद की जाती है, तथा एक बार लगाई गई फसल से 10 से 12 कटाई आसानी से कर सकते है | पहली कटाई के बाद बाकि की कटाई के लिए इसके पौधे 12 से 15 दिन में तैयार हो जाते है |
कंद के रूप में फसल प्राप्त करने के लिए इसकी जड़ो की खुदाई बीज रोपाई के तीन से चार माह पश्चात् की जाती है | इसका वाला इसके बीजो को प्राप्त करने के लिए खुदाई की गई जड़ो से बीजो को मशीन द्वारा अलग कर लिया जाता है | इसके कंद और बीज एक साथ तैयार हो जाते है |
चिकोरी के कंद की खुदाई बीज रोपाई के 120 दिन बाद की जाती है, जिससे प्रति हेक्टेयर 20 टन का उत्पादन प्राप्त हो जाता है, तथा 5 क्विंटल तक बीज प्रति हेक्टेयर के खेत से प्राप्त हो जाते है | कासनी के कंदो का बाज़ारी भाव 400 रूपए तथा बीजो का भाव 8 हजार रूपए प्रति क्विंटल होता है | जिससे किसान भाई इसकी एक बार की फसल से कंद के रूप में 80 हजार रूपए तथा दानो के रूप में 40 हजार रूपए तक की कमाई कर अधिक मुनाफा कमा सकते है |
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Celery

 

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आम जानकारी

सैलेरी का वनस्पातिक नाम एपिऐसी ग्रेविओलेन्स है और इसको कार्नोलीके नाम से भी जाना जाता है| इसके द्वारा तैयार होने वाली दवाइयों के कारण भी जाना जाता है| सैलेरी का प्रयोग जोड़ों के दर्द, सिर दर्द, घबराहट, गठिया, भर काम करने, खून साफ करने आदि के लिए किया जाता है| इसमें विटामिन सी, विटामिन के, विटामिन बी 6, फोलेट और पोटाशियम भारी मात्रा में पाया जाता है| यह जड़ी बूटी वाली किस्म का पौधा है, जिसकी डंडी की औसतन ऊंचाई 10-14 इंच होती है और फूलों का रंग सफ़ेद होता हैं| इसके तने हल्के हरे रंग के होते है और इसके साथ 7-18 सै.मी लम्बे पत्ते होते है| पत्तों से हरे सफ़ेद रंग के फूल पैदा होते है, जो फल पैदा करते है और बाद में यहीं फल बीज में बदल जाते है, जिनकी लम्बाई 1-2 मि.मी होती है और रंग हरा-भूरा होता है| इससे मुरब्बा, सलाद और सूप तैयार किय जाता है| यह ज्यादातर मेडिटेरेनियन क्षेत्रों में, दक्ष्णि एशिया इलाकों में, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के दलदली क्षेत्रों में और भारत के कुछ क्षेत्रों में पायी जाती है| पश्चमी उत्तर प्रदेश में लाडवा और सहारनपुर जिलें, हरियाणा और पंजाब के अमृतसर, गुरदासपुर और जालंधर जिलें मुख्य सैलेरी उगाने वाले क्षेत्र है |

 

जलवायु

Season

Temperature

12-30°C
Season

Rainfall

100cm

Season

Sowing Temperature

25-30°C

Season

Harvesting Temperature

12 – 18°C

मिट्टी

यह किस्म बहुत बढ़िया निकास वाली मिट्टी जैसे कि रेतली दोमट से चिकनी, काली मिट्टी और लाल मिट्टी में उगाई जा सकती है| यह जैविक तत्वों वाली दोमट मिट्टी में बढ़िया पैदावार देती है| इसको पानी सोखने वाली, खारी और नमकीन मिट्टी में ना उगाएं| इसकी खेती के लिए मिट्टी को 5.6 से भी ज्यादा पह की जरूरत होती है|

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

punjab celery 1 : यह पंजाब खेतीबाड़ी यूनिवर्सिटी के द्वारा तैयार की गयी पहली किस्म है| इसके बीज भूरे रंग के होते है| फूलों वाली किस्म पनीरी लगाने से 140-150 दिनों बाद तैयार हो जाती है| इसकी औसतन पैदावार बीजों के रूप में 4.46 कुएन्टल प्रति एकड़ होती है| इसमें कुल तेल की मात्रा 20.1% होती है|

RRL-85-1 : यह क्षेत्रीय खोज लबोरटरी, जम्मू के द्वारा तैयार की गयी है| यह 2-3% पीला परिवर्तनशील तेल पैदा करती है|

Standard bearer : यह किस्म IARI, नयीं दिल्ली द्वारा तैयार की गयी है| यह सलाद के लिए प्रयोग की जाती है|

Wright grove giant : यह किस्म भी IARI, नयीं दिल्ली द्वारा तैयार की गयी है| यह सलाद के लिए प्रयोग की जाती है|

Fordhook Emperor : यह देरी से पकने वाली किस्म है और इसके शुरुआत में पत्ते छोटे, सख्त और घने सफ़ेद रंग के होते है|

Giant Pascal : यह सर्दियो में बढ़िया पैदा होती है| इसका कद 5-6 सै.मी. होता है|

ज़मीन की तैयारी

सैलेरी की खेती के लिए, भुरभुरी और समतल मिट्टी की जरूरत होती है| मिट्टी को अच्छे स्तर पर लाने के लिए 4-5 बार हल के साथ जोताई करें और जोताई के बाद सुहागा फेरे| सैलेरी की पनीरी तैयार किये गए नरसरी बैडों पर लगाई जाती है|

बिजाई

बिजाई का समय
जैसे कि यह हाड़ी की फसल है, तो आधे-सितंबर से आधे-अक्टूबर तक तैयार कर देनी चाहियें|

फासला

पनीरी को 45×25 सै.मी. के फासलें पर लगाएं|

बीज की गहराई
बीज को 2-4 सै.मी. की गहराई पर बोयें|

बिजाई का ढंग
पनीरी बिजने से 60-70 दिनों के बाद मुख्य खेत में बीज दी जाती है|

बीज

बीज की मात्रा
खुले परागन वाली किस्मों के लिए 400 ग्राम प्रति एकड़ में प्रयोग करें

