Neno urea

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  • फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर क्या है ?
  • इसका उद्देश्य
  • यूरिया क्या है ?
  • यूरिया की खोज
  • यूरिया के उपयोग
  • यूरिया का उत्पादन
  • यूरिया से होने वाले नुकसान
  • नैनो यूरिया लिक्विड की खोज(NANO UREA)
  • नैनो यूरिया लिक्विड क्या है ?
  • नैनो उर्वरक (नैनो यूरिया) के लाभ
  • नैनो यूरिया को लेकर भविष्य की संभावनाएं

नैनो लिक्विड यूरिया
फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर क्या है ?
इसका उद्देश्य
यूरिया(UREA) क्या है ?
यूरिया की खोज
यूरिया के उपयोग
नैनो लिक्विड यूरिया

इफको (इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड) ने किसानों के लिए अपना नैनो लिक्विड यूरिया पेश किया है। इसे 31 मई 2021 को लॉन्च किया गया था। यह दुनिया का पहला नैनो लिक्विड यूरिया है। इसी के साथ भारत नैनो लिक्विड यूरिया लॉन्च करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। इस नैनो लिक्विड यूरिया को इफको ने विकसित किया है और इसका पैटेंट भी इसी के पास है। 

भारत सरकार ने IFFCO के नैनो लिक्विड यूरिया को मान्यता देकर फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर (fertilizer control order) में शामिल किया है। इसमें शामिल होने वाला यह एकमात्र नैनो उर्वरक है। नैनो लिक्विड यूरिया की एक बोतल में 40,000 पीपीएम नाइट्रोजन होता है जो सामान्य यूरिया के एक बैग के बराबर नाइट्रोजन पोषक तत्व देता है। लिक्विड यूरिया की लॉन्चिंग के बाद इफको ने दावा किया है कि इसके उपयोग से देश में यूरिया की खपत 50% तक कम हो सकती है। इसका उद्देश्य पौधों के पोषण को बढ़ाना और दुनिया भर के किसानों की मदद करना है।

नैनो लिक्विड यूरिया को इफको ने लॉन्च किया था। इसे किसानों को देने से पहले देश भर में 11,000 कृषि क्षेत्र परीक्षण (एफएफटी) में 94 से अधिक फसलों पर इसका परीक्षण किया गया था। किसान यूरिया का इस्तेमाल फसलों में नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए करते हैं, लेकिन इसका आधे से भी कम हिस्सा पौधों को मिल पाता था जबकि बाकि यूरिया मिट्टी और हवा में मिलकर प्रदुषण फैलाता था। हालांकि नैनो लिक्विड यूरिया ने काफी हद तक इस समस्या का समाधन कर दिया है।

फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर क्या है ?

फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर, 1985 (fertilizer control order), आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत केंद्र सरकार द्वारा जारी एक आदेश है।

इसका उद्देश्य

किसानों को सही समय पर और सही कीमत पर उर्वरकों की सही गुणवत्ता की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए, उर्वरक को एक आवश्यक वस्तु घोषित किया गया और उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO) को आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत देश में उर्वरकों की कीमत, विनियमित, व्यापार, गुणवत्ता और वितरण के लिए लागू किया गया था।

फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर उर्वरक निर्माताओं, आयातकों और डीलरों का अनिवार्य पंजीकरण करता है। साथ ही ये देश में निर्मित/आयातित और बेचे जाने वाले सभी उर्वरकों के विनिर्देश, उर्वरक मिश्रण के निर्माण पर विनियमन, उर्वरक बैग पर पैकिंग और अंकन, प्रवर्तन एजेंसियों की नियुक्ति और गुणवत्ता की स्थापना प्रदान करता है। वहीं, नियंत्रण प्रयोगशालाओं और गैर-मानक/ नकली/ मिलावटी उर्वरकों के निर्माण/ आयात और बिक्री को प्रतिबंधित करता है।

नोट – पिछले कुछ दिनों से नैनो यूरिया लिक्विड काफी चर्चा में रहा है। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि नैनो यूरिया लिक्विड क्या है, और आज दुनिया के लिए यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

यूरिया(UREA) क्या है ?

यूरिया (Urea या carbamide(यूरिया जल रहित एवं जीवाणु रहित पाउडर के रूप में)) एक जहरीला ठोस कार्बनिक यौगिक है। यह रंगहीन, गंधहीन, सफेद और दानेदार होता है। इसका रासायनिक सूत्र (NH2)2CO होता है। यह पानी में आसानी से घुलनशील है। यूरिया सामान्यरूप से स्तनधारी (Mammals) और सरीसृप (Reptiles) प्राणियों के मूत्र में पाया जाता है। इसे खेती में नाइट्रोजनयुक्त रासायनिक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। 

यूरिया की खोज

यूरिया को सर्वप्रथम 1773 में फ्रेंच वैज्ञानिक हिलेरी राउले ने मूत्र में खोजा था। वहीं, जर्मन वैज्ञानिक वोहलर ने सबसे पहले कृत्रिम विधि से यूरिया बनाया था। इससे पहले तक दुनिया में यह  माना जाता था कि यूरिया जैसे कार्बनिक यौगिक को सजीवों के शरीर (किडनी) के बाहर बनाना असंभव है तथा इसको बनाने के लिए प्राण शक्ति की आवश्यकता होती है। 

AgNCO (सिल्वर आइसोसाइनेट) + NH4Cl → (NH2)2CO (यूरिया) + AgCl

यूरिया के उपयोग

  • यूरिया के उपयोग से कृषि मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। 
  • वाहनों के प्रदूषण नियंत्रक के रूप में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 
  • रेजिन, प्लास्टिक एवं हाइड्रोजन के साथ-साथ यूरिया-फार्मेल्डिहाइड बनाने में भी इसका उपयोग होता है। 
  • इससे यूरिया-स्टीबामिन नामक काला-जार की दवा बनती है। 
  • इससे वेरोनल नामक नींद की दवा भी बनती है। 
  • यूरिया का उपयोग सेडेटिव (उत्तेजना को कम करने वाली और व्यक्ति को शांत करने वाली) दवाओं को बनाने में भी किया जाता है। 

यूरिया का उत्पादन
यूरिया से होने वाले नुकसान
नैनो यूरिया लिक्विड की खोज(NANO UREA)
नैनो यूरिया लिक्विड क्या है ?
नैनो उर्वरक (नैनो यूरिया) के लाभ
यूरिया का उत्पादन

भारत में साल 2008-09 में यूरिया का उत्पादन लगभग 2 करोड़ टन था। इस दौरान इसकी खपत करीब 2.4 करोड़ टन थी। इसलिए देश में यूरिया की जरूरत को पूरा करने के लिए इसका आयात किया जाता था। बाद में यूरिया उत्पादन की क्षमता साल दर साल बढ़ाती गई।

यूरिया से होने वाले नुकसान

धरती पर रहने वाले सभी जीवों के लिए भोजन और कृषि अति आवश्यक है। किसानों ने लंबे समय तक पारंपरिक तरीकों का उपयोग करके फसलें उगाई। लेकिन जब दुनिया की आबादी बढ़ी तो साथ-साथ भोजन की खपत भी बढ़ने लगी। इसके लिए किसानों ने पौधों की नाइट्रोजन आवश्यकताओं को पूरा करने और खाद्य फसल की उपज बढ़ाने के लिए खेती में यूरिया का उपयोग करना शुरू किया।

यूरिया फसलों की उपज बढ़ाने में मदद तो करता है, लेकिन इसके बार-बार और अधिक उपयोग से पर्यावरण के लिए खतरा पैदा हो गया है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, किसानों द्वारा छिड़के जाने वाले लगभग 40% यूरिया का पौधे उपयोग नहीं करते हैं, ये मिट्टी और भूजल में फैल कर प्रदुषण फैलाता है।

इसके अलावा, अतिरिक्त यूरिया नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन करता है, यह हानिकारक ग्रीनहाउस गैस पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती है। लेकिन यूरिया के बिना, किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें फसल की कम पैदावार और जीविकोपार्जन में असमर्थता शामिल है, तो आखिर इसका हल क्या है? इन सभी समस्याओं का समाधान करते हुए इफको ने पहला नैनो यूरिया लिक्विड पेश किया, जो यूरिया का उपयोग करते समय देखी गई कमियों के लिए एक सफल समाधान है।

नैनो यूरिया लिक्विड की खोज(NANO UREA)

इफको और इसके कृषि वैज्ञानिक पिछले 5 दशकों से किसानों के लिए फसल की पैदावार में सुधार, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता के साथ किसानों के जीवन को समृद्ध बनाने के मिशन के साथ काम कर रहे हैं। ऐसे ही इफको के एक वैज्ञानिक है- रमेश रालिया। रालिया ही नैनो यूरिया का आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक हैं। वो साल 2015 से नैनो यूरिया विकसित करने पर काम कर रहे थे। रालिया साल 2019 से नैनो यूरिया के राष्ट्रव्यापी परीक्षण में सक्रिय भागीदार रहे हैं। वर्षों की मेहनत के बाद गुजरात के कलोल में इफको के नैनो बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (एनबीआरसी) में इस अभिनव उत्पाद को तैयार किया गया।

नैनो यूरिया लिक्विड क्या है ?

