घर में उगने वाली सब्जियां और उनके तरिके

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  • परिचय
  • टमाटर
  • बीन्स
  • बैंगन
  • प्याज
  • पत्ता गोभी

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परिचय
टमाटर
बीन्स
बैंगन
प्याज
परिचय

आप अपने होम गार्डन या टेरिस गार्डन के गमलों में आगे बताई गई सब्जियां आसानी से लगा सकते हैं।
आइये जानते हैं, गमले या ग्रो बैग में उगने वाली सब्जियां कौन-कौन सी हैं तथा गमले में उगाई जाने वाली वेजिटेबल्स के नाम क्या हैं :-

  1. टमाटर (Tomato)
  2. बीन्स (Beans)
  3. बैंगन (Eggplant)
  4. सलाद पत्ता (Lettuce)
  5. प्याज (Onion)
  6. मिर्च (Chili)
  7. मूली (Radish)
  8. पालक (spinach)
  9. भिन्डी (okra)
  10. पत्ता गोभी (cabbage)

टमाटर

 

वानस्पतिक नाम – सोलनम लाइकोपर्सिकम (Solanum Lycopersicum)

टमाटर गमले में आसानी से उगाई जाने वाली सब्जी है, जिसे लोग कच्चा या पका दोनों रूपों में खाना पसंद करते हैं। घर पर लगाने के लिए आपको टमाटर की कुछ बौनी अर्थात छोटे पौधे वाली किस्मों को चुनना होगा, जो कि छोटे पॉट में ठीक तरह से उग जाएं। टमाटर के पौधे को पूर्ण सूर्य प्रकाश में, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में लगाना चाहिए। इस पौधे को अच्छी तरह उगने के लिए नियमित रूप से पानी तथा खाद दें।

गमले का आकार :- 

  • 12 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

टमाटर की वैरायटी :-

पॉट या गमलों में आसानी से उगने वाली टमाटर की कुछ किस्में निम्न हैं :-

  • CHERRY TOMATO
  • TOMATO PLUM
  • GRAPES TOMATO
  • HEIRLOOM TOMATO
  • TOMATO PEAR

बीन्स

 

वानस्पतिक नाम – फेजोलस वल्गेरिस (Phaseolus Vulgaris)

बीन्स गमले में उगाई जाने वाली सब्जियों में से एक है। बीन्स का पौधा बेल या लता के रूप में बढ़ता है, जिसको सहारे की आवश्यकता होती है, अतः आप पौधे को सहारे देने के लिए लकड़ी, क्रीपर नेट आदि का इस्तेमाल कर सकते हैं। घर पर बीन्स को शुरूआती बसंत या ठण्ड के मौसम में पूर्ण सूर्य प्रकाश में आसानी से लगाया जा सकता है। यह पौधे अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में नाइट्रोजन युक्त खाद और नियमित रूप से पानी देने पर ठीक तरह से उगते हैं।

गमले का आकार :-

कम से कम 15 इंच चौड़ाई और ऊंचाई वाला गमला

बीन्स की प्रमुख किस्में :- 

गमले में उगाई जाने वाली बीन्स की कुछ किस्में निम्न हैं :-

  • CLIMBING BEANS
  • POLE BEANS
  • FRENCH BEANS

बैंगन

 

वानस्पतिक नाम – सोलनम मेलोंगेना (Solanum Melongena)

ब्रिंजल या बैंगन, जिसे एगप्लांट (Eggplant) भी कहा जाता है, को पॉट में आसानी से ग्रो किया जा सकता है। इस पौधे की कई ऐसी किस्में हैं, जिनके पौधे आकार में बहुत बड़े और भारी हो सकते हैं, इसलिए पॉट में उगाने के लिए आपको कुछ ऐसी किस्मों को चुनना होगा, जो कि स्वादिष्ट, सुन्दर और पॉट में आसानी से उगने वाली हों। बैंगन के पौधे को वसंत ऋतु में, पूर्ण सूर्य प्रकाश में, समान रूप से नम तथा अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में उगाया जा सकता है।

गमले का आकार :-

  • 12 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

बैंगन की किस्में :- 

गमलों में लगाने के लिए बैंगन की कुछ किस्में इस प्रकार हैं :-

  • GREEN BRINJAL
  • BRINJAL BLACK
  • LONG BRINJAL
  • BRINJAL WHITE

प्याज

 

वानस्पतिक नाम- एलियम सेपा (Allium Cepa)

प्याज अधिकतर व्यंजनों में उपयोग की जाने वाली सब्जी है, जिसे कच्चा व पकाकर दोनों रूपों में खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। प्याज की कुछ किस्मों के बल्व (जड़) व कुछ किस्मों के पत्तों को खाने के रूप में उपयोग किया जाता हैं। ताज़ी और केमिकल फ्री स्वादिष्ट प्याज प्राप्त करने के लिए आप इसे गमले की मिट्टी में आसानी से लगा सकते हैं। प्याज को अतिरिक्त जल निकासी वाली गमले की मिट्टी में लगाएं तथा पौधों को नियमित रूप से पानी व कुछ समयांतराल में आवश्यकता अनुसार जैविक खाद देते रहें।

