भूमि: मसूर की खेती हल्की भूमियों में अच्छी होती है, मसूर के लिए बलुई दोमट एवं बलुई भूमि उत्तम होती है, भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए |

तापमान: मसूर की बिजाई के लिए मुख्यतया 18-30 डिग्री C तापमान होना चाहिए |

उचित समय: 15 अक्टूबर से 30 नवम्बर के बिच का समय बढ़िया माना जाता है |

भूमि की तेयारी: मृदा की उर्वरता एवं उत्पादन के लिये उपलब्ध होने पर 15 टन अच्छी सडी गोबर की खाद व 20 कि.ग्रा. नत्रजन तथा 50 कि.ग्रा. स्फुर / हें. एवं 20 कि.ग्रा./ हें. पोटास का प्रयोग करना चाहिये।

उच्चतम वैरायटी: एलएल-147, पंत एल-406, पंत एल-639, समना, एलएच 84-8, एल-4076, शिवालिक, पंत एल-4, प्रिया, डीपीएल-15, पंत लेंटिल-5, पूसा वैभव और डीपीएल-62

बीज उपचार: बीज जनित रोगों से बचाव के लिये 2 ग्राम थाइरम +1 ग्राम कार्वेन्डाजिम से एक किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बोआई करनी चाहियें।

बिजाई का तरीका: मोठ की बुवाई पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 30 सेंटीमीटर रखते हुए करनी चाहिए तथा पौधों से पौधों की दूरी 15 से.मी. उचित है |

बिजाई: बिजाई के समय भूमि और पानी के अनुसार बीज का चयन करे | बिजाई के समय 9 से 12 Kg बीज में की बिजाई करें|

सिंचाई: यह फसल असिंचित अवस्था में बोई जाती है ताल क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में वर्षा न होने पर अधिक उपज लेने के लिए बुआई के 40-45 दिन बाद व फली में दाना पड़ते समय सिंचाई करना लाभप्रद रहता है  |

खरपतवार नियंत्रण: इसकी पहली गुड़ाई 45 से 60 दिन बाद की जाती है, तथा बाद खेत में खरपतवार दिखाई देने पर गुड़ाई करनी होती है|

रोग नियंत्रण: मसूर में फली छेदक कीट पत्ती छेदक एवं माहों का प्रकोप होता है इसके लिए मोनो क्रोटोफॉस 1 मिली लिटर लिटर पानी में या मैटासिटाक्स 15 मिली  लिटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें|

अब फसल पकने का इंतजार करें – मसूर की कटाई उस समय करें जब यह हरे से भूरे रंग की होने लगे. कटाई सुबह-सुबह उस समय करना चाहिए जब मौसम में नमी रहती है. इससे बीज कम झड़ता है और उत्पादन अच्छा होता है. बीज कटाई के बाद खलिहान में मसूर को अच्छी तरह सुखाने के बाद डंडों से पीटकर बीज को निकालना चाहिए|