पनीरी की देख-रेख और रोपण

बिजाई से पहले कैल्शियम अमोनिया और सिंगल सुपर-फास्फेट के 150 ग्राम मिश्रण को बैडों पर लगाएं| 8×1.25 मीटर लम्बे और जरूरत के अनुसार चौड़े बैडों पर बीजों को बोयें| बिजाई के बाद बैडों को रूडी की खाद के साथ ढक दें और मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दें| बिजाई से तुरंत बाद फुवारे (स्प्रिंकलर) के साथ सिंचाई करनी जरूरी है|

बिजाई से 12-15 दिन बाद बीज अंकुरण होने शुरू हो जाते है| अंकुरण शुरू होने के समय, अंकुरण से पहले पखवाड़े कैल्शियम अमोनिया नाइट्रेट हर एक बैड पर डालें| पौधे के बढ़िया आकार के लिए महीने के फासले पर हर एक बैड पर कैल्शियम अमोनिया नाइट्रेट 100 ग्राम हर एक बैड पर डालें|

बिजाई वाले पौधे रोपाई के लिए 60-70 दिनों में तैयार हो जाते है| पनीरी निकलने से पहले बैडों को हल्का पानी लगा दें, ताकि पौधों को आसानी से निकाला जा सकें| रोपाई आम रूप से आधे-नवम्बर से आधे-दिसंबर तक की जाती है|

खाद

खादें(किलोग्राम प्रति एकड़)

UREA SSP MURIATE OF POTASH
90 35 #

तत्व(किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGEN PHOSPHORUS POTASH
40 16 #

ज़मीन की तैयारी के समय, रूडी की खाद या कम्पोस्ट खाद 15 रेहड़ी प्रति एकड़ में डालें और मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दें| नाइट्रोजन 40 किलो(यूरिया 90 किलो) और फास्फोरस 16 किलो(सिंगल सुपर फास्फेट 35 किलो) प्रति एकड़ में डालें|रोपाई करते समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस की पूरी मात्रा में डालें| रोपाई से 45 दिन बाद नाइट्रोजन की एक-चौथाई मात्रा डालें और बाकि की बची हुई नाइट्रोजन 75 दिनों के बाद डालें|

खरपतवार नियंत्रण

खेत को नदीन रहत करने के लिए हाथों और कस्सी से हल्की गोड़ाई करें| अगर नदीनों पर काबू नहीं किया जाएँ तो यह पैदावार को काम कर देते है| नदीन की प्रभावशाली रोकथाम के लिए, लिओरॉन 6 किलो प्रति एकड़ डालें| नदीनों की रोकथाम के लिए मल्चिंग भी एक बढ़िया तरीका है| इसके स्वाद को बढ़ाने के लिए संवेनदशीलता को बनाई रखने के लिए इसमें पीलापन होना जरूरी है|

सिंचाई

सैलेरी को बढ़िया विकास के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में पानी की जरूरत होती है| थोड़े-थोड़े समय के बाद हल्की सिंचाई करते रहें| नाइट्रोजन डालने से पहले थोड़े-थोड़े समय के बाद हल्की सिंचाई की जरूरत होती है|

पौधे की देखभाल

    • बीमारिया और रोकथाम

सैलेरी का चितकबरा रोग: यह चेपे रोग के द्वारा कई ओर पौधों तक फैलता है| इसके लक्षण नाड़ियो में पीलापन, धब्बे पड़ना, पत्ते मुड़ना और पौधों का विकास रुकना आदि है |

उपचार: उभरे हुए नदीनों को हटा दें और खेत में 1-3 महीने तक सैलेरी ना लगाएं| इसके साथ बीमारी का खतरा कम हो जाता है|

  • उखेड़ा रोग: यह एक फंगस वाली बीमारी है, जोकि राइजोक्टोनिया सोलनाईऔर पैथीयम प्रजाति के कारण होती है| इसका लक्षण बीजों का गलना है, इसके साथ अंकुरण होने की दर भी कम हो जाती है या अंकुरण धीरे से होता है|उपचार: यदि इसका हमला दिखे तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम या एम 45 को 150 लीटर पानी में मिलाकर जड़ों के नज़दीक डालें।

  • पत्तों के निचली ओर धब्बे: यह एक फंगस वाली बीमारी है, जोकि परनोस्पोरा अम्बेलीफार्म के कारण होती है| इसके लक्षण पत्तों पर धब्बे(जो पौधों के विकास के साथ गहरे होते रहते है), पत्तों के ऊपर पीले धब्बे और पत्तों के नीचे की तरफ फूले हुए सफेद धब्बे बन जाते है|उपचार: यदि इसका हमला दिखे तो ज़िनेब 75 डब्लयु पी 400 ग्राम या एम 45, 400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

  • अगेता का झुलसा रोग(सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट, सर्कोस्पोरा ब्लाइट):यह सर्कोस्पोरा ऐपी. के कारण होती है| इसके लक्षण है जैसे की पत्तों के दोनों तरफ छोटे पिले धब्बे आदि|उपचार: यदि इसका हमला दिखे तो ज़िनेब 75 डब्लयु पी 400 ग्राम या एम 45, 400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

    • कीट और रोकथाम

पत्ते की सुंडी: यह पत्तों पर हमला करती है और पत्ते सड़े हुए दिखाई देते है|

उपचार: इसकी रोकथाम के लिए कीटनाशक स्प्रे करें|

  • गाजर की भुन्डी: यह ताज़े पत्तों पर हमला करती है और इसमें सुरंग बना देती है|उपचार: इसके रोकथाम के लिए उचित कीटनाशन की स्प्रे करें|

  • चेपा: यह पत्तों का रस चूसता है, जिसकी साथ पौधे के विकास में रुकावट आती है|उपचार: इसकी रोकथाम के लिए 15 दिनों के फासले पर मैलाथिऑन 50 ई सी 400 मि.मी. प्रति एकड़ की स्प्रे करें|

फसल की कटाई

कटाई आम रूप पर बिजाई से 4-5 महीने के बाद की जाती है| कटाई पौधे और बीज के लिए की जाती है| पौधे ज़मीन से थोड़ा ऊपर तेज़ छुरी की सहायता के साथ काटे जाते है| बीजों की प्राप्ति आम रूप पर बीजों का रंग हल्के भूरे से सुनहरी होने तक की जाती है| फसल तैयार होने के तुरंत बाद कटाई कर लें, क्योंकि कटाई होने में देरी होने के साथ बीज की पैदावार में नुकसान होता है|