गमले का आकार :-

  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 24 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

प्याज की किस्में :-

प्याज (onion) के गमले में लगाई जाने वाली प्रमुख किस्में निम्न हैं जैसे :-

  • SPRING ONION
  • RED ONION
  • ONION YELLOW
  • WHITE ONION

पत्ता गोभी
पत्ता गोभी

 

वानस्पतिक नाम – ब्रैसिका ओलेरासिया (Brassica oleracea)

घर पर गमले में उगाई जाने वाली पत्ता गोभी प्रमुख सब्जियों में से एक है, जिसे कच्चा और पका दोनों रूपों में खाया जाता है। कम कैलोरी वाली इस सब्जी को ताज़ा खाने के लिए घर पर पॉट या ग्रो बैग की मिट्टी में लगाया जाता है। पत्ता गोभी वेजिटेबल को उचित मात्रा में पानी देकर, जैविक खाद युक्त गमले की रेत में आसानी से ग्रो किया जा सकता है।

गमले का आकार :-

  • 12 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 12 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)
  • 15 x 15 इंच (चौड़ाई x ऊंचाई)

पत्ता गोभी की प्रमुख किस्में :-

गमले (pot) या ग्रो बैग में लगाई जाने वाली पत्ता गोभी की कुछ किस्में निम्न हैं जैसे :-

  • CHINESE CABBAGE
  • RED CABBAGE
  • SAVOY CABBAGE
  • CABBAGE HYBRID

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एकीकृत बाग़वानी विकास मिशनएकीकृत बाग़वानी विकास मिशन फलों, सब्जियों, जड़ और कंद फसलों, मशरूम, मसालों,फूलों, सुगंधित पौधों, नारियल, काजू, कोको और बांस को कवर करने वाले बागवानी क्षेत्र….Click Here मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजनाबागवानी फसलों में प्रतिकूल मौसम व प्राकृतिक आपदाओं के कारण से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा सरकार द्वारा मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना की शुरुआत की गई है..Click Here चाय की फसलभारत के अंदर चाय की खेती काफी पहले से की जा रही है दरअसल साल 1835 में अंग्रेजो ने सबसे पहले असम के बागो में चाय लगाकर इसकी शुरुआत की थी। आज के समय में भारत के विभिन्न राज्यों में चाय की खेती…Click Here
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मिर्च के पौधे

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  • परिचय
  • जलवायु और मृदा
  • मिर्च की उन्नत किस्में
  • मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन
  • मिर्च के महत्वपूर्ण कीट एवं प्रबंधन तकनीक
  • मिर्च के महत्वपूर्ण रोग एवं प्रबंधन तकनीक

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परिचय
जलवायु और मृदा
मिर्च की उन्नत किस्में
मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन
परिचय

मिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये। काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे. हरी मिर्च.)

मिर्च उगाने वाले महत्वपूर्ण राज्य आंध्र प्रदेश (समग्र), महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा और तमिलनाडु हैं जो भारत का 70 प्रतिशत से अधिक रकबा बनाते हैं।

जलवायु और मृदा

मिर्च की खेती विविध प्रकार की मिट्टियों मे जिसमे की कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त हो एवं जल निकास की उचित सुविधा हो, मे सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिर्च की फसल जलभराव वाली स्थिति सहन नही कर पाती है। यद्यपि मिर्च को pH 6.5—8.00 वाली मिट्टी मे भी (वर्टीसोल्स) मे भी उगाया जा सकता है |
मिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये।

मिर्च की उन्नत किस्में

काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे हरी मिर्च.) जवाहर मिर्च -218 (उपज 18-20 क्वि. / हे सूखी मिर्च.) अर्का सुफल (उपज 250 क्वि. / हे.) तथा संकर किस्म काशी अर्ली (उपज 300-350 क्वि. / हे.), काषी सुर्ख या काशी हरिता (उपज 300 क्वि. / हे.) का चयन करें। पब्लिक सेक्टर की एचपीएच-1900, 2680, उजाला तथा यूएस-611, 720 संकर किस्में की खेती की जा रही है।

मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन

मिर्च की पौध तैयार करने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहाँ पर पर्याप्त मात्रा में धूप आती हो तथा बीजो की बुवाई 3 गुणा 1 मीटर आकार की भूमि से 20 सेमी ऊँची उठी क्यारी में करें। मिर्च की पौधशाला की तैयारी के समय 2-3 टोकरी वर्मी कंपोस्ट या पूर्णतया सड़ी गोबर खाद 50 ग्राम फोटेट दवा / क्यारी मिट्टी में मिलाऐं। बुवाई के 1 दिन पूर्व कार्बन्डाजिम दवा 1.5 ग्राम/ली. पानी की दर से क्यारी में टोहा करे। अगले दिन क्यारी में 5 सेमी दूरी पर 0.5-1 सेमी गहरी नालियाँ बनाकर बीज बुवाई करें।

बीज की मात्रा :-

मिर्च की ओ.पी. किस्मों के 500 ग्राम तथा संकर (हायब्रिड) किस्मों के 200-225 ग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र की नर्सरी तैयार करने के लिए पर्याप्त होती है।

