खुरपका मुँहपका रोग

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  • परिचय
  • रोग के लक्षण
  • रोकथाम के उपाय
  • रोग जांच हेतु नमूनें/ पदार्थ
  • खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के लिये किट
  • उपचार
  • किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या करें ?
  • किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या नहीं करें ?

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परिचय
रोग के लक्षण
रोकथाम के उपाय
रोग जांच हेतु नमूनें/ पदार्थ
परिचय

खुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसानदायक होती है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु से होता है यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलने वाला रोग है तथा कुछ समय में एक झुंड या पूरे गाँव के अधिकतर पशुओं को संक्रामित कर देता है। इस रोग से पशुधन उत्पादन में भारी कमी आती है साथ ही देश से पशु उत्पादों के निर्यात पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस बीमारी से अपने देश में प्रतिवर्ष लगभग 20 हजार करोड़ रूपये की प्रत्यक्ष नुकसान होता है |

रोग के लक्षण

 

इस रोग के लक्षण नीचे लिखे हैं :-

तीव्र ज्वर (102-105 फ.) साधारणतः युवा पशु में जानलेवा होता है परंतु वयस्क पशु में नहीं। पशुओं की मृत्यु प्राय: गलघोटु रोग होने से होती है (गलघोटु रोग से बचाने के लिए अपने पशुओं को बरसात से पहले इसका टीका अवश्य लगवाएं )

  • मुँह से अत्यधिक लार का टपकना (रस्सी जैसा)
  • जीभ तथा तलवे पर छालों का उभरना जो बाद में फट कर घाव में बदल जाते हैं।
  • जीभ की सतह का निकल कर बाहर आ जाना एवं थूथनों पर छालों का उभरना।
  • खुरों के बीच में घाव होना जिसकी वजह से पशु का लंगड़ा कर चलना या चलना बंद कर देता है। मुँह में घावों कि वजह से पशु भोजन लेना तथा जुगाली करना बंद कर देता है एवं कमजोर हो जाता है।
  • दूध उत्पादन में लगभग 80 प्रतिशत की कमी, गाभिन पशुओं के गर्भपात एवं बच्चा मरा हुआ पैदा हो सकता है।
  • बछड़ों में अत्याधिक ज्वर आने के पश्चात बिना किसी लक्षण की मृत्यु होना।

रोकथाम के उपाय

इस रोग का उपचार अब तक संभव नहीं हो सका है इसलिए रोकथाम ही सबसे कारगर नियंत्रण का उपाय है। सभी किसान/ पशुपालक को अब इस रोग के प्रति जागरूकता दिखाने की आवश्यकता है तभी इस रोग का रोकथाम संभव है।

  • पशुपालकों को अपने सभी पशुओं (चार महीने से ऊपर) को टीका/भेद लगवाना चाहिए। प्राथमिक टीकाकरण के चार सप्ताह के बाद पशु को बूस्टर/वर्धक खुराक दिया जाना चाहिए और प्रत्येक 6 महीने में नियमित टीकाकरण करना चाहिए।
  • नये पशुओं को झुंड या गाँव में मिश्रित करने से पूर्व सिरम से उसकी जाँच आवश्यक है। केन्द्रीय प्रयोगशाला मुक्तेश्वर, उत्तराखंड एवं एआइसीआरपी हैदराबाद, कोलकत्ता, पुणे, रानीपेत, शिमला एवं तिरुवनंतपुरम केन्द्रं पर इसकी जाँच की सुविधा उपलब्ध है। इन नए पशुओं को कम से कम चौदह दिनों तक अलग बाँध कर रखना चाहिए तथा भोजन एवं अन्य प्रबन्धन भी अलग से ही करना चाहिए।
  • पशुओं को पूर्ण आहार देना चाहिए जिससे खनिज एवं विटामीन की मात्रा पूर्ण रूप से मिलती रहे।

रोग जांच हेतु नमूनें/ पदार्थ

मुँह,खुर एवं छिमी का घाव,लाव,दूध इत्यादि को निकटतम प्रयोगशाला को वर्फ में रखकर जाँच हेतु जल्द से जल्द भेंजे या निकटतम केंद्र पर तुरंत सूचित करें। यदि संभव हुआ तो मुँह,खुर व छिमी के घाव को 50 % बफर ग्लिसरीन में रखकर भेंजे।

खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के लिये किट
उपचार
किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या करें ?
किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या नहीं करें ?
खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के लिये किट

भारत में विकसित खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के उपयोग में आने वाली किट

उपचार

मुँह में बोरो ग्लिसेरीन (850 मिली ग्लिसेरीन एवं 120 ग्राम बोरेक्स) लगाए। शहद एवं मडूआ या रागी के आटा को मिलाकर लेप बनाएँ एवं मुँह में लगाएँ। डॉक्टर के परामर्श पर ज्वरनाशी एवं दर्दनाशक का प्रयोग करे एवं जिस पशु के मुँह, खुर एवं छिमी में घाव हो उसको 3 या 5 दिन तक प्रतिजैविक जैसेकि डाइक्रिस्टीसीन या ऑक्सीिटेटरासाइकलीन की सुई लगाए। खुर के घाव में हिमैक्स या नीम के तेल का प्रयोग करें जिससे की मक्खी नहीं बैठे क्योंकि मक्खी के बैठने से कीड़े होते हैं। कीड़ा लगने पर तारपीन तेल का उपयोग करें इसके अलावा मड़ूआ या रागी एवं गेहूँ का आटा, चावल के बराबर की मात्रा को पकाकर तथा उसमें गुड़ या शहद, खनिज मिश्रण को मिलाकर पशु को नियमित दें साथ ही साथ अपने पशुओं को प्रोटीन भी दें।

किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या करें ?

  • निकटतम सरकारी पशुचिकित्सा अधिकारी को सूचित करें।
  • प्रभावित पशुओं के रोग का पता लगने पर तुरंत उसे अलग करें।
  • दूध निकालने के पहले आदमी को अपना हाथ एवं मुँह साबुन से धोना चाहिए तथा अपना कपड़ा बदलना चाहिए क्योंकि आदमी से बीमारी फैल सकता है।
  • बीमारी को फैलने से बचाने के लिए पूरे प्रभावित क्षेत्र को 4 प्रतिशत सोडियम कोर्बोनेट (NaCC) घोल (400 ग्राम सोडियम कार्बोनेट 10 लीटर पानी में) या 2 प्रतिशत सोडियम हाइड्राक्साइड (NaOH) से दिन में दो बार धोना चाहिए एवं इस प्रक्रिया को दस दिन तक दोहराना चाहिए।
  • स्वस्थ एवं बीमार पशु को अलग-अलग रखना चाहिए।
  • बीमार पशुओं को स्पर्श करने के बाद व्यक्ति को 4 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट घोल के साथ खुद को, जूते एवं चप्पल, कपड़े आदि धोने चाहिए।
  • समाज को यह करना चाहिए कि दूध इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल किये बर्तन एवं दूध के डिब्बे को 4 प्रतिशत सोडियम कोर्बोनेट घोल से सुबह और शाम धोने के बाद ही उन्हें गांव से अंदर या बाहर मेजना चाहिए।
  • संकमित गांव के बाहर 10 फिट चौड़ा बलीचिंग पाउडर का छिड़काव करना चाहिए।पशुचिकित्सक को चाहिए की प्रारंभिक चरण के प्रकोप में बचे पशुओं में, संक्रमित गांव/क्षेत्र के आसपास, रोग के आगे प्रसार को रोकने के लिए वृत्त टीकाकरण (टीकाकरण की शुरूआत स्वस्थ पशुओं में बाहर से अंदर की ओर) करना चाहिए तथा टीकाकरण के दौरान प्रत्येक पशु के लिए अलग-अलग सुई का प्रयोग करें तथा इस दौरान बीमार पशु को नही छुएं।टीकाकरण के 15 से 21 दिनों के बाद ही पशुओं को गांव में लाना चाहिए।
  • इस प्रकोप के शांत होने के बाद इस प्रकिया को एक महीने तक जारी रखा जाना चाहिए।

किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या नहीं करें ?

