भूमि: मूंग की खेती के लिए दोमट एवं बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती हैl भूमि में उचित जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चहियेl
तापमान: मूंग की बिजाई के लिए मुख्यतया 35-42 डिग्री C तापमान होना चाहिए |
उचित समय: 10 जुलाई से 30 जुलाई के बिच का समय बढ़िया माना जाता है |
भूमि की तेयारी: मूंग के लिए 20 किलो नाइट्रोजन तथा 40 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की आवश्कता होती है l नाइट्रोजन एवं फास्पोरस की मात्रा 87 किलो ग्राम डी.ए.पी. एवं 10 किलो ग्राम यूरिया के द्वारा बुवाई के समय देनी चाहिएl मूंग की खेती हेतु खेत में दो तीन वर्षों में कम एक बार 5 से 10 टन गोबर या कम्पोस्ट खाद देनी चाहिए | बुवाई के लिए कुल्तिवेटर – तोई – हेरो इत्यादी का इस्तेमाल करें |
उच्चतम वैरायटी: RMG-62, RMG-268, GM-4, Ganga-8
बीज उपचार: बीजों को 2.5 ग्राम थायरम एवं 1.0 ग्राम कार्बेन्डाजिम या 4-5 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। फफूंदनाशी से बीजोपचार के पश्चात् बीज को राइजोबियम एवं पीएसबी कल्चर से उपचारित करें। अगर उपचारित बीज का उपयोग कर रहे हो, तो उन्हें उपचारित न करें।
बिजाई का तरीका: गेहूं की बिजाई 2 तरीके से कार सकते है छिटा विधि और कतारों में | कतारों में बिजाई क लिए मूंग को 25-30 सेमी कतार से कतार तथा 5-7 सेमी पौधे से पौधे की दूरी पर बुआई करें एवं बीज को 3-5 सेमी गहराई पर बोना चाहिये जिससे अच्छा अंकुरण प्राप्त हो सके।
बिजाई: बिजाई के समय भूमि और पानी के अनुसार बीज का चयन करे | बिजाई के समय 25 से 30 Kg की बिजाई करें|
पहली सिंचाई: बिजाई के 25 से 30 दिन के अंदर पहली सिंचाई करें और पहली सिंचाई के साथ 10-20 Kg प्रति एकड़ यूरिया खाद डालें|
नोट : पहली सिंचाई के बाद यह भी चेक करे की मूंग में कोई खरपतवार तो नहीं है अगर है तो हस्तचालित यंत्रो से निंदाई करें या खरपतवार नासक का छिढ़काव करें |
दूसरी सिंचाई: बिजाई के 45 से 60 दिन के अंदर दूसरी सिंचाई करें |
तीसरी सिंचाई और चौथी सिंचाई जरुरत के हिसाब से करें|
मुख्य रोग: पत्ता छेदक , दीमक , कातरा , रस चुसक इत्यादी | रोग नियंत्रण के लिए प्रोफेनोफॉस की 1 लीटर या क्लोरेन्ट्रानिलिट्रोल की 500 मिली या स्पाइनोसैड की 125 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से दो बार छिड़काव करें
अब फसल पकने का इंतजार करें – फसल के पनके का समय 65-80 दिन के लगभग मन जाता है | फसल पकने पर फलियाँ सूखने लग जाती है और काली पड़ जाती है | उस दौरान इसके पौधों की कटाई कर लेनी चाहिए | पौधों की कटाई के बाद उन्हें एकत्रित कर धूप में अच्छे से सूखा लेना चाहिए | इसके बाद सूखी हुई फलियों को मशीन की सहायता से निकाल लिया जाता है |

