Saffron

पोस्ट सामग्री

  • केसर का पौधा कहां से लाएं ?
  • केसर प्राप्त करने का तरीका
  • जर्दा क्या होता है ?
  • लच्छा क्या होता है ?
  • 15 * 15 कमरे में केसर की खेती से कमाई
  • केसर की खेती में खर्चा
  • केसर की खेती में एयरोपोनिक तकनीक क्या है ?
  • शुरुआत में कितना खर्च आता है?
  • केसर की खेती के लिए ध्वनि

केसर

केसर एक सुंदर फूलों वाली खेती होती है केसर के पौधे पर फूल होते हैं फूलों के अंदर लाल रंग के पतले से धागे नुमा आकर के होते हैं वह केसर होती है |

केसर का पौधा कहां से लाएं ?

जम्मू कश्मीर में पंपोर नाम की जगह है वहां से इसका बल्ब लेकर आए यहां पर बहुत ही उच्च क्वालिटी का केसर का बल्ब मिलता है

केसर प्राप्त करने का तरीका

सबसे पहले हम खेत के अंदर जाकर केसर के पौधे को उखाड़ लाये उसके बाद केसर के पौधे को नीचे जड़ से पकड़े और जो पौधे के ऊपर लंबी टहनी की तरह होता है उसको घुमा दें फिर फुल अलग हो जाएगा और उस फूल की पंखुड़ी को धीरे-धीरे निकाल दें अब जो उसके अंदर लाल रंग का पतला रस्सीनुमा भाग है उसको निकाल ले यही केसर है

जर्दा क्या होता है ?

हल्का सा आपको ऑरेंज कलर में दिखाई दे रहा है, इसे जर्दा कहा जाता है

लच्छा क्या होता है ?

ऊपर केसर बीच में ऑरेंज रंग का जिसे जर्दा कहते हैं और नीचे सफेद रंग का होता है इन तीनों को मिलाकर लच्छा कहा जाता है तो तीनों चीजें बिकती हैं। पूरा पार्ट तीनों चीजें बिकती है साथ में फ्लावर भी बिकता है और बिकता है तो बहुत ही ज्यादा डिमांड में रहते हैं।

बल्ब क्या होता है ?

जो जड़ होती है नीचे उसे भाग को बल्ब कहा जाता है उसकी मार्केट में बहुत कीमत होती है लगभग 550 से ₹700 किलो होती है

15 * 15 कमरे में केसर की खेती से कमाई

किसान भाइयों हम पहले साल केसर से कमाई की बात करें तो पहले साल हमें इससे ज्यादा मुनाफा नहीं मिल पाएगा द्वितीय साल में काफी मुनाफा मिलेगा

केसर की खेती में खर्चा

बिजली के बिल की बात करें तो इतना खर्चा नहीं आता है अगर ठंडक की बात कर रहे हैं तो आप 1 टन का अगर आपके पास एसी(AC) तो उसमें कुछ कनेक्शन करके भी आप उसे चिलर के रूप में यूज कर सकते हैं। अच्छा तो आपकी लागत इतनी ज्यादा नहीं रहेगी इस बिजनेस में। मतलब आपने तो फिर भी पूरा एडवांस तरीके से कर रखा है सेंसर लगे हुए हैं| अगर किसी को करना भी हो तो वह अपने घर में भी कर सकता है बिल्कुल आपके घर में कर सकते हैं और आपको ज्यादा
जगह की भी
रिक्वायरमेंट नहीं रहेगी तो यह एक कम लागत में बहुत ही अच्छा प्रॉफिट देने वाला बिजनेस है |

केसर की खेती में एयरोपोनिक तकनीक क्या है ?

इसमें सारा कंट्रोल सिस्टम का होता है नमी के लिए ह्यूमिडिटी फायर प्रयोग करते हैं ठंडक के लिए एसी(AC) प्रयोग करते हैं इस प्रकार इन सब का सेटअप लगाया जाता है अगर कहीं घर पर केसर लगानी हो तो पौधों को CO2 गैस भी दी जाती है

शुरुआत में कितना खर्च आता है?

किसान भाइयों अगर एक छोटे कमरे में इसकी खेती को करें तो डेढ़ टन का एक एसी (AC) लगभग डेढ़ लाख का 2 लाख के केसर के बल्ब 3.5 लाख में पूरा कंपलीट सेटअप हो जाएगा | 15 * 15 कमरे में मैक्सिमम 10 लाख प्रॉफिट हो सकता है

केसर की खेती के लिए ध्वनि

इस खेती के लिए स्पीकर लगाएऔर इसमें गायत्री मंत्र और प्राकृतिक आवाज बजाइये अच्छा लाभ मिलेगा फूल ज्यादा खिलेंगे |

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Pearl farming from marine creatures

 

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Pearl Farming From Marine

समुद्री जीवो से मोती की खेती

समुद्री जीवों से मोती की खेती करते हैं जिसे सीप मोती कहते हैं | ये समुद्री जीव सीप  होता है| जिस से सीप के मोती की खेती करते हैं|

सीप किसे कहते हैं?

समुद्री जीव जिसे सीप कहते हैं सीप के जिगर, फेफड़े, हड्डी सब होता है जैसे अन्य जीवो में होते हैं | सीप समुद्र के नीचे पाया जाने वाला जीव होता है| यह मछली की तरह होता है यह ब्रिटेन बगेरा से लाया जाता है |

सीप से मोती बनाने की पहली प्रक्रिया

इस प्रक्रिया में सबसे पहले इनको समुद्र से लाया जाता है, फिर प्रीकंटेनर जोकी पानी से भरा होता है उसमें 8 से 10 दिन तक उसे रखा जाता है

सीप से मोती बनाने की द्वितीय प्रक्रिया

अब सीप को पानी से थोड़ा बाहर निकाला जाता है उसके बाद इनका ऑपरेशन किया जाता है जब पानी के बाहर निकलते हैं तो ये सीप 0.5-1 mm ( यानी आधा से एक एम एम ) अपना मुंह चौड़ा कर देती है ऑपरेशन से पहले न्यूक्लियस लिया जाता है जिससे मोती बनता है |

न्यूक्लियस क्या होता है?

न्यूक्लियस भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं न्यूक्लियस को जिस आकार में डालेंगे वो उसी आकार का मोती बनेगा उसके साथ-साथ हम जापान से एन ओ पी लाते हैं और भारतीय एन ओ पी भी उपयोग करते हैं |

सीप का ऑपरेशन किस प्रकार से होता है ?