स्वदेशी रूप से निर्मित लिक्विड नैनो यूरिया एक तरल उर्वरक है जो पौधों को आवश्यक नाइट्रोजन प्रदान करता है। ये नाइट्रोजन पौधों में अमीनो एसिड, वर्णक, एंजाइम और आनुवंशिक सामग्री के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। नैनो यूरिया तरल, एक नैनो-प्रौद्योगिकी-आधारित उत्पाद है जिसने सामान्य कृषि उर्वरकों से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान किया है। राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (एनएआरएस) के हिस्से के रूप में 2019-20 में देश के 30 एग्रो क्लाइमेटिक जोन के 11000 किसानों के खेतों में 94 फसलों पर इसका 2 साल तक परीक्षण किया गया था। इसके अलावा भारतीय कृषि अनुंसधान परिषद (ICAR) के 20 से अधिक संस्थानों और कृषि विश्वविद्यायों में भी लिक्विड यूरिया का सफल परीक्षण हो चुका है। इस दौरान पारंपरिक नाइट्रोजन पूरकता विधियों की तुलना में नैनो यूरिया के कई फायदे दिखाई दिए।

नैनो उर्वरक (नैनो यूरिया) के लाभ

नैनो यूरिया, ठोस यूरिया का ही तरल रूप है। यह कम लागत में फसल की नाइट्रोजन जरूरतों को पूरा करने के लिए नैनो तकनीक का उपयोग करता है। यहां हम नैनो यूरिया के कुछ लाभ के बारे में बता रहे हैं:-

नैनो यूरिया के उपयोग से फसलों की पैदावार में बढ़ोतरी देखी गई है। कुछ परीक्षणों के अनुसार ल्क्विड यूरिया के उपयोग से फसलों की पैदावार में करीब 8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।

नैनो यूरिया का विषाक्तता और जैव सुरक्षा को लेकर परीक्षण किया गया था। इस परीक्षण  में यह पाया गया कि नैनो यूरिया मनुष्यों, जानवरों, पक्षियों और मिट्टी के जीवों के लिए सुरक्षित है।

500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल में 40,000 मिलीग्राम/एमएल नाइट्रोजन होती है जो एक एकड़ खेती को नाइट्रोजन प्रदान करने के लिए पर्याप्त हो सकती है। इतनी ही जमीन को नाइट्रोजन देने के लिए ठोस यूरिया के 2.5 बैग लगते हैं।

नैनो-प्रौद्योगिकी-आधारित उत्पाद (नैनो लिक्विड यूरिया) बढ़ी हुई दक्षता के साथ सबसे उन्नत नाइट्रोजन उर्वरक है।

नैनो यूरिया एक लागत प्रभावी उत्पाद है और खेत में इसकी कम मात्रा डालने पर ही फसलों को जरुरी नाइट्रोजन प्राप्त हो जाती है।

खेती के लिए नैनो यूरिया का उपयोग करने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इससे पर्यावरण को कम से कम नुकसान पड़ता है। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा और हवा और पानी की गुणवत्ता में सुधार होगा। 

नैनो यूरिया को लेकर भविष्य की संभावनाएं
नैनो यूरिया अपनी उच्च दक्षता और न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव के साथ कृषि में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। उर्वरकों के इस स्थायी विकल्प से कृषि क्षेत्र में सुधार होगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी क्योंकि इससे कम लागत पर फसल की पैदावार बढ़ाने में मदद मिलेगी।
भारत के कई राज्य फसलों को दिए जाने वाले पोषक तत्वों (उर्वरक) के लिए अब टिकाऊ और वैकल्पिक विधियां अपनाने पर जोर दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, तेलंगाना राज्य ने खेती में नैनो यूरिया का उपयोग करना शुरू कर दिया है और इसे बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है।
भारत, नैनो लिक्विड यूरिया के द्वारा पूरी दुनिया के किसानों को लाभ पहुंचाना चाहता है। इसके लिए इसे पूरी दुनिया में वितरित करने की योजना बनाई जा रही है। हाल ही में भारत ने श्रीलंका को 100 टन नैनो यूरिया की डिलीवरी की थी। वहां राष्ट्रपति द्वारा रासायनिक उर्वरकों के आयात पर रोक लगाने के फैसले के बाद किसानों को यूरिया की तत्काल आवश्यकता थी।
नैनो लिक्विड यूरिया के विकास के साथ ही भारत कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए एक स्वस्थ, समृद्ध और टिकाऊ भविष्य की ओर अग्रसर है।

लिया गया लेख

Minimum Support Price (MSP PRICE)एमएसपी भारत सरकार द्वारा बंपर उत्पादन के वर्षों के दौरान कीमत में अत्यधिक गिरावट के खिलाफ उत्पादक – किसानों की रक्षा के लिए तय की गई कीमत है। न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार की ओर से उनकी उपज के लिए गारंटी मूल्य हैClick Hereginger organicअदरक हिमाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण मसालेदार नगदी फसल है। इसकी काश्त के लिए 5-6.5 पी.एच. रेंज और एक प्रतिशत से अधिक जैविक कार्बन वाली रेतीली अथवा भंगुर मृदा काफी उपयुक्त है…Click HereNano DAPसभी फसलों के लिए, नैनो डीएपी आसानी से उपलब्ध नाइट्रोजन (एन) और फास्फोरस (पी2ओ5) का एक विश्वसनीय स्रोत है, और यह खड़ी फसलों में नाइट्रोजन और फास्फोरस की कमी के मुद्दों को संबोधित करने में सहायता करता है। नैनो डीएपी फॉर्मूलेशन में फॉस्फोरस (16.0% P 2 O 5 w/v) और नाइट्रोजन (8.0% N w/v) है।Click Here
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PRADHAN MANTRI KRISHI SINCHAI YOJANA

  • सतही लघु सिंचाई (एसएमआई)
  • महत्वपूर्ण लिंक
  • योजना की बुनियादी विशेषताएं :
  • योजना के मुख्य उद्देश्य :

सतही लघु सिंचाई (एसएमआई)

विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 1999-2000 से केंद्रीय सहायता (CA) प्रदान करने के लिए त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) के तहत 2000 हेक्टेयर से कम सिंचाई क्षमता वाली सतही लघु सिंचाई (SMI) योजनाओं को शामिल किया गया था। इसके बाद इस योजना का विस्तार ओडिशा के डीपीएपी, आदिवासी, डीडीपी, बाढ़ प्रवण, वामपंथी उग्रवादी और कोरापुट, बोलांगीर और कालाहांडी (केबीके) क्षेत्र में किया गया।

प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) को 2015-16 में शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य खेत पर पानी की भौतिक पहुंच को बढ़ाना और सुनिश्चित सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करना, कृषि जल उपयोग दक्षता में सुधार करना, स्थायी जल संरक्षण प्रथाओं को लागू करना आदि था। पीएमकेएसवाई- हर खेत को पानी (एचकेकेपी) पीएमकेएसवाई के घटकों में से एक है। एसएमआई की योजना अब पीएमकेएसवाई (एचकेकेपी) का एक हिस्सा है।

महत्वपूर्ण लिंक

सभी राज्यों की भागीदारी बढ़ाने के लिए बारहवीं योजना के दौरान घरेलू बजटीय सहायता के साथ राज्य क्षेत्र की योजना के रूप में जल निकायों की मरम्मत, नवीनीकरण और जीर्णोद्धार (आरआरआर) के लिए एक नई योजना को मंजूरी दी गई थी। प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) 2015-16 में शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य खेत पर पानी की भौतिक पहुंच को बढ़ाना और सुनिश्चित सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करना, खेत के पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार करना, स्थायी जल संरक्षण प्रथाओं को लागू करना आदि था। पीएमकेएसवाई हर खेत को पानी (एचकेकेपी) पीएमकेएसवाई के घटकों में से एक है। जल निकायों के आरआरआर की योजना पीएमकेएसवाई (एचकेकेपी) का हिस्सा बन गई है।

योजना की बुनियादी विशेषताएं :

कैबिनेट ने 9050 करोड़ रुपये के परिव्यय एवं 21.0 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता बनाने के लक्ष्य के साथ पीएमकेएसवाई (एचकेकेपी) घटक के लिए मंजूरी दे दी है जिसमें आरआरआर से 1.50 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता बनाने का लक्ष्य है।

योजना के मुख्य उद्देश्य :