  • सामुहिक चराई के लिए अपने पशुओं को नहीं भेजें. अन्यथा स्वस्थ पशुओं में रोग फैल सकता है।
  • पशुओं को पानी पीने के लिए आम स्रोत जैसेकि तालाब, धाराओं, नदियों से सीधे उपयोग नहीं करना चाहिए इससे बीमारी फैल सकती है | पीने के पानी में 2 प्रतिशत सोडियम बाइकार्बोनेट घोल मिलाना चाहिए।
  • लोगों को गांव के बाहर आने-जाने के द्वारा रोग फैल सकता है।
  • लोगों को ज्यादा इधर उधर नहीं घूमना चाहिए वे स्वस्थ पशुओं के साथ संपर्क में नहीं जाएं तथा खेतों एवं स्थानों पर जहाँ पशुओं को रखा जाता है वहाँ जाने से उन्हें बचना चाहिए।
  • प्रभावित क्षेत्र से पशुओं की खरीदी न करें।

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चाय की फसलभारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है दरअसल साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती की जाती है। इससे पूर्व चाय की खेती सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों में ही की जाती थी लेकिन अब यह पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर मैदानी इलाकों तक पहुंच चुकी है। दुनिया में भारत चाय उत्पादन के संदर्भ में दूसरे स्थान पर है। विश्व की लगभग 27 फीसद चाय का उत्पादन भारत..Click Hereदुधारू पशुओं के प्रमुख रोग व उनका उपचारदुधारू पशुओं में अनेक कारणों से बहुत सी बीमारियाँ होती है| सूक्ष्म विषाणु, जीवाणु, फफूंदी, अंत: व ब्रह्मा परजीवी, प्रोटोजोआ, कुपोषण तथा शरीर के अंदर की चयापचय (मेटाबोलिज्म) क्रिया में विकार आदि प्रमुख कारणों में है| इन बीमारियों में बहुत सी जानलेवा बीमारियां है था कई बीमारियाँ पशु के उत्पादन पर कुप्रभाव डालती है…Click Hereभावान्तर भरपाई योजना का संक्षिप्त विवरणमण्डी में सब्जी व फल की कम कीमत के दौरान किसानों का निर्धारित संरक्षित मूल्य द्वारा ज़ोखिम को कम करना।
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चाय की फसल

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  • चाय का परिचय
  • चाय की खेती हेतु मृदा, जलवायु एवं तापमान कैसा होना चाहिए
  • जानें चाय की उन्नत किस्में कौन-कौन सी हैं
  • चाय कितने तरह की होती है
  • चाय की खेती के लिए भूमि की तैयारी एवं खाद
  • चाय के पौधों को प्रभावित करने वाले रोग और उनका नियंत्रण कैसे करें
  • चाय की खेती से कितनी आमदनी होती है

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चाय का परिचय

भारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है दरअसल साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती की जाती है। इससे पूर्व चाय की खेती सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों में ही की जाती थी लेकिन अब यह पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर मैदानी इलाकों तक पहुंच चुकी है। दुनिया में भारत चाय उत्पादन के संदर्भ में दूसरे स्थान पर है। विश्व की लगभग 27 फीसद चाय का उत्पादन भारत के अंदर ही किया जाता है इसके साथ ही 11 फीसद चाय उपभोग के साथ भारत सबसे बड़ा चाय का उपभोगकर्ता भी है। चाय को पेय पदार्थ के तौर पर उपभोग में लाया जाता है अगर चाय का सेवन सीमित रूप में करते है तो आपको इससे विभिन्न लाभ मिलते हैं।

भारत में चाय का सर्वाधिक सेवन किया जाता है। विश्व में भी जल के उपरांत यदि किसी पेय पदार्थ का सबसे ज्यादा उपयोग किया जाता है उसका नाम चाय है। चाय में कैफीन भी काफी ज्यादा मात्रा में विघमान रहती है। चाय प्रमुख तौर पर काले रंग में पाई जाती है जिसे पौधों और पत्तियों से तैयार किया जाता है। गर्म जलवायु में चाय के पौधे अच्छे से प्रगति करते है। यदि आप भी चाय की खेती करना चाहते हैं तो आइए हम इस लेख में आपको चाय की खेती से जुड़ी अहम जानकारी देंगे।

चाय की खेती हेतु मृदा, जलवायु एवं तापमान कैसा होना चाहिए

चाय की खेती करने के लिए हल्की अम्लीय जमीन की जरूरत होती है। इसकी खेती के लिए बेहतर जल निकासी वाली भूमि होना अति आवश्यक है क्योंकि जलभराव वाली जगहों पर इसके पौधे काफी शीघ्रता से नष्ट हो जाते हैं । चाय की खेती अधिकांश पहाड़ी इलाकों में की जाती है। चाय की खेती हेतु जमीन का P.H. मान 5.4 से 6 के बीच रहना चाहिए।

चाय की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु को उपयुक्त माना जाता है। चाय के पौधों को गर्मी के साथ-साथ वर्षा की भी जरुरत पड़ती है। शुष्क और गर्म जलवायु में इसके पौधे अच्छे से विकास करते हैं। इसके अतिरिक्त छायादार स्थानों पर भी इसके पौधों को विकास करने में सहजता होती है। अचानक से होने वाला जलवायु परिवर्तन फसल के लिए नुकसानदायक होता है। इसके पौधों को शुरुआत में सामान्य तापमान की जरूरत पड़ती है। चाय के पौधों को विकास करने के लिए 20 से 30 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है। चाय के पौधे कम से कम 15 डिग्री और ज्यादा से ज्यादा 45 डिग्री तापमान ही झेल सकते हैं।

जानें चाय की उन्नत किस्में कौन-कौन सी हैं

चीनी जात चाय

चाय की इस किस्म में पौधों का आकार झाड़ीनुमा होता है जिसमें निकलने वाली पत्तियां चिकनी और सीधी होती हैं । इसके पौधों पर बीज काफी शीघ्रता से निकल आते हैं और इसमें चीनी टैग की खुशबू विघमान होती है। इसकी पत्तियों को तोड़ने के दौरान अगर अच्छी पत्तियों का चयन किया जाता है तो चाय भी उच्च गुणवत्ता वाली अर्जित होती है।

असमी जात चाय

चाय की यह प्रजाति विश्व में सबसे बेहतरीन मानी जाती है। इसके पौधों पर निकलने वाली पत्तियों का रंग थोड़ा हरा होता है जिसमें पत्तियां चमकदार एवं मुलायम होती हैं। इस प्रजाति के पौधों को फिर से रोपण करने के लिए भी उपयोग में लिया जा सकता है ।

