दूध का बुखार

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दूध का बुखार

दुग्ध ज्वर तब उत्पन्न होता है जब गायें ब्याने के समय पर्याप्त कैल्शियम एकत्र करने में असमर्थ होती हैं। इस पृष्ठ का उद्देश्य डेयरी किसानों के लिए (उप)नैदानिक ​​दूध बुखार को नियंत्रित करने की चुनौती की बेहतर समझ प्रदान करना है। निदान और सलाह के लिए हमेशा अपने पशुचिकित्सक से परामर्श लें।

परिभाषाएं


दुग्ध ज्वर क्या है?

दुग्ध ज्वर, या हाइपोकैल्सीमिया, कैल्शियम की कमी है। इस बीमारी का क्लिनिकल और सबक्लिनिकल रूप होता है और यह तब प्रभावित करता है जब गायें सबसे अधिक असुरक्षित होती हैं – संक्रमण अवधि के दौरान। ब्याने के तुरंत बाद गायों को बड़ी मात्रा में कैल्शियम की आवश्यकता होती है: शुरुआत में वे अपने रक्त से और बाद में अपने आहार और हड्डियों से कैल्शियम लेती हैं। यदि पर्याप्त कैल्शियम जुटाने में असमर्थ है तो प्रभावित जानवर ठीक से खड़ा नहीं हो पाएगा और उसकी भूख कम हो जाएगी जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य और प्रदर्शन खराब हो जाएगा।

 

“यदि आप चाहते हैं कि सूखी गायें पर्याप्त शुष्क पदार्थ का उपभोग करें तो उन्हें पर्याप्त स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना बहुत महत्वपूर्ण है।”

अर्नौट डेकर, पशुचिकित्सक, फ़ाइब्रो

लक्षण


दुग्ध ज्वर के लक्षण

दुग्ध ज्वर, या हाइपोकैल्सीमिया, कैल्शियम की कमी है। हाइपोकैल्सीमिया के दो रूप हैं: क्लिनिकल और सबक्लिनिकल।

नैदानिक दूध बुखार के लक्षण

क्लिनिकल मिल्क फीवर से पीड़ित गाय में गंभीर कैल्शियम की कमी के लक्षण दिखाई देंगे: वह खड़ी नहीं हो पाएगी और छूने पर ठंड महसूस होगी।

उपनैदानिक दूध बुखार के लक्षण

क्लिनिकल हाइपोकैल्सीमिया की तुलना में बहुत अधिक घटना होने के बावजूद, सबक्लिनिकल हाइपोकैल्सीमिया के प्रभावों को अक्सर गंभीर रूप से कम करके आंका जाता है। जबकि एक प्रभावित गाय सामान्य रूप से खड़ी रहने और कार्य करने में सक्षम होगी, वह अंतर्निहित कैल्शियम की कमी के परिणामस्वरूप बहुत कम कुशलता से काम करेगी और बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होगी। मास्टिटिस, गर्भाशय संक्रमण, एंडोमेट्रैटिस और प्लेसेंटा रिटेंशन जैसी समस्याओं की घटनाएं बढ़ जाएंगी।

 

“शोध से पता चलता है कि लगभग 60% गायें सबक्लिनिकल मिल्क फीवर से पीड़ित हैं। इन मामलों को कम करके, डेयरी किसान अपने झुंड के स्वास्थ्य और उत्पादकता को प्रभावी ढंग से बढ़ावा दे सकते हैं।”

हेन्को स्प्लिंटर, डेयरी तकनीकी विशेषज्ञ, फ़ाइब्रो

कारण और प्रभाव


दुग्ध ज्वर से बचाव कैसे करें?

जैसे-जैसे गाय ब्याने के करीब आती है, उसकी कैल्शियम की मांग काफी बढ़ जाती है। अजन्मे बछड़े में हड्डियों की वृद्धि और कोलोस्ट्रम के उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में कैल्शियम की आवश्यकता होती है।
इस मांग को पूरा करने के लिए गाय सबसे पहले अपने खून से कैल्शियम लेती है। क्योंकि यह पर्याप्त नहीं है, गाय को अपने आहार और अपनी हड्डियों से अधिक कैल्शियम जुटाना पड़ता है। अधिकांश समय, गायों को पर्याप्त उपलब्ध कैल्शियम नहीं मिल पाता है, जिससे (उप) क्लिनिकल मिल्क फीवर हो जाता है। सामान्य तौर पर, बड़ी गायें छोटी गायों की तुलना में (उप)नैदानिक ​​दूध बुखार के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं।

दुग्ध ज्वर के परिणाम क्या हैं?

जबकि नैदानिक ​​दूध बुखार घातक हो सकता है, उप-नैदानिक ​​मामलों में दूध उत्पादन में कमी और गाय को पूर्ण स्वास्थ्य में वापस लाने में आने वाली लागत और समय के परिणामस्वरूप गंभीर प्रभाव भी पड़ सकता है। जबकि स्पष्ट लक्षण अनुपस्थित हैं, दुग्ध ज्वर के उपनैदानिक ​​मामले प्रतिरक्षा प्रणाली के कमजोर होने के परिणामस्वरूप मास्टिटिस, बरकरार प्लेसेंटा, एंडोमेट्रैटिस, गर्भाशय संक्रमण और अन्य बीमारियों में वृद्धि का प्रवेश द्वार हो सकते हैं। इसका दूध उत्पादन पर स्पष्ट रूप से हानिकारक प्रभाव पड़ेगा और गाय को पूर्ण स्वास्थ्य में वापस लाने में महत्वपूर्ण समय, ऊर्जा और वित्तीय लागत लग सकती है।