  • जलाशयों का व्यापक सुधार और जीर्णोद्धार जिससे टैंक भंडारण क्षमता में वृद्धि।
  • भूजल पुनर्भरण।
  • पीने के पानी की उपलब्धता में वृद्धि।
  • कृषि/बागवानी उत्पादकता में सुधार।
  • टैंक कमानों के जलग्रहण क्षेत्रों में सुधार।
  • बेहतर जल उपयोग दक्षता के माध्यम से पर्यावरणीय लाभ; सतह और भूजल के संयुक्त उपयोग को बढ़ावा देकर।
  • प्रत्येक जल निकाय के स्थायी प्रबंधन के लिए सामुदायिक भागीदारी और स्वावलंबी प्रणाली।

लिया गया लेख

aloe vera cultivationएलोवेरा की बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए इसकी खेती मुनाफे का सौदा साबित हो रही है। हर्बल और कास्मेटिक्स में इसकी मांग निरंतर बढ़ती ही जा रही है। इन प्रोडक्टसों में अधिकांशत: एलोवेरा का उपयोग किया जा रहा हैClick HereBrahmakamal cultivationब्रह्मकमल जैसा कि नाम से पता चलता है कि ब्रह्मकमल का संबंध सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा से है। वेदों और अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथों में ब्रह्मकमल का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार इस पुष्प का संबंध ब्रह्मा से बताया गया है….Click HereA lotus plantकमल, भारत का राष्ट्रीय फूल, अपनी सुंदरता और पवित्रता के लिए प्रसिद्ध है। जब आप इस सुंदर फूल को पानी में खिलते हुए देखते हैं, तो आपको समझ में आता है कि इसे क्यों इतना महत्व दिया जाता है..Click Here
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Minimum Support Price (MSP PRICE)

Table Of Content

  • एमएसपी(MSP) का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य :
  • एमएसपी का निर्धारण :
  • गन्ने के लिए मूल्य निर्धारण नीति :
  • इसमें फसलें शामिल हैं :-
  • नवीनतम न्यूनतम समर्थन मूल्य-खरीफ (2023-24) , रबी (2024-25) :-
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भारत सरकार द्वारा कृषि उत्पादकों को कृषि कीमतों में किसी भी तेज गिरावट के खिलाफ बीमा करने के लिए बाजार हस्तक्षेप का एक रूप है। कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर कुछ फसलों के लिए बुवाई के मौसम की शुरुआत में भारत सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा की जाती है। एमएसपी भारत सरकार द्वारा बंपर उत्पादन के वर्षों के दौरान कीमत में अत्यधिक गिरावट के खिलाफ उत्पादक - किसानों की रक्षा के लिए तय की गई कीमत है। न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार की ओर से उनकी उपज के लिए गारंटी मूल्य है। इसका प्रमुख उद्देश्य किसानों को संकटपूर्ण बिक्री से बचाने में सहायता करना और सार्वजनिक वितरण के लिए खाद्यान्न की खरीद करना है। यदि बंपर उत्पादन और बाजार में बहुतायत के कारण किसी वस्तु का बाजार मूल्य घोषित न्यूनतम मूल्य से नीचे चला जाता है, तो सरकारी एजेंसियां ​​घोषित न्यूनतम मूल्य पर किसानों द्वारा दी जाने वाली पूरी मात्रा खरीद लेती हैं।

एमएसपी(MSP) का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य :

सरकार की मूल्य समर्थन नीति कृषि उत्पादकों को कृषि कीमतों में किसी भी तेज गिरावट के खिलाफ बीमा प्रदान करने के लिए निर्देशित है। न्यूनतम गारंटीशुदा कीमतें एक ऐसी मंजिल निर्धारित करने के लिए तय की जाती हैं जिसके नीचे बाजार कीमतें नहीं गिर सकतीं। 1970 के दशक के मध्य तक, सरकार ने दो प्रकार की प्रशासित कीमतें घोषित कीं:

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खरीद की कीमतें एमएसपी न्यूनतम कीमतों के रूप में कार्य करता था और सरकार द्वारा उत्पादकों के निवेश निर्णयों के लिए दीर्घकालिक गारंटी की प्रकृति में तय किया गया था, इस आश्वासन के साथ कि उनकी वस्तुओं की कीमतों को सरकार द्वारा निर्धारित स्तर से नीचे गिरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। बंपर फसल की स्थिति में भी खरीद कीमतें ख़रीफ़ और रबी अनाज की कीमतें थीं, जिस पर अनाज को पीडीएस के माध्यम से जारी करने के लिए सार्वजनिक एजेंसियों (जैसे एफसीआई) द्वारा घरेलू स्तर पर खरीदा जाना था। कटाई शुरू होने के तुरंत बाद इसकी घोषणा की गई। आमतौर पर खरीद मूल्य खुले बाजार मूल्य से कम और एमएसपी से अधिक होता था। धान के मामले में दो आधिकारिक कीमतों की घोषणा की यह नीति कुछ बदलावों के साथ 1973-74 तक जारी रही। गेहूं के मामले में इसे 1969 में बंद कर दिया गया और फिर 1974-75 में केवल एक वर्ष के लिए पुनः स्थापित किया गया। चूँकि एमएसपी बढ़ाने की बहुत अधिक माँगें थीं, 1975-76 में, वर्तमान प्रणाली विकसित की गई थी जिसमें धान (और अन्य खरीफ फसलों) और बफर स्टॉक संचालन के लिए खरीदे जाने वाले गेहूं के लिए कीमतों का केवल एक सेट घोषित किया गया था।

एमएसपी का निर्धारण :

न्यूनतम समर्थन मूल्य के स्तर और अन्य गैर-मूल्य उपायों के संबंध में सिफारिशें तैयार करने में, आयोग किसी विशेष वस्तु या वस्तुओं के समूह की अर्थव्यवस्था की संपूर्ण संरचना के व्यापक दृष्टिकोण के अलावा, निम्नलिखित कारकों को भी ध्यान में रखता है :-

  1. बनाने की किमत
  2. इनपुट कीमतों में बदलाव
  3. इनपुट-आउटपुट मूल्य समता
  4. बाज़ार कीमतों में रुझान
  5. मांग और आपूर्ति
  6. अंतर-फसल मूल्य समता
  7. औद्योगिक लागत संरचना पर प्रभाव
  8. जीवन यापन की लागत पर प्रभाव
  9. सामान्य मूल्य स्तर पर प्रभाव
  10. अंतर्राष्ट्रीय मूल्य स्थिति
  11. भुगतान की गई कीमतों और किसानों द्वारा प्राप्त कीमतों के बीच समानता।
  12. निर्गम कीमतों पर प्रभाव और सब्सिडी के लिए निहितार्थ

आयोग जिला, राज्य और देश के स्तर पर सूक्ष्म-स्तरीय डेटा और समुच्चय दोनों का उपयोग करता है। आयोग द्वारा उपयोग की गई जानकारी/डेटा में अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित शामिल हैं:-

  1. प्रति हेक्टेयर खेती की लागत और देश के विभिन्न क्षेत्रों में लागत की संरचना और उसमें परिवर्तन;
  2. देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रति क्विंटल उत्पादन की लागत और उसमें परिवर्तन;
  3. विभिन्न खद्यन की कीमतें और उनमें परिवर्तन;
  4. उत्पादों की बाज़ार कीमतें और उनमें परिवर्तन;
  5. किसानों द्वारा बेची गई और उनके द्वारा खरीदी गई वस्तुओं की कीमतें और उनमें परिवर्तन;
  6. आपूर्ति संबंधी जानकारी – क्षेत्र, उपज और उत्पादन, आयात, निर्यात और घरेलू उपलब्धता और सरकार/सार्वजनिक एजेंसियों या उद्योग के पास स्टॉक;
  7. मांग संबंधी जानकारी – प्रसंस्करण उद्योग की कुल और प्रति व्यक्ति खपत, रुझान और क्षमता;
  8. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कीमतें और उनमें परिवर्तन, विश्व बाज़ार में मांग और आपूर्ति की स्थिति;
  9. चीनी, गुड़, जूट के सामान, खाद्य/अखाद्य तेल और सूती धागे जैसे कृषि उत्पादों के डेरिवेटिव की कीमतें और उनमें परिवर्तन;
  10. कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण की लागत और उसमें परिवर्तन;
  11. विपणन की लागत – भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण, विपणन सेवाएँ, कर/शुल्क और बाज़ार पदाधिकारियों द्वारा बनाए रखा गया मार्जिन; और
  12. व्यापक-आर्थिक चर जैसे कीमतों का सामान्य स्तर, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और मौद्रिक और राजकोषीय कारकों को प्रतिबिंबित करने वाले।