रोपाई की तकनीक एवं समय :- 

मिर्च की रोपाई वर्षा, शरद, ग्रीष्म तीनों मौसम  मे की जा सकती है। परन्तु मिर्च की मुख्य फसल खरीफ (जून-अक्टू.) मे तैयार की जाती है। जिसकी रोपाई जून.-जूलाई मे, शरद ऋतु की फसल की रोपाई सितम्बर-अक्टूबर तथा ग्रीष्म कालीन फसल की रोपाई फर-मार्च में की जाती है।

पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक :-

मिर्च की फसल मे उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करे। सामान्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्रफल मे 200-250 क्वि गोबर की पूर्णतः सड़ी हुयी खाद या 50 क्वि. वर्मीकंपोस्ट खेत की तैयारी के समय मिलायें। नत्रजन 120-150 किलों, फास्फोरस 60 किलो तथा पोटाश 80 किलो का प्रयोग करे।

मिर्च के महत्वपूर्ण कीट एवं प्रबंधन तकनीक
मिर्च के महत्वपूर्ण रोग एवं प्रबंधन तकनीक
मिर्च के महत्वपूर्ण कीट एवं प्रबंधन तकनीक

कीट प्रमुख लक्षण रोकथाम / नियंत्रण के उपाय
थ्रिप्स वैज्ञानिक भाषा मे इसे सिटरोथ्रिटस डोरसेलिस हुड कहते है। छोटी अवस्था मे ही कीट पौधों की पत्तियों एवं अन्य मुलायम भागों से रस चूसते है जिसके कारण पत्तियां उपर की ओर मुड कर नाव के समान हो जाती है। 1. बुवाई के पूर्व थायोमिथम्जाम 5 ग्राम प्रति किलो बीज दर से बीजोचार करे।
2. नीम बीज अर्क का 4 प्रतिशत का छिडकाव करें।
3. रासायनिक नियंत्रण के अंतर्गत फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एस.सी. 1.5 मि. ली. 1 ली. पानी मे मिला कर छिडकाव करें।
4. एसिटामिप्रिड 0.2 ग्रा. 1 ली. या इमिडक्लोप्रिड 0.3 ग्रा. 1 ली. या थायोमिथम्जाम 0.3 ग्र्रा.1 ली. पानी में मिलाकर छिडकाव करें।
सफ़ेद मक्खी इस कीट का वैज्ञानिक नाम बेमिसिया तवेकाई है  जिसके शिशु एवं वयस्क पत्तियों की निचली सतह पर चिपक कर रस चूसते हैं जिसकी पत्तियां नीचे तरफ मुड़ जाती हैं । 1. कीट की सतत निगरानी कर तथा संख्या के आधार पर डाईमिथएट की 2 मि.ली. मात्रा 1 पानी मिलकर छिड़काव करें ।
2. अधिक प्रकोप की स्थिति में थायमेथाइसम 25 डब्लू जी की 5 ग्राम मात्रा 15 ली. पानी में मिलकर छिड़काव करें ।
माइट कीट का वैज्ञानिक नाम – हेमीटारयोनेमसलाटस बैंक है। यह बहुत ही छोटे कीट होते है जो पत्तियों की सतह से रस चूसते है जिसम पत्तियां नीचे की ओर मुड जाती है। 1. नीम की निबोंली के सत का 4 प्रतिशत का छिडकाव करे।
2. डायोकोफाल 2.5 मि.ली. या ओमाइट 3 मि.ली. / ली. पानी मे मिलाकर छिडकाव करें।

मिर्च के महत्वपूर्ण रोग एवं प्रबंधन तकनीक

प्रमुख लक्षण रोकथाम / नियंत्रण के उपाय
डेम्पिंग ऑफ़ आर्द्रगलन इस रोग का कारण पीथियम एफिजडरमेटम, फाइटोफ्थोरा स्पी. फफूंद जिसम नर्सरी में पौधा भूमि की सतह के पास से गलकर गिर जाता है। 1. मिर्च की नर्सरी उठी हुयी क्यारी पद्धति से तैयार करे जिसम जल निकास की उचित व्यवस्था हो।
2. बिजोचार कार्बेन्डाजिम 1 ग्रा.दवा 1 किलो बिज से करें।
एन्थे्रक्लोज कोलेटोट्राइकम कैप्सीकी नामक फफूंद से होने वाला अतिव्यापक एवं महत्वपूर्ण रोग है। विकसित पौधों पर शाखाओं का कोमल शीर्ष भाग ऊपर से नीचे की ओर सूखना प्रारम्भ होता है। 1. फसल चक्र अपनाएं तथा स्वस्थ व प्रमाणित बीज बोये बुवाई पूर्व बिजोंचार अवश्य करें।
2. रोग का प्रारंभिक अवस्था मे ही लाइटक्स 50, अइथेन 45, के 0. 25 प्रतिशत धोल का 7 दिन अंतराल पर अवश्यकता अनूसार छिडकाव करें।
जीवाणु जम्लानी (बैक्टीरियलविल्ट) इस रोग का कारण स्यूडोमोनस सोलेनेसियेरम नमक जीवाणु है | शिमला मिर्च, टमाटर तथा बैगन में इसका अधिक प्रकोप होता है | पौध रोपण पूर्व बोरडेक्स मिश्रण के
1 घोल या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम दवा 1 ली. पानी में घोलकर मृदा उपचार अवश्य करें या टोह करें
ट्राइकोडर्मा विरिडी या हरजीयनम 4 ग्राम और मेटलेक्सिल 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें
पर्ण कुंचन यह रोग विषाणु के कारण होता है जो कि तंबाकूपर्ण कुंचन विषाणु से होता है। रोग के कारण पौधें की पत्तियां छोटी होकर मुड जाती है तथा पौधा बोना हो जाता है यह रोग सफेद मक्खी कीट के कारण एक दूसरे पौधे पर फैलता है 1. नर्सरी मे रोगी पौधौं को समय-समय पर हटाते रहे। तथा स्वस्थ पौधौं का ही रोपण करे।
2. रसचूसक कीटो के नियंत्रण हेतू अनुशंसित दवाओं का प्रयोग करे ।