समाधान


दुग्ध ज्वर के मामलों को कम करें

सूखी गायों को खिलाए जाने वाले सभी चारे की मैक्रोमिनरल सामग्री का परीक्षण करके शुरुआत करें। कम पोटेशियम सामग्री वाले चारे का चयन करें। जितना संभव हो सके राशन में पोटेशियम की मात्रा को कम करने के लिए राशन तैयार करें और स्वादिष्ट सामग्री का उपयोग करें।
एनीस्टार्ट(उप)नैदानिक ​​दूध बुखार को कम करने में मदद करता है। ब्याने के दौरान अनुकूलित कैल्शियम चयापचय के परिणामस्वरूप डेयरी गायें अधिक स्वस्थ, अधिक उत्पादक होती हैं।
सूखी गाय के राशन में एनीस्टार्ट जोड़ने से, आपकी गायें अधिक कैल्शियम जुटा सकती हैं और अधिक दूध और कम स्वास्थ्य घटनाओं के साथ अपना अगला स्तनपान शुरू कर सकती हैं।

उपचार


दूध के बुखार का इलाज कैसे करें

डाउनर गायों का उपचार आमतौर पर अंतःशिरा कैल्शियम से किया जाता है। हल्के और संदिग्ध मामलों के समाधान के लिए उपचर्म अनुप्रयोग और मौखिक कैल्शियम फॉर्मूलेशन उपलब्ध हैं। ध्यान दें कि कैल्शियम के ये विभिन्न रूप एक-दूसरे के समतुल्य नहीं हैं। कैल्शियम उपचार में जितना दिखता है उससे कहीं अधिक है; किसी भी अन्य उपचार की तरह, इन्हें केवल पशुचिकित्सक के मार्गदर्शन में ही दिया जाना चाहिए।

अपने झुंड के लिए संक्रमण मूल्यांकन प्राप्त करें

यदि आप इस बारे में अधिक जानना चाहते हैं कि हम आपके झुंड के प्रदर्शन को अनुकूलित करने में कैसे आपकी मदद कर सकते हैं, तो कृपया कॉलबैक का अनुरोध करने के लिए अपना टेलीफ़ोन नंबर सबमिट करें। निम्नलिखित पर चर्चा करने के लिए टेलीफोन या आमने-सामने बैठक की तारीख निर्धारित करने के लिए हम आपको तीन कार्य दिवसों के भीतर कॉल करेंगे:

वर्तमान स्थिति का विश्लेषण

हम आपके झुंड की वर्तमान स्थिति को समझने और सुधार के क्षेत्रों की पहचान करने के लिए आपके साथ काम करेंगे।

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मूल्यांकन

हम यह सुनिश्चित करने के लिए एक विस्तृत समीक्षा करेंगे कि हमारे द्वारा किए गए परिवर्तन प्रभावी ढंग से काम कर रहे हैं और, जहां आवश्यक हो, आपके झुंड को सुधार जारी रखने में सक्षम बनाने के लिए अतिरिक्त सहायता और सलाह प्रदान करेंगे।

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थनैला रोगथनैला रोग (Garget) दुधारू पशुओं में होने वाली एक बीमारी है। यह बीमारी मुख्यतः गाय, भैंस,भेड़ ,बकरी सुअर आदि में होती है जिसमे प्रभावित पशुओं के थन गर्म हो जाते है एवं सूजन बढ़ जाती है । शारीरिक तापमान बढ़ जाता है… Click Here घर में उगने वाली सब्जियां और उनके तरिकेटमाटर गमले में आसानी से उगाई जाने वाली सब्जी है, जिसे लोग कच्चा या पका दोनों रूपों में खाना पसंद करते हैं। घर पर लगाने के लिए आपको टमाटर की कुछ बौनी अर्थात छोटे पौधे वाली किस्मों को चुनना होगा…Click Hereप्रधानमंत्री किसान सम्मान निधिप्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि भारत सरकार के अधीन एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है जो किसानों और उनके परिवारों को आय सहायता प्रदान करती है। पीएम-किसान योजना को पहली बार तेलंगाना सरकार द्वारा रायथु बंधु योजना के रूप में लागू किया गया था..Click Here
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लंगड़ा बुखार 

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  • यह रोग मुख्यतः किसमें पाया जाता है
  • रोग कारक
  • फैलाव का कारण
  • रोग का प्रसार प्रक्षेत्र
  • रोगजनन
  • लक्षण (symptoms)
  • उपचार एवं रोकथाम
  • रोकथाम व नियंत्रण ( prevention and control )

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यह रोग मुख्यतः किसमें पाया जाता है
रोग कारक
फैलाव का कारण
रोग का प्रसार प्रक्षेत्र 
यह रोग मुख्यतः किसमें पाया जाता है

यह रोग मुख्यतः बड़े जानवरों जैसे गाय, भैंस, भेड़ इत्यादि मे देखने को मिलता है। यह एक जीवाणु जनित रोग है। मुख्य रूप से यह गाय मे ज्यादा देखने को मिलता है। यह एक संक्रामक बीमारी है। यह रोग प्रायः सभी स्थानों पर पाया जाता है लेकिन गरम व नम जलवायु वाले प्रदेशों मे ज्यादा पाया जाता है। बरसात के मौसम मे यह रोग ज्यादा फैलता है और इस रोग से मृत्यु दर भी ज्यादा रहती है। यह रोग मुख्यतः जवान जानवरों छह माह से दो साल के पशुओंद्ध मे देखने को मिलता है। किसानबंधु इसे लंगड़ा बुखार के नाम से भी जानते है। इस रोग मे कंधे व पुट्ठे की मांसपेशियों मे गैस भर जाने के कारण सूजन आ जाती है व तेज बुखार और जहरबाद सेप्टिसिमिया के कारण जानवर की मृत्यु हो जाती है। किसानों एवं पशुपालकों को इस रोग की जानकारी के अभाव के कारण बहुत ज्यादा आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है।