खरीफ फसलों के लिए एमएसपी में वृद्धि केंद्रीय बजट 2018-19 की घोषणा के अनुरूप है, जिसमें एमएसपी को अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत (सीओपी) के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर तय करने की घोषणा की गई है, जिसका लक्ष्य उचित पारिश्रमिक है। किसान।

स्रोत: किसान पोर्टल

गन्ने के लिए मूल्य निर्धारण नीति :

गन्ने का मूल्य निर्धारण आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए), 1955 के तहत जारी गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 के वैधानिक प्रावधानों द्वारा नियंत्रित होता है। 2009-10 चीनी सीज़न से पहले, केंद्र सरकार वैधानिक न्यूनतम मूल्य (एसएमपी) तय कर रही थी। गन्ने का और किसान 50:50 के आधार पर चीनी मिल के मुनाफे को साझा करने के हकदार थे। चूंकि मुनाफे का यह बंटवारा वस्तुतः लागू नहीं हुआ, इसलिए गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 को अक्टूबर, 2009 में संशोधित किया गया और एसएमपी की अवधारणा को गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) से बदल दिया गया। एफआरपी की गणना के लिए एक अतिरिक्त कारक के रूप में एक नया खंड ‘जोखिम और मुनाफे के कारण गन्ना उत्पादकों के लिए उचित मार्जिन’ जोड़ा गया था और इसे 2009-10 के चीनी मौसम से प्रभावी बनाया गया था। तदनुसार, सीएसीपी को नियंत्रण आदेश में सूचीबद्ध वैधानिक कारकों पर उचित ध्यान देना आवश्यक है, जो हैं :-

  • गन्ने के उत्पादन की लागत;
  • वैकल्पिक फसलों से उत्पादक को लाभ और कृषि वस्तुओं की कीमतों की सामान्य प्रवृत्ति;
  • उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर
  • चीनी की उपलब्धता;
  • चीनी की कीमत;
  • गन्ने से चीनी की पुनर्प्राप्ति दर;
    उप-उत्पादों की बिक्री से प्राप्त आय। गुड़, खोई और प्रेस मिट्टी या उनका आरोपित मूल्य (दिसंबर, 2008 में डाला गया) और;
  • जोखिम और मुनाफे के आधार पर गन्ना उत्पादकों के लिए उचित मार्जिन (अक्टूबर, 2009 में डाला गया)।राज्य सलाहकार मूल्य (एसएपी) नामक एक मूल्य की भी घोषणा करते हैं, जो आमतौर पर एसएमपी से अधिक होता है।

इसमें फसलें शामिल हैं :-

सरकार ने 22 अनिवार्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और गन्ने के लिए उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) की घोषणा की। अनिवार्य फसलें हैं- ख़रीफ़ सीज़न की 14 फ़सलें, 6 रबी फ़सलें और दो अन्य वाणिज्यिक फ़सलें। इसके अलावा, तोरिया और छिलके रहित नारियल का एमएसपी क्रमशः रेपसीड/सरसों और खोपरा के एमएसपी के आधार पर तय किया जाता है। फसलों की सूची इस प्रकार है.

अनाज (7) – धान, गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का और रागी
दालें (5) – चना,अरहर, मूंग, उड़द और मसूर
तिलहन (8) – मूंगफली, रेपसीड/सरसों, तोरिया, सोयाबीन, सूरजमुखी के बीज, तिल, कुसुम बीज और निगरसीड,कच्चा कपास,कच्चा जूट,खोपरा छिलका रहित नारियल
गन्ना (उचित एवं लाभकारी मूल्य)
वर्जीनिया फ्लू से ठीक किया गया (वीएफसी) तंबाकू

नवीनतम न्यूनतम समर्थन मूल्य-खरीफ (2023-24) , रबी (2024-25) :-

भारत में फसलों की बुआई का मौसम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता है और फसल की कटाई भी किस्म पर निर्भर करती है। इस प्रकार ख़रीफ़ में बोई गई फसल अक्टूबर से पहले भी बाज़ार में आ सकती है। 2023-24 के लिए खरीफ फसलों का एमएसपी 1 सितंबर 2023 से लागू है। सभी अनिवार्य रबी फसलों के लिए एमएसपी रबी विपणन सीजन (आरएमएस) 2024-25 के लिए है।

विपणन सीजन 2023-24 के लिए खरीफ फसलों के लिए एमएसपी में वृद्धि केंद्रीय बजट 2018-19 की घोषणा के अनुरूप है, जिसमें एमएसपी को अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत के कम से कम 1.5 गुना के स्तर पर तय करने की घोषणा की गई है, जिसका लक्ष्य उचित है। किसानों को उचित पारिश्रमिक किसानों को उनकी उत्पादन लागत पर अपेक्षित मार्जिन बाजरा (82%) के मामले में सबसे अधिक होने का अनुमान है, इसके बाद तुअर (58%), सोयाबीन (52%) और उड़द (51%) का स्थान आता है। बाकी फसलों के लिए, किसानों को उनकी उत्पादन लागत पर मार्जिन कम से कम 50% होने का अनुमान है।

सरकार ने विपणन सीजन 2024-25 के लिए रबी फसलों के एमएसपी में वृद्धि की है, ताकि उत्पादकों को उनकी उपज के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जा सके। एमएसपी में सबसे अधिक वृद्धि मसूर (मसूर) के लिए 425 रुपये प्रति क्विंटल, इसके बाद रेपसीड और सरसों के लिए 200 रुपये प्रति क्विंटल की मंजूरी दी गई है। गेहूं और कुसुम के लिए 150-150 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी को मंजूरी दी गई है. जौ और चने के लिए क्रमश: 115 रुपये प्रति क्विंटल और 105 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी को मंजूरी दी गई है.

जिंस क़िस्म 2022-2023 के लिए एमएसपी (रुपये प्रति क्विंटल) 2023-2024 के लिए एमएसपी (रुपये प्रति क्विंटल) पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि (रुपये प्रति क्विंटल)
ख़रीफ़ फसलें
धान सामान्य

2040

2183

143

Grade ‘A’ 2060 2203

143

ज्वार हाइब्रिड 2970 3180

210

मालदांडी

2990

3225

235

 बाजरा

2350

2500 150
 मक्का

1962

2090 128
 रागी

3578

3846

268

 अरहर (तूर)

6600

7000 400
 मूंग 7755 8558

803

 उड़द

6600

6950

350

 कपास मध्यम स्टेपल* 6080 6620 540
लंबा स्टेपल **

6380

7020

640

 खोल में मूंगफली

5850

6377

527

 सूरजमुखी के बीज 6400 6760 360
 सोयाबीन पीला 4300 4600 300
 तिल 7830 8635 805
 नाइजरसीड 7287 7734 447
रबी फसलें (रबी विपणन मौसम (आरएमएस) 2024-25)
 गेहूँ

2125 2275

150

 जौ

1735 1850 115
 चना

5335

5440

105

 मसूर (दाल)

6000 6425

425

 रेपसीड और सरसों

5450

5650 200
 कुसुम

5650

5800 150
 तोरिया

5050

5450

400

अन्य फसलें
 खोपरा (2024 फसल मौसम) पिसाई

10,860

11,160

300

गोल

11,750

12,000

250

 छिलका रहित नारियल (2023 फसल मौसम) 2860 2930

70

 कच्चा जूट (2023-24 सीज़न के लिए)

4750

5050

300

 गन्ना $ (चीनी सीजन 2023-24 के लिए)

315

* स्टेपल लंबाई (मिमी) 24.5 -25.5 और माइक्रोनेयर मान 4.3 -5.1

** स्टेपल लंबाई (मिमी) 29.5 -30.5 और माइक्रोनेयर मान 3.5 -4.3

$ उचित एवं लाभकारी मूल्य

चीनी सीजन 2023-23 (अक्टूबर-सितंबर) के लिए चीनी मिलों द्वारा देय गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) इस प्रकार है:

    • 2023-24 चीनी सीज़न के लिए गन्ने का एफआरपी रु. 10.25% की मूल पुनर्प्राप्ति दर के लिए 315/क्विंटल
    • रुपये का प्रीमियम 10.25% से अधिक वसूली में प्रत्येक 0.1% वृद्धि के लिए 3.07/क्विंटल
    • एफआरपी में रुपये की कमी रिकवरी में प्रत्येक 0.1% की कमी के लिए 3.07/क्विंटल
    • उन चीनी मिलों के मामले में कोई कटौती नहीं जहां रिकवरी 9.5% से कम है। ऐसे किसानों को मिलेंगे रुपये आगामी चीनी सीजन 2023-24 में गन्ने के लिए रुपये के स्थान पर 291.975/क्विंटल। चालू चीनी सीजन 2022-23 में 282.125/क्विंटल।