व्हाइट पिओनी चाय

चाय की यह व्हाइट पिओनी प्रजाति सर्वाधिक चीन में उत्पादित की जाती है । इस प्रजाति के पौधों पर निकलने वाली पत्तियां कोमल एवं बड्स के जरिए से तैयार की जाती हैं साथ ही चाय में हल्का कड़कपन भी पाया जाता है। इसको जल में डालने पर इसका रंग हल्का हो जाता है।

सिल्वर निडल व्हाइट चाय

सिल्वर निडल व्हाइट प्रजाति की चाय को कलियों के जरिए से तैयार किया जाता है। इस प्रजाति की कलियां चहुं ओर से रोये से ढक जाती हैं। इसके बीज पानी में डालने पर हल्के रंग के पड़ जाते हैं। सिल्वर निडल व्हाइट किस्म का स्वाद मीठा एवं ताजगी वाला होता है।

चाय कितने तरह की होती है

चाय की उन्नत प्रजातियों से चाय प्रमुख तौर पर काली, सफेद और हरे रंग की अर्जित हो जाती है। इसकी पत्तियों, शाखाओं एवं कोमल हिस्सों को प्रोसेसिंग के जरिए से तैयार किया जाता है।

सफेद चाय white tea

सफेद चाय को तैयार करने के लिए पौधों की ताजा एवं कोमल पत्तियों को उपयोग किया जाता है। इस प्रकार की चाय का स्वाद मीठा होता है। इसमें एंटी-ऑक्सिडेंट की मात्रा ज्यादा और कैफीन की मात्रा काफी कम पाई जाती है।

हरी चाय हरी चाय

हरी चाय की पत्तियों से विभिन्न प्रकार की चाय बनाई जाती है। इसके पौधों में निकलने वाली कच्ची पत्तियों से हरी चाय को तैयार करते है। इस चाय में एंटी-ऑक्सिडेंट की मात्रा सर्वाधिक होती है।

काली या आम चाय हरी चाय

यह एक साधारण चाय होती है, जो कि प्रमुख तौर पर हर घर में मौजूद होती हैं। इसके दानों को विभिन्न तरह की चाय को बनाने हेतु इस्तेमाल में लाया जाता है परंतु सामान्य तौर पर इसको साधारण चाय के लिए उपयोग में लाते हैं। इस प्रजाति की चाय को तैयार करने के लिए पत्तियों को तोड़के कर्ल किया जाता है जिससे दानेदार बीज भी मिल जाते हैं।

चाय की खेती के लिए भूमि की तैयारी एवं खाद

चाय के पौधे एक बार तैयार हो जाने के पश्चात विभिन्न सालों तक पैदावार देते हैं इसलिए इसके खेत को बेहतर ढ़ंग से तैयार कर लिया जाता है। भारत में इसका उत्पादन अधिकांश पर्वतीय इलाकों में ढलान वाली भूमि में किया जाता है इसके लिए भूमि में गड्डों को तैयार कर लिया जाता है यह गड्डे पंक्तिबद्ध ढ़ंग से दो से तीन फीट का फासला रखते हुए तैयार किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त पंक्तियों के बीच भी एक से डेढ़ मीटर का फासला रखा जाता है।

इसके उपरांत तैयार गड्डों में जैविक खाद के तौर पर 15 KG पुरानी गोबर की खाद व रासायनिक खाद स्वरूप 90 KG पोटाश, 90 KG नाइट्रोजन और 90 KG सुपर फास्फेट की मात्रा को मृदा में मिश्रित कर प्रति हेक्टेयर में तैयार गड्डो में भर दिया जाता है। यह समस्त गड्डे पौध रोपाई से एक महीने पूर्व तैयार कर लिए जाते हैं इसके पश्चात भी इस खाद को पौधों की कटाई के चलते साल में तीन बार देना पड़ता है।

चाय के पौधों को प्रभावित करने वाले रोग और उनका नियंत्रण कैसे करें

बतादें कि अन्य फसलों की भांति ही चाय के पौधों में भी विभिन्न प्रकार के रोग लग जाते है जो पौधों पर आक्रमण करके बर्बाद कर देते हैं। अगर इन रोगों का नियंत्रण समयानुसार नहीं किया जाता है तो उत्पादन काफी प्रभावित होता है। इसके पौधों में मूल विगलन, चारकोल विगलन, गुलाबी रोग, भूरा मूल विगलन रोग, फफोला अंगमारी, अंखुवा चित्ती, काला मूल विगलन, भूरी अंगमारी, शैवाल, काला विगलन कीट और शीर्षरम्भी क्षय जैसे अनेक रोग दिखाई पड़ जाते हैं जो कि चाय के उत्पादन को बेहद प्रभावित करते हैं। इन रोगो से पौधों का संरक्षण करने हेतु रासायनिक कीटनाशक का छिड़काव समुचित मात्रा में किया जाता है।

चाय की खेती से कितनी आमदनी होती है

चाय के पौधे रोपाई के एक साल पश्चात पत्तियों की कटाई के लिए तैयार हो जाते है इसके उपरांत पत्तियों की तुड़ाई को एक वर्ष में तीन बार किया जा सकता है। बतादें कि इसकी प्रथम तुड़ाई मार्च के महीने में की जाती है वहीं अतिरिक्त तुड़ाई को तीन माह के समयांतराल में करना होता है। चाय की विभिन्न तरह की उन्नत प्रजातियों से प्रति हेक्टेयर 600 से 800 KG की पैदावार हांसिल हो जाती है। बाजार में चाय का भाव बेहद अच्छा होता है जिससे किसान भाई चाय की एक साल की फसल से डेढ़ से दो लाख तक की आमदनी सहजता से कर सकते हैं।

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खुरपका मुँहपका रोगखुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसानदायक होती है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु से होता है यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलने वाला रोग है तथा कुछ समय में एक झुंड या पूरे गाँव के अधिकतर पशुओं को संक्रामित कर देता है…Click Hereथनैला रोगथनैला रोग (Garget) दुधारू पशुओं में होने वाली एक बीमारी है। यह बीमारी मुख्यतः गाय, भैंस,भेड़ ,बकरी सुअर आदि में होती है। जिसमे प्रभावित पशुओं के थन गर्म हो जाते है एवं सूजन बढ़ जाती है । शारीरिक तापमान बढ़ जाता है । दूध देने की क्षमता कम हो जाती है । जानवर खाना पीना बंद कर देता है …..Click Here दूध का बुखारदुग्ध ज्वर तब उत्पन्न होता है जब गायें ब्याने के समय पर्याप्त कैल्शियम एकत्र करने में असमर्थ होती हैं। इस पृष्ठ का उद्देश्य डेयरी किसानों के लिए (उप)नैदानिक ​​दूध बुखार को नियंत्रित करने की चुनौती की बेहतर समझ प्रदान करना है। निदान और सलाह के लिए हमेशा अपने पशुचिकित्सक से परामर्श लें…Click Here
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दुधारू पशुओं के प्रमुख रोग व उनका उपचार

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  • विषाणु और जीवाणु से रोग
  • पशु प्लेग (रिन्ड़रपेस्ट)
  • पशुओं में पागलपन या हलकजाने का रोग (रेबीज)
  • गलघोंटू रोग (एच.एस.)
  • लंगड़ा बुखार (ब्लैक कवाटर)
  • ब्रुसिल्लोसिस (पशुओं का छूतदार गर्भपात)
  • रक्त प्रोटोज़ोआ जनित रोग
  • बाह्म तथा अंत: परजीवी जनित रोग