रोग कारक

यह एक जीवाणु जनित रोग है जोकि क्लोस्ट्रीडियम चौवाई नामक जीवाणु से होता है। यह एक ग्राम बीजाणु बनाने वाला रॉड के आकार का जीवाणु है। इसके बीजाणु पर्यावरणीय परिवर्तनों और कीटाणुनाशकों के लिए अत्यधिक प्रतिरोधी हैं इस कारण यह जीवाणु कई वर्षों तक मिट्टी में बना रहता है।

फैलाव का कारण

लंगड़ा बुखार एक मृदा जनित संक्रमित रोग है। बीजाणु संक्रमित भोजन खाने से इस रोग के जीवाणु आहारनली के माध्यम से शरीर मे प्रवेश कर जाते है। संक्रमित घाव के कारण भेड़ में भी यह रोग फैलता है उदाहरण के लिए बाल काटते समय त्वचा के घावों का संक्रमण ।

रोग का प्रसार प्रक्षेत्र 

यह रोग प्रायः सभी स्थानों पर पाया जाता है लेकिन गरम व नम जलवायु वाले प्रदेश जैसे कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु इत्यादि जगह पर ज्यादा देखा गया है। देश मे 75% से 80% इस रोग से ग्रसित जानवर मुंबई, हैदराबाद, मैसूरु और चेन्नई मे मिलते है तथा 20% से 25% मामले देश के बाकी जगह मे मिलते है। वर्षा ऋतु मे इस रोग के फैलने की संभावना ज्यादा होती है। इस रोग मे मृत्यु दर भी ज्यादा रहती है। यह रोग गाय, भैंस, भेड़ के साथ.साथ जंगली प्रजातियों जैसे हिरण और एन्टीलोप मे भी देखने को मिलता है।

रोगजनन
लक्षण (symptoms)
उपचार एवं रोकथाम
रोकथाम व नियंत्रण ( prevention and control )
रोगजनन

जानवरों के द्वारा दूषित मिट्टी व संक्रमित चारे आदि को खाने से बीजाणु आहारनली के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं तथा मांसपेशियों तक पहुंचकर कुछ समय तक शांत पड़े रहते हैं बाद में ये बीजाणु अनुकूल परिस्थितियों मे जीवाणुओं को उत्पन्न करते है फिर ये जीवाणु संख्या में लगातार वृद्धि करते रहते हैं। ये मुख्यतः कंधे व पुट्ठे की मांसपेशियों मे पहुँचकर वहाँ इनके द्वारा उत्पन्न किए गए चार प्रकार के टॉक्सिन अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा से मांसपेशियों के रेशे व रक्त नलियां गलने लगतीं है मांसपेशियों के गलने व सड़ने से गैस बनने लगती है तथा रक्त नलियों के गलने से रक्त बाहर आकर त्वचा के नीचे एकत्रित होने लगता है जिसके फलस्वरूप कंधे व पुट्ठे की मांसपेशियों में छलनी जैसे छेद बनने लग जाते हैं साथ ही साथ इनमे गैस भी भरने लगती है। गैस भरी जगह पर हाथ लगाने पर चरचर(crepitating sound) जैसी आवाज उत्पन्न होती है। इस रोग के बीजाणु व जीवाणु आंत में शरीर के दूसरी जगह जैसे जीभ,जबड़े, हृदय व अन्य अंगों की मांसपेशियों में पहुँचकर ऐसी ही स्थिति पैदा कर देते है । इस अवस्था में शरीर में सेप्टिसीमिया हो जाता है और जानवर की मृत्यु हो जाती है।

लक्षण (symptoms)

1. जानवरों मे तेज बुखार (105°F – 107°F)  देखने को मिलता है।

2. जानवर खाना-पीना एवं जुगाली करना बंद कर देता है ।

3. रोगी पशु के कन्धे, गर्दन ,जाँघ अथवा पूठ्ठे पर सूजन आ जाती है तथा इस सूजन वाले हिस्से को दबाने पर चर-चर (crepitating sound) की आवाज  आती है, हालांकि भेड़ों मे कई बार आवाज नही आती है ।

4. जानवर की आँखेँ लाल हो जाती है ।

5. रोगी जानवर अचानक बुरी तरह लंगड़ाने लगता है और उसकी चाल मे अकड़न आ जाती है जिसके साथ ही वह एक स्थान से आगे बढ़ने की कोशिश भी नही करता ।

6. प्रारंभ मे यह सूजन (Necrotizing myositis) गरम व पीड़ादायक होतीं है लेकिन बाद मे ठंडी व पीडारहित होती है । 

7. सूजन मे यदि चीरा लगाया जाये तो उसमे से झागदार काला, दुर्गन्धयुक्त स्राव निकलता है ।