सबसे पहले सीप को पानी से बाहर निकलते हैं उसके बाद 0.5 से 1 एम एम अपना मुंह खुल देते हैं उसके बाद एक प्लास (plier) लेते हैं उसकी मदद से थोड़ा सिप का मुंह खोला जाता है 8 mm के करीब मुंह चौड़ा करते हैं उसके बाद एक लकड़ी का स्पॉट उसके मुंह में देते हैं ताकि मुंह चौड़ा रहे फिर सिप के मेंटल वाले हिस्से में चिरा लगाते हैं फिर मेंटल और बाहरी त्वचा के विच न्यूक्लियस लगा देंगे और न्यूक्लियस को थोड़ा थोड़ा भीतर सरका देंगे ताकि अच्छे से उनका पोषण हो सके यही प्रक्रिया दूसरी तरफ करेंगे और ऑपरेशन करने के बाद मेंटल व बाहरी त्वचा को पहले की तरह दोबारा बंद करदे | ऑपरेशन केवल 30 से 40 सेकंड में करना होता है ऑपरेशन के बाद 500 एमजी (mg) एंटीबायोटिक कैप्सूल के अंदर वाला पदार्थ 250 एमजी (mg) पानी में डाले और साथ में ऑक्सीजन भी पानी में डाल दे और घोल दे अब पानी के टैंक में 5 से 7 दिन छोड़ दे फिर हम एक बड़े टैंक जो कि मुख्य टैंक होता है पानी में छोड़ देंगे इस बड़े टैंक में एक बोतल के तीन ट्रे लगाकर उनमें सीप डाल दे और ट्रे टैंक के तल के एक से डेढ़ फीट तक ऊपर रखें  | अब इस तरह इस टैंक में 12 से 16 महीने इस टैंक में रख दें

सीप को खाना कहा से मिलता है?

यह सीप दो से तीन इंच अपना पैर बाहर निकाल देती है अगर सीधे खड्डे में रखेंगे तो किसी अन्य जीव से खाना बना लेगी परंतु टैंक में रखेंगे तो चारा (feed) देना होता है 25 ग्राम एनपी के (npk)और 50 ग्राम यूरिया 500 ग्राम गाय का गोबर और चूना पत्थर मिलाकर पानी में मिला दें अब एक से डेढ़ साल बाद मोती बाहर निकाल के बिछ दें अब इनको काट दें | जिस आकार में न्यूक्लियस डाला इस आकार का मोती तैयार हो जाएगा |

सीप से मोती बनाने की ट्रेनिंग कहाँ से ले ?

अगर किसी भाई को ट्रेनिंग लेना हो तो मध्य प्रदेश के नोलखा, जिला-रतलाम के अंदर इसका केंद्र है संपर्क नंबर (contact no)  95757 99765


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Red Sandalwood

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लाल चंदन का पौधे की जानकारी

लाल चंदन एक खूबसूरत पौधा है जो अपनी महकती हुई सुगंध और लाल रंग के लिए प्रसिद्ध है। यह एक छोटा पेड़ होता है जिसकी पत्तियाँ छोटी होती हैं और पूरे साल हरा-भूरा रहता है। लाल चंदन के फूलों का उपयोग धूप, इत्र और पूजा-अर्चना में किया जाता है। इसके पौधे को माटी में उगाया जा सकता है और यह धूप और ठंड में अच्छी तरह से विकसित होता है। यह पौधा बीजों द्वारा भी प्रजनन करता है।

लाल चंदन क्या है ?

लाल चंदन एक प्राकृतिक पौधा है जिसका वैज्ञानिक नाम ‘टेरोकार्पस सैंटालिनस (Pterocarpus santalinus)’ है। यह पौधा छोटे वृक्ष की तरह होता है और इसकी छाल लाल रंग की होती है। इसकी महक बहुत ही सुंदर होती है और यह वनस्पतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
लाल चंदन का उपयोग बहुत समय से पूरी दुनिया में किया जाता है। इसकी खुशबू और धार्मिक महत्व के कारण इसे पूजा-अर्चना में उपयोग किया जाता है। इसकी लकड़ी को धार्मिक और आयुर्वेदिक उपचारों में भी इस्तेमाल किया जाता है। यह त्वचा के लिए भी फायदेमंद माना जाता है, और इसे सौंदर्य उत्पादों जैसे क्रीम और साबुन में भी शामिल किया जाता है। इसका धूप और तेल भी आरोग्य और सौंदर्य के लिए उपयोगी होते हैं।
लाल चंदन एक महत्वपूर्ण पौधा है जो हमारे सामाजिक, धार्मिक और सौंदर्यिक आदर्शों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका उपयोग विभिन्न रूपों में होता है, और इसके विभिन्न अंगों का उपयोग आयुर्वेदिक और सौंदर्य उत्पादों में भी किया जाता है।

लाल चंदन का इतिहास

लाल चंदन वनस्पतिक रूप से एक प्रसिद्ध  पौधा है जिसे हम चंदन भी कहते हैं। इसका इतिहास संदिग्ध है और इसका प्रयोग बहुत साल पहले से हो रहा है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, लाल चंदन की खोज भारत में हुई। प्राचीन काल में इसे सौंदर्य और धार्मिक कार्यों में उपयोग किया जाता था। इसका उल्लेख महाभारत और रामायण में भी मिलता है।
लाल चंदन को सजावटी और आरोग्यकारी गुणों के लिए प्रशंसा की जाती है। इसकी महक और त्वचा पर प्रभावशाली गुणों के कारण यह खूब प्रयोग में लाया जाता है। इसके इतिहास और महत्व के कारण यह पौधा समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिक परंपराओं में भी महत्वपूर्ण रूप से मान्यता प्राप्त करता है।

लाल चंदन की पहचान

लाल चंदन, एक पौधा है जिसकी पहचान उसके रंग और गंध से की जा सकती है। यह पौधा अपनी खासता में लाल या गुलाबी रंग की छाल और महकदार गंध के लिए प्रसिद्ध है।लाल चंदन की पहचान करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रख सकते हैं:

  1. रंग: लाल चंदन का रंग गहरा लाल होता है, जो सूखने के बाद और भी गहरा हो जाता है।
  1. गंध: लाल चंदन की गंध विशेष होती है, जो सुगंधित और मनोहारी होता है। इसका गंध आपको ध्यान से महसूस होगा।
  1. गहराई: लाल चंदन का काटने पर उसकी गहराई दिखेगी, जो आपको पत्ती के अंदर दिखेगी। इसमें दरारें नहीं होनी चाहिए।
  1. टेक्स्चर: लाल चंदन की छिलका धारण करने वाली पत्ती मजबूत और स्पष्ट होती है।

यदि आप इन विशेषताओं का ध्यान रखेंगे, तो लाल चंदन की पहचान करना आसान होगा। ध्यान दें कि आपके पास सत्यापित स्रोतों से जानकारी होनी चाहिए और वनस्पति को अनुमानित न करें।