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विषाणु और जीवाणु से रोग

 दुधारू पशुओं में अनेक कारणों से बहुत सी बीमारियाँ होती है । सूक्ष्म विषाणु, जीवाणु, फफूंदी, अंत: व ब्रह्मा परजीवी, प्रोटोजोआ, कुपोषण तथा शरीर के अंदर की चयापचय (मेटाबोलिज्म) क्रिया में विकार आदि प्रमुख कारणों में है इन बीमारियों में बहुत सी जानलेवा बीमारियां है । कई बीमारियाँ पशु के उत्पादन पर कुप्रभाव डालती है कुछ बीमारियाँ एक पशु से दूसरे पशु को लग जाती है जैसे मुह व खुर की बीमारी, गलघोंटू आदि छूतदार रोग कहते हैं । कुछ बीमारियाँ पशुओं से मनुष्यों में भी आ जाती है जैसे रेबीज़ (हल्क जाना), क्षय रोग आदि इन्हें जुनोटिक रोग कहते हैं अत: पशुपालक को प्रमुख बीमारियों के बारे में जानकारी रखना आवश्यक है ताकि वह उचित समय पर उचित कदम उठा कर अपना आर्थिक हानि से बचाव तथा मानव स्वास्थ्य की रक्षा में भी सहयोग कर सके । दुधारू पशुओं के प्रमुख रोग् निम्नलिखित है :-

(क)विषाणु जनित रोग

  1. मुहं व खुर की बीमारी :- मुंहपका-खुरपका रोग (Foot and Mouth Disease – FMD) फटे खुर या दो खुर वाले पशुओं में जैसे गाय, भैंस, बकरी, हिरन, भेड़, सूअर तथा अन्य जंगली पशुओ में होने वाला एक अत्यंत संक्रामक एवं विषाणु जनित रोग है। FMD रोग गायों और भेसों को अधिक प्रभावित करता है

(ख)जीवाणु जनित रोग :-

इस रोग को पैदा करने वाले सूक्ष्म विषाणु हलकाये कुत्ते, बिल्ली,बंदर, गीदड़, लोमड़ी या नेवले के काटने से स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश करते हैं तथा नाडियों के द्वारा मस्तिष्क में पहुंच कर उसमें बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं । रोगग्रस्त पशु की लार में यह विषाणु बहुतायत में होता है तथा रोगी पशु द्वारा दूसरे पशु को काट लेने से अथवा शरीर में पहले से मौजूद किसी घाव के ऊपर रोगी की लार लग जाने से यह बीमारी फैल सकती है । यह बीमारी रोगग्रस्त पशुओं से मनुष्यों में भी आ सकती है अत: इस बीमारी का जन स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत महत्व है एक बार पशु अथवा मनुष्य में इस बीमारी के लक्षण पैदा होने के बाद उसका फिर कोई इलाज नहीं है तथा उसकी मृत्यु निश्चित है । विषाणु के शरीर में घाव आदि के माध्यम से प्रवेश करने के बाद 10 दिन से 210 दिनों तक की अवधि में यह बीमारी हो सकती है । मस्तिष्क के जितना अधिक नज़दीक घाव होता है उतनी ही जल्दी बीमारी के लक्षण पशु में पैदा हो जाते है जैसे कि सिर अथवा चेहरे पर काटे गए पशु में एक हफ्ते के बाद यह रोग पैदा हो सकता है ।

लक्षण :- रेबीज़ मुख्यत: दो रूपों में देखी जाती है पहला जिसमें रोग ग्रस्त पशु काफी भयानक हो जाता है तथा दूसरा जिसमें वह बिल्कुल शांत रहता है । पहले अथवा उग्र रूप में पशु में रोग के सभी लक्षण स्पष्ट दिखायी देते हैं लेकिन शांत रूप में रोग के लक्षण बहुत कम अथवा लगभग नहीं के बराबर ही होते हैं ।
 कुत्तों में इस रोग की प्रारम्भिक अवस्था में व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है तथा उनकी आंखे अधिक तेज नज़र आती हैं कभी-कभी शरीर का तापमान भी बढ़ जाता है । 2-3 दिन के बाद उसकी बेचैनी बढ़ जाती है तथा उसमें बहुत ज्यादा चिड-चिडापन आ जाता है । वह काल्पनिक वस्तुओं की अथवा बिना प्रयोजन के इधर-उधर काफी तेज़ी से दौड़ने लगता हैं तथा रास्ते में जो भी मिलता है उसे वह काट लेता हैं ।अन्तिम अवस्था में पशु के गले में लकवा हो जाने के कारण उसकी आवाज़ बदल जाती है शरीर में कपकपी तथा चाल में लड़खड़ाहट आ जाती है तथा वह लकवा ग्रस्त होकर अचेतन अवस्था में पड़ा रहता है इसी अवस्था में उसकी मृत्यु हो जाती है ।

     गाय व भैंसों में इस बीमारी के भयानक रूप के लक्षण दिखते हैं  पशु काफी उत्तेजित अवस्था में दिखता है तथा वह बहुत तेजी से भागने की कोशिश करता हैं । वह ज़ोर-ज़ोर से रम्भाने लगता है तथा बीच-बीच में जम्भाइयाँ लेता हुआ दिखाई देता है । वह अपने सिर को किसी पेड़ अथवा दीवाल के साथ टकराता है । कई पशुओं में मद के लक्षण भी दिखायी से सकते हैं रोगग्रस्त पशु ही दुर्बल हो जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है के

     मनुष्य में इस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में उत्तेजित होना, पानी अथवा कोई खाद्य पदार्थ को निगलने में काफी तकलीफ महसूस करना तथा अंत में लकवा लकवा होना आदि है के

उपचार तथा रोकथाम :-      एक बार लक्षण पैदा हो जाने के बाद इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है| जैसे ही किसी स्वस्थ पशु को इस बीमारी से ग्रस्त पशु काट लेता है उसे तुरन्त नजदीकी पशु चिकित्सालय में ले जाकर इस बीमारी से बचाव का टीका लगवाना चाहिए| इस कार्य में ढील बिल्कुल नहीं बरतनी चाहिए क्योंकि ये टीके तब तक ही प्रभावकारी हो सकते हैं जब तक कि पशु में रोग के लक्षण पैदा नहीं होते|पालतू कुत्तों को इस बीमारी से बचने के लिए नियमित रूप से टीके लगवाने चाहिए तथा आवारा कुत्तों को समाप्त के देने चाहिए| पालतू कुत्तों का पंजीकरण सथानीय संस्थाओं द्वारा करवाना चाहिए तथा उनके नियमित टीकाकरण का दायित्व निष्ठापूर्वक मालिक को निभाना चाहिए|

पशु प्लेग (रिन्ड़रपेस्ट)