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सेब के लिए कटाई के बाद का प्रबंधनवैज्ञानिक रूप से मैलस पुमिला के नाम से जाना जाने वाला सेब अपनी कुरकुरी बनावट और मीठे-तीखे स्वाद के लिए पसंद किया जाता है। भारत में, सेब की खेती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है। इसके अतिरिक्त, इसे कुछ हद तक अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड….Click Hereभारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजनाभारत सरकार ने उन किसानों का समर्थन करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास किया है जो रसायनों के उपयोग के बिना खेती करना चुनते हैं और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के लिए बाजार का विस्तार करते हैं। साल 2023-2024 तक एक विशिष्ट और स्वतंत्र योजना के रूप में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) बनाकर..Click Hereराष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशनआत्मनिर्भर भारत योजना के एक भाग के रूप में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन की घोषणा की गई। आइए इन शीर्षकों के तहत योजनाओं के विवरण के बारे में जानें
लॉन्च की तारीख – देश में एकीकृत कृषि प्रणाली को ध्यान में रखते हुए 2020 में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन शुरू किया गया है।
NBHM: मंत्रालय – NBHM कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है…Click Here

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कपास की फसल में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीट एवं उनका प्रबंधन

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  • कपास की उन्नत उत्पादन तकनीक
  • उन्नत क़िस्म
  • बुवाई का समय एवं विधि
  • बुवाई का समय एवं विधि
  • खाद एवं उर्वरक
  • सिचांई
  • कीटनाशक,पहचान,नियंत्रण करने के उपाय
  • उपज
  • कपास की चुनाई के समय रखने वाली सावधानियाँ

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कपास संपूर्ण भारत के किसानों के लिए एक नकदी फसल मानी जाती है। इसकी खेती केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्वभर में की जाती है, लेकिन कपास के उत्पादन में भारत का स्थान सबसे पहले आता है। चूँकि कपास एक नकदी फसल है, इसलिए इसकी खेती किसानों की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पिछले कुछ वर्षों में कपास फसल के उत्पादन और कीमत में काफी उछाल देखी गयी है। कपास की फसल से जहाँ एक तरफ किसान अधिक आय प्राप्त करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ किसानों को अपनी फसल से कीटों और रोगों के चलते काफी नुकसान भी झेलना पड़ता है। जी हाँ अक्सर मौसम में अधिक नमी और अनियमितता की वजह से फसल में विभिन्न प्रकार के कीटों का आक्रमण हो जाता है, जो फसलों को भारी हानि पहुंचाते हैं साथ ही किसानों की मेहनत और आय को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए  यदि आपने भी अपने खेतों में कपास की खेती की है एवं उसमें किसी भी प्रकार के कीटों के हमले का सामना कर रहे हैं, तो आप इस लेख में बताये गए सुझाव के अनुसार अपनी कपास की फसल को सुरक्षित कर सकते हैं।

कपास की उन्नत उत्पादन तकनीक

  • कपास रेशे वाली फसल हैं यह कपडे़ तैयार करने का नैसर्गिक रेशा हैं।
  • मध्यप्रदेश में कपास सिंचित एवं असिंचित दोनों प्रकार के क्षेत्रों में लगाया जाताहैं।
  • प्रदेश में कपास फसल का क्षेत्र 7.06 लाख हेक्टेयर था तथा उपज 426.2 किग्रा लिंट/हे.
  • बीटी कपास में रस चूसक कीटों के नियंत्रण के लिये 2-3छिडकाव कर नापर्याप्त होता हैं जबकि पहले में देश की कुल कीटनाशक खपत का लगभग आधाभाग लग जाता था।
  • बी.टी.कपास से अधिकतम उपज दिसम्बर मध्य तक लेली जाती हैं जिससे रबी मौसम गेहूँ का उत्पादन भी लिया जा सकता हैं।