कटाई के बाद
कटाई के बाद, इसको जरूरत के अनुसार अलग-अलग छांट लिया जाता है| फिर सैलेरी को सैलर, कोल्ड स्टोर आदि में स्टोर कर लिया जाता है, ताकि इसको लम्बे समय तक संभाला जा सकें|

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OIL PALM

 

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ताड़ के तेल का महत्व

खाद्य तेल की स्वदेशी उपलब्धता बढ़ाने के लिए ऑयल पाम की खेती महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सबसे अधिक तेल देने वाली बारहमासी फसल है। अच्छी रोपण सामग्री, सिंचाई और उचित प्रबंधन के साथ, ऑयल पाम में 5 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद प्रति हेक्टेयर 20-25 मीट्रिक टन ताजे फल गुच्छों (एफएफबी) का उत्पादन करने की क्षमता होती है। यह बदले में 4-5 मीट्रिक टन पाम तेल और 0.4-0.5 मीट्रिक टन पाम कर्नेल तेल (पीकेओ) पैदा करने में सक्षम है। तुलनात्मक दृष्टि से, पाम तेल की उपज पारंपरिक तिलहनों से प्राप्त खाद्य तेल की उपज से 5 गुना अधिक है। इस बारहमासी फसल का आर्थिक जीवन काल 30 वर्ष है, जिसमें तीन अलग-अलग चरण शामिल हैं। किशोर अवधि (1-3 वर्ष), स्थिर अवधि (4-8 वर्ष) और स्थिर अवधि (9-30 वर्ष)। पाम तेल वैश्विक खाद्य तेल और वसा बाजार में कारोबार किए जाने वाले प्रमुख तेलों में से एक है। वर्तमान समय में यह विश्व में वनस्पति तेल का सबसे बड़ा स्रोत है। पांच देशों मुख्य रूप से इंडोनेशिया, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड और कंबोडिया का विश्व के कुल एफएफबी उत्पादन में 90% से अधिक का योगदान है।

ताड़ के तेल(palm oil) का संभावित क्षेत्र

कृषि, सहयोग और किसान कल्याण विभाग (डीएसी एंड एफडब्ल्यू) द्वारा गठित विभिन्न समितियों ने देश में पाम तेल की खेती के लिए उपयुक्त 19.33 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की पहचान की है, जिसमें उत्तर पूर्वी राज्यों में 2.18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र भी शामिल है। संभावित राज्य आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल, मिजोरम, ओडिशा और तमिलनाडु थे।

ताड़ के तेल (palm oil) की खेती में बाधाएँ

ऑयल पाम की निर्माण अवधि लंबी होती है और यह किसानों की आय के प्रवाह को कम से कम 4-5 वर्षों तक प्रतिबंधित कर देता है।

सीमित संसाधनों वाले किसानों की छोटी जोत।
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सीपीओ की कीमतों में उतार-चढ़ाव।
अनियमित मानसून के कारण पानी की कमी।
रबर, सुपारी, गन्ना, केला, नारियल आदि जैसी अन्य आर्थिक रूप से व्यवहार्य फसलों से प्रतिस्पर्धा।
खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में भिन्नता।

भारत सरकार की पहल
ताड़ के तेल की खेती के महत्व को देखते हुए, DAC&FW ने 1991-92 में संभावित राज्यों में तिलहन और दलहन (TMOP) पर प्रौद्योगिकी मिशन शुरू किया था। आठवीं और नौवीं योजना के दौरान एक व्यापक केंद्र प्रायोजित योजना, ऑयल पाम डेवलपमेंट प्रोग्राम (ओपीडीपी) शुरू की गई थी। दसवीं और ग्यारहवीं योजना के दौरान, भारत सरकार ने तिलहन, दलहन, ऑयल पाम और मक्का (आईएसओपीओएम) की एकीकृत योजना के तहत पाम ऑयल की खेती के लिए सहायता प्रदान की। ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देने के लिए, भारत सरकार ने वर्ष 2011-12 के दौरान आरकेवीवाई के तहत ऑयल पाम क्षेत्र विस्तार (ओपीएई) पर एक विशेष कार्यक्रम का समर्थन किया था, जिसका उद्देश्य 60,000 हेक्टेयर क्षेत्र को ऑयल पाम की खेती के तहत लाना था, जो मार्च, 2014 तक जारी रहा।

  • 4.1. बारहवीं योजना के दौरान, तिलहन और तेल पाम पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमओओपी) शुरू किया गया है जिसमें मिनी मिशन- II (एमएम-II) तेल पाम क्षेत्र के विस्तार और उत्पादकता में वृद्धि के लिए समर्पित है। एनएमओओपी का एमएम-II 13 राज्यों में लागू किया जा रहा है; आंध्र प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, केरल, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और गोवा। 2014-15 के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों के बीच फंडिंग पैटर्न 50:50 था, जिसे 2015-16 से सामान्य श्रेणी के राज्यों के मामले में 60:40 और उत्तर-पूर्वी और पहाड़ी राज्यों के मामले में 90:10 तक संशोधित किया गया है।
  • 4.2. एमएम-II के तहत, किसानों को रोपण सामग्री की 85% लागत और चार साल के लिए नए वृक्षारोपण की रखरखाव लागत, ड्रिप-सिंचाई प्रणाली की स्थापना, डीजल/इलेक्ट्रिक जैसे अन्य घटकों की 50% लागत पर वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। पंप-सेट, बोर-वेल/जल संचयन संरचनाएं/तालाब, गर्भधारण अवधि के दौरान अंतर-फसल के लिए इनपुट, वर्मी-कम्पोस्ट इकाइयों का निर्माण और मशीनरी और उपकरणों की खरीद आदि।
  • 4.3. केंद्र प्रायोजित ऑयल पाम विकास योजनाओं के कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप ऑयल पाम के तहत क्षेत्र का विस्तार 1991-92 में 8585 हेक्टेयर से बढ़कर 2016-17 के अंत तक 3,16,600 हेक्टेयर हो गया है। इसी प्रकार, ताजे फलों के गुच्छों (एफएफबी) और कच्चे पाम तेल (सीपीओ) का उत्पादन 1992-93 में क्रमशः 21,233 मीट्रिक टन और 1,134 मीट्रिक टन से बढ़कर 2016-17 में क्रमशः 12,89,274 और 2,20,554 मीट्रिक टन हो गया है। वर्तमान में, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु प्रमुख पाम तेल उत्पादक राज्य हैं। वर्ष 2017-18 तक पाम तेल की खेती और एफएफबी और सीपीओ के उत्पादन के तहत प्राप्त क्षेत्र का राज्य-वार विवरण नीचे दिया गया है:
क्र.सं. राज्य 2017-18 के दौरान प्राप्त क्षेत्रफल (हेक्टेयर में) मार्च 2018 तक कुल क्षेत्र कवरेज 2016-17 में उत्पादन (एमटी में) 2017-18 में उत्पादन (एमटी में)
एफएफबी(FFBs) सीपीओ(CPO) एफएफबी(FFBs) सीपीओ(CPO)
1 आंध्र प्रदेश 6157 162689 1136579 190854 1427827 234695
2 तेलंगाना 1413 18312 88549 19979 147516 27274
3 कर्नाटक 1120 43517 11912 2051 12917 2224
4 तमिलनाडु 589 30900 7422 1115 6983 938
5 गुजरात 76 5797 853 NA
6 गोवा 953 NA NA
7 ओडिशा 1005 21777 4965 NA
8 त्रिपुरा 530 NA NA
9 असम 814 1849 0 0
10 केरल 7 5785 34198 5929 30220 5191
11 महाराष्ट्र 1474 NA NA
12 मिजोरम 885 28295 4796 626
13 छत्तीसगढ 773 4222 0 0
14 अंडमान एवं निकोबार 1593 NA NA
15 अरुणाचल प्रदेश 843 1416 0 0
16 नागालैंड 800 1973 0 0
कुल 14482 331082 1289274 220554 1625463 270322