सूक्ष्म विषाणु (वायरस) से पैदा होने वाली बीमारी को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है जैसेकि खरेडू,मुहंपका खुरपका, चपका,खुरपा आदि यह बहुत तेज़ी फैलाने वाला छुतदार रोग है जोकि गाय, भैंस, भेड़, ऊंट, सुअर आदि पशुओं में होता है । विदेशी व संकर नस्ल रोग की गायों में यह बीमारी अधिक गम्भीर रूप से पायी जाती है  यह बीमारी हमारे देश में हर स्थान में होती है । इस से रोग ग्रस्त पशु ठीक होकर अत्यन्त कमज़ोर हो जाते हैं । दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन बहुत कम हो जाता है तथा बैल काफी समय तक कार्य करने योग्य नहीं रहते । 

रोग का कारण :- मुंहपका-खुरपका रोग एक अत्यन्त सूक्ष्म विषाणु जिसके अनेक प्रकार तथा उप-प्रकार है । इनकी प्रमुख किस्मों में ओ,ए,सी,एशिया-1,एशिया-2,एशिया-3, सैट-1, सैट-3 तथा इनकी 14 उप-किस्में शामिल है । हमारे देश मे यह रोग मुख्यत: ओ,ए,सी तथा एशिया-1 प्रकार के विषाणुओं द्वारा होता है नम-वातावरण, पशु की आन्तरिक कमजोरी, पशुओं तथा लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन तथा नजदीकी क्षेत्र में रोग का प्रकोप इस बीमारी को फैलाने में सहायक कारक हैं ।

संक्रमण विधि :- यह रोग बीमार पशु के सीधे सम्पर्क में आने, पानी, घास, दाना, बर्तन, दूध निकलने वाले व्यक्ति के हाथों से, हवा से तथा लोगों के आवागमन से फैलता है । रोग के विषाणु बिमार पशु की लार, मुंह, खुर व थनों में पड़े फफोलों में बहुत अधिक संख्या में पाए जाते हैं । ये खुले में घास, चारा, तथा फर्श पर चार महीनों तक जीवित रह सकते हैं लेकिन गर्मीं के मौसम में यह बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं । विषाणु जीभ, मुंह, आंत, खुरों के बीच की जगह थनों तथा घाव आदि के द्वारा स्वस्थ पशु के रक्त में पहुंचते हैं तथा लगभग 5 दिनों के अंदर उसमें बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं ।

रोग के लक्षण :- रोग ग्रस्त पशु को 104-106 डि. फारेनहायट तक बुखार हो जाता है । वह खाना-पीना व जुगाली करना बन्द कर देता है दूध का उत्पादन गिर जाता है मुंह से लार बहने लगती है तथा मुंह हिलाने पर चप-चप की आवाज़ आती हैं इसी कारण इसे चपका रोग भी कहते है तेज़ बुखार के बाद पशु के मुंह के अंदर गालों,जीभ,होंठ, तालू व मसूड़ों के अंदर खुरों के बीच तथा कभी-कभी थनों व आयन पर छाले पड़ जाते हैं  ये छाले फटने के बाद घाव का रूप ले लेते हैं जिससे पशु को बहुत दर्द होने लगता है । मुंह में घाव व दर्द के कारण पशु खाना-पीना बन्द कर देते हैं जिससे वह बहुत कमज़ोर हो जाता है । खुरों में दर्द के कारण पशु लंगड़ा कर चलने लगता है । गर्भवती मादा में कई बार गर्भपात भी हो जाता है नवजात बच्छे/बच्छियां बिना किसी लक्षण दिखाए मर जाते है । लापरवाही होने पर पशु के खुरों में कीड़े पड़ जाते हैं तथा कई बार खुरों के कवच भी निकल जाते हैं  हालांकि व्यस्क पशु में मृत्यु दर कम (लगभग 10%) है लेकिन इस रोग से पशुपालक को आर्थिक हानि बहुत ज्यादा उठानी पड़ती है । दूध देने वाले पशुओं में दूध के उत्पादन में कमी आ जाती है । ठीक हुए पशुओं का शरीर खुरदरा तथा उनमें कभी कभी हांफना रोग हो जाता है । बैलों में भारी काम करने की क्षमता खत्म हो जाती हैं ।

उपचार :- इस रोग का कोई निश्चित उपचार नहीं है लेकिन बीमारी की गम्भीरता को कम करने के लिए लक्षणों के आधार पर पशु का उपचार किया जाता है । रोगी पशु में सेकैन्डरी संक्रमण को रोकने के लिए उसे पशु चिकित्सक की सलाह पर एंटीबायोटिक के टीके लगाए जाते हैं । मुंह व खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते हैं मुंह में बोरो-गिलिसरीन तथा खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है ।

रोग से बचाव :-
(1) इस बीमारी से बचाव के लिए पशुओं को पोलीवेलेंट वेक्सीन के वर्ष में दो बार टीके अवश्य लगवाने चाहिए । बच्छे/बच्छियां में पहला टीका 1 माह की आयु में  दूसरे तीसरे माह की आयु तथा तीसरा 6 माह की उम्र में और उसके बाद नियमित सारिणी के अनुसार टीके लगाए जाने चाहिए ।
(2)बीमारी हो जाने पर रोगग्रस्त पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए ।
(3)बीमार पशुओं की देख-भाल करने वाले व्यक्ति को भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहना चाहिए ।
(4)बीमार पशुओं के आवागमन पर रोक लगा देना चाहिए ।
(5)रोग से प्रभावित क्षेत्र से पशु नहीं खरीदना चाहिए ।
(6)पशुशाला को साफ-सुथरा रखना चाहिए ।
(7)इस बीमारी से मरे पशु के शव को खुला न छोड़कर गाढ़ देना चाहिए ।

पशुओं में पागलपन या हलकजाने का रोग (रेबीज)
पशुओं में पागलपन या हलकजाने का रोग (रेबीज़) को पैदा करने वाले विषाणु हलकाये कुत्ते , बिल्ली , बन्दर, गीदड़, लोमड़ी या नेवले के काटने से स्वस्थ पशु के शरीर में प्रवेश करते हैं तथा नाड़ियों के द्वारा मष्तिस्क में पहुंच कर उसमें बीमारी के लक्षण पैदा करते हैं। 
गलघोंटू रोग (एच.एस.)

 गाय व भैंसों में होने वाला एक बहुत ही घातक तथा छूतदार रोग है जोकी अधिकतर बरसात के मौसम में होता है यह गोपशुओं की अपेक्षा भैंसों में अधिक पाया जाता है| यह रोग नहुत तेज़ी से फैलकर बड़ी संख्या मे पशुओं को अपनी चपेट में लेकर उनकी मौत का कारण बन जाता हैं जिससे पशु पालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है| इस रोग के प्रमुख लक्षणों में तेज़ बुखार, गले में सूजन, सांस लेने में तकलीफ निकालकर सांस लेना तथा सांस लेते समय तेज़ आवाज आदि शामिल है| कईं बार बिना किसी स्पष्ट लक्षणों के ही पशु की अचानक मृत्यु हो जाती है|

उपचार तथा रोकथाम :- इस रोग से ग्रस्त हुए पशु को तुरन्त पशु चिकित्सक को दिखाना चाहिए अन्यथा पशु की मौत हो जाती है सही समय पर उपचार दिए जाने पर रोग ग्रस्त पशु को बचाया जा सकता है इस रोग की रोकथाम के लिए रोगनिरोधक टीके लगाए जाते हैं | पहला टीका 3 माह की आयु में दूसरा 9 माह की अवस्था में तथा इसके बाद हर साल यह टीका लगाया जाता हैं| ये टीके पशु चिकित्सा संस्थानों में नि:शुल्क लगाए जाते हैं|