ख़रीफ़ सत्र के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (2024)Updated

फसल 2024-25 के लिए एमएसपी (रुपये प्रति क्विंटल) 2023-24 के लिए एमएसपी (रुपये प्रति क्विंटल) पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि (रुपये प्रति क्विंटल)
धान (सामान्य) 2300 2183 117
 धान (ग्रेड-ए) 2320 2203 117
ज्वार(हाइब्रिड) 3371 3180 191
 ज्वार(मालदांडी) 3421 3225 196
 बाजरा 2625 2500 125
 रागी 4290 3846 444
 मक्का 2225 2090 135
 अरहर/तुअर 7550 7000 550
 मूंग 8682 8558 124
 उड़द 7400 6950 450
 मूंगफली 6783 6377 406
 सूरजमुखी 7280 6760 520
 तिल 9267 8635 632
 नाइजर सीड्स 8717 7734 983
 कपास (मध्य स्टेपल) 7121 6620 501
 कपास (लंबा स्टेपल) 7521 7020 501
 सोयाबीन 4892 4600 292

 

Free Borewell Yojana 2024निःशुल्क बोरवेल योजना 2024 (Free Borewell Yojana 2024) : हरियाणा सरकार द्वारा किसानों के लिए फ्री बोरवेल योजना शुरू की गई है। इस योजना के तहत राज्य के किसान अपने खेतों में मुफ्त में बोरवेल लगवा सकते हैं।Click Here ginger organicअदरक हिमाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण मसालेदार नगदी फसल है। इसकी काश्त के लिए 5-6.5 पी.एच. रेंज और एक प्रतिशत से अधिक जैविक कार्बन वाली रेतीली अथवा भंगुर मृदा काफी उपयुक्त है..Click Heretuberose plantरजनीगंधा, जिसे वैज्ञानिक रूप से ‘Tuberose‘ कहा जाता है, एक सुगंधित फूलों वाला पौधा है जो भारत में बहुत लोकप्रिय है। यह अक्सर पूजा, शादियों और अन्य सांस्कृतिक अवसरों पर उपयोग होता है। रजनीगंधा के फूल सफेद रंग के होते हैं, और जब वे खिलते हैं, तो वे एक मधुर और अत्यंत प्रियतम खुशबू फैलाते हैं….Click Here

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Atal Bhujal Yojana (ABHY)

Table Of Content

  • अटल भूजल योजना (ABHY) की पृष्ठभूमि :-
  • अटल भूजल योजना (ABHY) के उद्देश्य :-
  • अटल भूजल योजना (ABHY) के घटक :-
  • अटल भूजल योजना की विशेषताएं :-
  • अटल भूजल योजना योजना का महत्व :-
  • भारत में भूजल की स्थिति :-
  • विभिन्न राज्यों की भूजल क्षमता :-
  • केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की भूमिका :-
  • अटल भूजल योजना इस स्थिति से कैसे निपटेगी ?
  • अटल भूजल योजना का वित्तपोषण :-
  • अटल भूजल योजना कवरेज :-
  • अटल भूजल योजना योजना के अपेक्षित परिणाम :-
  • अटल जल योजना के अपेक्षित प्रभाव :-

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अटल भूजल योजना कवरेज :-

अटल भूजल योजना (ABHY) केंद्र सरकार द्वारा सामुदायिक भागीदारी के साथ भूजल के सतत प्रबंधन के लिए 6,000 करोड़ रुपये की एक योजना है। अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana – ABHY ) को अटल जल (ATAL JAL) के नाम से भी जाना जाता है। अटल भूजल योजना (ABHY) (Atal Bhujal Yojana) या अटल जल (ATAL JAL) ‘जल उपयोगकर्ता संघों’ की स्थापना, जल बजट, ग्राम पंचायतवार जल सुरक्षा डिजाइन आदि के निर्माण और कार्यान्वयन के माध्यम से सार्वजनिक भागीदारी की परिकल्पना करता है। कार्यक्रम जल शक्ति मंत्रालय द्वारा निष्पादित किया जा रहा है, जिसे पहले जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के रूप में जाना जाता था। अटल भूजल योजना (ABHY) (Atal Bhujal Yojana Hindi me) भारत सरकार और विश्व बैंक (World Bank) द्वारा 50:50 के अनुपात में वित्तपोषित किया जा रहा है।

अटल भूजल योजना (ABHY) देश के सात राज्यों में चिन्हित जल संकट वाले क्षेत्रों में स्थायी भूजल प्रबंधन के लिए सामुदायिक भागीदारी और मांग पक्ष हस्तक्षेप पर जोर देती है। इस योजना में जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission – JJM) के लिए बेहतर स्रोत स्थिरता, सरकार के ‘किसानों की आय को दोगुना करने’ के लक्ष्य में सकारात्मक योगदान और इष्टतम जल उपयोग की सुविधा के लिए समुदाय में व्यवहार परिवर्तन को शामिल करने की भी परिकल्पना की गई है।

अटल भूजल योजना (ABHY) के क्रियान्वयन के लिए चिन्हित अति-शोषित और पानी की कमी वाले राज्यों में गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। इन राज्यों को भूजल दोहन और क्षरण की डिग्री, निर्मित कानूनी और नियामक उपकरणों, संस्थागत इच्छा और भूजल प्रबंधन से जुड़ी पहलों को क्रियान्वित करने के अनुभव के आधार पर चुना गया है।

अटल भूजल योजना (ABHY) की पृष्ठभूमि :-

  • भूजल देश के कुल सिंचित क्षेत्र में लगभग 65% और ग्रामीण पेयजल आपूर्ति का लगभग 85% योगदान देता है।
  • बढ़ती जनसंख्या, शहरी विकास और औद्योगिक विकास की बढ़ती मांगों के कारण राष्ट्र में सीमित भूजल संसाधन खतरे में हैं। 
  • कई क्षेत्रों में गहन और अनियंत्रित भूजल पंपिंग के परिणामस्वरूप भूजल स्तर में तेजी से और व्यापक गिरावट आई है और साथ ही भूजल निकासी सुविधाओं के निरंतर अस्तित्व में कमी आई है।
  • देश के कुछ हिस्सों में भूजल की गुणवत्ता में गिरावट से भूजल की उपलब्धता में कमी की समस्या और भी बढ़ गई है।
  • अति-उपयोग, संदूषण और संबंधित पर्यावरणीय प्रभावों के कारण भूजल पर बढ़ते दबाव से राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ने का खतरा है, जब तक कि आवश्यक निवारक/सुधारात्मक उपायों को प्राथमिकता पर नहीं लिया जाता है।
जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission – JJM) 
  • जल जीवन मिशन (JJM) के माध्यम से 2024 तक कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) के माध्यम से प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति व्यक्ति प्रति दिन 55 लीटर पानी की आपूर्ति की परिकल्पना की गयी है।
  • जल जीवन मिशन (JJM) का क्रियान्वयन जल शक्ति मंत्रालय के द्वारा किया जाता है।
  • इस मिशन का शुभारम्भ 2019 में किया गया था।
  • जल आपूर्ति प्रणालियों और जल कनेक्शनों की कार्यक्षमता, जल गुणवत्ता निगरानी और परीक्षण के साथ-साथ टिकाऊ कृषि, संरक्षित जल का संयुक्त उपयोग, पेयजल स्रोत में वृद्धि, पेयजल आपूर्ति प्रणाली, ग्रे वाटर ट्रीटमेंट और इसका पुन: उपयोग सुनिश्चित करता है। 

मिशन में शामिल प्रावधान ( Provisions included in the Mission)

  • गुणवत्ता प्रभावित क्षेत्र
  • सूखा प्रवण और रेगिस्तानी क्षेत्रों के गांव
  • सांसद आदर्श ग्राम योजना (SAGY) गांवों आदि में एफएचटीसी के प्रावधान को प्राथमिकता देना
  • विद्यालयों, आंगनबाडी केन्द्रों, ग्राम पंचायत भवनों, स्वास्थ्य केन्द्रों, आरोग्य केन्द्रों तथा सामुदायिक भवनों को कार्यात्मक नल कनेक्शन प्रदान करना 
  • पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले दूषित पदार्थों को हटाने के लिए तकनीकी हस्तक्षेप का इस्तेमाल करना आदि।

कार्यान्वयन | Implementation

  • मिशन पानी के प्रति सामुदायिक दृष्टिकोण पर आधारित है और इसमें मिशन के प्रमुख घटक के रूप में व्यापक सूचना, शिक्षा और संचार शामिल है।
  • JJM पानी के लिए एक जन आंदोलन बनाया जा सकता है, जिससे यह सभी की प्राथमिकता बन जाए।
  • केंद्र और राज्यों के बीच फंड शेयरिंग पैटर्न हिमालय और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए 90:10, अन्य राज्यों के लिए 50:50 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100% है।

योजना का प्रदर्शन | Performance of the scheme

  • अब तक 772,000 (76 प्रतिशत) स्कूलों और 748,000 (67.5 प्रतिशत) आंगनवाड़ी केंद्रों में नल के पानी की आपूर्ति की गई है।