लाल चंदन की विशेषता

लाल चंदन एक विशेष पौधा है जिसका वैज्ञानिक नाम ‘टेरोकार्पस सैंटालिनस’ है। इसकी पहचान इसके लाल रंगीन छाल और महक से होती है। इसकी खुशबू स्वर्णिम होती है और यह वनस्पतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
लाल चंदन की विशेषताएं इसे अनुष्ठानिक और आर्थिक महत्व देती हैं। इसकी महक और खास गुणवत्ता के कारण इसे आरोग्य और सौंदर्य के उपयोग के लिए खूब प्रचलित किया जाता है। इसे पूजा-अर्चना, आयुर्वेदिक उपचार, सौंदर्य उत्पादों और इत्रों में भी इस्तेमाल किया जाता है। यह त्वचा के लिए भी फायदेमंद माना जाता है, जैसे कि यह त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाता है।
लाल चंदन की विशेषताएं इसे एक महत्वपूर्ण पौधा बनाती हैं जो अपनी खासियतों के कारण मानव समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसका उपयोग विभिन्न उद्योगों में होता है और इसकी खुशबू और धार्मिक महत्व के कारण यह लोगों के द्वारा पसंद किया जाता है।

लाल चंदन की खेती का उचित समय

लाल चंदन की खेती के लिए उचित समय रोपाई के रूप में जल्दी बीज बोने के बाद होता है। यह खेती करने के लिए सबसे उपयुक्त मौसम गर्मी का होता है, जब तापमान 25-35 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। लाल चंदन पौधों के लिए धूप वाले स्थान की आवश्यकता होती है जो उन्हें समृद्ध और उचित विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।
इस पौधे की खेती को मानव और पशु चारा के रूप में भी किया जा सकता है, जो इसे और भी अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। खेती के लिए उचित समय में सबकुछ उचित ढंग से नहीं किया जाता है, इसलिए खेतीकर्ताओं को समय-समय पर गुरुकुल से सलाह लेना चाहिए।

लाल चंदन की खेती से लाभ

लाल चंदन की खेती से विभिन्न प्रकार के लाभ होते हैं। यह पौधा वनस्पतिक दुनिया में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसकी खेती से कई तरह के लाभ हासिल होते हैं।लाल चंदन की खेती से होने वाले प्रमुख लाभ नीचे दिए गए हैं :-

1. वन्यजीवों के लिए आहार :-
लाल चंदन का पौधा वन्यजीवों के लिए मुख्य आहार का स्रोत होता है। इसके फल और बीज खाने में उपयोगी होते हैं और इससे वन्य पशुओं को पोषण मिलता है।

2. औषधीय गुण :-
लाल चंदन के पत्तों, फूलों और बीजों में औषधीय गुण होते हैं। इसके उपयोग से विभिन्न बीमारियों का उपचार किया जा सकता है।

3. कृषि उत्पादन :-लाल चंदन की खेती से कृषि उत्पादन में भी वृद्धि होती है। इसके फल और बीज का उपयोग खाद्य उत्पादों, तेल और खाद्य सामग्री में किया जाता है।

4. वानिकी उत्पादन :-लाल चंदन के तने और लकड़ी का उपयोग वानिकी उत्पादन में होता है। इससे फर्नीचर, इंटीरियर डेकोरेशन आदि उत्पादों का निर्माण किया जाता है।

5. पर्यावरण संरक्षण :-लाल चंदन की खेती से पर्यावरण संरक्षण में भी सहायता मिलती है। इसके विकास से वन्य प्राणियों को सही आवास और खाने की सुविधा मिलती है।
लाल चंदन की खेती से यह साबित होता है कि यह एक उपयोगी पौधा है जो वन्यजीवों को पोषण, औषधीय गुण, और विभिन्न उत्पादों में उपयोग के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करता है। इसकी खेती से किसान और उद्यमी भी लाभान्वित हो सकते हैं।

लाल चंदन का पौधा कहां से लगाएं और कितना खर्च आएगा

लाल चंदन का पौधा कहां से लगाएं और कितना खर्च आएगा

लाल चंदन का पौधा उगाने के लिए आपको कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना होगा। यह पौधा खुशबूदार और वन्यजीवन के लिए महत्वपूर्ण होता है, इसलिए इसकी खेती को समझने और सफलतापूर्वक प्रयास करने के लिए निम्नलिखित जानकारी दी गई है:

  1. उचित स्थान: लाल चंदन का पौधा उगाने के लिए उचित स्थान का चयन करना महत्वपूर्ण है। यह वन्य और धूप में अच्छे संभावित होता है। इसे सीधी धूप वाले स्थान पर लगाना चाहिए।
  1. मिट्टी की गुणवत्ता: लाल चंदन के पौधे को उगाने के लिए मिट्टी की गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। यह पौधा उपजाऊ मिट्टी में अच्छे से उगता है।
  1. जलवायु: लाल चंदन गर्म जलवायु को पसंद करता है। इसे शीत जलवायु में नहीं लगाना चाहिए।
  1. पौधों की देखभाल: पौधों की देखभाल में ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय-समय पर सिंचाई, कटाई, खरपतवार, और कीटनाशकों का उपयोग करना आवश्यक होता है।

लाल चंदन के पौधे को उगाने का खर्च विभिन्न कारणों पर निर्भर करता है, जैसे कि पौधे की मात्रा, उगाने के स्थान की उपलब्धता, पौधे की देखभाल का खर्च आदि। सामान्य रूप से, एक लाल चंदन के पौधे को उगाने का खर्च लगभग 500 से 1000 रुपये प्रति पौधा हो सकता है।

लाल चंदन की खेती के लिए मिट्टी

रक्त चंदन की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी चयन करना आवश्यक होता है। इस पौधे को अच्छी ग्राम्थिकी वाली, सुगंधित, और गाढ़ी मिट्टी पसंद होती है।
निम्नलिखित चरणों का पालन करके मिट्टी का चयन करें:

  1. सबसे पहले, एक अच्छी ड्रेनेज वाली मिट्टी चुनें, जिससे पानी समय पर सुख जाएगा और मूल्यवान खाद पोषण दे सकेगी।
  2. दूसरे, मिट्टी का pH स्तर जांचें। रक्त चंदन के लिए pH 6.5 से 7.5 के बीच का मान उपयुक्त होता है।
  1. तीसरे, मिट्टी में पेशेवर खाद या कंपोस्ट मिलाएं। यह पौधे को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करेगा।
  1. अंत में, मिट्टी को अच्छी तरह से खुदाई करें और टिड्डी और रोमछिद्रों से मुक्त करें। इससे मिट्टी सुस्थ और विराण रहेगी।
  1. इस तरह से, आप एक उचित मिट्टी का चयन करके रक्त चंदन की खेती कर सकते हैं और अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

बिना अनुमति, क्या लाल चंदन की लकड़ी उगाई जा सकती है?