8. अन्त मे पशु का तापमान गिरने लगता है तथा पशु की मृत्यु हो जाती है ।

9. कई बार रोगी पशु बगैर कोई लक्षण दिखाये भी मर सकते है।

उपचार एवं रोकथाम

  • यह एक जीवाणु जनित रोग है। इस रोग का उपचार बहुत जटिल है क्योंकि यह रोग बहुत जल्दी फैलता है अगर सही समय पर पशु चिकित्सक की देखरेख मे उपचार उपलब्ध करा दें तो रोगी जानवर सही हो सकता है ।
  • रोगी पशु को स्वस्थ पशुओ से अलग कर दें ।
  • पशु चिकित्सक द्वारा सूजन वाले भाग को चीरा लगवाकर उसका काला झागदार, बदबूदार रक्त को निकलवा देना चाहिए, परन्तु यह बहुत ही सावधानीपूर्वक व साफ तरीके से करना चाहिए ।
  • इसके अलावा रोगी जानवर को पशु चिकित्सक द्वरा लक्षण आधारित उपचार प्रदान करवाना चाहिए।

रोकथाम व नियंत्रण ( prevention and control )

  • यह रोग एक संक्रामक रोग है इसलिए रोगी जानवर के आस पास रहने वाले सभी जानवर संक्रमित हो सकते है और इस रोग का जीवाणु मिट्टी मे भी रहता है अतः रोगी जानवर को स्वस्थ पशुओ से दूर रखना चाहिये तथा अलग रखकर ही उपचार करना चाहिए।
  • वर्षा ऋतु शुरु होने से पहले जानवरों का टीकाकरण करवाना चाहिए।
  • 3 माह के बाद वाले सभी जानवरों को टीका लगवाना  चाहिए।
  • जानवरों के आवास की सम्पूर्ण रूप से साफ सफाई एवं निस्संक्रामक दवाइयों का उपयोग करना चाहिए।
  • बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए।
  • समय- समय पर पशुचिकित्सकों द्वारा पशुओं की जाँच करवाना चाहिए ।
  • भोजन – पानी एवं दवाइयों का समय के हिसाब से उचित प्रबंधन होना चाहिए ।
  • पशुओं के आवास में नमी, प्रकाश आदि चीजों का सम्पूर्ण रूप से ध्यान रखना चाहिए।

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मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजनाबागवानी फसलों में प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाओं के कारण से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा सरकार द्वारा मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना की शुरुआत की गई है। इस योजना के तहत किसानों को प्रति एकड प्रीमीयम राशि 2.5 प्रतिशत…Click Hereहरियाणा मुख्यमंत्री अंत्योदय दुग्ध उत्पादन सहकारिता प्रोत्साहन योजनाकरनाल में एक रैली को सम्बोधित करते हुवे हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर जी और भारत के गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने अंत्योदय परिवारों के लिए नयी योजनाओं के संचालन …Click Here फसल अवशेष प्रबंधनफसलों की कटाई के बाद कई किसान खेतों में बचे अवशेषों में किसान आग लगा देते हैं पराली के इसी धुएं में लोगों की सांस फूलने लगती है कार्बन के कण वाला यहीं धुआं स्मॉग के रूप में हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, दिल्ली को अपनी जद में ले लेता है…Click Here
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थनैला रोग

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  • थनैला रोग
  • रोग कारक
  • थनैला रोग संक्रमण
  • थनैला रोग लक्षण
  • रोग की पहचान
  • थनैला रोग रोकथाम
  • थनैला रोग का उपचार
  • थनैला रोग के कारण आर्थिक हानियाँ

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थनैला रोग
रोग कारक
थनैला रोग संक्रमण
थनैला रोग के लक्षण
थनैला रोग

थनैला रोग (Garget) दुधारू पशुओं में होने वाली एक बीमारी है। यह बीमारी मुख्यतः गाय, भैंस,भेड़ ,बकरी सुअर आदि में होती है। जिसमे प्रभावित पशुओं के थन गर्म हो जाते है एवं सूजन बढ़ जाती है । शारीरिक तापमान बढ़ जाता है । दूध देने की क्षमता कम हो जाती है । जानवर खाना पीना बंद कर देता है ।

यह बीमारी प्रत्यक्ष रूप में जितना नुकसान करती है उससे कही ज्यादा अप्रत्यक्ष रूप से पशुपालको को आर्थिक नुकसान पहुंचती है ।

रोग कारक

यह बीमारी अनेक कारको के वजह से होती है जैसे की जीवाणु, विषाणु, मोल्ड, फफूंद, यीस्ट आदि इसके अलावा वातावरण प्रतिकूलता के कारण यह रोग होता है ।

थनैला रोग संक्रमण

रोग का प्रमुख कारण साफ सफाई अच्छी तरह से नहीं होना होता है । रोग का संचरण दूषित त्वचा पर जीवाणु का थन की नलिका में प्रवेश करने से होता है । पशु का दूध निकालने वाले ग्वालो द्वारा संक्रमित पशु से स्वस्थ पशु में होता है । थन पर गोबर व कीचड़ संक्रमण का कारण होते है । फर्श की अच्छी तरह से सफाई न होना आदि ।

थनैला रोग के लक्षण

अदृश्य लक्षण :-

 प्रारम्भ में इस रोग में थन व दूध सामान्य प्रतीत होते है परन्तु दूध की कमी, दूध की गुणवत्ता में ह्रास एवं बिसुखने के पश्चात थन आंशिक या पूर्ण रूप से ख़राब हो जाता है ।