उन्नत क़िस्म

संकर किस्म उपयुक्त क्षेत्र जिले विशेष
डी.सी.एच. 32 (1983) धार, झाबुआ, बड़वानी खरगौन महीन रेशेकी किस्म
एच-8 (2008) खण्डवा, खरगौन व अन्य क्षेत्र जल्दी पकने वाली किस्म 130-135दिन
रासी 659 बीजी II (Rasi 659 BG II) सिरसा,फतेहाबाद,हिसार,आदि यह किस्म मध्यम भारी मिट्टी में लगाई जाती है।
इसके बड़े बॉल होते है ।
यह किस्म 145-160 दिन की होती है।
अजीत 155 बीजी II (Ajeet 155 BG II) सिरसा,फतेहाबाद,हिसार,आदि यह किस्म मध्यम हल्की मिट्टी में लगाई जाती है
इसके बॉल मध्यम आकर के होते है।
यह किस्म 140-150 दिन की होती है।

बुवाई का समय एवं विधि

यदि पर्याप्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध हैं तो कपास की फसल को मई माह में ही लगाया जा सकता हैं सिंचाई की पर्याप्त उपलब्धता न होने पर मानसून की उपयुक्त वर्षा होते ही कपास की फसल लगावें। कपास की फसल को मिट्टी अच्छी भूरभूरी तैयार कर लगाना चाहिए। सामान्यतः उन्नत जातियों का 2.5 से 3.0 किग्रा. बीज (रेशाविहीन/डिलिन्टेड) तथा संकर एवं बीटी जातियों का 1.0 किग्रा. बीज (रेशाविहीन) प्रति हेक्टेयर की बुवाई के लिए उपयुक्त होता हैं। उन्नत जातियों में चैफुली 45-60*45-60 सेमी. पर लगायी जाती हैं (भारी भूमि में 60*60, मध्य भूमि में 60*45, एवं हल्की भूमि में ) संकर एवं बीटी जातियों में कतार से कतार एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी क्रमशः 90 से 120 सेमी. एवं 60 से 90सेमी रखी जाती हैं |

खाद एवं उर्वरक

प्रजाति नत्रजन (किलोग्राम/हे. ) फास्फोरस/हे. पोटाश/हे. गंधक (किग्रा/हे.)
उन्नत 80-120 40-60 20-30 25
संकर 150 75 40 25
15% बुआई के समय एक चैथाई 30 दिन, 60 दिन, 90 दिन पर बाकी 120 दिन आधा बुआई के समय एवं बाकी 60 दिन पर आधा बुआई के समय एवं बाकी 60 दिन पर बुआई के समय
  • उपलब्ध होने पर अच्छी तरह से पकी हुई गोबर की खाद/कम्पोस्ट 7 से 10 टन/हे. (20 से 25 गाड़ी) अवश्य देना चाहिए ।
  • बुआई के समय एक हेक्टेयर के लिए लगने वाले बीज को 500 ग्राम एजोस्पाइरिलम एवं 500 ग्राम पी.एस.बी. से भी उपचारित कर सकते है जिससे 20 किग्रा नत्रजन एवं 10 किग्रा स्फुर की बचत होगी।
  • बोनी के बाद उर्वरक को कालम पद्धति से देना चाहिए। इस पद्धति से पौधे के घेरे/परिधि पर 15 सेमी गहरे गड्ढे सब्बल बनाकर उनमें प्रति पौधे को दिया जाने वाला उर्वरक डालते है व मिट्टी से बंद कर देते है।

सिचांई

एकान्तर (कतार छोड़ ) पद्धति अपना कर सिंचाई जल की बचत करे बाद वाली सिंचाईयाँ हल्की करें,अधिक सिंचाई से पौधो के आसपास आर्द्रता बढ़ती है व मौसम गरम रहा तो कीट एवं रोगों के प्रभाव की संभावना बढ़ती है ।

कीटनाशक,पहचान,नियंत्रण करने के उपाय

कीट पहचान हानि नियंत्रण के उपाय
हरा मच्छर पंचभुजाकार हरे पीले रंग के अगले जोड़ी पंख पर एक काला धब्बा पाया जाता है शिशु -व्यस्क पत्तियों के निचले भाग से रस चूसते है। पत्तिया क्रमशः पीली पड़कर सूखने लगती है। 1.पूरे खेत में प्रति एकड़ 10 पीले प्रपंच लगाये। 2.नीम तेल 5 मिली.टिनोपाल/सेन्डोविट 1 मिली.प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।3.रासायनिक कीटनाशी थायोमिथाक्ज़्म 25डब्लुजी – 100 ग्राम सक्रिय तत्व/हेएसिटामेप्रिड 20एस.पी. – 20 ग्राम सक्रिय तत्व/हे.इमिडाक्लोप्रिड 17.8एस.एल – 200 मिली.सक्रिय तत्व/हे ट्रायजोफास 40ईसी 400 मिली सक्रिय तत्व/हे.एक बार उपयोग में लाई गई दवा का पुनः छिड़काव नहीं करें।
सफेदमक्खी हल्के पीले रंग की जिसका शरीर सफेद मोमीय पाउडर से ढंका रहता है पत्तियो से रस चूसती है एवं मीठा चिपचिपा पदार्थ पौधे की सतह पर छोड़ते है वायरस का संचरण भी करती है।
तेला अत्यंत छोटे काले रंग के कीट पत्तियो की कनचली समह से खुरचकर हरे पदार्थ का रस पान करते है।
मिलिबग मादा पंखी विहीन,शरीर सफेद पाउडर से ढंका। शरीर पर काले रंग के पंख। तने,शाखाओं,पर्णवृतों,फूल पूड़ी एवं घेटोंपर समूह में रस चूसकर मीठा,चिपचिपा पदार्थ उत्सर्जित करती है।