अटल भूजल योजना (ABHY) के उद्देश्य :-

  • अटल भूजल योजना के कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्यों को नीचे सूचीबद्ध किया गया है :
  • सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से राष्ट्र में प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में भूजल प्रबंधन को बढ़ाना।
  • पानी के संरक्षण और कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करने वाले व्यवहारिक परिवर्तनों को बढ़ावा देना।
  • योजना के तहत निर्धारित प्राथमिकता वाले क्षेत्र गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश राज्यों में आते हैं।
  • ये राज्य भारत में भूजल के संबंध में अति-उपयोग किए गए, महत्वपूर्ण और अर्ध-महत्वपूर्ण ब्लॉकों की कुल संख्या का लगभग 25% प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • इनमें भारत में पाए जाने वाले जलोढ़ और कठोर रॉक एक्वीफर्स के दो महत्वपूर्ण प्रकार के भूजल प्रणालियाँ भी शामिल हैं और भूजल प्रबंधन में संस्थागत इच्छा और अनुभव के विभिन्न स्तर हैं।
  • यह योजना राज्यों में चल रहे सरकारी कार्यक्रमों को पूर्व निर्धारित प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में उनके केंद्रित निष्पादन को प्रोत्साहित करने में सक्षम बनाएगी।
  • इस योजना के तहत शामिल राज्यों को अनुदान के रूप में भूजल प्रशासन के लिए जिम्मेदार संस्थानों को बढ़ावा देने के साथ-साथ भूजल प्रबंधन में सुधार के लिए सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने और पानी के संरक्षण और कुशल उपयोग को बढ़ावा देने वाले व्यवहारिक परिवर्तनों को बढ़ावा देने के लिए अनुदान प्रदान किया जाएगा।

अटल भूजल योजना (ABHY) के घटक :-

  • योजना के दो घटक है। जो इस प्रकार हैं: 

    • संस्थागत सुदृढ़ीकरण और क्षमता निर्माण घटक भाग लेने वाले राज्यों में भूजल क्षेत्र में मजबूत डेटाबेस, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामुदायिक भागीदारी की सुविधा द्वारा भूजल शासन के लिए संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 1,400 करोड़ रुपये का प्रावधान ताकि वे अपने संसाधनों का स्थायी प्रबंधन कर सकें।
    • केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न चल रही योजनाओं के बीच सामुदायिक भागीदारी, मांग प्रबंधन और अभिसरण पर जोर देने और भूजल व्यवस्था में परिणामी सुधार के साथ पूर्व-निर्धारित परिणामों की उपलब्धि के लिए राज्यों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रोत्साहन घटक के रूप में 4,600 करोड़ रुपये की अनुदान सहायता का प्रावधान आदि।

अटल भूजल योजना की विशेषताएं :-

    • अटल जल को सहभागी भूमिगत जल प्रबंधन के लिए संस्थागत ढांचे को मजबूत करने और देश के सात राज्यों, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक चलने वाले भूजल संसाधन प्रबंधन के लिए सामुदायिक स्तर पर व्यवहार परिवर्तन लाने के मुख्य उद्देश्य के साथ तैयार किया गया है।
    • योजना के लागू होने से इन सात राज्यों के 78 जिलों की लगभग 8350 ग्राम पंचायतों को लाभ होने का अनुमान है।
    • ABHY मांग पक्ष प्रबंधन पर मौलिक ध्यान देने के साथ पंचायत के नेतृत्व वाले भूजल प्रबंधन और व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा देगा।
    • 5 वर्षों की अवधि में वितरित किए जाने वाले 6000 करोड़ रुपये के पूर्ण व्यय में से 50% विश्व बैंक ऋण के रूप में होगा जिसे केंद्र सरकार द्वारा चुकाया जाएगा।
    • बकाया 50% नियमित बजटीय सहायता से केंद्रीय सहायता के माध्यम से प्राप्त किया जाएगा।
    • विश्व बैंक के ऋण घटक और केंद्रीय सहायता सहित पूरी राशि राज्यों को अनुदान के रूप में दी जाएगी।

अटल भूजल योजना योजना का महत्व :-

यह पहल उन व्यक्तियों की सहायता करेगी जिन्हें स्थिर भूजल आपूर्ति की आवश्यकता है, विशेषकर ऐसे किसान जो पिछले कई वर्षों से भूजल की गंभीर कमी से अत्यधिक प्रभावित हैं। इसका फोकस मुख्य रूप से समुदायों की भागीदारी और विभिन्न जल योजनाओं के साथ अभिसरण पर है। इसका महत्वपूर्ण घटक समाज को जवाबदेह बनाना और भूजल संसाधनों के प्रबंधन के लिए व्यवहार में बदलाव लाना है। यह जल संसाधनों के प्रति समग्र दृष्टिकोण में सुधार करने में सहायता करेगा।

भारत में भूजल की स्थिति :-

    • केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission – CWC) द्वारा “जल और संबंधित सांख्यिकी 2019” नाम से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में, भारत का वार्षिक नवीकरणीय भूजल संसाधन 432 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) था।
    • 432 बीसीएम नवीकरणीय भूजल में से 393 बीसीएम वार्षिक ‘निकासी योग्य’ भूजल उपलब्धता है।
    • पंद्रह राज्यों में राष्ट्र की भूजल क्षमता का लगभग 90% हिस्सा है।

विभिन्न राज्यों की भूजल क्षमता :-

राज्य संभावना (प्रतिशत में)
उत्तर प्रदेश 16.2
मध्य प्रदेश 8.4
महाराष्ट्र 7.3
बिहार 7.3
पश्चिम बंगाल 6.8
असम 6.6
पंजाब 5.5
गुजरात 5.2
  • वर्तमान वार्षिक भूजल निकासी 249 बीसीएम है, जिसका उपयोग बड़े पैमाने पर सिंचाई के लिए किया जाता है।
  • धान और गन्ना जैसी जल-गहन फसलों के विकल्प के लिए सरकार के आह्वान के पीछे यही कारण है।
  • 2017 के प्री-मॉनसून के दौरान, 2009-18 के दस साल के औसत की तुलना में, केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) द्वारा प्रबंधित 61 फीसदी कुओं में भूजल स्तर में गिरावट आई है।
  • जिन राज्यों में कम से कम 100 कुओं की निगरानी की गई, उनमें कर्नाटक (80%) में सबसे अधिक कमी देखी गई, उसके बाद महाराष्ट्र (75%), उत्तर प्रदेश (73%), आंध्र प्रदेश (73%) और पंजाब (69%) का स्थान रहा।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की भूमिका :-

  • केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) 23,196 नेशनल हाइड्रोग्राफ मॉनिटरिंग स्टेशनों (6,503 खोदे गए कुओं और 16,693 पीजोमीटर) की एक प्रणाली के माध्यम से जल स्तर और उसके ग्रेड की देखरेख करता है। 
  • पीजोमीटर (Piezometers) वे उपकरण हैं जिनका उपयोग भूजल के दबाव या गहराई को मापने के लिए किया जाता है।
  • CGWB हर साल जनवरी-मार्च-मई और नवंबर के महीनों में भूजल की निगरानी रखता है।
  • बोर्ड ने भूजल संसाधनों के संबंध में देश की मूल्यांकन इकाइयों (ब्लॉक, तालुक, मंडल, आदि) को सुरक्षित, अर्ध-महत्वपूर्ण और अति-शोषित में वर्गीकृत किया है।
  • अति-शोषित इकाइयों की संख्या 2004 में 839 इकाइयों से बढ़कर 2017 में 1,186 हो गई है।
  • भारत के उत्तरी भाग में, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में 60% से अधिक मूल्यांकन इकाइयाँ या तो अति-शोषित या गंभीर हैं।
  • संसद के मानसून सत्र के दौरान, जल शक्ति मंत्रालय ने उल्लेख किया है कि 2017 तक, देश की मूल्यांकन की गई इकाइयों में से 14% अर्ध-महत्वपूर्ण हैं, 5% महत्वपूर्ण हैं और 17% अति-शोषित हैं।

अटल भूजल योजना इस स्थिति से कैसे निपटेगी ?