नहीं, बिना अनुमति के लाल चंदन की लकड़ी उगाई जाना सही नहीं होता है। लाल चंदन (सैंडलवुड) एक महंगा और मूल्यवान पेड़ है, जिसकी लकड़ी बहुत मूल्यवान होती है और इसका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है।इसकी कटाई और विक्रय बिना सरकारी अनुमति के किया जाना अवैध है। सरकारी अधिकारियों ने इसे संरक्षित पेड़ी के रूप में गणना किया है ताकि इसका वितरण और उपयोग संबंधित नियमों और विधियों के अनुसार हो सके।इसके अवैध कटाई और विक्रय के प्रयास से वन्यजीवों को भी प्रभावित किया जा सकता है जो इस पेड़ के आवास में रहते हैं। इसलिए, लाल चंदन की खेती या इसकी लकड़ी की कटाई के लिए सरकारी अनुमति का पालन करना बेहद महत्वपूर्ण है। यह एक सुरक्षित और विधिवत तरीका होता है जो स्थायी और वृद्धि करने वाले लाभ के साथ संरक्षित पेडो की खेती को सुनिश्चित करता है।

लाल चंदन की खेती का लाइसेंसचन्दन की खेती के लिए एक व्यक्ति को चन्दन की खेती का लाइसेंस की आवश्यकता होती है। यह लाइसेंस सरकारी विभाग या अधिकारी से प्राप्त किया जा सकता है। इस लाइसेंस के अधीन, व्यक्ति को चन्दन की खेती करने की अनुमति मिलती है।इसके लिए आपको निकटतम कृषि विभाग या फसल विभाग में आवेदन करना होगा और आवश्यक दस्तावेजों के साथ आपको आवेदन करना होगा। इसके लिए आपको किसान पंजीकरण, जमीन का प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, पासपोर्ट आदि की जरूरत पड़ सकती है।लाइसेंस प्राप्त करने के बाद, आपको चन्दन की खेती के लिए विशेष निर्देशों का पालन करना होगा और समय-समय पर सरकारी अधिकारी को खेती का अवलोकन करने की अनुमति देनी होगी। इसके बिना चन्दन की खेती करना अवैध हो सकता है और सख्त कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

लाल चंदन कहाँ उगता है ?

लाल चंदन (Santalum album) एक प्रमुख वन्य पौधा है जो अपनी महक और उपयोगी लकड़ी के लिए प्रसिद्ध है। यह पौधा प्राय: भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, और अटलांटिक और तिहामानी द्वीप समूह के प्रायीद्वीपों में पाया जाता है।भारत में लाल चंदन विभिन्न राज्यों में उगाया जाता है, जैसे कि केरलकर्नाटकतमिलनाडुआँध्र प्रदेशतेलंगानाओडिशाराजस्थानगुजरातमहाराष्ट्र, और मध्य प्रदेश। यहाँ के तापमान, मिट्टी की गुणवत्ता, और उपयुक्त मौसम लाल चंदन की उगाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।यह पौधा जंगली वनों में पाया जाता है और किसी विशेष मानव इंजीनियरिंग की आवश्यकता नहीं होती है। इसकी प्राकृतिक उगाई और प्रबंधन के द्वारा इसे संरक्षित रखा जाता है। लाल चंदन के प्रमुख उगानों में प्राकृतिक अभ्यारण्य, वन्यजीव अभ्यारण्य, और वन्य उद्यान शामिल हो सकते हैं। लाल चंदन एक महत्वपूर्ण पौधा है जो भारतीय सभ्यता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और उद्यानिकी, वैध्य विज्ञान, धार्मिक आयाम और खुदरा उद्योगों में उपयोगी है।

भारत में लाल चंदन का क्या रेट है?

भारत में लाल चंदन का रेट विभिन्न कारणों पर निर्भर करता है। लाल चंदन (सैंडलवुड) एक मूल्यवान पेड़ है जिसकी लकड़ी का उपयोग धार्मिक उपासना, चिकित्सा, दुर्लभ सुगंध, इत्र, काजल, धूप, आर्थिक व्यवसाय और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसकी लकड़ी का व्यापार विश्व भर में होता है और यह बाजार में मूल्यवान है।

लाल चंदन के रेट को प्रभावित करने वाले कुछ मुख्य कारण हैं – पेडो के पौधे की उपलब्धता, बाजार की मांग, उत्पादन क्षेत्र, वित्तीय वर्ष, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नीतियां आदि। लाल चंदन की उचित देखभाल और विकास से उत्पन्न उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी अधिक मूल्यवान होती है।भत में लाल चंदन की कीमत एक किलोग्राम में कुछ हजार रुपये से शुरू होती है और यह आगे के वर्षों में परिस्थितियों के अनुसार बदल सक

ती है। विभिन्न राज्यों और बाजारों में भी इसका रेट भिन्न-भिन्न हो सकता है। लाल चंदन के उत्पादन और व्यापार में रुचि रखने वाले लोग इसके बाजार मूल्य के बारे में स्पष्टता से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और विश्वसनीय स्रोतों से समर्थन ले सकते हैं।

लाल चंदन किन रूपों में उपलब्ध है?

लाल चंदन एक प्रमुख पौधा है जिसकी लकड़ी और तना धार्मिक और आराधना के उद्देश्यों के लिए उपयोगी होता है। इसकी विशेषता यह है कि इसकी लकड़ी और तना के रूप में व्यापारिक महत्व रखती है।
लाल चंदन की रूपों में बाजार में तीन प्रमुख रूप मिलते हैं। पहला रूप है ताजगोंद, जो चंदन के ताज या माथे पर लगाने के लिए उपयोग होता है। दूसरा रूप है चंदन का तेल, जिसे खुदरा उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है। तीसरा रूप है चंदन का पाउडर, जिसे धार्मिक और आराधना के उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
ये रूप अलग-अलग प्रकार के प्रसाधनों में इस्तेमाल होते हैं, जैसे मालाओं, इत्रों, मोमबत्तीयों, पूजा सामग्री, साबुन, और केश तेलों में। लाल चंदन की इन रूपों का उपयोग विभिन्न सांस्कृतिक और आराधनात्मक उद्देश्यों के लिए होता है और इसकी महक, सुगंध, और मेडिकल प्रयोगों में भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।

लाल चंदन के फायदे –लाल चंदन के उपयोग से व्यापारिक और औषधीय लाभ होते हैं। यहां लाल चंदन के कुछ प्रमुख फायदे हैं:

1. सुगंध

लाल चंदन की सुगंध मधुर, सुरम्य और आकर्षक होती है। इसकी सुगंध धार्मिक और साधना प्रदान करती है, जिससे मन को शांति और ताजगी मिलती है। यह सुगंध भ्रमणकारी होती है और मन को प्राकृतिकता से जोड़ती है। लाल चंदन की खुशबू स्नान या ध्यान के समय उपयोग की जा सकती है, जो मन को शांति और सुकून प्रदान करती है। इसकी सुगंध से शरीर को स्वच्छ और प्राकृतिकता की अनुभूति होती है।

2. चिकित्सकीय गुण

लाल चंदन को औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है। इसे त्वचा समस्याओं, जैसे कील-मुहांसों और दाग-धब्बों के इलाज में उपयोग किया जाता है।