सीएसीपी द्वारा अनुशंसित एफएफबी की कीमतों का निर्धारण

  • ऑयल पाम फ्रेश फ्रूट बंच (एफएफबी) की कीमतें किसानों को निजी ऑयल पाम डेवलपर कंपनियों द्वारा सीएसीपी अनुशंसित फॉर्मूले के आधार पर भुगतान की जा रही हैं, यानी 18% तेल निष्कर्षण के आधार पर शुद्ध क्रूड पाम ऑयल (सीपीओ) भारित औसत मूल्य का 13.54%। अनुपात (ओईआर), साथ ही पाम कर्नेल नट्स की 9% रिकवरी पर 75.25 प्रतिशत भारित औसत कीमत। यह कृषि स्तर से कारखाने के स्तर तक सीपीओ के उत्पादन की कुल लागत के 75.25 प्रतिशत पर खेती की अनुमानित लागत पर आधारित है। इस फॉर्मूले का सीपीओ की ज़मीनी कीमत से सीधा संबंध है क्योंकि सीपीओ की ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमत पाम तेल उत्पादकों को बेहतर कीमत प्रदान करेगी। सीएसीपी ने सुझाव दिया है कि सीपीओ का आयात शुल्क तब लागू किया जाना चाहिए जब सीपीओ की कीमत 800 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन से कम हो जाए।

तिलहन और ऑयलपाम पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमओओपी) पर एक संक्षिप्त जानकारी
पृष्ठभूमि :

एनएमओओपी का निर्माण 11वीं योजना अवधि के दौरान तिलहन, तेल पाम और मक्का (आईएसओपीओएम), वृक्ष जनित तिलहन (टीबीओ) और तेल पाम क्षेत्र विस्तार (ओपीएई) कार्यक्रम की एकीकृत योजना की पूर्ववर्ती योजनाओं की उपलब्धियों पर किया गया है, जिसके कार्यान्वयन में ताजे फलों के गुच्छों (एफएफबी) के उत्पादन में वृद्धि के साथ तिलहनों के उत्पादन और उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव और ऑयल पाम के तहत क्षेत्र का विस्तार। एनएमओओपी में 3 मिनी मिशन (एमएम), तिलहन (एमएम-I), ऑयल पाम (एमएम-II) और वृक्ष जनित तिलहन-टीबीओ (एमएम-III) के लिए एक-एक मिशन अप्रैल, 2014 से लॉन्च किया गया था।

मिशन लक्ष्य :

मिशन का लक्ष्य 2016-17 तक तिलहनों का उत्पादन 28.93 मिलियन टन (XI योजना का औसत) से बढ़ाकर 35.51 मिलियन टन करना और एफएफबी की उत्पादकता 4927 किलोग्राम/हेक्टेयर से बढ़ाकर 1.25 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को ऑयल पाम की खेती के तहत लाना है। XII योजना के अंत तक 15000 किग्रा/हेक्टेयर तक।

रणनीतियाँ :

तिलहनों के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने के लिए, किस्म प्रतिस्थापन पर ध्यान देने के साथ बीज प्रतिस्थापन अनुपात (एसआरआर) को बढ़ाने पर जोर दिया जाना था; तिलहन के तहत सिंचाई कवरेज बढ़ाना; कम उपज वाले अनाज से तिलहन तक क्षेत्र का विविधीकरण; अनाज/दलहन/गन्ना के साथ तिलहन की अंतर-फसल; चावल की परती का उपयोग; वाटरशेड और बंजर भूमि में पाम ऑयल और टीबीओ की खेती का विस्तार; ऑयल पाम और टीबीओ की गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री की उपलब्धता बढ़ाना; तिलहनों की खरीद और टीबीओ के संग्रहण और प्रसंस्करण को बढ़ाना। ऑयल पाम और टीबीओ की गर्भाधान अवधि के दौरान अंतर-फसलन से उत्पादन न होने पर किसानों को आर्थिक लाभ मिलेगा।

फंडिंग पैटर्न :

मिशन के तहत हस्तक्षेप की लागत 2014-15 के दौरान 75:25 के अनुपात में थी जिसे बदलकर 50:50 कर दिया गया और केंद्र और राज्यों के बीच इसे 60:40 पर पुनर्गठित किया गया है। हालाँकि, केंद्रीय एजेंसियों/एसएयू/आईसीएआर संस्थानों के माध्यम से कार्यान्वित किए जा रहे बीज उत्पादन, एफएलडी, मिनीकिट और अनुकूली अनुसंधान जैसे कुछ घटकों के लिए 100% केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है। राज्य कोषागारों के माध्यम से राज्य के कृषि/बागवानी विभागों को धनराशि जारी की जाती है।

वित्तीय प्रगति :
2012-13 से 2016-17 के दौरान आईएसओपीओएम और एनएमओओपी के तहत आवंटन और रिलीज का राज्य/एजेंसी-वार विवरण नीचे दिया गया है:

(रुपये करोड़ में)

वर्ष योजना आवंटन निस्तार
बजट अनुमान (BE) संशोधित अनुमान (RE)
2012-13 ISOPOM 584.50 404.30 402.83
2013-14 ISOPOM 507.00 560.27 558.14
2014-15 NMOOP 433.00 333.00 318.97
2015-16 NMOOP 353.00 272.03 305.80
2016-17 NMOOP 500.00 376.00* 327.50

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john’s disease

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जॉन की बीमारी , जिसे पैराट्यूबरकुलोसिस के रूप में भी जाना जाता है, एक लंबे समय तक चलने वाला संक्रमण है जो आंतों के बहुत धीरे-धीरे मोटे होने का कारण बनता है जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो जाता है और जिसके परिणामस्वरूप वजन कम होता है, दस्त होता है और अंततः मृत्यु हो जाती है। जॉन की बीमारी मुख्य रूप से मवेशियों और अन्य जुगाली करने वालों को प्रभावित करती है, लेकिन सूअरों में भी इसकी सूचना मिली है। जॉन की बीमारी की आर्थिक लागत दूध छुड़ाने के वजन में कमी, बाद में पुन: प्रजनन, और अपनी उत्पादन लागत वसूल करने से पहले गायों को खोने या मारने के कारण महत्वपूर्ण हो सकती है। नैदानिक ​​परीक्षण गलत हैं (विशेष रूप से बीमारी के शुरुआती चरणों में, और कोई प्रभावी टीका नहीं है और कोई प्रभावी उपचार नहीं है। जॉन की बीमारी एक बार झुंड में स्थापित हो जाने के बाद इसे खत्म करना बहुत मुश्किल है, इसलिए इसे रोकने के लिए जैव सुरक्षा सावधानियां आवश्यक हैं संक्रमित कोलोस्ट्रम या प्रजनन स्टॉक के माध्यम से झुंड में प्रवेश करना।

परिचय
जॉन्स रोग जीवाणु  माइकोबैक्टीरियम एवियम  उप-प्रजाति  पैराट्यूबरकुलोसिस  (एमएपी) के कारण होता है। बछड़े आम तौर पर जॉन की संक्रमित गाय के कोलोस्ट्रम, दूध या खाद के संपर्क के माध्यम से जीवन में बहुत पहले ही संक्रमण पकड़ लेते हैं, लेकिन बीमारी के लक्षण वर्षों बाद तक स्पष्ट नहीं होते हैं। इस बीच, एमएपी आम तौर पर छोटी आंत में जमा होता है और बढ़ता है। एमएपी आंत के बाहर के क्षेत्रों में भी फैल सकता है, जैसे गर्भाशय, लिम्फ नोड्स, थन, सांडों के प्रजनन अंग, और सीधे दूध या वीर्य में उत्सर्जित हो सकते हैं।
कई उपचारों की जांच की गई है, लेकिन दुर्भाग्य से जॉन की बीमारी के लिए कोई भी उपचार प्रभावी और किफायती नहीं पाया गया है। इसका आंशिक कारण यह है कि संक्रमण और नैदानिक ​​बीमारी के बीच एक अत्यंत लंबी सुप्त अवधि होती है। समस्या को और अधिक जटिल बनाने के लिए संक्रमणों की ठीक से पहचान करने के लिए सटीक परीक्षणों की कमी है, विशेष रूप से प्रारंभिक विकास वाले संक्रमणों की।
प्रमुख बिंदु

इस बात की चिंता है कि तेजी से बढ़ते झुंड के आकार और झुंड के फैलाव के कारण गोमांस झुंडों में जॉन की बीमारी का खतरा बढ़ रहा है।
बछड़े आम तौर पर जॉन की संक्रमित गाय के कोलोस्ट्रम, दूध या खाद के संपर्क के माध्यम से जीवन में बहुत पहले ही संक्रमण पकड़ लेते हैं, लेकिन बीमारी के लक्षण वर्षों बाद तक स्पष्ट नहीं होते हैं।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जॉन्स रोग से 1 से 2% परिपक्व पश्चिमी कनाडाई गोमांस गाय (झुंड का 5%) और 2 से 9% कनाडाई डेयरी गाय (और 70% डेयरी गाय) संक्रमित होती हैं।
यह देखा गया है कि जॉन रोग से पीड़ित गायें ऐसे बछड़े पैदा करती हैं जिनका वजन सामान्य झुंड के साथियों की तुलना में 50 पाउंड कम होता है।
नैदानिक ​​लक्षण आम तौर पर 2-6 वर्ष की आयु के बीच दिखाई देते हैं और इसमें समय-समय पर होने वाले दस्त और प्रगतिशील वजन घटाने शामिल हो सकते हैं, जिनमें से दोनों उपचार के प्रति अनुत्तरदायी होते हैं।
व्यक्तिगत जानवरों में प्री-क्लिनिकल संक्रमण का पता लगाने के लिए नैदानिक ​​परीक्षण अविश्वसनीय हैं, कनाडा में कोई टीका उपलब्ध नहीं है, और जॉन्स रोग के इलाज के लिए कोई प्रभावी दवाएं नहीं हैं। रोकथाम महत्वपूर्ण है.
एक निर्माता द्वारा की जाने वाली सबसे बुरी गलती जॉन की संक्रमित गाय को अलग करना और उसे इस उम्मीद में ब्याने वाले क्षेत्र में रखना है कि बेचने से पहले उसका वजन बढ़ जाएगा।

कनाडाई मवेशियों के झुंड पर प्रभाव

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 1 से 2% परिपक्व पश्चिमी कनाडाई गोमांस गायें (झुंड का 5%) और 2 से 9% कनाडाई डेयरी गायें (और 70% डेयरी झुंड) जॉन की बीमारी से संक्रमित हो सकती हैं। डेयरी झुंडों में उच्च घटना दर बछड़ा प्रबंधन में अंतर से संबंधित हो सकती है और क्योंकि गोमांस मवेशी आम तौर पर बड़े क्षेत्रों में होते हैं और डेयरी मवेशियों की तुलना में अन्य मवेशियों के मल के संपर्क में कम होते हैं। हालाँकि, डेयरी मवेशी बीफ़ उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अधिकांश अपना करियर लीन बीफ़ के रूप में समाप्त करते हैं।

