भूमि: आलू की खेती में कार्बनिक तत्वों से भरपूर उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसकी खेती के लिए उचित जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है | सामान्य P.H. मान वाली भूमि में इसकी खेती आसानी से की जा सकती है | समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु आलू की फसल के लिए उचित मानी जाती है | भारत में इसकी खेती सर्दियों के मौसम में की जाती है, किन्तु सर्दियों में गिरने वाला पाला इसके पौधों को हानि पहुँचाता है |

तापमान: इसके लिए दिन का तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस और रात का तापमान 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तक होनी चाहिए। वहीं कंद बनने के समय 20 से 25 डिग्री सेल्सियस ज्यादा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि इससे ज्यादा तापमान होने पर कंदों का विकास रूक जाता है।

उचित समय: 20 सितम्बर से 05 नवम्बर के बीच का समय बढ़िया माना जाता है |

भूमि की तेयारी: भूमि की अच्छे से गहरी बुवाई करके उसमे पानी दे | पानी देने के बाद भूमि में 50-60 टन रूढ़ी की खाद डालकर या 100 Kg नत्रजन, 40 Kg फोस्फोरस और 40 kg पोटाश प्रति/है. डालकर दोबारा से बुवाई करे | बुवाई के लिए कुल्तिवेटर – तोई – हेरो इत्यादी का इस्तेमाल करें |

उच्चतम वैरायटी: कुफरी अलंकार, कुफरी बहार 3792 E, कुफरी बादशाह, कुफरी स्वर्ण, E 4,486, JF 5106  |

बीज उपचार : आलुओं के सही अंकुरन के लिए उन्हें जिबरैलिक एसिड 1 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर एक घंटे के लिए उपचार करें। फिर छांव में सुखाएं और 10 दिनों के लिए हवादार कमरे में रखें। फिर काटकर आलुओं को मैनकोजेब 0.5 प्रतिशत घोल (5 ग्राम प्रति लीटर पानी) में 10 मिनट के लिए भिगो दें। इससे आलुओं को शुरूआती समय में गलने से बचाया जा सकता है। आलुओं को गलने और जड़ों में कालापन रोग से बचाने के लिए साबुत और काटे हुए आलुओं को 6 प्रतिशत मरकरी के घोल (टैफासन) 0.25 प्रतिशत (2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी) में डालें।

बिजाई का तरीका: गाजर की बुवाई मेड़ों पर की जाती है। इसके लिए 8-10 इंच गहरी खालिया बनाये | मेड़ों और पौधों की आपसी दूरी क्रमषः 60 सेमी. 40 सेमी. रखना चाहिए।

बिजाई: बिजाई के समय भूमि और पानी के अनुसार बीज का चयन करे | बिजाई के लिए छोटे आकार के आलू 8-10 क्विंटल, दरमियाने आकार के 10-12 क्विंटल और बड़े आकार के 12-18 क्विंटल प्रति एकड़ के लिए प्रयोग करें।

सिंचाई : आलू की फसल में खाद व उर्वरक का प्रयोग अधिक होने से इसे काफी पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए इसकी रोपनी के 10 दिन बाद परन्तु 20 दिन के अंदर ही प्रथम सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। ऐसा करने से अकुरण शीघ्र होगा तथा प्रति पौधा कंद की संख्या बढ़ जाती है जिसके कारण उपज में दोगुनी वृद्धि हो जाती है। इसकी दो सिंचाई के बीच 20 दिन से ज्यादा अंतर नहीं रखना चाहिए। वहीं खुदाई के 10 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। ऐसा करने से खुदाई के समय कंद स्वच्छ निकलेंगे।

मिट्टी चढ़ाना : रोपनी के 30 दिन बाद दो पंक्तियों के बीच में यूरिया का शेष आधी मात्रा यानि 165 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालकर कुदाली से मिट्टी बनाकर प्रत्येक पंक्ति में मिट्टी चढ़ा देना चाहिए। फिर कुदाली से हल्का थप-थपाकर दबा देना चाहिए ताकि मिट्टी में पकड़ बनी रहे।

खरपतवार नियंत्रण: आलू के खेत में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए रासायनिक और प्राकृतिक दोनों ही विधियों का इस्तेमाल किया जाता है | रासायनिक विधि द्वारा खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए पेंडामेथालिन की उचित मात्रा का छिड़काव बीज रोपाई के पश्चात किया जाता है | इससे खरपतवार कम मात्रा में खेत में जन्म लेती है | प्राकृतिक विधि में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए निराई – गुड़ाई की जाती है | इसकी पहली गुड़ाई बीज रोपाई के तक़रीबन 20 से 25 दिन बाद की जाती है | आलू के पौधों को दो से तीन गुड़ाई की ही आवश्यकता होती है | जिसमे पहली गुड़ाई के बाद बाकी की गुड़ाइयो को 15 से 20 दिन बाद करना होता है

उर्वरक : जब फसल 60-65 दिनों की हो जाए तो 30 किलोग्राम यूरिया का प्रयोग कर सकते हैं |

खरपतवार : प्याज में खरपतवार की अधिकता होने से तमाम तरह के रोग और कीट लगते हैं. इसलिए प्याज में समय रहते हाथ की सहायता से पतली खुरपी यंत्र से खरपतवार को निकाल देना चाहिए. प्याज की फसल को खरपतवार से मुक्त रखने पर प्याज के कंद का साइज भी बढ़ता है |

रोग नियंत्रण :

चेपा  : चेपे के हमले को चैक करने के लिए अपने इलाके के समय अनुसार पत्तों को काट दें। यदि चेपे या तेले का हमला दिखे तो इमीडाक्लोप्रिड 50 मि.ली. या थायामैथोक्सम 40 ग्राम प्रति एकड़ 150 लीटर पानी की स्प्रे करें।

कुतरा सुंडी: यदि इसका हमला दिखे तो क्लोरपाइरीफॉस 20 प्रतिशत ई सी 2.5 मि.ली. को प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें।

पत्ते खाने वाली सुंडी : यदि खेत में इसका हमला दिखे तो क्लोरपाइरीफॉस या प्रोफैनाफॉस 2 मि.ली. या लैंबडा साइहैलोथ्रिन 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें।

आलू का कीड़ा : बीज सेहतमंद और बीमारी मुक्त प्रयोग करें। पूरी तरह गली रूड़ी की खाद ही प्रयोग करें। यदि हमला दिखे तो कार्बरिल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की स्प्रे करें।

चितकबरा रोग : इसकी रोकथाम के लिए मैटासिसटोक्स या रोगोर 300 मि.ली. को प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 

अब फसल पकने का इंतजार करें – आलू की फसल में जमीन के अंदर होती है आलू की कटाई की जगह पर किसानों को इसकी खुदाई करनी पड़ती है। अतः किसानों को फसल पकने के 15 दिन पहले ही सिंचाई बंद कर देनी चाहिए और आलू की खुदाई से पहले पत्तियों को 5 से 10 दिन पहले काट देनी चाहिए। इससे आलू की त्वचा मजबूत हो जाती है।

आलू की खुदाई के बाद आलू को 3 से 4 दिन के लिए किसी छायेदार जगह पर ही रखें ताकि छिलके और भी मजबूत हो जाएं और आलू में लगी मिट्टी भी सूखकर अगल हो जाए।