Pink Boll Worm (गुलाबी सुंडी)

पिंक बॉलवॉर्म एशिया का मूल निवासी है, लेकिन दुनिया के अधिकांश कपास उगाने वाले क्षेत्रों में एक आक्रामक प्रजाति बन गई है। भारत के कई क्षेत्रों में कपास पर गुलाबी सुंडी एक प्रमुख कीट के रूप में उभर कर आती रही  है। कपास में कपास के सबसे बड़े दुश्मन पिंक बॉल वार्म (Pink Boll worm) यानी गुलाबी सुंडी कीट के आक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है। यह इल्ली कपास के बीजों को खाकर आर्थिक हानि पहुँचाती है। गुलाबी इल्ली का प्रकोप फसल के मध्य तथा देर की अवस्था में होता है। गुलाबी सुंडी की लटें फलीय भागों के अंदर छुपकर तथा प्रकाश से दूर रहकर नुकसान करती हैं जिसके कारण इस कीट से होने वाले नुकसान की पहचान करना कठिन होता है, और फसल को अधिक नुकसान होता है। फसल का सीजन बदलने के बाद किसानों को लगता है कि अब सूंडी का प्रकोप खत्म हो चुका है। लेकिन केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान गुलाबी सूंडी का कीड़ा पूरी तरह नहीं मरता है | यह लकड़ियों और खराब टिंडों में शांत होकर छिप जाता है कीड़ा, सीजन आने पर जागता है | गुलाबी सूंडी का कीड़ा 2 किलोमीटर तक उड़कर जा सकता है। तो आइये जानते है इसके  लक्षण, जीवन चक्र, नुकसान और उसकी रोकथाम के बारे में:-

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Mealybug (मिलीबग)

मिलीबाग Pseudococcidae फैमिली का insect है , यह गरम और नमी वाले जलवायु में पाया जाता है । मिलीबग की 200 से भी ज्यादा प्रजातियाँ पायी जाती हैं पर ज़्यादातर एक जैसी ही दिखती हैं । मादा मिलीबग और नर मिलीबग की बनावट में पर्याप्त अंतर पाया जाता है । मादा जहां आकार में बड़ी होती है नर आकार में प्रायः छोटे ही होते हैं । मादा के पंख नही होते जबकि नर के पंख होते हैं , इसके अलावा मादा पैर होने के कारण Move कर सकती है जबकि नर के पैर नही होते हैं । कुछ प्रजातियाँ अंडे देती हैं जबकि कुछ Direct बच्चों को जन्म देती हैं । यह एक बार में सैकड़ों अंडे दे सकती हैं इसीलिए यदि इन पर control नहीं किया गया तो इनकी संख्या बहुत तेज़ी से फैलता है । लक्षण कीटों के समूह से बना सफ़ेद रुई जैसा गुच्छा पत्तियों, तनों, फूलों तथा फलों के निचले हिस्से पर दिखाई देता है। ये बहुत अधिक सक्रिय होते हैं। संक्रमण के कारण पत्तियों का पीला पड़ना तथा मुड़ना, पौधों में अवरुद्ध विकास तथा फलों का समय से पहले गिरना देखा गया है। | तो आइये जानते है इसके  लक्षण, जीवन चक्र, नुकसान और उसकी रोकथाम के बारे में:-

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कद्दू (Pumpkin)

भूमि: कद्दू की खेती को करने के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ मिट्टी  की आवश्यकता होती है | कद्दू की फसल की अच्छी वृद्धि के लिए गर्म और आद्र दोनों ही जलवायु को उपयुक्त माना जाता है | इसकी फसल में अधिक पानी की आवश्यकता होती है, किन्तु अधिक जलभराव वाली भूमी को इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है | कद्दू की अच्छी फसल के लिए जमीन का P.H. मान 5 से 7 के मध्य होना चाहिए | 

तापमान: तकरीबन 25 से 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान में इसके पौधे अच्छे से विकास करते हैं।

उचित समय: कद्दू की खेती साल में दो बार की जा सकती है। खरीफ में बुवाई का समय जून – जुलाई और जायद में बुवाई का समय जनवरी – फ़रवरी होता है।

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खीरा (Cucumber)

भूमि: खीरे को रेतीली दोमट व भारी मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, लेकिन इसकी खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई एवं दोमट मिट्टी में अच्छी रहती है। खीरे की खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 6-7 के बीच होना चाहिए। इसकी खेती उच्च तापमान में अच्छी होती है।

तापमान: इसके लिए 25-35 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान अच्छा माना जाता है।

उचित समय: टिंडा की खेती साल में दो बार की जा सकती है। इसे फरवरी से मार्च और जून से जुलाई तक इसकी बुवाई कर सकते हैं।

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जई(Jaee)

भूमि : जई सभी प्रकार की कृषि योग्य भूमि में पैदा हो सकती है | यह हर तरह की मिट्टी में उगाई जाती है। अच्छे जल निकास वाली चिकनी रेतली मिट्टी, जिस में जैविक तत्व हों, जई की खेती के लिए उचित मानी जाती है। जई की खेती के लिए 5-6.6 पी एच वाली मिट्टी बढ़िया होती है।

तापमान : जई की बिजाई के लिए मुख्यतया 20-25 डिग्री C तापमान होना चाहिए।

उचित समय : 20 अक्टूबर से 10 नवम्बर के बिच का समय बढ़िया माना जाता है।

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