3. स्नान के लाभ

लाल चंदन का पाउडर स्नान में उपयोग किया जाता है जो त्वचा को स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित बनाने में मदद करता है।

4. शांति और ध्यान

लाल चंदन की सुगंध तनाव को कम करने और मन को शांति प्रदान करने में मदद करती है। इसे ध्यान और मेडिटेशन के दौरान इस्तेमाल किया जाता है।

5. त्वचा के लिए लाभकारी

लाल चंदन त्वचा को ताजगी और उज्जवलता प्रदान करता है। यह त्वचा को मोटापा और झाइयों से बचाता है।

6. खुशहाली के लिए

लाल चंदन की खुशबू मानसिक तनाव को कम करके चैन और शांति प्रदान करती है। यह मन को स्थिर और प्रसन्न बनाने में मदद करता है।

7. उत्तेजक

लाल चंदन को उत्तेजक माना जाता है और यह मस्तिष्क को सक्रिय करके याददाश्त और मनोदशा में सुधार करता है।

8. प्राकृतिक रंग संवर्धन

लाल चंदन का प्रयोग प्राकृतिक रंग और लक्ष्य के संवर्धन में किया जाता है। इसका उपयोग रंग चित्रण और पूजा-अर्चना में किया जाता है। ये थे कुछ और लाल चंदन के फायदे, जो स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक लाभ प्रदान करते हैं। आपको यह ध्यान देना चाहिए कि इन फायदों की पुष्टि के लिए यदि आप किसी चिकित्सक की सलाह लेते हैं, तो यह बेहतर होगा।

ब्रेस्ट कैंसर में भी इलाज –लाल चंदन में मौजूद प्राकृतिक गुणों के कारण यह ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में उपयोगी हो सकता है। इसमें मौजूद एंटीकैंसर और एंटीऑक्सीडेंट गुण रक्त परिसंचरण को बढ़ाते हैं और कैंसर को रोकने में मदद करते हैं। इसके अलावा, यह शरीर के अंदर की संक्रमण को कम करने में मदद करता है और प्राकृतिक इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। लाल चंदन का नियमित उपयोग ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में सहायक हो सकता है, लेकिन इसे केवल वैद्य की सलाह के साथ उपयोग करना चाहिए।

लाल चंदन के औषधीय उपयोग

आयुर्वेद में लाल चंदन का उपयोग एक आयुर्वेदिक औषधि के रूप में किया जाता है। इसमें कई गुण होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह ठंडक, शुष्कता, कडवाहट और पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसे मानसिक विकारों के इलाज के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।1. पिंपल्‍स करे दूरलाल चंदन में मौजूद एंटीबैक्टीरियल गुण पिंपल्‍स और मुंहासों को कम करने में मदद करते हैं। इसका उपयोग त्वचा के रोगों के लिए एक प्रमुख उपाय माना जाता है। लाल चंदन त्वचा की मौत को कम करके पिंपल्‍स को सुखा देता है और त्वचा को खूबसूरत और स्वस्‍थ बनाता है।

2. त्‍वचा संबंधी समस्‍याएंलाल चंदन त्‍वचा को शांति और ताजगी प्रदान करता है, जिससे चर्म रोगों और खुजली को कम किया जा सकता है। यह ताजगी प्रदान करने और त्वचा को स्‍वस्‍थ रखने के कारण, यह त्‍वचा की गंदगी और तैलीयता को कम करता है, जिससे त्वचा चमकदार और स्वच्‍छ रहती है।

3. एजिंग के लक्षणों को कम करेलाल चंदन में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करते हैं, जो त्वचा को युवा और चमकदार बनाए रखते हैं। इसका नियमित इस्‍तेमाल त्‍वचा के झुर्रियों, डार्क स्‍पॉट्‍स, और उम्र के निशानों को कम करता है और त्‍वचा को मुलायम और सुंदर बनाता है।

4. बुखार का इलाज लाल चंदन शीतल गुणों से भरपूर होता है और उच्‍च तापमान के कारण हुए बुखार को कम करने में मदद करता है। यह ताजगी प्रदान करने और शीतलता प्रदान करने के कारण, यह त्‍वचा को ठंडक पहुंचाकर बुखार को शांत करता है और सुखावन्त अनुभव प्रदान करता है।

5. कॉस्‍मेटिक्‍स में इस्‍तेमाल लाल चंदन त्वचा के लिए एक प्रमुख सौंदर्य उत्‍पादक माना जाता है, जिसे अनेक कॉस्‍मेटिक्‍स में इस्‍तेमाल किया जाता है। इसका बार-बार इस्‍तेमाल त्‍वचा को नर्म, ताजगीपूर्ण और उज्जवल बनाता है, और सौंदर्यिक उत्प्रेरणा को बढ़ाता है।

6. स्किन को पोषण देता है लाल चंदन विटामिन ई, विटामिन सी, एंटीऑक्सीडेंट्स और पोषक तत्‍वों से भरपूर होता है, जो त्‍वचा को ग्लो करने और स्‍वस्‍थ रखने में मदद करता है। यह त्वचा को मुलायम और चमकदार बनाता है और उसे पूर्ण पोषण प्रदान करता है।

लाल चंदन के प्रमुख उत्पादक राज्य

लाल चंदन भारत के कई राज्यों में प्रमुख रूप से उत्पादित होता है। इसकी मुख्य उपजावस्था मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना राज्यों में होती है। ये राज्यों के कुछ जिलों में लाल चंदन की विशेष उपज होती है और यहाँ पर्याप्त मात्रा में उत्पादित किया जाता है। इन राज्यों के क्षेत्रों की मौसम एवं जलवायु शर्तें लाल चंदन की वैज्ञानिक उपजावस्था के लिए उपयुक्त होती हैं।
मध्य प्रदेश भारत में लाल चंदन के प्रमुख उत्पादक राज्यों में से एक है। यहाँ के स्थानीय क्षेत्रों में चंदन की विशेष उपज होती है और लाल चंदन के पेड़ों का विपणन एवं व्यापार यहाँ पर्याप्त मात्रा में किया जाता है। उत्तर प्रदेश में भी लाल चंदन की उत्पादन गतिविधि बहुत महत्वपूर्ण है। राजस्थान, गुजरात, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना भी लाल चंदन के उत्पादन में सक्रिय हैं। इन राज्यों के प्रमुख क्षेत्रों में लाल चंदन की खेती और उपजावस्था को सुनिश्चित करने के लिए विशेष उपयोग होते हैं। इन राज्यों का मौसम और जलवायु शर्तें चंदन के पेड़ों के विकास एवं प्रगति के लिए आदर्श होती हैं।

लाल चन्दन का बीज कहां मिलेगा

लाल चंदन वानस्पतिक नाम:टेरोकार्पस सैंटालिनस (Pterocarpus santalinus) का बीज खरीदना थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि यह पौधा संरक्षित है और उसकी अनधिकृत कटाई और विपणन पर प्रतिबंध है। हालांकि, यदि आपको लाल चंदन के बीज खरीदने हैं, तो आपको निम्नलिखित स्थलों पर खोज सकते हैं:

सरकारी पौधशाला: भारत में कुछ राज्य सरकारों द्वारा संचालित पौधशाला और वृक्षिका लाल चंदन के बीज बेचती हैं।

ऑनलाइन वेबसाइट: कुछ ऑनलाइन वेबसाइट जैसे Amazon, Flipkart, या अन्य विशेषज्ञ बागवानी संक्रेत साइट्स पर आपको लाल चंदन के बीज मिल सकते हैं।

विशेषज्ञ बागवानी स्टोर: कुछ बड़े शहरों में स्पेशलाइज़्ड नर्सरी और बागवानी स्टोर भी इसे बेच सकते हैं।

अधिकृत विपणकार: जिन्हें सरकार द्वारा लाल चंदन के बीज विपणन की अनुमति है, वे भी इसे बेच सकते हैं। जब भी आप लाल चंदन के बीज खरीदें, तो सुनिश्चित करें कि आप अधिकृत और स्थायी विपणकार से ही खरीद रहे हैं ताकि आप अवैध वाणिज्य और संरक्षण संबंधी मुद्दों से बच सकें।

लाल चंदन के नुकसान

1. नकारात्मक प्रभाव अगर लाल चंदन की खेती को अनुचित तरीके से किया जाए, तो इसका पौधा मर सकता है या पूरी तरह से विकसित नहीं हो सकता है। सही धातु मात्रा, जलवायु एवं मापदंडों का ध्यान रखना इस पौधे की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होता है।

2. पेड़ों के अवैध कटाई लाल चंदन के पेड़ों की अवैध और अनुचित कटाई करने से पेड़ पर दूषित कीट और बीमारियाँ हो सकती हैं। इसलिए, पेड़ों की सही और व्यवस्थित कटाई करना आवश्यक है।

3. कीटाणु और संक्रमण लाल चंदन के पौधे की रक्षा में कीटाणु और संक्रमणों का विशेष ख्याल रखना आवश्यक है। इनके प्रभाव से पौधा पीड़ित हो सकता है और इसके विकास पर असर पड़ सकता है।

4. प्राकृतिक आपदाएं  अधिक बारिश, बाढ़, तूफान या ज्वालामुखी के कारण भी लाल चंदन की उत्पादन को प्रभावित किया जा सकता है। इन प्राकृतिक आपदाओं के सामयिकता और पौधों की सुरक्षा के लिए योजनाबद्धता की आवश्यकता होती है।

5. उच्च आपातकालीन दर  कई बार लाल चंदन की मांग अधिक होती है और इसके परिणामस्वरूप इसकी दर में वृद्धि हो जाती है। इससे इसका मूल्य बढ़ जाता है और बाजार में इसका स्पष्ट असर पड़ता है। इस प्रकार, यहाँ ऊपर लाल चंदन के नुकसानों का उल्लेख किया गया है। इन नुकसानों से बचने के लिए उचित ध्यान और प्रबंधन की आवश्यकता होती है ताकि इस पौधे की उपजावस्था और मानवीय उपयोगिता को सुरक्षित रखा जा सके।

लाल चंदन का विपण  लाल चंदन का विपणन एक महत्वपूर्ण पहलु है जो इस प्राकृतिक उत्पाद को बाजार में प्रदर्शित करने और उपभोगकर्ताओं तक पहुंचाने का कार्य करता है। यह उत्पाद के महत्व और उपयोग को प्रचारित करने का काम करता है जिससे उपभोगकर्ता उसके गुणों, लाभों और उपयोग के बारे में जान सकें। लाल चंदन का विपणन विभिन्न तत्वों को सम्मिलित करता है जैसे कि उत्पाद की विशेषताओं का प्रदर्शन, ब्रांड नाम और पैकेजिंग, मूल्य निर्धारण, विपणन संचार और वितरण। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद निर्माण, पैकेजिंग का आकर्षक होना, उपभोगकर्ताओं के आकर्षण के लिए विभिन्न माध्यमों का उपयोग करना और उचित मार्गदर्शन करना आवश्यक होता है। विपणन की विभिन्न उपयोगी तकनीकों का उपयोग करके लाल चंदन का प्रचार और प्रमोशन किया जाता है। इसमें विज्ञापन, सामाजिक मीडिया, वेबसाइट, बाजारी दस्तावेज़, प्रदर्शनी आदि शामिल हो सकते हैं। विपणन योजना को ध्यान में रखते हुए उपभोगकर्ताओं की आवश्यकताओं को समझना, निर्धारित बाजार सेगमेंट को ध्यान में रखते हुए संदेश को प्रभावी ढंग से पहुंचाना आवश्यक होता है।  लाल चंदन का विपणन इसकी व्यापकता और मानवीय उपयोगिता को बढ़ाने में मदद करता है। यह उपभोगकर्ताओं को इस उत्पाद के बारे में जागरूक करता है और उन्हें इसके फायदे, उपयोग और उपभोग के तरीकों के बारे में जानने का मौका देता है। इसके अलावा, विपणन साथी व्यापारियों के लिए एक बाजार में पहचान बनाने और प्रतिस्पर्धा में अग्रणी होने में मदद करता है।

निष्कर्ष   आज हमने जाना ‘लाल चंदन’ पौधे के बारे में! यह एक खास प्रकार का पौधा है जिसकी खासियत हमें अद्भुत सुगंध और उपयोगी गुणों के बारे में बताती है। लाल चंदन के पौधे का इतिहास भी बहुत रोचक है और यह विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  इस पौधे की सुगंध से हमारा मन प्रसन्न होता है और यह तनाव को कम करने में भी मदद करता है। लाल चंदन के पौधे का उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी किया जाता है और इसके फायदे अनेक होते हैं।


लाल चंदन के पेड़ के बारे में अधिक जानकारी

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Ashwagandha cultivation

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अश्वगंधा खरीफ (गर्मी) के मौसम में वर्षा शुरू होने के समय लगाया जाता है। अच्छी फसल के लिए जमीन में अच्छी नमी व मौसम शुष्क होना चाहिए। फसल सिंचित व असिंचित दोनों दशाओं में की जा सकती है। रबी के मौसम में यदि वर्षा हो जाए तो फसल में गुणात्मक सुधार हो जाता है। इसकी खेती सभी प्रकार की जमीन में की जा सकती है। केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल में किए गए परीक्षणों से पता चला है कि इसकी खेती लवणीय पानी से भी की जा सकती है।

लवणीय पानी की सिंचाई से इसमें एल्केलोइड्‌स की मात्रा दो से ढाई गुणा बढ़ जाती है। इसकी खेती अपेक्षाकृत कम उपजाऊ व असिंचित भूमियों में करनी चाहिए। विशेष रूप से जहां पर अन्य लाभदायक फसलें लेना सम्भव न हो या कठिन हो। भूमि में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। फसल की अच्छी बढ़वार के लिए शुष्क मौसम व तापमान 350 ब से अधिक नहीं होना चाहिए। इस फसल के लिए 500 से 700 मि.मी वर्षा वाले शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्र उपयुक्त हैं।