दृश्य लक्षण :-

पशुओं के थन में गांठ एवं सूजन आ जाती है । प्रारम्भ में एक या दो थन प्रभावित होते है। लेकिन उपचार न होने पर अन्य सभी थनो में ये रोग फ़ैल जाता है । दूध में खून एवं मवाद दिखने लगता है दूध पानी जैसा दिखाई देने लगता है । कुछ दिनों पश्चात् थन से दूध आना बंद हो जाता है । समय पर उपचार न होने की वजह से सूजन बढ़कर अपरिवर्तनीय हो जाती है ।

रोग की पहचान
थनैला रोग रोकथाम
थनैला रोग का उपचार
थनैला रोग के कारण आर्थिक हानियाँ
रोग की पहचान

बीमारी को पहचानने के लिए निम्न प्रकार के उपाय किये जा सकते है  :-

  • पीएच पेपर द्वारा समय – समय पर जाँच की सकती है ।
  • केलिफोर्निया मास्टायसिस सलूशन के माध्यम से जाँच ।
  • संदेह की स्थिति में दूध कल्चर एवं सीटीभीति जाँच ।

थनैला रोग रोकथाम

    1. दुधारू पशुओं के रहने के स्थान की नियमित साफ सफाई जरुरी है । फिनायल के घोल व अमोनिआ कम्पाउंड का छिड़काव करना चाहिए ।
    2. दूध दोहने के पश्चात् थन की यथोचित सफाई के लिए लाल पोटाश या सेवलॉन का प्रयोग किया जाना चाहिए ।
    3. थनैला होने पर तुरंत पशुचिकित्सक की सलाह से उपचार करना चाहिए ।
    4. दूध दोहन निश्चित अंतराल पर होना चाहिए । दूध दोहन की तकनीक सही होनी चाहिए जिससे थन को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो ।
    5. रोगी पशु को स्वस्थ पशु से अलग कर देना चाहिए ।

थनैला रोग का उपचार

    1. रोग का सफल उपचार प्रारंभिक अवस्थाओं में ही संभव है अन्यथा रोग के बढ़ जाने पर थन ख़राब हो सकते है ।
    2. इस रोग से बचने के लिए दुधारू पशु के दूध की जाँच समय पर करवा लेनी चाहिए ।
    3. जीवाणुनाशक औषधियों के द्वारा उपचार पशुचिकित्सक के द्वारा करवाना चाहिए यह औषधीया थन में चढ़ाकर तथा मासपेशियो में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है ।
    4. थन में ट्यूब चढ़ाकर उपचार के दौरान पशु का दूध पिने योग्य नहीं होता अतः अंतिम ट्यूब के चढ़ाने के बाद ४८ घंटे बाद तक दूध प्रयोग में नहीं लाना चाहिए । उपचार पूर्ण रूप से किया जाना चाहिए ।

थनैला रोग के कारण आर्थिक हानियाँ

थनैला रोग के ग्रस्त पशु के दूध में कोशिका की संख्या बढ़ जाती है नमक बढ़ जाता है । यह दूध मानव उपयोग के लिए अनुप्युक्त होता है । दूध के उत्पादन में ५ से २५ % की गिरावट आ जाती है । थनैला रोग से ग्रसित पशु के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें स्वतंत्र एंटीबायोटिक एवं जीवाणुओं की संख्या अधिक होती है ।

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लंगड़ा बुखार यह रोग मुख्यतः बड़े जानवरों जैसे गाय, भैंस, भेड़ इत्यादि मे देखने को मिलता है। यह एक जीवाणु जनित रोग है। मुख्य रूप से यह गाय मे ज्यादा देखने को मिलता है। यह एक संक्रामक बीमारी है। यह रोग प्रायः सभी स्थानों पर पाया जाता है लेकिन गरम व नम जलवायु वाले प्रदेशों मे ज्यादा पाया जाता है बरसात के मौसम मे यह रोग ज्यादा फैलता है और इस रोग से मृत्यु दर भी ज्यादा रहती है…Click Here चाय की फसलभारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है। दरअसल, साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती की जाती है इससे पूर्व चाय की खेती सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों में ही की जाती थी। लेकिन, अब यह पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर मैदानी इलाकों तक पहुंच चुकी है…Click Hereखुरपका मुँहपका रोगखुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है, खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसान दायक होती है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु से होता है। यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलने वाला रोग है, तथा कुछ समय में एक झुंड या पूरे गाँव के अधिकतर पशुओं को संक्रामित कर देता है…Click Here
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गलघोटू रोग के लक्षण बचाव एवं निदान

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  • परिचय
  • गलघोटू रोग कारक
  • गलघोटू रोग संक्रमण
  • गलघोटू रोग लक्षण
  • गलघोटू रोग की रोकथाम
  • गलघोटू रोग से बचाव
  • हेमोरेजिक सेप्टिसेमिया टीकाकरण
  • टीकाकरण अनुसूची
  • गलघोटू रोग का उपचार

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परिचय
गलघोटू रोग कारक
गलघोटू रोग संक्रमण
गलघोटू रोग लक्षण
गलघोटू रोग की रोकथाम
परिचय

गलघोटू (Hemorrhagic Septicemia ) एक घातक संक्रामक बीमारी है जो मुख्यत: गाय भैंस में मानसून के मौसम के दौरान होती है साधारण भाषा में गलघोटू रोग “घुरखा” , ” घोटुआ ” , ” डहका ” आदि के नाम से जाना जाता है । यह रोग भेड़,बकरियों एवं सूअरों को प्रभावित करता है ।

पशुओ के इस रोग में पशुपालको को अत्याधिक नुक्सान का सामना करना पड़ता है । गलघोटू रोग के कारण पशुओ की मृत्यु दर अधिक होती है यह रोग छह से दो वर्ष की आयु के जानवरो में होती है ।