जॉन की बीमारी की दर डेयरी और गोमांस दोनों झुंडों में बढ़ती दिख रही है। यह वृद्धि संभवतः पिछले 20 वर्षों में पूर्वी और पश्चिमी कनाडा में कम लेकिन बड़े गोमांस और डेयरी झुंडों की ओर स्पष्ट रुझान से जुड़ी हुई है।

जॉन की बीमारी महंगी है. संक्रमित गायों को जल्दी मारने से होने वाले आर्थिक नुकसान के अलावा, यूएस नेशनल जॉन्स डिजीज डिमॉन्स्ट्रेशन हर्ड प्रोजेक्ट में लगभग 5,000 बीफ गायों के डेटा से पता चला कि जॉन की पॉजिटिव गायों के बछड़ों का वजन दूध छुड़ाने के समय जॉन की नेगेटिव गायों के बछड़ों की तुलना में औसतन 50 पाउंड कम होता है। . इस उत्पादन हानि पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता है। यह बीमारी सांडों और प्रतिस्थापन मादाओं को बेचने वाले शुद्ध नस्ल के कार्यों में प्रतिष्ठा और आर्थिक मार्जिन को भी प्रभावित करती है, भोजन की लागत बढ़ाती है और जानवरों की दीर्घायु को कम करती है।

Brahmakamal cultivationब्रह्मकमल जैसा कि नाम से पता चलता है कि ब्रह्मकमल का संबंध सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा से है। वेदों और अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों में ब्रह्मकमल का वर्णन मिलता है।Click HereHaryana Solar Water Pump Scheme हरियाणा सरकार के सरल पोर्टल saralharyana.gov.in पर प्रधानमंत्री कुसुम योजना के अंतर्गत हरियाणा के किसानो के लिए 6 श्रृंखला के अंतर्गत सौर पंप लगवाने हेतु नया आवेदन 20-02-2024 से 01 मार्च 2024 तक आमंत्रित किये जा रहे हैं …Click HereHaryana Tractor Subsidy Scheme 2024हरियाणा सरकार का उद्देश्य राज्य के लघु-मध्यम किसानों (एससी किसानों) की आय को बढ़ाना है, Haryana Tractor Subsidy 2024 Yojana के माध्यम से 45 एच.पी या उससे अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टरों पर 01 लाख रूपये का अनुदान दिया जाएगा…Click Here
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Haryana Solar Water Pump Scheme 

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हरियाणा सरकार के सरल पोर्टल saralharyana.gov.in पर प्रधानमंत्री कुसुम योजना के अंतर्गत हरियाणा के किसानो के लिए 6 श्रृंखला के अंतर्गत सौर पंप लगवाने हेतु नया आवेदन 20-02-2024 से 01 मार्च 2024 तक आमंत्रित किये जा रहे हैं | इच्छित किसान सरल पोर्टल (saralharyana.gov.in) पर जाकर अपनी जरूरत के अनुरूप सोलर पंप की क्षमता और प्रकार का चयन करके अपने पसंद की कंपनी चुनें और लाभार्थी हिस्सा जमा करवाएं

महत्वपूर्ण जानकारी

  1. किसान 75% अनुदान राशि पर 3 एच.पी. से 10 एच.पी. सोलर पंप के लिए आवेदन कर सकते हैं
  2. बिजली आधार कनेक्शन (UHBVN/DHBVN) के लिए बिजली आधार कनेक्शन के मोजुदा आवेदको को सोर ऊर्जा पंप के कनेक्शन के लिए पराथमिकता दी जाएगी, बसरते उनको अपने मौजुदा बिजली कनेक्शन को समर्पण(surrender) करना पड़ेगा|
  3. वर्ष 2019 से 2021 तक के मौजुदा किसान जिन्होनें 1 एच.पी. 10 एच.पी. बिजली आधारित कृषि ट्यूबवेल के लिए DISCCOM (UHBVN/DHBVN) मे आवेदन किया था उन्हे पी.एम. कुसुम योजना के तहत उन्हें सोलर पंप कनेक्शन की प्रउन्हे पी.एम. कुसुम योजना के तहत उन्हें सोलर पंप कनेक्शन की प्रथमिकता  दी जाएगी |
  4. इस वर्ष के लक्षित लाभार्थियो का चयन परिवार की वार्षिक आय भूमि धारण (land Holding)के आधार पर किया जाएगा|
  5. किसान अपने खेत का आकार, पानी का स्तर और पानी की जरुरत अनुसार प्रकार और पंप का चयन करें|
  6. किसान को अपने खेत में केवल बोर करवाकर देना होगा बाकी पंप स्थापना का काम फर्म द्वारा किया जाएगा|
  7. पुराने सभी आवेदक भी नए सिरे से आवेदन करे(जिन्होनें अभी तक लाभर्थी हिसा नहीं जमा करवाया है बिना लाभर्थी हिसाब के जमा किए गए आवेदन को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा)

पात्रता और महत्वपूर्ण दस्तावेज

  1. परिवार पहचान पत्र(PPP )|
  2. आवेदक के परिवार (PPP) के नाम पर सोलर का कनेक्शन ना हो |
  3. आवेदक के नाम पर बिजली आधारित पंप ना हो |
  4. आवेदक के नाम पर कृषि भूमि की जमाबंदी/फर्द |
  5. हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण के सर्वेक्षण के अनुसार उन गांवों में जहां भूजल स्तर 100 फीट नीचे चला गया है सुक्ष्म सिंचाई परनाली की सथपना अनिवार्ये है अन्य को भूमिगत पाइपलाइन (Underground Pipeline ) या सुक्ष्म सिंचाई परनाली को लगाना अनिवार्ये है |
  6. धान उगाने वाले किसान जिनके क्षेत्र में HWRA की रिपोर्ट के आधार पर भूजल स्तर 40 मीटर से नीचे गिर गया है वह किसान योजना के पात्र नहीं है |
  7. सोलर पंप योजना 2023-24 के नियम और शर्त की पूरी जानकारी विभाग की आधिकारिक साइट ( https://hareda.gov.in/ )पर जाएं |