उपज

देशी/उन्नत जातियों की चुनाई प्रायः नवम्बर से जनवरी-फरवरी तक, संकर जातियों की अक्टूबर-नवम्बर से दिसम्बर-जनवरी तक तथा बी.टी. किस्मों की चुनाई अक्टूबर से दिसम्बर तक की जाती है। कहीं-कहीं बी.टी. किस्मों की चुनाई जनवरी-फरवरी तक भी होती है। देशी/उन्नत किस्मों से 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, संकर किस्मों से 13-18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथी बी.टी. किस्मों से 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक औसत उपज प्राप्त होती है।

कपास की चुनाई के समय रखने वाली सावधानियाँ

  • कपास की चुनाई प्रायः ओस सूखन के बाद ही करनी चाहिए।
  • अविकसित, अधखिले या गीले घेटों की चुनाई नहीं करनी चाहिए ।
  • चुनाई करते समय कपास के साथ सूखी पत्तियाँ, डण्ठल, मिट्टी इत्यादि नहीं आना चाहिए।
  • चुनाई पश्चात् कपास को धूप में सुखा लेना चाहिए क्योंकि अधिक नमी से कपास में रूई तथा बीज दोनों की गुणवत्ता में कमी आती है । कपास को सूखाकर ही भंडारित करें क्योंकि नमी होने पर कपास पीला पड़ जायेगा व फफूंद भी लग सकती हैं।

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मिर्च के पौधेमिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये। काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे. हरी मिर्च.)….Click Hereभारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजनाभारत सरकार ने उन किसानों का समर्थन करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास किया है जो रसायनों के उपयोग के बिना खेती करना चुनते हैं और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के लिए बाजार का विस्तार करते हैं। साल 2023-2024 तक एक विशिष्ट और स्वतंत्र योजना के रूप में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) बनाकर…Click Hereराष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशनआत्मनिर्भर भारत योजना के एक भाग के रूप में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन की घोषणा की गई। आइए इन शीर्षकों के तहत योजनाओं के विवरण के बारे में जानें
लॉन्च की तारीख – देश में एकीकृत कृषि प्रणाली को ध्यान में रखते हुए 2020 में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन शुरू …Click Here

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सेब के लिए कटाई के बाद का प्रबंधन

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  • परिचय
  • सेब की कटाई के बाद का प्रबंधन

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परिचय

 

मैलस पुमिला सेब का अर्जित वैज्ञानिक नाम है लेकिन इंटीग्रेटेड टैक्सोनोमिक इंफॉर्मेशन सिस्टम के अनुसार इसे मालुस डोमेस्टिका, मालुस सिल्वेस्ट्रिस, मालुस कम्युनिस और पाइरस मालुस के नाम से भी जाना जाता है।

वैज्ञानिक रूप से मैलस पुमिला के नाम से जाना जाने वाला सेब अपनी कुरकुरी बनावट और मीठे-तीखे स्वाद के लिए पसंद किया जाता है। भारत में, सेब की खेती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है इसके अतिरिक्त इसे कुछ हद तक अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, पंजाब और सिक्किम में उगाया जाता है। ये बहुमुखी फल न केवल स्वादिष्ट हैं बल्कि पोषक तत्वों और आहार फाइबर से भी भरपूर हैं। हालाँकि बगीचे से हमारी मेज तक की यात्रा एक जटिल है, जिसमें कई चुनौतियाँ हैं जो सेब की ताजगी और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं यहीं पर फसल कटाई के बाद की तकनीक काम में आती है।

सेब की कटाई के बाद की तकनीक में तरीकों और प्रथाओं की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है जिसका उद्देश्य कटाई के बाद सेब की गुणवत्ता, स्वाद और शेल्फ जीवन को बनाए रखना है। जिस क्षण से ये फल पेड़ से तोड़े जाते हैं, वे एक यात्रा शुरू करते हैं जिसमें सावधानीपूर्वक रखरखाव, भंडारण और पैकेजिंग शामिल होती है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सेब उपभोक्ताओं तक अपनी अच्छी स्थिति में पहुंचे। यह महत्वपूर्ण क्षेत्र न केवल भोजन की बर्बादी को कम करता है,जिससे यह हमारी मेज पर साल भर पसंदीदा बन जाता है। इस लेख में, हम कटाई के बाद की तकनीकों की व्याख्या करेंगे जो इसे संभव बनाती हैं।


सेब की कटाई के बाद का प्रबंधन

उत्तम सेब प्राप्त करने के लिए फसल कटाई के बाद की सावधानीपूर्वक प्रक्रियाओं की एक श्रृंखला शामिल होती है। नीचे फसल कटाई के बाद के प्रबंधन के महत्वपूर्ण चरण बताए गए हैं, जो यह गारंटी देते हैं कि सेब ताजा दिखने में आकर्षक और बाजार में वितरण के लिए तैयार है ।