गलघोटू रोग कारक

यह रोग ‘पस्तुरिल्ला मल्टोसीदा” नामक जीवाणु से होता है  गलघोटू रोग का जीवाणु अधिक आद्रता वाले मौसम में सक्रिय होता है और यह 2 से ३ सप्ताह तक मिट्टी एवं घास में सक्रिय रह सकता है ।

गलघोटू रोग संक्रमण

यह रोग अस्वस्थ पशु से स्वस्थ पशु में उनके सांस एवं स्त्राव से फैलता है । ख़राब पानी एवं संक्रमित भोजन कराने से पशुओ को यह बीमारी लग जाती है ।

गलघोटू रोग लक्षण

गलघोटू रोग में अचानक से तेज़ बुखार {१०३ -१०५ } हो जाता है ठण्ड लगने लगती है अत्यधिक लार का बहना , आँखों में सूजन आना , गले में सूजन होने से सास लेते समय दर्द होता है पशु खाना पीना बंद कर देता और पशु सुस्त हो जाता है समय पर इलाज न होने की वजह से पशु की मृत्यु हो जाती है । नैदानिक संकेतो के शुरुआत में 6 से ४८ घंटो के बाद पशु की मृत्यु हो सकती है ।

गलघोटू रोग की रोकथाम

  • गलघोटू रोग की पुख्ता जांच होने पर सर्वप्रथम संदेहात्मक वस्तु जैसे की दुघ एकत्र करने का पात्र, वाहन एवं अन्य यन्त्र को हल्के अम्ल क्षार या जीवाणु नाशक द्रव्य से साफ़ करना चाहिए ।
  • प्रभावित क्षत्रो में वाहनों एवं पशु की आवाजाही पूर्णतयः रोक देना चाहिए ।
  • अस्वस्थ पशु को स्वस्थ पशुओ से अलग स्थान पर रखना चाहिए ताकि रोग स्वस्थ पशुओ में ना फ़ैल सके।
  • गाय एवं भैस इस रोग के प्रति अधिक संवेदनशील है ।
  • पशु आवास को स्वच्छ रखें रोग की संभावना होने पर तुरंत पशुचिकित्सक से संपर्क करें ।
  • ०.५ % फिनाइल को १५ मिनट तक रखने पर इस रोग के जीवाणु मर जाते है ।
  • जिस स्थान पर पशु मरा हो उस स्थान को कीटनाशक दवाइयों से धोना चाहिए ।

गलघोटू रोग से बचाव
हेमोरेजिक सेप्टिसेमिया टीकाकरण
टीकाकरण अनुसूची
गलघोटू रोग का उपचार
गलघोटू रोग से बचाव

  • इस रोग से बचाव करने के लिए पशुओ का टीकाकरण एक मात्र उपाय है वर्षा ऋतू से दो महीने पूर्व {मई – जून } में टीका लगा देना चाहिए ।
  • पशुओ को उचित मात्रा में जगह प्रदान करें ।
  • एक ही बाड़े में जरुरत से अधिक जानवर न रखें ।
  • बाड़े को सूखा एवं साफ़ रखें ।

हेमोरेजिक सेप्टिसेमिया टीकाकरण

Haemorrhagic Septicaemia टीकाकरण करने से यह रोग बरसात के मौसम में नहीं फैलता,
Italian Trulli
टीकाकरण से यह रोग नियंत्रित किया जा सकता है । एक बार टीकाकरण से पशु में छह महीने से
एक साल तक प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है । यह वैक्‍सीन बाजार में रक्षा एच .एस,
रक्षा एच.एस + बी.क्यू एवं रक्षा त्रयोवेक
नाम से उपलब्ध है । गाय तथा भैंस में मे वैक्‍सीन की
2 मिली मात्रा  त्वचा के नीचे दी जाती हैैै ।

टीकाकरण अनुसूची

पहली खुराक –  महीने की आयु के जानवरो को 
बूस्टर खुराक – प्रथम टीकरण के 6 महीने बाद
पुनः टीकाकरण – वार्षिक

गलघोटू रोग का उपचार

एंटीबायोटिक संवेदनशीलता परिक्षण विशेष रूप से आवश्यक है जिसके बाद ही पशु में एंटीबायोटिक दिया जाना चाहिए । पेनिसिलिन, अमोक्सीसीलीन, टेट्रासाइक्लिन आदि इस रोग के लिए प्रभावी एंटीबायोटिक दवा है ।

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खुरपका मुँहपका रोगखुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है, खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसान दायक होती है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु से होता है। यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलने वाला रोग है, तथा कुछ समय में एक झुंड या पूरे गाँव के अधिकतर पशुओं को संक्रामित कर देता है…Click Here चाय की फसलभारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है। दरअसल, साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती की जाती है। इससे पूर्व चाय की खेती सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों में ही की जाती थी। लेकिन, अब यह पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर मैदानी इलाकों तक पहुंच चुकी है…Click Here देशी तरीकों से घर पर कर सकते हैं पशुओं का उपचारकई बार पशुओं के बीमार होने पर जल्दी पशु चिकित्सक नहीं उपलब्ध हो पाते हैं पशुपालक मेडिकल स्टोर से दवाएं लाकर पशुओं को देता है जोकि महंगे तो होते हैं लेकिन कई बार इलाज नहीं हो पाता है । कई बार तो पशुपालक को नुकसान भी उठाना पड़ जाता है जबकि पशुपालक घर बैठे कुछ घरेलू उपचार अपनाकर अपने पशुओं को ठीक कर सकते हैं…Click Here
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खुरपका मुँहपका रोग

Table Of Content

  • परिचय
  • रोग के लक्षण
  • रोकथाम के उपाय
  • रोग जांच हेतु नमूनें/ पदार्थ
  • खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के लिये किट
  • उपचार
  • किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या करें ?
  • किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या नहीं करें ?