अन्य दिशानिर्देश

  • सबसे पहले किसान के खेत में सर्वे किया जाएगा सर्वेक्षण के समय किसान ध्यानपूर्वक अपने पंप  के हेड का चयन करें और सर्वे फॉर्म पर हस्ताक्षर करें क्योंकि एक पंप के टिन हेड होते हैं| जिनमें पानी की निकासि हेड अनुसार अलग-अलग होती है अगर पंप लगाने के बाद किसान अलग हेड का पंप बदलता है तो उसकी किमत किसान को देनी होगी |
  • पंप लगने से पहले किसान को खेत में अपने खर्च पर पंप लगाने से पहले किसान को खेत में अपने खर्च पर बोरिंग करवा के देनी होगी या बोर की कैविटी अच्छी तरह से की हो |
  • सभी कंपनियों के पैनल स्ट्रक्चर का डिज़ाइन अलग-अलग हो सकता है जो कि आईटीआई संस्थान से मान्यता प्राप्त हूं इसलिए किसान पैनल संरचना के डिजाइन को लेकर भ्रमित न हो एसी स्थिति में किसान कंपनी से उनके पैनल स्ट्रक्चर के डिजाइन सर्टिफिकेट की मांग कर सकता है |
  • किसान अपनी देखरेख में पंप की स्थापना करवाएं स्थापना के समय कोई संशय की स्थिति में किसान कंपनी से पंप स्थापना के ड्राइंग की मांग कर सकता है या अपने जिले के अतिरिक्त उपायुक्त कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं |
  • स्थापना करवाने के लिए किसान किसी प्रकार का वहन ना करे तथा पंप स्थापना के पूर्ण रूप से संतुष्ट होने पर वह किसान स्थापना पत्र पर हस्ताक्षर करे|
  • किसान का पंप 5 साल की वारंटी (warranty) पर आता है पंप के साथ इंटरपुट करना पूर्णरूप से खत्म हो जाएगा एसी स्थिति में वारंटी पूर्णरूप से खत्म हो जाएगी |
  • ये पंप 5 साल के लिए चोरी तथा प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित है पंप लगाने के बाद उसकी सुरक्षा सम्बन्दी पूर्ण जिमेवारी किसान बीमा क्लेम की स्थिति में किसान को 7 दिनों के भीतर लिखित जानकारी आपके जिले के अतिरिक्त उपायुकत कार्यालय, आपकी चुनी कंपनी और विमा कंपनी में देनी होगी| आपकी चोरी की स्थिति में 7 दिनों के भीतर एफ आई आर रिपोर्ट कारवानी होगी |
  • यदि किसान लगाए गए पंप उस जगह से पंप स्थानात्रित करता है या उसको बेचता है या उसका दुरुपयोग करता है एसी स्थिति में किसान को सरकार द्वारा दी गई सब्सिडी राशि वापसी करनी होगी तथा उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करवाते हुए एफ आई आर दर्ज करवा दी जाएगी|

सोलर पम्पिग की क्षमता के अनुसार फर्म और किसान दे राशि की सुची

क्रमांक सोलर पंप का प्रकार एवं क्षमता लाभार्थी का हिस्सा जमा किया जाना है फर्मों का नाम
1 3 एचपी डीसी, सरफेस (मोनोब्लॉक) सामान्य नियंत्रक के साथ ₹ 53,926
  • एल्पेक्स सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • एवीआई(avi) एप्लायंसेज प्रा. लिमिटेड
  • डायनेमेक इलेक्ट्रोपावर प्राइवेट लिमिटेड
  • इकोज़ेन सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड
  • एथोस पावर प्राइवेट लिमिटेड
  • जीके एनर्जी मार्केटर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • हिमालयन सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • केएसबी लिमिटेड(ksb ltd)
  • लक्ष्मी एजेंसी
  • मीरा एनर्जी रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड
  • वनइंडिग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड
  • ओसवाल पंप्स लिमिटेड
  • पीसीआई वायर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • प्रीमियर एनर्जीज लिमिटेड
  • रोटोमैग मोटर्स एंड कंट्रोल्स प्राइवेट। लिमिटेड
  • शक्ति पंप्स इंडिया लिमिटेड
  • स्पैन पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
2 7.5 एचपी डीसी, सामान्य नियंत्रक के साथ सबमर्सिबल ₹ 1,13,629
  • एल्पेक्स सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • ऑस्ट्रेलियन प्रीमियम सोलर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
  • एवीआई एप्लायंसेज प्राइवेट लिमिटेड
  • सी.आर.आई. पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
  • क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड
  • ड्यूक प्लास्टो टेक्नीक प्राइवेट लिमिटेड
  • डायनेमेक इलेक्ट्रोपावर प्राइवेट लिमिटेड
  • इकोजेन सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड
  • एथोस पावर प्राइवेट लिमिटेड
  • एवररेन्यू एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
  • जीके एनर्जी मार्केटर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • हिमालयन सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • कोसोल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
  • केएसबी लिमिटेड
  • लक्ष्मी एजेंसी
  • मीरा एनर्जी रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड
  • वनइंडिग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड
  • ओसवाल पंप्स लिमिटेड
  • पीसीआई वायर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • प्रीमियर एनर्जीज लिमिटेड
  • पीवी पावर टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड
  • रोटोमैग मोटर्स एंड कंट्रोल्स प्राइवेट लिमिटेड
  • स्पैन पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
  • शक्ति पंप्स इंडिया लिमिटेड
  • अल्टेक एनर्जीज
3 10 एचपी डीसी, सबमर्सिबल के साथ सामान्य नियंत्रक ₹ 1,42,170
  • अल्पेक्स सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • एवीआई एप्लायंसेज प्रा. लिमिटेड
  • सी.आर.आई. पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
  • क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड
  • डायनेमेक इलेक्ट्रोपावर प्राइवेट लिमिटेड
  • इकोजेन सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड
  • एथोस पावर प्राइवेट लिमिटेड
  • एवररेन्यू एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
  • जीके एनर्जी मार्केटर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • मीरा एनर्जी रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड
  • वनइंडिग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड
  • ओसवाल पंप्स लिमिटेड
  • पीसीआई वायर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • प्रीमियर एनर्जीज लिमिटेड
  • रोटोमैग मोटर्स एंड कंट्रोल्स प्राइवेट। लिमिटेड
  • शक्ति पंप्स इंडिया लिमिटेड
  • स्पैन पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
4 10 एचपी एसी, सामान्य नियंत्रक के साथ सबमर्सिबल ₹ 1,40,759
  • एल्पेक्स सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • गैलो एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
  • एवीआई एप्लायंसेज प्राइवेट लिमिटेड
  • सी.आर.आई. पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
  • क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड
  • ड्यूक प्लास्टो टेक्नीक प्राइवेट लिमिटेड
  • डायनेमेक इलेक्ट्रोपावर प्राइवेट लिमिटेड
  • इकोजेन सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड
  • एथोस पावर प्राइवेट लिमिटेड
  • एवररेन्यू एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
  • जीके एनर्जी मार्केटर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • हिमालयन सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • कोसोल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
  • मीरा एनर्जी रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड
  • लक्ष्मी एजेंसी
  • मीरा एनर्जी रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड
  • वनइंडिग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड
  • ओसवाल पंप्स लिमिटेड
  • पीसीआई वायर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • प्रीमियर एनर्जीज लिमिटेड
  • पीवी पावर टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड
  • रोटोमैग मोटर्स एंड कंट्रोल्स प्राइवेट लिमिटेड
  • स्पैन पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
  • शक्ति पंप्स इंडिया लिमिटेड
5 10 एचपी डीसी, यूनिवर्सल सोलर पंप नियंत्रक के साथ सबमर्सिबल ₹ 2,02,253
  • सी.आर.आई. पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
  • हिमालयन सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • लक्ष्मी एजेंसी
  • शक्ति पंप्स इंडिया लिमिटेड
  • सूर्या इंटरनेशनल एंटरप्राइज प्राइवेट लिमिटेड
6 10 एचपी एसी, यूनिवर्सल सोलर पंप नियंत्रक के साथ सबमर्सिबल ₹ 2,06,486
  • सी.आर.आई. पंप्स प्राइवेट लिमिटेड
  • इकोज़ेन सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड
  • जीके एनर्जी मार्केटर्स प्राइवेट लिमिटेड
  • शक्ति पंप्स इंडिया लिमिटेड
  • हिमालयन सोलर प्राइवेट लिमिटेड
  • कोसोल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड
  • मीरा एनर्जी रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड
  • प्रीमियर एनर्जीज लिमिटेड
  • रोटोमैग मोटर्स एंड कंट्रोल्स प्राइवेट लिमिटेड