पादप विवरण

अश्वगंधा एक मध्यम लम्बाई (40 से. मी. से 150 से. मी.) वाला एक बहुवर्षीय पौधा है। इसका तना शाखाओं युक्त, सीधा, धूसर या श्वेत रोमिल होता है। इसकी जड़ लम्बी व अण्डाकार होती है। पुष्प छोटे हरे या पीले रंग के होते है। फल 6 मि. मी चौड़े, गोलाकार, चिकने व लाल रंग के होते हैं। फलों के अन्दर काफी संख्या में बीज होते हैं।

भूमि एवं जलवायु

भारत में अश्वगंधा अथवा असगंध जिसका वानस्पतिक नाम वीथानीयां सोमनीफेरा है, यह एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल के साथ-साथ नकदी फसल भी है। यह पौधा ठंडे प्रदेशों को छोड़कर अन्य सभी भागों में पाया जाता है। मुख्य रूप से इसकी खेती मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग में मंदसौर, नीमच, मनासा, जावद, भानपुरा तहसील में व निकटवर्ती राज्य राजस्थान के नागौर जिले में होती है। नागौरी अश्वगंधा की बाजार में एक अलग पहचान है। इस समय देश में अश्वगंधा की खेती लगभग 5000 हेक्टेयर में की जाती है जिसमें कुल 1600 टन प्रति वर्ष उत्पादन होता है जबकि इसकी मांग 7000 टन प्रति वर्ष है।

प्रजातियां

अनुपजाऊ एवं सूखे क्षेत्रों के लिए केन्द्रीय औषधीय एवं सुगंध अनुसंधान संस्थान, लखनऊ की पोशीता एवं रहितता नामक प्रजातियां उपयुक्त पायी गई हैं।

भूमि की तैयारी व बुआई

वर्षा होने से पहले खेत की 2-3 बार जुताई कर लें। बुआई के समय मिट्‌टी को भुरभुरी बना दें। बुआई के समय वर्षा न हो रही हो तथा बीजों में अकुंरण के लिए पर्याप्त नमी हो। वर्षा पर आधारित फसल को छींटा विधि से भी बोया जा सकता है। अगर सिचिंत फसल ली जाए तो बीज पंक्ति से पंक्ति 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 से. मी. रखने पर अच्छी उपज मिलती है तथा उसकी निराई-गुडाई भी आसानी से की जा सकती है। बुआई के बाद बीज को मिट्‌टी से ढक देना चाहिए। अश्वगंधा की फसल को सीधे खेत में बीज द्वारा अथवा नर्सरी द्वारा रोपण करके उगाया जा सकता है। नर्सरी तैयार करने के लिए जून-जुलाई में बिजाई करनी चाहिए। वर्षा से पहले खेत को 2-3 बार जुताई करके मिट्‌टी को अच्छी तरह भुरभुरी बना देना चाहिए। बुआई के तुरन्त बाद फुआरे से हल्का पानी लगा दें। एक हेक्टेयर के लिए 5 किलो बीज की नर्सरी उपयुक्त होगी। बोने से पहले बीजों को थीरम या डाइथेन एम-45 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए। ऐसा करने से अकुंर बीज जनित रोगों से सुरक्षित रहते है। बीज 8-10 दिन में अंकुरित हो जाते है। अकुंरण के बाद उनकी छटाई कर लें। पौधों की ऊंचाई 4 से 6 सें. मी. होने पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से. मी. व पौधे से पौधे की दूरी 5-10 सें. मी. की कर देनी चाहिए।

उर्वरक व निराई गुडाई

अश्वगंधा की फसल में किसी प्रकार की रासायनिक खाद नही डालनी चाहिए क्योंकि इसका प्रयोग औषधि निर्माण में किया जाता है लेकिन बुआई से पहले 15 किलो नाईट्रोजन प्रति हैक्टर डालने से अधिक ऊपज मिलती है। बुआई के 20-25 दिन पश्चात्‌ पौधों की दूरी ठीक कर देनी चाहिए। खेत में समय-समय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए। अश्वगंधा जड़ वाली फसल है इसलिए समय-समय पर निराई-गुडाई करते रहने से जड़ को हवा मिलती रहती है जिसका उपज पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

सिंचाई

सिंचित अवस्था में खेती करने पर पहली सिंचाई करने के 15-20 दिन बाद दूसरी सिंचाई करनी चाहिए। उसके बाद अगर नियमित वर्षा होती रहे तो पानी देने की आवश्यकता नही रहती। बाद में महीने में एक बार सिंचाई करते रहना चाहिए। अगर बीच में वर्षा हो जाए तो सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती। वर्षा न होने पर जीवन रक्षक सिंचाई करनी चाहिए। अधिक वर्षा या सिंचाई से फसल को हानि हो सकती है। 4 ई.सी. से 12 ई.सी. तक वाले खारे पानी से सिंचाई करने से इसकी पैदावार पर कोई असर नही पड़ता परन्तु गुणवत्ता 2 से 2.5 गुणा बढ़ जाती है।

फसल सुरक्षा

जड़ों को निमोटोड के प्रकोप से बचाने के लिए 5-6 कि.ग्रा ग्राम फ्यूराडान प्रति हैक्टर की दर से बुआई के समय खेत में मिला देना चाहिए। पत्ती की सड़न (सीडलीग ब्लास्ट) व लीफ स्पाट सामान्य बीमारियां हैं। जो खेत में पौधों की संखया कम कर देती हैं। अतः बीज को डायथीन एम-45 से उपचारित करके बोना चाहिए। एक माह पुरानी फसल को 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में डायथीन एम-45 मिलाकर 7-10 दिन के अंतर पर छिड़काव करते रहना चाहिए जब तक बीमारी नियंत्रित न हो जाए। पत्ती भक्षक कीटों से फसल को सुरक्षित रखने के लिए रोगर या नुआन 0.6 प्रतिशत का छिड़काव 2-3 बार करना चाहिए।

खुदाई, सुखाई और भंडारण

अश्वगंधा की फसल 135 से 150 दिन के मध्य खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। पौधे की पत्तियां व फल जब पीले हो जाए तो फसल खुदाई के लिए तैयार होती है। पूरे पौधे को जड़ समेत उखाड़ लेना चाहिए। जड़ें कटने न पाए इसलिए पौधों को उचित गहराई तक खोद लेना चाहिए। बाद में जड़ों को पौधो से काट कर पानी से धो लेना चाहिए व धूप में सूखने दें। जड़ों की छंटाई उनकी आकृति के अनुसार निम्न प्रकार से करनी चाहिए।