लंगड़ा बुखार (ब्लैक कवाटर)

जीवाणुओं से फैलने वाला यह रोग गाय व भैंसों दोनों को होता है लेकिन गोपशुओं में यह बीमारी अधिक देखी जाती है तथा इससे अच्छे व स्वस्थ पशु ही ज्यादातर प्रभावित होते हैं । इस रोग में पिछली अथवा अगली टांगों के ऊपरी भाग में भारी सूजन आ जाती हैं जिससे पशु लंगड़ा कर चलने लगता है या फिर बैठ जाता है । पशु को तेज़ बुखार हो जाता है तथा सूजन वाले स्थान को दबाने पर कड़-कड़ की आवाज़ आती है । उपचार तथा रोकथाम :- रोगग्रस्त पशु के उपचार हेतू तुरन्त नजदीकी पशु चिकित्सालय में संपर्क करना चाहिए ताकि पशु को शीघ्र उचित उपचार मिल सके देर करने से पशु को बचाना लगभग असंभव हो जाता है क्योंकि जीवाणुओं द्वारा पैदा हुआ जहर (टोक्सीन) शरीर में पूरी तरह फेल जाता है जोकि पशु की मृत्यु का कारण बन जाता है । उपचार के लिए पशु को ऊँची डोज़ में प्रोकें पेनिसिलीन के टीके लगाए जाते हैं तथा सूजन वाले स्थान पर भी इसी दवा को सुई द्वारा माँस में डाला जाता है । इस बीमारी से बचाव के लिए पशु चिकित्सक संस्थाओं में रोग निरोधक टीके नि:शुल्क लगाए जाते है अत:पशु पालकों को इस सुविधा का अवश्य लाभ उठाना चाहिए ।

ब्रुसिल्लोसिस (पशुओं का छूतदार गर्भपात)

जीवाणु जनित इस रोग में गोपशुओं तथा भैंसों में गर्भवस्था के अन्तिम त्रैमास में गर्भपात हो जाता है । यह रोग पशुओं से मनुष्यों में भी आ सकता है । मनुष्यों में यह उतार-चढ़ाव वाला बुखार (अज्युलेण्ट फीवर)नामक बीमारी पैदा करता है । पशुओं में गर्भपात से पहले योनि से अपारदर्शी पदार्थ निकलता है तथा गर्भपात के बाद पशु की जेर रुक जाती है । इसके अतिरिक्त यह जोड़ों में आर्थ्रायटिस (जोड़ों की सूजन) पैदा के सकता है ।

उपचार व रोकथाम :-  अब तक इस रोग का कोई प्रभावकारी इलाज नहीं हैं यदि क्षेत्र में इस रोग के 5% से अधिक पोजिटिव केस हों तो रोग की रोकथाम के लिए बच्छियों में 3-6 माह की आयु में ब्रुसेल्ला-अबोर्टस स्ट्रेन-19 के टीके लगाए जा सकते हैं । पशुओं में प्रजनन की कृत्रिम गर्भाधान पद्यति अपना कर भी इस रोग से बचा जा सकता है ।

रक्त प्रोटोज़ोआ जनित रोग

 बबेसिओसिस अथवा टिक फीवर (पशुओं के पेशाब में खून आना) :-

यह बीमारी पशुओं में एक कोशिकीय जीव जिसे प्रोटोज़ोआ कहते हैं से होता है । बबेसिया प्रजाति के प्रोटोज़ोआ पशुओं के रक्त में चिचडियों के माध्यम से प्रवेश हो जाते हैं तथा वे रक्त की लाल रक्त कोशिकाओं में जाकर अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं जिसके फलस्वरूप लाल रक्त कोशिकायें नष्ट होने लगती हैं  लाल रक्त किशिकाओं में मौजूद हीमोग्लोबिन पेशाब के द्वारा शरीर से बाहर निकलने लगता है जिससे पेशाब का रंग कॉफी के रंग का हो जाता है । कभी-कभी उसे खून वाले दस्त भी लग जाते हैं इसमें पशु खून की कमी हो जाने से बहुत कमज़ोर हो जाता है पशु में पीलिया के लक्षण भी दिखायी देने लगते हैं तथा समय पर इलाज ना कराया जाय तो पशु की मृत्यु हो जाती है ।

उपचार व रोकथाम :-  यदि समय पर पशु का इलाज कराया जाये तो पशु को इस बीमारी से बचाया जा सकता हैं । इसमें बिरेनिल के टीके पशु के भार के अनुसार मांस में दिए जाते हैं तथा खून बढाने वाली दवाओं का प्रयोग किया जाता हैं । इस बीमारी से पशुओं को बचाने के लिए उन्हें चिचडियों के प्रभाव से बचना जरूरी है क्योंकि ये रोग चिचडियों के द्वारा ही पशुओं में फैलता है ।

बाह्म तथा अंत: परजीवी जनित रोग

  1. बाह्म परजीवी रोग :-

    पशुओं के शरीर पर जुएं,चिचडी तथा पिस्सुओं का प्रकोप :-    पशुओं के शरीर पर बाह्म परजीवी जैसे कि जुएं, पिस्सु या चिचडी आदि प्रकोप पर पशुओं का खून चूसते हैं जिससे उनमें खून की कमी हो जाती है तथा वे कमज़ोर हो जाते हैं । इन पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता घट जाती है तथा वे अन्य बहुत सी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं बहुत से परजीवी जैसे कि चिचडियों आदि पशुओं में कुछ अन्य बीमारी जैसे टीक-फीवर का संक्रमण भी हो जाता है । पशुओं में बाह्म परजीवी के प्रकोप को रोकने के लिए अनेक दवाइयां उपलब्ध हैं जिन्हें पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार प्रयोग करके इनसे बचा जा सकता है ।

  2. पशुओं में अंत:परजीवी प्रकोप :-

 पशुओं की पाचन नली में भी अनेक प्रकार के परजीवी पाए जाते हैं जिन्हें अंत: परजीवी कहते हैं । ये पशु के पेट, आंतों, यकृत उसके खून व खुराक पर निर्वाह करते हैं जिससे पशु कमज़ोर हो जाता है तथा वह अन्य बहुत सी बीमारियों का शिकार हो जाता है इससे पशु की उत्पादन क्षमता में भी कमी आ जाती है।

  पशुओं को उचित आहार देने के बावजूद यदि वे कमजोर दिखायी दें तो इसके गोबर के नमूनों का पशु चिकित्सालय में परीक्षण करवाना चाहिए। परजीवी के अंडे गोबर के नमूनों में देखकर पशु को उचित दवा दी जाती है जिससे परजीवी नष्ट हो जाते हैं।