* सौर जल पम्पिंग प्रणाली की सांकेतिक तकनीकी विशिष्टताएँ

पंप प्रकार और क्षमता पीवी मॉड्यूल क्षमता
(PV MODULE CAPACITY )
मोटर पंप-सेट प्रकार शटऑफ डायनामिक हेड
(SHUTOFF DYANAMIC HEAD )
3HP(DC,surfaceसतह) 2700 WP नियंत्रक के साथ 3HP(3HP with controller ) 25.0 मीटर
3HP(DC, Submersible) 3000 WP 3HP with controller 45.0 मीटर
3HP(AC, Submersible) 3000 WP 3HP with controller 45.0 मीटर
5HP(DC,Surface) 4800 WP 5 HP with controller 45.0 मीटर
5 HP(DC,Submersible) 4800 WP 5HP with controller 70.0 मीटर
5HP(AC,Submersible) 4800 WP 5HP with controller 70.0 मीटर
7.5HP(DC,Surface) 6750 WP 7.5HP with controller 45.0 मीटर
7.5HP(DC,Submersible) 6750 WP 7.5HP with controller 100.0 मीटर
7.5HP(AC,Submersible) 6750 WP 7.5HP with controller 100.0 मीटर
10HP(DC,Surface) 9000 WP 10HP with controller 45.0 मीटर
10 HP(DC,Submersible) 9000 WP 10 HP with controller 100.0 मीटर
10 HP(AC,Submersible) 9000 WP 10 HP with controller 100.0 मीटर

* विभिन्न डायनामिक हेड वाले सौर पंपों की डिस्चार्ज तालिका

SN
कर्मांक नं
PUMP TYPE AND CAPACITY
(पंप प्रकार और क्षमता)
MODULE CAPACITY(W)
(मॉड्यूल क्षमता(डब्ल्यू))
DISCHARGE LITERS PER DAY AT VARIOUS HEAD (m)
(विभिन्न शीर्षों पर प्रति दिन डिस्चार्ज लीटर (एम) )
30 50 70 100 150
1 3HP(DC, Submersible) 3000 114000 69000 45000 —-
2 5HP(DC,Submersible) 4800 110400 72000 50400 —-
3 7.5HP(DC,Submersible) 6750 155250 101250 70875 —-
4 10 HP(DC,Submersible) 9000 207000 135000 94500 —-
5 3HP(AC, Submersible) 3000 105000 63000 42000 —- —-
6 5HP(AC,Submersible) 4800 100800 67200 43200 —-
7 7.5HP(AC,Submersible) 6750 141750 94500 60750 —-
8 10 HP(AC,Submersible) 9000 189000 126000 81000 —-
9 3HP(DC,Surface) 2700 297000 at 10m 148500 at 20m 72000 —-
10 5HP(DC,Surface) 4800 528000 at 10m 264000 at 20m 182400 at 30m —-
11 7.5HP(DC,Surface) 6750 742500 at 10m 371250 at 20m 256500 at 30m —-
12 10HP(DC,Surface) 9000 99000 at 10m 495000 at 20m 342000 at 30m —-

*जल उत्पादन के आंकड़े 7.5 किलोवाट प्रति वर्गमीटर की “औसत दैनिक सौर विकिरण” स्थिति के तहत एसपीवी पैनल की तीन बार ट्रैकिंग के साथ साफ धूप वाले दिन पर हैं। पीवी सरणी की सतह पर (यानी पीवी मॉड्यूल के साथ समतलीय)।

सोलर पंप की सम्पूर्ण तकनीकी विशिष्टताओं की जानकारी विभाग की वेबसाइट (https://hareda.gov.in/) या एमएनआरइ की वेबसाइट (mnre.gov.in) पर प्राप्त करें।
Note(टिप्पणी):- अधिक जानकारी के लिए आप अपने जिले के अतिरिक्त उपायुक्त कार्यालय में परियोजना अधिकारी/सहायक परियोजना अधिकारी, नवीन एवं नवीनीकरण ऊर्जा विभाग एवं कार्यालय के टेलीफोन नं. 0172-3504085 पर सुबह 9.00 से शाम 5.00 बजे तक संपर्क करें |
https://youtu.be/O_7fVR5Qx74?si=Ua16oQxWR8cI3GXq

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