प्री-कूलिंग प्रक्रिया :-

कटाई के तुरंत बाद सेबों को प्री-कूलिंग प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें ताजे तोड़े गए सेबों को अच्छी तरह हवादार और तापमान नियंत्रित वातावरण में रखना शामिल है। यहां प्राथमिक लक्ष्य कटाई के दौरान फलों में जमा होने वाली अवशिष्ट गर्मी को हटाना है। सेब को समय से पहले पकने से रोकने और ताजगी बनाए रखने के लिए पर्याप्त पूर्व-शीतलन आवश्यक है इसके अलावा यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि ग्रेडिंग, रैपिंग और डिब्बों में पैक करने के अगले चरण पर आगे बढ़ने से पहले सेब की सतहें नमी मुक्त रहें।
ग्रेडिंग :- 
सेब को उनके आकार, रूप और समग्र गुणवत्ता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। ग्रेडिंग प्रक्रिया में छह अलग-अलग आकार श्रेणियों में मैन्युअल रूप से छंटाई शामिल है। इसके अतिरिक्त सेबों का मूल्यांकन उनके रंग, आकार, गुणवत्ता और सामान्य उपस्थिति के आधार पर किया जाता है, जिससे तीन या अधिक गुणवत्ता ग्रेड प्राप्त होते हैं। इन गुणवत्ता ग्रेडों को AAA, AA, A; A,B, C या अतिरिक्त फैंसी, फैंसी क्लास।
भंडारण :-
सेब कई अन्य फलों की तुलना में अपने विस्तारित शेल्फ जीवन के लिए प्रसिद्ध है । कटाई के बाद उन्हें चार से आठ महीने तक की लंबी अवधि के लिए संग्रहीत किया जा सकता है । कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं सेब की ताजगी को संरक्षित करने के लिए इष्टतम वातावरण प्रदान करती हैं। इन भंडारण इकाइयों को विशिष्ट तापमान पर सावधानीपूर्वक बनाए रखा जाता है, आमतौर पर -1.1° से 0°C तक, आर्द्रता का स्तर 85-90% बनाए रखा जाता है। इस तरह की नियंत्रित स्थितियाँ पकने की प्रक्रिया में देरी करने, खराब होने से बचाने और यह सुनिश्चित करने में मदद करती हैं कि सेब लंबे समय तक बाजार के लिए तैयार रहें।
पैकिंग :-
सेबों के सुरक्षित परिवहन और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें आमतौर पर मजबूत लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता है। इन बक्सों में लगभग 10 या 20 किलोग्राम फल रखने की क्षमता है । इसके अतिरिक्त नालीदार फाइबर बोर्ड के डिब्बों का उपयोग पैकिंग उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है।

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कपास की फसल में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीट एवं उनका प्रबंधनकपास संपूर्ण भारत के किसानों के लिए एक नकदी फसल मानी जाती है। इसकी खेती केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्वभर में की जाती है, लेकिन कपास के उत्पादन में भारत का स्थान सबसे पहले आता है। चूँकि कपास एक नकदी फसल है, इसलिए इसकी खेती किसानों की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है…Click Here कृषि उड़ान योजनाजैसे की आप लोग जानते है की ज्यादातर कृषि पर ही निर्भर रहते है ।कृषि ही उनकी आय का साधन होती है ।किसानो की फसल की पैदावार की अच्छी कीमत प्रदान करने के लिए ही सरकार ने इस योजना को शुरू किया गया है ।
इस योजना के ज़रिये किसानो की आय को दुगुना करना ।
PM Kisan Krishi Udaan Scheme 2023 के जरिए किसानों की उत्पादकों को सीधे बाजार तक पहुंचाने में उपयोग किया जाएगा…Click Here
किसान क्रेडिट कार्डकिसान क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत वर्ष 1998 में की गई थी। किसानों की ऋण आवश्‍यकताओं (कृषि संबंधी खर्चों) की पूर्ति के लिये पर्याप्‍त एवं समय पर ऋण की सुविधा प्रदान करना, साथ ही आकस्‍मिक खर्चों के अलावा सहायक कार्यकलापों से संबंधित खर्चों की पूर्ति करना। यह ऋण सुविधा एक सरल कार्यविधि के माध्‍यम से यथा- आवश्‍यकता के आधार पर प्रदान की जाती हैClick Here
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भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजना

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  • भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजना
  • योजना अवलोकन
  • विशेषताएँ
  • लाभ
  • निष्कर्ष

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भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजना
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विशेषताएँ
लाभ
निष्कर्ष
भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति योजना

भारत सरकार ने उन किसानों का समर्थन करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयास किया है जो रसायनों के उपयोग के बिना खेती करना चुनते हैं और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के लिए बाजार का विस्तार करते हैं। साल 2023-2024 तक एक विशिष्ट और स्वतंत्र योजना के रूप में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) बनाकर, भारत सरकार ने पूरे देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने हेतु अहम पहल की है। 