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फसल अवशेष प्रबंधनफसलों की कटाई के बाद कई किसान खेतों में बचे अवशेषों में किसान आग लगा देते हैं पराली के इसी धुएं में लोगों की सांस फूलने लगती है कार्बन के कण वाला यहीं धुआं स्मॉग के रूप में हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, दिल्ली को अपनी जद में ले लेता है अब उसी पराली से निपटने के लिए हरियाणा सरकार किसानों को प्रोत्साहन धनराशि… Click Here गन्ना उत्पादन की नई तकनीक अपनाने पर पांच हजार तक का अनुदानजानकारी के अनुसार इस विधि में किसान को अपने खेत में चार फीट लाइन से लाइन की दूरी में गन्ने की बिजाई और गन्ने के बीच में दूसरी फसल गेहूं, सरसों, चना व सब्जियां उगानी होगी। इस विधि से बिजाई करने वाले किसान को प्रति एकड़ 3600 रु…Click Hereविभिन्न मशीनीकरण योजनाओं के तहत आवेदन आमंत्रित – वित्तीय वर्ष 2023-24किसानों को एक घोषणा पत्र देना होगा, जिसमें किसान को बताना होगा कि पिछले तीन वर्षों से मशीन पर अनुदान नहीं लिया है। इसके साथ फसल अवशेष न जलाने की शपथ भी लेनी होगी। शपथ लेने वालों को ही इस योजना का लाभClick Here
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एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन

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  • एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन
  • एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन के बारे में
  • उद्देश्य 
  • प्रमुख विशेषताएं 
  • एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन के अंतर्गत उप-योजनाएं
  • एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन से संबंधित अन्य पहलें 

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एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन

योजना का नाम  एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन
आरंभ  2014
लक्ष्य  बागवानी क्षेत्र के समग्र विकास को बढ़ावा देना
नोडल मंत्रालय  कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय
क्रियान्वयन क्षेत्र  सभी राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश 
आधिकारिक बेवसाइट   https://midh.gov.in/ 

एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन के बारे में

 

  • एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन फलों, सब्जियों, जड़ और कंद फसलों, मशरूम, मसालों,फूलों, सुगंधित पौधों, नारियल, काजू, कोको और बांस को कवर करने वाले बागवानी क्षेत्र के समग्र विकास के लिए 2014-15 से लागू एक केंद्र प्रायोजित योजना है।
  • MIDH के तहत, भारत सरकार, उत्तर पूर्व और हिमालय के राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में विकास कार्यक्रमों के लिए कुल परिव्यय का 60% योगदान देती है, 40% हिस्सा राज्य सरकारों द्वारा योगदान दिया जाता है।
    • उत्तर पूर्वी राज्यों और हिमालयी राज्यों के मामले में भारत सरकार  90% योगदान देती है। 
  • राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB), नारियल विकास बोर्ड (CDB), केंद्रीय बागवानी संस्थान (CIH) के मामले में नागालैंड सरकार और राष्ट्रीय एजेंसियों के कार्यक्रमों के लिए 100% योगदान केंद्र सरकार द्वारा दिया जाता है।  
  • MIDH कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन है।

उद्देश्य 

  • बागवानी क्षेत्र के समग्र विकास को बढ़ावा देना जिसमें बांस और नारियल भी शामिल है।
  • इस क्रम में प्रत्येक राज्य अथवा क्षेत्र की जलवायु विविधता के अनुरूप क्षेत्र आधारित अलग-अलग कार्यनीति अपनाना इसमें शामिल है – अनुसंधान, तकनीक को बढ़ावा, विस्तारीकरण, फसलोपरांत प्रबंधन, प्रसंस्करण और विपणन इत्यादि।
  • कृषकों को एफआईजी, एफपीओ व एफपीसी जैसे कृषक समूहों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करना ताकि समानता और व्यापकता आधारित आर्थिकी का निर्माण किया जा सके।
  • उच्च पोषण मूल्य वाली बागवानी फसलों का क्षेत्रफल और उत्पादन बढ़ाना। 
  • गुणवत्ता, पौध सामग्री और सूक्ष्म सिंचाई के प्रभावी उपयोग के माध्यम से उत्पादकता में सुधार करना।
  • बागवानी क्षेत्र में ग्रामीण युवाओं को प्रोत्साहन देना और रोजगार उत्पन्न करना।
  • एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम)/एकीकृत कीट प्रवंधन(आईपीएम),  जैविक खेती, अच्छी कृषि पद्धतियों (जीएपी) को बढ़ावा देना।
  • बेहतर किस्मों, गुणवत्ता वाले बीजों और रोपण सामग्री, संरक्षित खेती, उच्च घनत्व वाले वृक्षारोपण, कायाकल्प, सटीक खेती और बागवानी मशीनीकरण के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाना।
  • कोल्ड स्टोरेज (सीएस) के माध्यम से पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट को बढ़ावा देना।

प्रमुख विशेषताएं 

 

      • इस मिशन में राष्ट्रीय बाग़वानी मिशन (NHM),  उत्तर पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए बाग़वानी मिशन, राष्ट्रीय बांस मिशन, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, नारियल विकास बोर्ड और केंद्रीय बागवानी संस्थान नागालैंड जैसी उप-योजनाएं और कार्यक्षेत्र सम्मिलित है।
      • इस मिशन के अंतर्गत अनुसंधान एवं विकास उत्पादकता में प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा दिया जाता है।
      • MIDH के तहत निम्नलिखित प्रमुख हस्तक्षेपों/गतिविधियों के लिए राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है :-
        • गुणवत्तापूर्ण बीज एवं पौध सामग्री के उत्पादन के लिए नर्सरियों, टिश्यू कल्चर इकाइयों की स्थापना।
        • क्षेत्र विस्तार अर्थात फलों, सब्जियों और फूलों के लिए नए बागों और बगीचों की स्थापना।
        • अनुत्पादक, पुराने और जीर्ण बागों का कायाकल्प।
        • उत्पादकता में सुधार करने और बे-मौसमी उच्च मूल्य वाली सब्जियां और फूल उगाने के लिए संरक्षित खेती, यानी पॉली-हाउस, ग्रीन-हाउस आदि।
        • जैविक खेती और प्रमाणन।
        • जल संसाधन संरचनाओं का निर्माण और वाटरशेड प्रबंधन।
        • परागण के लिए मधुमक्खी पालन।
        • बागवानी मशीनीकरण।
        • पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट और मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण।
        • किसानों का प्रशिक्षण।
        • किसान हित समूहों, किसान उत्पादक संगठनों और उत्पादक संघों के संवर्धन और सुदृढ़ीकरण को MIDH के तहत एक घटक के रूप में शामिल किया गया है। 
        • ऐसे समूहों को एसएफएसी द्वारा निर्दिष्ट मानदंडों के अनुसार, बागवानी विकास, कटाई के बाद के प्रबंधन, प्रसंस्करण और विपणन के क्षेत्र में नवीन परियोजनाओं को शुरू करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है।
        • मिशन की तीन स्तरीय संरचना है – राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर। राष्ट्रीय स्तर पर, एक सामान्य परिषद (GC) और एक कार्यकारी समिति (EC) होती है।
          • सामान्य परिषद, जो समग्र दिशा प्रदान करती है, की अध्यक्षता केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा की जाती है। 
          • सचिव (कृषि और सहकारिता) की अध्यक्षता में एक कार्यकारी समिति, मिशन की गतिविधियों की देखरेख करती है।
        •  राज्य स्तर पर, कृषि उत्पादन आयुक्त, या सचिव बागवानी/कृषि की अध्यक्षता में एक कार्यकारी समिति मिशन के कार्यान्वयन की देखरेख करती है।

एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन के अंतर्गत उप-योजनाएं

  • राष्ट्रीय बागवानी मिशन(NHM)
    • इसे वर्ष 2005-06 में 10 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत शुरू किया गया था।
    • इसका उद्देश्य बागवानी का उपलब्ध अधिकतम क्षमता तक विकसित करना है।
  • पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए बागवानी मिशन (HMNEH)
    • HMNEH पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों में बागवानी के समग्र विकास के लिए कार्यान्वित की जा रही एकीकृत बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच) योजना का एक हिस्सा है।
    • इस मिशन में सिक्किम और तीन हिमालयी राज्यों जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सहित सभी पूर्वोत्तर राज्य शामिल है।
    • मिशन बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज के माध्यम से उत्पादन से लेकर खपत तक बागवानी के पूरे स्पेक्ट्रम को संबोधित करता है।
    • राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (BHN)
      • इसकी स्थापना 1984 में डॉ एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में ” नाशवान कृषि वस्तुओं पर समूह ” की सिफारिशों पर की गई थी।
      • इसका मुख्यालय गुरुग्राम में है।
    • नारियल विकास बोर्ड (BDC)
      • यह नारियल की खेती और उद्योग के एकीकृत विकास के लिए एक सांविधिक निकाय है।
      • यह नारियल उत्पादक राज्यों में मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (एमआईडीएच) के तहत विभिन्न योजनाओं को लागू कर रहा है।
      • यह जनवरी 1981 में अस्तित्व में आया और इसका मुख्यालय केरल के कोच्चि में है।
    • केंद्रीय बागवानी संस्थान (HIC)
      • इसे कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग द्वारा वर्ष 2006 में मेडज़िफेमा, नागालैंड में स्थापित किया गया था।
      • यह पूर्वोत्तर क्षेत्र में समग्र विकास के लिए बागवानी के विभिन्न पहलुओं पर तकनीकी सहायता प्रदान करता है।

एकीकृत बाग़वानी विकास मिशन से संबंधित अन्य पहलें 

  • प्रोजेक्ट चमन ( CHAMAN ) 
    • इसे बागवानी फसलों के क्षेत्र और उत्पादन के आकलन के लिए 2014 में शुरू किया गया।
    • इसमें बागवानी क्षेत्र के रणनीतिक विकास के लिए रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है।
  • हॉर्टनेट (HORTNET)
    • यह, राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHM) के अंतर्गत ई-गवर्नेस के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संचालित किया जा रहा है।

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जीवंत ग्राम कार्यक्रमयह एक केंद्र प्रायोजित योजना है जिसका उद्देश्य उत्तरी सीमा पर सीमावर्ती गांवों के स्थानीय प्राकृतिक मानव एवं अन्य संसाधनों के आधार पर आर्थिक चालकों की पहचान करना तथा “हब एंड स्पोक मॉडल” पर विकास केंद्रों का विकास करना है….Click Hereप्राथमिक कृषि ऋण समितियों (Primary Agricultural Credit Societies- PACS) प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (Primary Agricultural Credit Societies- PACS) के डिजिटलीकरण हेतु 2,516 करोड़ रुपए की घोषणा की गई है….Click Hereप्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजनाइस योजना को वर्ष 2015 में खेती के लिये पानी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने, सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करने, जल उपयोग दक्षता में सुधार करने तथा सतत् जल संरक्षण प्रथाओं को बढ़ावा देने के लक्ष्य के साथ शुरू किया गया था…Click Here
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मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना

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  • योजना में शामिल प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाएं
  • योजना में शामिल 46 फसलें
  • योजना में देय बीमा राशि व प्रीमीयम
  • योजना में प्रति एकड़ मुआवजा राशि
  • आधिकारिक वेबसाइट

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बागवानी फसलों में प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाओं के कारण से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा सरकार द्वारा मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना की शुरुआत की गई है। इस योजना के तहत किसानों को प्रति एकड प्रीमीयम राशि 2.5 प्रतिशत सब्जियों मसालों के लिए 750 रूपये प्रति एकड़ व फलों के लिए 1000 रूपये प्रति एकड़ देना होगा। सब्जियों एवं मसालों के लिए न्यूनतम मुआवजा राशि प्रति एकड़ 15,000 रूपये व अधिकतम 30,000/- रूपये तथा फलों के लिए न्यूनतम मुआवजा राशि 20,000 रूपये व अधिकतम 40,000/- रूपये होगी।

योजना में शामिल प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाएं

ओलावृश्टि, तापमान, पाला
ओलावृश्टि, तापमान, पाला जल कारक (बाढ़, बादल फटना, नहर/ड्रेन का टूटना, जलभराव) आंधी तूफान व आग

योजना में शामिल 46 फसलें

सब्जियां सब्जियां (23) फल (21) मसाले (2)
अरबी,भिन्डी,करेला,लौकी,बैंगन,पत्ता गोभी,
शिमला मिर्च,गाजर,गोभी,मिर्च,खीरा,ककड़ी,
खरबूज़,प्याज, मटर,आलू,कद्दू,मूली,तोरइ,
टिंडा,जुकिनी, टमाटर,तरबूज
आँवला,बेर,चीकू,खजूर,ड्रैगन फल,अंजीर,
अंगूर,अमरूद,जामुन,किन्नू,लैमन,नींबू,लीची,
मालटा,संतरा,आम,आड़ू,नाशपाती आलु बुख़ारा,
अनार,स्ट्राबेरी
हल्दी, लेह्सुन

योजना में देय बीमा राशि व प्रीमीयम

फसल बीमा राशि प्रीमीयम राशि (2.5 प्रतिषत)
सब्जियां व मसाले रू. 30,000 प्रति एकड़ रू. 750 प्रति एकड़
फल रू. 40,000 प्रति एकड़ रू. 1,000 प्रति एकड़

योजना में प्रति एकड़ मुआवजा राशि

नुकसान प्रतिशत मुआवजा दर सब्जियां व मसाले (रूपये प्रति एकड़) फल (रूपये प्रति एकड़)
0 से 25 शुन्य शुन्य शुन्य
26 से 51 50 प्रतिशत 15,000 20,000
51 से 75 75 प्रतिशत 22,500 30,000
75 से अधिक 100 प्रतिशत 30,000 40,000

मुआवजा राशि सीधे पंजीकृत किसान के खाते में स्थानान्तरित होगी मुआवजा राशि समिति द्वारा सर्वेक्षण पर आधारित होगी

आधिकारिक वेबसाइट
https://mbby.hortharyana.gov.in/
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प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधिइस योजना के तहत सभी छोटे और सीमांत किसानों को तीन किस्तों में प्रति वर्ष 6,000 रुपये की आय सहायता प्रदान की जाएगी जो सीधे उनके बैंक खातों में जमा की जाएगी। इस योजना पर कुल वार्षिक खर्च 75,000 करोड़ रुपये होने की उम्मीद है जिसे केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित किया जाएगाClick Hereपीएम किसान मान धन योजनाप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा झारखंड के रांची में प्रधानमंत्री किसान मान धन योजना का शुभारंभ किया गया। यह एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जिसे सहयोग एवं किसान कल्याण, कृषि विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और भारत सरकार द्वारा भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के साथ साझेदारी में….Click Hereसक्रिय मछुआरों के लिए समूह दुर्घटना बीमामछली पकड़ने में सक्रिय रूप से लगे मछली किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करना
मछुआरों के निधन के बाद भी उनके परिवार के सदस्यों को गरीबी की बुराइयों से बचाना।….Click Here

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