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परिचय
रोग के लक्षण
रोकथाम के उपाय
रोग जांच हेतु नमूनें/ पदार्थ
परिचय

खुरपका मुंहपका रोग (एफ.एम.डी) गाय, भैस, मिथुन, हाथी इत्यादि में होने वाला एक अत्याधिक संकामक रोग है खासकर दुधारू गाय एवं भैस में यह बीमारी अधिक नुकसानदायक होती है। यह रोग एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु से होता है यह पशुओं में अत्याधिक तेजी से फैलने वाला रोग है तथा कुछ समय में एक झुंड या पूरे गाँव के अधिकतर पशुओं को संक्रामित कर देता है। इस रोग से पशुधन उत्पादन में भारी कमी आती है साथ ही देश से पशु उत्पादों के निर्यात पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस बीमारी से अपने देश में प्रतिवर्ष लगभग 20 हजार करोड़ रूपये की प्रत्यक्ष नुकसान होता है |

रोग के लक्षण

 

इस रोग के लक्षण नीचे लिखे हैं :-

तीव्र ज्वर (102-105 फ.) साधारणतः युवा पशु में जानलेवा होता है परंतु वयस्क पशु में नहीं। पशुओं की मृत्यु प्राय: गलघोटु रोग होने से होती है (गलघोटु रोग से बचाने के लिए अपने पशुओं को बरसात से पहले इसका टीका अवश्य लगवाएं )

  • मुँह से अत्यधिक लार का टपकना (रस्सी जैसा)
  • जीभ तथा तलवे पर छालों का उभरना जो बाद में फट कर घाव में बदल जाते हैं।
  • जीभ की सतह का निकल कर बाहर आ जाना एवं थूथनों पर छालों का उभरना।
  • खुरों के बीच में घाव होना जिसकी वजह से पशु का लंगड़ा कर चलना या चलना बंद कर देता है। मुँह में घावों कि वजह से पशु भोजन लेना तथा जुगाली करना बंद कर देता है एवं कमजोर हो जाता है।
  • दूध उत्पादन में लगभग 80 प्रतिशत की कमी, गाभिन पशुओं के गर्भपात एवं बच्चा मरा हुआ पैदा हो सकता है।
  • बछड़ों में अत्याधिक ज्वर आने के पश्चात बिना किसी लक्षण की मृत्यु होना।

रोकथाम के उपाय

इस रोग का उपचार अब तक संभव नहीं हो सका है इसलिए रोकथाम ही सबसे कारगर नियंत्रण का उपाय है। सभी किसान/ पशुपालक को अब इस रोग के प्रति जागरूकता दिखाने की आवश्यकता है तभी इस रोग का रोकथाम संभव है।

  • पशुपालकों को अपने सभी पशुओं (चार महीने से ऊपर) को टीका/भेद लगवाना चाहिए। प्राथमिक टीकाकरण के चार सप्ताह के बाद पशु को बूस्टर/वर्धक खुराक दिया जाना चाहिए और प्रत्येक 6 महीने में नियमित टीकाकरण करना चाहिए।
  • नये पशुओं को झुंड या गाँव में मिश्रित करने से पूर्व सिरम से उसकी जाँच आवश्यक है। केन्द्रीय प्रयोगशाला मुक्तेश्वर, उत्तराखंड एवं एआइसीआरपी हैदराबाद, कोलकत्ता, पुणे, रानीपेत, शिमला एवं तिरुवनंतपुरम केन्द्रं पर इसकी जाँच की सुविधा उपलब्ध है। इन नए पशुओं को कम से कम चौदह दिनों तक अलग बाँध कर रखना चाहिए तथा भोजन एवं अन्य प्रबन्धन भी अलग से ही करना चाहिए।
  • पशुओं को पूर्ण आहार देना चाहिए जिससे खनिज एवं विटामीन की मात्रा पूर्ण रूप से मिलती रहे।

रोग जांच हेतु नमूनें/ पदार्थ

मुँह,खुर एवं छिमी का घाव,लाव,दूध इत्यादि को निकटतम प्रयोगशाला को वर्फ में रखकर जाँच हेतु जल्द से जल्द भेंजे या निकटतम केंद्र पर तुरंत सूचित करें। यदि संभव हुआ तो मुँह,खुर व छिमी के घाव को 50 % बफर ग्लिसरीन में रखकर भेंजे।

खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के लिये किट
उपचार
किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या करें ?
किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या नहीं करें ?
खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के लिये किट

भारत में विकसित खुरपका मुँहपका रोग की जाँच के उपयोग में आने वाली किट

उपचार

मुँह में बोरो ग्लिसेरीन (850 मिली ग्लिसेरीन एवं 120 ग्राम बोरेक्स) लगाए। शहद एवं मडूआ या रागी के आटा को मिलाकर लेप बनाएँ एवं मुँह में लगाएँ। डॉक्टर के परामर्श पर ज्वरनाशी एवं दर्दनाशक का प्रयोग करे एवं जिस पशु के मुँह, खुर एवं छिमी में घाव हो उसको 3 या 5 दिन तक प्रतिजैविक जैसेकि डाइक्रिस्टीसीन या ऑक्सीिटेटरासाइकलीन की सुई लगाए। खुर के घाव में हिमैक्स या नीम के तेल का प्रयोग करें जिससे की मक्खी नहीं बैठे क्योंकि मक्खी के बैठने से कीड़े होते हैं। कीड़ा लगने पर तारपीन तेल का उपयोग करें इसके अलावा मड़ूआ या रागी एवं गेहूँ का आटा, चावल के बराबर की मात्रा को पकाकर तथा उसमें गुड़ या शहद, खनिज मिश्रण को मिलाकर पशु को नियमित दें साथ ही साथ अपने पशुओं को प्रोटीन भी दें।

किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या करें ?