योजना अवलोकन

  • योजना का नाम: राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF)
  • योजना लॉन्च वर्ष: 2023-24
  • योजना निधि आवंटित: 1584 करोड़ रुपये
  • सरकारी योजना का प्रकार: केंद्र सरकार
  • प्रायोजित/सेक्टर योजना: प्रायोजित

विशेषताएँ

  • इस योजना का उद्देश्य अगले चार वर्षों के दौरान देशभर में 7.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हुए 15,000 क्लस्टर विकसित करना है।
  • इसका लक्ष्य गंगा बेल्ट और देश के अन्य वर्षा आधारित क्षेत्रों में 1 करोड़ किसानों तक पहुंचना है।
  • इस योजना के उद्देश्यों में वैकल्पिक खेती तकनीकों को बढ़ावा देना भारतीय गायों और स्थानीय संसाधनों पर आधारित एकीकृत खेती मॉडल को लोकप्रिय बनाना और जैविक खेती के तरीकों को इकट्ठा करना, सत्यापन करना और दस्तावेजीकरण करना आदि शामिल है।
  • यह योजना प्राकृतिक खेती के बारे में जागरूकता पैदा करने, क्षमता निर्माण, प्रचार और प्रदर्शन के लिए काम करेगी।
  • यह घरेलू और विदेशी दोनों बाजारों के लिए जैविक कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रमाणन के लिए मानक स्थापित करेगी।
  • कार्यक्रम मांग-संचालित है और राज्य वर्ष-वार लक्ष्य और लक्ष्य के साथ दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य योजना तैयार करेंगे।
  • NMNF के तहत, किसानों को ऑन-फार्म इनपुट उत्पादन बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए तीन साल तक प्रति वर्ष 15,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता मिलेगी।
  • भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) को पूरे देश में कार्यान्वयन के लिए NMNF के रूप में उन्नत किया गया है।
  • योजना के बारे में नवीनतम समाचार: मिशन का लक्ष्य अगले चार वर्षों में 15,000 समूहों के विकास के माध्यम से 7.5 लाख हेक्टेयर भूमि को कवर करना है, जिसका कुल बजट परिव्यय 1,584 करोड़ रुपये है। सरकार ने वर्ष 2023-24 के लिए 459.00 करोड़ रुपये का प्रावधान प्रस्तावित किया है। इस योजना से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग में उल्लेखनीय कमी आने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
  • इसके अलावा, साल 2023-24 के लिए उर्वरक सब्सिडी का बजट 1,75,099 करोड़ रुपये रखा गया है। किसानों को किफायती कीमत पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

लाभ

  • पारंपरिक स्वदेशी कृषि पद्धतियों के उपयोग को बढ़ावा देता है।
  • बाहर से खरीदे जाने वाले कृषि उत्पादों की लागत को कम कर किसानों की आय में वृद्धि करता है।
  • स्थानीय संसाधनों और देशी गाय पर आधारित एकीकृत खेती और पशुपालन प्रणाली के उपयोग को प्रोत्साहित करता है।
  • देश के विभिन्न भागों में अपनाई जा रही प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को एकत्रित करना और उनका दस्तावेजीकरण करना।

निष्कर्ष

  • यह सराहनीय है कि भारत सरकार ने पूरे देश में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ खेती के तरीकों को प्रोत्साहित करने के लिए प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (NMNF) शुरू किया है। योजना का लक्ष्य बाहरी कृषि उत्पादों पर निर्भरता कम करके और पारंपरिक और स्थानीय कृषि पद्धतियों के उपयोग को बढ़ावा देकर किसानों की आय में वृद्धि करना है। 

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मिर्च के पौधेमिर्च की खेती विविध प्रकार की मिट्टियों मे जिसमे की कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त हो एवं जल निकास की उचित सुविधा हो, मे सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिर्च की फसल जलभराव वाली स्थिति सहन नही कर पाती है। यद्यपि मिर्च को pH 6.5—8.00 वाली मिट्टी मे भी (वर्टीसोल्स) मे भी उगाया जा सकता है…Click Hereकपास की फसल में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कीट एवं उनका प्रबंधनकपास संपूर्ण भारत के किसानों के लिए एक नकदी फसल मानी जाती है। इसकी खेती केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्वभर में की जाती है, लेकिन कपास के उत्पादन में भारत का स्थान सबसे पहले आता है। चूँकि कपास एक नकदी फसल है, इसलिए इसकी खेती किसानों की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है…Click Hereसेब के लिए कटाई के बाद का प्रबंधनमैलस पुमिला सेब का अर्जित वैज्ञानिक नाम है लेकिन इंटीग्रेटेड टैक्सोनोमिक इंफॉर्मेशन सिस्टम के अनुसार इसे मालुस डोमेस्टिका, मालुस सिल्वेस्ट्रिस, मालुस कम्युनिस और पाइरस मालुस के नाम से भी जाना जाता है वैज्ञानिक रूप से मैलस पुमिला के नाम से जाना जाने वाला सेब अपनी कुरकुरी बनावट और मीठे-तीखे स्वाद के लिए पसंद किया जाता है…Click Here
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