  • शुरुआत करने के लिए, अटल भूजल योजना को सात राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) में पांच साल की अवधि (2020-21 से 2024-25 तक) में लागू किया जाएगा।
  • इस योजना से देश भर के 78 जिलों में लगभग 8,350 ग्राम पंचायतों को लाभ होने का अनुमान है।
  • यदि कुशल है, तो इस योजना का देश के शेष भागों में विस्तार किया जा सकता है।
  • ABHY का फोकस भूजल स्तर में गिरावट के साथ-साथ पानी के उपयोग की दर को कम करने पर होगा।
  • इसका उद्देश्य संगठनात्मक ढांचे को बढ़ावा देना और दीर्घकालिक भूजल संसाधन प्रबंधन के लिए सामुदायिक स्तर पर व्यवहार परिवर्तन सुनिश्चित करना है।
  • इसमें समुदाय के नेतृत्व वाली जल सुरक्षा योजनाओं के निर्माण की भी परिकल्पना की गई है।
  • यह पहल 2013 की भूजल प्रबंधन और संसाधन विनियमन योजना का एक अद्यतन और संशोधित संस्करण है जिसका उद्देश्य देश के भूजल संसाधनों का प्रबंधन करना है।
  • नई पहल में “जल उपयोगकर्ता संघ” और जल बजट जैसी अवधारणाएं शामिल हैं।
  • अच्छा प्रदर्शन करने वाले जिलों और पंचायतों को अतिरिक्त धनराशि दी जाएगी।

अटल भूजल योजना का वित्तपोषण :-

  • अटल भूजल योजना (अटल जल) 6000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसमें से 3,000 करोड़ रुपये विश्व बैंक से ऋण और 3,000 करोड़ रुपये भारत सरकार के बराबर योगदान के रूप में होंगे।
  • वित्तपोषण का पैटर्न भारत सरकार और विश्व बैंक के बीच 50:50 के अनुपात में है।
  • इस योजना के तहत राज्यों को सहायता अनुदान के रूप में राशि दी जाएगी। विश्व बैंक का वित्तपोषण एक नए ऋण साधन के तहत किया जाएगा जो कि परिणाम के लिए कार्यक्रम (PforR) है, जिसमें इस योजना के तहत पूर्व-सहमति परिणामों की उपलब्धि के आधार पर विश्व बैंक से भारत सरकार को धनराशि वितरित की जाएगी।
  • संवितरण से जुड़े संकेतक (Disbursement Linked Indicators – DLIs) निर्धारित किए गए हैं जिसके आधार पर प्रोत्साहन राशि का वितरण किया जाएगा। फंडिंग के लिए जिन पांच डीएलआई पर विचार किया गया है वे हैं:
    • भूजल डेटा या सूचना और रिपोर्ट की सार्वजनिक घोषणा (प्रोत्साहन निधि का 10%)
    • समुदाय के नेतृत्व वाली जल सुरक्षा योजनाओं का निर्माण (प्रोत्साहन निधि का 15%)
    • मौजूदा योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से हस्तक्षेपों का सार्वजनिक वित्त पोषण (प्रोत्साहन निधि का 20%)
    • पानी के प्रभावी उपयोग के लिए प्रथाओं को अपनाना (प्रोत्साहन निधि का 40%)
    • भूजल स्तर में गिरावट की दर में वृद्धि (प्रोत्साहन निधि का 15%)।
    • प्रोत्साहन राशि प्रतिपूर्ति योग्य होगी और बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य/क्षेत्र अतिरिक्त निधियों के हकदार होंगे।

अटल भूजल योजना कवरेज :-

  • यह योजना सात राज्यों में पूर्व निर्धारित प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से भूजल प्रबंधन को बढ़ाने पर केंद्रित है। 
  • उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और कर्नाटक। योजना के लागू होने से इन राज्यों के 78 जिलों की लगभग 8353 ग्राम पंचायतों को लाभ होने का अनुमान है।
  • अस्थायी वित्तीय आवंटन के साथ योजना के क्रियान्वयन के लिए निर्धारित क्षेत्रों का विवरण नीचे दिया गया है:-
क्रम संख्या राज्य जिला  ब्लाक  ग्राम पंचायत (GPs)
1 गुजरात 6 24 1,816
2 हरियाणा 13 36 1,895
3 कर्नाटक 14 41 1,199
4 मध्य प्रदेश 5 9 678
5 महाराष्ट्र 13 35 1,339
6 राजस्थान  17 22 876
7 उत्तर प्रदेश 10 26 550
  कुल 78 193 8,353

अटल भूजल योजना योजना के अपेक्षित परिणाम :-

  • भूजल निगरानी नेटवर्क को बढ़ाने के लिए संस्थागत सुदृढ़ीकरण।
  • भूजल डेटा भंडारण, विनिमय, विश्लेषण और प्रसार में सुधार के लिए सभी स्तरों पर हितधारकों की क्षमता में वृद्धि।
  • बेहतर डेटाबेस और पंचायत स्तर पर सामुदायिक नेतृत्व वाली जल सुरक्षा योजनाओं के आधार पर उन्नत और व्यवहार्य जल बजट।
  • दीर्घावधि भूजल प्रबंधन के लिए धन के विवेकपूर्ण और कुशल उपयोग को सक्षम करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की सभी चल रही और नई योजनाओं के अभिसरण के माध्यम से जल सुरक्षा योजनाओं का प्रवर्तन।
  • सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण, बिजली फीडर पृथक्करण आदि के माध्यम से मांग को कम करने के उद्देश्य से उपलब्ध भूजल संसाधनों का प्रभावी उपयोग।

अटल जल योजना के अपेक्षित प्रभाव :-

  • स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ पहचाने गए क्षेत्र में जल जीवन मिशन के लिए स्रोत स्थिरता।
  • किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य में योगदान देंगे।
  • सहभागी भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देंगे।
  • बड़े पैमाने पर जल उपयोग दक्षता में वृद्धि और फसल के बेहतर पैटर्न।
  • भूजल संसाधनों के कुशल और उचित उपयोग की उन्नति और सामुदायिक स्तर पर व्यवहार परिवर्तन।

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Nutrient based subsidy policyउर्वरकों के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) कार्यक्रम शुरू किया गया। योजना के तहत, यूरिया को छोड़कर, सब्सिडी वाले फॉस्फेटिक और पोटासिक (पी एंड के) उर्वरकों के प्रत्येक ग्रेड को उनमें निहित पोषण सामग्री के आधार पर वार्षिक आधार पर निर्धारित सब्सिडी का एक निश्चित स्तर प्राप्त होता है।Click HereLIVESTOCK HEALTH AND DISEASE CONTROL PROGRAMME CSSपशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण योजना का समग्र उद्देश्य पशुधन और मुर्गीपालन की विभिन्न बीमारियों के खिलाफ रोगनिरोधी टीकाकरण कार्यक्रमों के कार्यान्वयन, क्षमता निर्माण, रोग निगरानी और पशु चिकित्सा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के माध्यम से पशु स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार करना हैClick Here Beetrootचुकंदर एक ऐसा फल है, जिसका सेवन सब्जी के रूप में पकाकर या बिना पकाये ऐसे भी किया जा सकता है | चुकंदर को मीठी सब्जी भी कह सकते है, क्योकि इसका स्वाद खाने में हल्का मीठा होता है…Click Here
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Nutrient based subsidy policy

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Table of Contents

  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना
  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना क्या है?
  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना के उद्देश्य :
  • योजना की विशेषताएं क्या हैं?
  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना का क्या महत्व है?
  • एनबीएस योजना की समस्याएं क्या हैं?
  • एनपीएसके क्या है और यह पौधों में वृद्धि के लिए कैसे जिम्मेदार है?
  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना से संबंधित मुद्दे :-
  • एनबीएस की दक्षता में सुधार के तरीके :

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पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना

उर्वरकों के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) कार्यक्रम शुरू किया गया। योजना के तहत, यूरिया को छोड़कर, सब्सिडी वाले फॉस्फेटिक और पोटासिक (पी एंड के) उर्वरकों के प्रत्येक ग्रेड को उनमें निहित पोषण सामग्री के आधार पर वार्षिक आधार पर निर्धारित सब्सिडी का एक निश्चित स्तर प्राप्त होता है। पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme) के तहत उर्वरकों के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) को खुला छोड़ दिया गया है, और निर्माता/विपणक इसे उचित मात्रा में निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र हैं।

पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना क्या है?

  • 1 अप्रैल 2010 से, भारत सरकार ने पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) (NBS) नीति लागू की है।
  • योजना की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
  • इस योजना में डीएपी, एमएपी, टीएसपी, डीएपी लाइट, एमओपी, एसएसपी, अमोनियम सल्फेट और 15 जटिल उर्वरक ग्रेड सहित 22 विनियंत्रित उर्वरक ग्रेड शामिल हैं।
  • ये उर्वरक किसानों को उनके पोषक तत्वों (एन, पी, के, और एस) के आधार पर रियायती दरों पर वितरित किए जाते हैं।
  • उर्वरक नियंत्रण आदेश के अनुसार, बोरान और जस्ता जैसे माध्यमिक और सूक्ष्म पोषक तत्वों के पूरक उर्वरकों पर अतिरिक्त सब्सिडी उपलब्ध है।
  • उद्यमों को दी जाने वाली सब्सिडी की राशि का निर्धारण प्रतिवर्ष पोषण संबंधी सामग्री के आधार पर किया जाता है।

पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना के उद्देश्य :

  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) संतुलित मिट्टी उर्वरता को प्रोत्साहित करने की उम्मीद में बनाई गई थी, जिसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता में वृद्धि होगी और इसके परिणामस्वरूप किसानों की आय में सुधार होगा।
  • इस योजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि विकास का समर्थन करने और संतुलित मिट्टी पोषक तत्व आवेदन सुनिश्चित करने के लिए किसानों के पास वैधानिक निश्चित लागत पर पीएण्डके की पर्याप्त आपूर्ति हो।
  • इसके उद्देश्यों में संतुलित उर्वरक उपयोग को बनाए रखना, कृषि उत्पादकता में सुधार, स्थानीय उर्वरक क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित करना और सब्सिडी भार को कम करना शामिल है।

योजना की विशेषताएं क्या हैं?