  • निकटतम सरकारी पशुचिकित्सा अधिकारी को सूचित करें।
  • प्रभावित पशुओं के रोग का पता लगने पर तुरंत उसे अलग करें।
  • दूध निकालने के पहले आदमी को अपना हाथ एवं मुँह साबुन से धोना चाहिए तथा अपना कपड़ा बदलना चाहिए क्योंकि आदमी से बीमारी फैल सकता है।
  • बीमारी को फैलने से बचाने के लिए पूरे प्रभावित क्षेत्र को 4 प्रतिशत सोडियम कोर्बोनेट (NaCC) घोल (400 ग्राम सोडियम कार्बोनेट 10 लीटर पानी में) या 2 प्रतिशत सोडियम हाइड्राक्साइड (NaOH) से दिन में दो बार धोना चाहिए एवं इस प्रक्रिया को दस दिन तक दोहराना चाहिए।
  • स्वस्थ एवं बीमार पशु को अलग-अलग रखना चाहिए।
  • बीमार पशुओं को स्पर्श करने के बाद व्यक्ति को 4 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट घोल के साथ खुद को, जूते एवं चप्पल, कपड़े आदि धोने चाहिए।
  • समाज को यह करना चाहिए कि दूध इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल किये बर्तन एवं दूध के डिब्बे को 4 प्रतिशत सोडियम कोर्बोनेट घोल से सुबह और शाम धोने के बाद ही उन्हें गांव से अंदर या बाहर मेजना चाहिए।
  • संकमित गांव के बाहर 10 फिट चौड़ा बलीचिंग पाउडर का छिड़काव करना चाहिए।पशुचिकित्सक को चाहिए की प्रारंभिक चरण के प्रकोप में बचे पशुओं में, संक्रमित गांव/क्षेत्र के आसपास, रोग के आगे प्रसार को रोकने के लिए वृत्त टीकाकरण (टीकाकरण की शुरूआत स्वस्थ पशुओं में बाहर से अंदर की ओर) करना चाहिए तथा टीकाकरण के दौरान प्रत्येक पशु के लिए अलग-अलग सुई का प्रयोग करें तथा इस दौरान बीमार पशु को नही छुएं।टीकाकरण के 15 से 21 दिनों के बाद ही पशुओं को गांव में लाना चाहिए।
  • इस प्रकोप के शांत होने के बाद इस प्रकिया को एक महीने तक जारी रखा जाना चाहिए।

किसी एक गांव/क्षेत्र में खुरपका मुँहपका रोग प्रकोप के समय क्या नहीं करें ?

  • सामुहिक चराई के लिए अपने पशुओं को नहीं भेजें. अन्यथा स्वस्थ पशुओं में रोग फैल सकता है।
  • पशुओं को पानी पीने के लिए आम स्रोत जैसेकि तालाब, धाराओं, नदियों से सीधे उपयोग नहीं करना चाहिए इससे बीमारी फैल सकती है | पीने के पानी में 2 प्रतिशत सोडियम बाइकार्बोनेट घोल मिलाना चाहिए।
  • लोगों को गांव के बाहर आने-जाने के द्वारा रोग फैल सकता है।
  • लोगों को ज्यादा इधर उधर नहीं घूमना चाहिए वे स्वस्थ पशुओं के साथ संपर्क में नहीं जाएं तथा खेतों एवं स्थानों पर जहाँ पशुओं को रखा जाता है वहाँ जाने से उन्हें बचना चाहिए।
  • प्रभावित क्षेत्र से पशुओं की खरीदी न करें।

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चाय की फसलभारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है दरअसल साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती की जाती है। इससे पूर्व चाय की खेती सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों में ही की जाती थी लेकिन अब यह पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर मैदानी इलाकों तक पहुंच चुकी है। दुनिया में भारत चाय उत्पादन के संदर्भ में दूसरे स्थान पर है। विश्व की लगभग 27 फीसद चाय का उत्पादन भारत..Click Hereदुधारू पशुओं के प्रमुख रोग व उनका उपचारदुधारू पशुओं में अनेक कारणों से बहुत सी बीमारियाँ होती है| सूक्ष्म विषाणु, जीवाणु, फफूंदी, अंत: व ब्रह्मा परजीवी, प्रोटोजोआ, कुपोषण तथा शरीर के अंदर की चयापचय (मेटाबोलिज्म) क्रिया में विकार आदि प्रमुख कारणों में है| इन बीमारियों में बहुत सी जानलेवा बीमारियां है था कई बीमारियाँ पशु के उत्पादन पर कुप्रभाव डालती है…Click Hereभावान्तर भरपाई योजना का संक्षिप्त विवरणमण्डी में सब्जी व फल की कम कीमत के दौरान किसानों का निर्धारित संरक्षित मूल्य द्वारा ज़ोखिम को कम करना।
कृषि में विविधिकरण के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना…Click Here

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