  • रसायन और उर्वरक मंत्रालय का उर्वरक विभाग कार्यक्रम की देखरेख करता है।
  • आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) (एनबीएस) को यथावत रखने के उर्वरक विभाग के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।
  • यदि पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) को बनाए रखा जाता है तो किसानों को एक विनियमित मूल्य पर पीएण्डके की पर्याप्त आपूर्ति तक पहुंच प्राप्त होगी।
  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) में केंद्रीय बजट 2021 में कोई समायोजन नहीं देखा गया।
  • भारत में, यूरिया एकमात्र विनियमित उर्वरक है, और इसे कानूनी रूप से अधिसूचित समान खुदरा मूल्य पर बेचा जाता है।
  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) (एनबीएस) फॉस्फोरिक और पोटेशियम उर्वरक निर्माताओं, विपणक और आयातकों को उचित एमआरपी निर्धारित करने की अनुमति देती है।
  • एमआरपी की गणना घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पीएंडके उर्वरक लागतों के साथ-साथ देश के इन्वेंट्री स्तर और मुद्रा विनिमय दर का उपयोग करके की जाती है।

पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना का क्या महत्व है?

  • भारत में यूरिया ही एकमात्र नियंत्रित उर्वरक है, और इसे कानूनी रूप से अधिसूचित एकसमान खुदरा मूल्य पर बेचा जाता है।
  • एनबीएस फॉस्फोरिक और पोटेशियम उर्वरक निर्माताओं, विपणक और आयातकों को उचित एमआरपी निर्धारित करने की अनुमति देती है।
  • एमआरपी की गणना घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पीएंडके उर्वरक लागतों के साथ-साथ देश के इन्वेंट्री स्तर और मुद्रा विनिमय दर का उपयोग करके की जाती है।

एनबीएस योजना की समस्याएं क्या हैं?

  • इस कार्यक्रम का लक्ष्य संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहित करना था, जिससे सरकारी उर्वरक समर्थन लागत को कम करने के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य में वृद्धि होगी।
  • अब तक, नीति मृदा स्वास्थ्य को बढ़ाने के अपने पहले लक्ष्य को पूरा करने में विफल रही है। इसका कारण यह है कि यूरिया की कीमतें सस्ती कीमतों की ओर झुकी हुई हैं।

एनपीएसके क्या है और यह पौधों में वृद्धि के लिए कैसे जिम्मेदार है?

  • फलने-फूलने के लिए सभी पौधों को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम की आवश्यकता होती है। इनमें से किसी भी पोषक तत्व की कमी होने पर एक पौधा मर जाएगा।
  • नाइट्रोजन (एन) – पौधों की पत्तियों के विकास के लिए नाइट्रोजन मुख्य रूप से महत्वपूर्ण है।
  • फास्फोरस (पी) – फास्फोरस जड़ वृद्धि के साथ-साथ फूल और फलों के विकास के लिए आवश्यक है।
  • पोटेशियम (के) – पोटेशियम एक पोषक तत्व है जो पौधे के समग्र कार्यों के समुचित कार्य में सहायता करता है।
  • ये तत्व विभिन्न तरीकों से पौधों की वृद्धि में सहायता करते हैं। इसे समझने से आपको किसी पौधे या उसके विकास की अवस्था के लिए उपयुक्त उर्वरक का चयन करने में मदद मिलेगी।
  • पौधों की वृद्धि में इन पोषक तत्वों की भूमिका होती है:
  • N, P, और K ऐसे पोषक तत्व हैं जिनकी फसलों को सबसे अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। नतीजतन, उन्हें अक्सर सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व माना जाता है।
  • एन और पी के प्राथमिक कार्य यह हैं कि वे प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड के घटक हैं, जो दोनों पौधे के ऊतकों के आवश्यक घटक हैं।
  • K एकमात्र पोषक तत्व है जो कार्बनिक पौधों के घटकों में नहीं पाया जाता है, लेकिन परासरण और एंजाइम गतिविधि जैसी पौधों की प्रक्रियाओं के नियमन के लिए आवश्यक है। सामान्य तौर पर, K काटे गए पौधों के उत्पादों की गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण है।

पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना से संबंधित मुद्दे :-

  • सब्सिडी वाले यूरिया को थोक खरीदारों/व्यापारियों के साथ-साथ प्लाईवुड और पशु चारा निर्माताओं सहित गैर-कृषि उपयोगकर्ताओं को दिया जा रहा है।
  • इसकी तस्करी बांग्लादेश और नेपाल सहित अन्य जगहों पर की जा रही है।
  • विशेषज्ञ इस विकृति का श्रेय अपूर्ण पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) को देते हैं। समस्या फॉस्फेट और पोटेशियम की कीमतों में तेजी से वृद्धि के साथ-साथ यूरिया के मूल्य नियंत्रण के कारण है।
  • लंबे समय में, उर्वरक उपयोग में यह विकासशील बेमेल कृषि उत्पादन के लिए एक भयानक शगुन है।
  • एनबीएस के बाहर, यूरिया अभी भी मूल्य नियंत्रण के अधीन है, और पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) का उपयोग केवल अन्य उर्वरकों में किया गया है।
  • पिछले दस वर्षों में, विनियंत्रित उर्वरकों (यूरिया के अलावा) की कीमत में 2.5 से चार गुना की वृद्धि हुई है। हालांकि, अप्रैल 2010 के बाद से यूरिया की कीमत में मुश्किल से 11% की वृद्धि हुई है।
  • नतीजतन, किसान पहले की तुलना में अधिक यूरिया का उपयोग कर रहे हैं, जिससे उर्वरक असंतुलन बढ़ रहा है।
  • चूंकि खाद्य सब्सिडी के बाद उर्वरक सब्सिडी दूसरी सबसे बड़ी सब्सिडी है, एनबीएस न केवल अर्थव्यवस्था के बजटीय स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि देश की मिट्टी के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाती है।

एनबीएस की दक्षता में सुधार के तरीके :-

  • यूरिया को पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) के तहत लाना: उर्वरक उपयोग में असंतुलन को दूर करने के लिए यूरिया को एनबीएस के तहत लाया जाना चाहिए। यूरिया की लागत बढ़ाना जबकि अन्य उर्वरकों को सस्ता करने के लिए फॉस्फेट, पोटाश और सल्फर की पोषक तत्व आधारित सब्सिडी योजना (Nutrient Based Subsidy Scheme in Hindi) दरों को कम करना एक व्यवहार्य विकल्प है।
  • दीर्घकालिक सुधार: लंबे समय में, एनबीएस को प्रति एकड़ नकद सब्सिडी द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए जिसका उपयोग किसी भी उर्वरक को खरीदने के लिए किया जा सकता है। इसमें व्यक्तिगत और मूल्य वर्धित उत्पाद शामिल हैं जिनमें न केवल अतिरिक्त पोषक तत्व होते हैं, बल्कि यूरिया की तुलना में नाइट्रोजन को अधिक कुशलता से परिवहन करते हैं।
  • उर्वरकों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी): डीबीटी योजना प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बेहतर उत्पादों सहित कई मोर्चों पर किसानों को लाभान्वित कर सकती है, “टिकाऊ और जिम्मेदार” कृषि उत्पादन के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं पर उन्नत उद्योग विस्तार सेवाएं, और इस तरह के लिए उच्च आय उत्पाद। दूसरी ओर, उर्वरकों में डीबीटी, ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक वित्तीय समावेशन से पहले होना चाहिए।
  • लास्ट-माइल कनेक्टिविटी को सक्षम करना: सस्ती कीमत वाली “लास्ट माइल” प्रौद्योगिकियां सरकार को आवश्यक संवितरण ढांचा बनाने में मदद कर सकती हैं, जिससे भूमि, फसल, मिट्टी के स्वास्थ्य और अन्य भौगोलिक मानदंडों के आधार पर लक्षित सब्सिडी लक्ष्यीकरण की अनुमति मिलती है।

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