सर्वोतम या ए श्रेणी

जड़ें 7 सें. मी. लम्बी व तथा 1-1.5 सें. मी. व्यास वाली भरी हुई चमकदार और पूरी तरह से सफेद ए श्रेणी मानी जाती हैं।

उतम या बी श्रेणी

5 सें. मी. लम्बी व 1 सें. मी. व्यास वाली ठोस चमकदार व सफेद जड़ उत्तम श्रेणी की मानी जाती है।

मध्यम या सी श्रेणी

3-4 सें. मी. लम्बी, व्यास 1 सें. मी. वाली तथा ठोस संरचना वाली जड़ें मध्यम श्रेणी में आती हैं।

निम्न या डी श्रेणी

उपरोक्त के अतिरिक्त बची हुई कटी-फटी, पतली, छोटी व पीले रंग की जड़ें निम्न अथवा डी श्रेणी में रखी जाती हैं।

जड़ो को जूट के बोरों में भरकर हवादार जगह पर भडांरण करें। भडांरण की जगह दीमक रहित होनी चाहिए। इन्हें एक वर्ष तक गुणवत्ता सहित रुप में रखा जा सकता है।

उपज

आमतौर पर एक हैक्टर से 6.5-8.0 कुंतल ताजा जड़ें प्राप्त होती हैं जो सूखने पर 3-5 क्विंटल रह जाती है। इससे 50-60 किलो बीज प्राप्त होता है

विपणन (मार्कटिंग)

नीमच मण्डी (मघ्य प्रदेश), अमृतसर (पंजाब), खारी बावली (दिल्ली), पंचकूला (हरियाणा), सीतामढ़ी (बिहार)

फसल चक्र

अश्वगंधा खरीफ फसल के रूप मे लगाई जा सकती है तथा फसल चक्र में गेहूं की फसल ली जा सकती है।

गुणवत्ता

खारे पानी से भी इस फसल को उगाया जा सकता है। इसकी लवण सहनशीलता 16 ई. सी. तक होती है। खारे पानी के उपयोग से इसकी गुणवता में 2 से 2) गुणा वृद्धि होती है। अल्कलायड की मात्रा 0.5 से बढ़कर 1.2 प्रतिशत हो जाती हैं।

उपयोग

अश्वगंधा की जड़ें व पत्तियां औषधि के रूप में काम में लाई जाती हैं जो कि निम्नलिखित बीमारियों में उपयोगी है।

विथेफेरिन : टयूमर प्रतिरोधी है।

विथेफेरिन-ए : जीवाणु प्रतिरोधक है।

विथेनीन : उपशामक व निद्रादायक होती है।

जड़ों का उपयोग

Roots

सूखी जड़ों से आयुर्वेदिक व यूनानी दवाइयां बनाई जाती हैं। इसकी जड़ों से गठिया रोग, त्वचा की बीमारियां, फेफड़े में सूजन, पेट के फोड़ों तथा मंदाग्निका उपचार किया जाता है। पंजाब में इसकी जड़ों का उपयोग कमर व कूल्हों के दर्द निवारण हेतु किया जाता है।

पत्तियों का उपयोग

पत्तियों से पेट के कीड़े मारने तथा गर्म पत्तियों से दुखती आँखों का इलाज किया जाता है। हरी पत्तियों का लेप घुटनों की सूजन तथा क्षय (टी.बी.) रोग के इलाज के लिए किया जाता है। इसके प्रयोग से रुके हुए पेशाब के मरीज को आराम मिलता है। इसे भारतीय जिनसेंग की संज्ञा दी गई है जिसका उपयोग शक्तिवर्धक के रूप में किया जा रहा है। इसके नियमित सेवन से मानव में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। इसकी निरन्तर बढ़ती मांग को देखते हुए इसके उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं।

अश्वगंधा की खेती के लिए आय-व्यय का ब्यौरा

एक हेक्टेयर में अश्वगंधा पर अनुमानित व्यय रु. 10000/- आता है जबकि लगभग 5 क्विंटल जड़ों तथा बीज का वर्तमान विक्रय मूल्य लगभग 78,750 रुपये होता है। इसलिए शुद्ध-लाभ 68,750 रुपये प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। उन्नत प्रजातियों में यह लाभ और अधिक हो सकता है।

सारणी-1. अश्वगंधा की खेती का प्रति हेक्टेयर आय-व्यय का विवरण

व्यय रु.
1. खेत की तैयारी 2000.00
2. बीज की कीमत 1000.00
3. नर्सरी तैयार करना 500.00
4. पौध रोपण 2000.00
5. निराई, गुडाई 1000.00
6. सिंचाई 500.00
7. खाद, उर्वरक और उनका प्रयोग 1000.00
8. जड़ की खुदाई और उनकी सफाई 2000.00
योग 10000.00

* दिये गये कुल योग में स्थान अनुसार और वर्तमान मुद्रास्फीति की दर के अनुसार परिवर्तन हो सकता है। अत: दिया गया आय-व्यय का विवरण रुपये मूल्यों में परिवर्तनीय है। यह केवल अनुमान पर आधारित है।

आय
उपज मूल्य प्रति किलो ग्राम कुल आय
जड़ें 5 क्विंटल 145/- 72,500.00
बीज 50 किलोग्राम 125/- 6,250.00
योग 78,750.00

शुद्ध-लाभ प्रति हेक्टेयर : 78,750-10,000 = 68,750 रुपये

** दी गई कुल आय में स्थान अनुसार खर्च और वर्तमान मुद्रास्फीति की दर के अनुसार परिवर्तन हो सकता है। अत: दिया गया आय (लाभ) का विवरण रुपये मूल्यों में परिवर्तनीय।यह केवल अनुमान पर आधारित है।

स्त्रोत : केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल 132001, हरियाणा

अश्वगंधा की खेती के बारे में अधिक जानकारी

https://www.youtube.com/watch?v=rpzLQ5zGNrAhttps://www.youtube.com/watch?v=Ctgbrss1XJM

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French Bean’s Organic

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सिंचाई और जल प्रबंधन

बुआई के तुरंत बाद, तीसरे दिन और बाद में सप्ताह में एक बार सिंचाई की जाए। फूल आने तथा फलियों के विकास के समय सिंचाई करना लाभदायक होता है। पानी की कमी में मृदा में नमी का अभाव या अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन से फली की कलियां विरूपित या मज्जा ग्रस्त हो सकती हैं।

भूमि का चयन और इसे तैयार करना

रेतीली से लेकर भारी चिकनी मृदा जिसका पी.एच. रेंज 5.5-6 है और जिसमें जैविक कार्बन एक प्रतिशत से ज्यादा है वह फ्रेंचबीन  की खेती के लिए उपयुक्त है। मृदा में पी.एच. स्तर, जैविक कार्बन, गौण पोषक तत्व (एनपी.के.), सूक्ष्म पोषक तत्व तथा खेत में सूक्ष्म जीवों के प्रभाव की मात्रा की जांच करने के लिए वर्ष में एक बार मृदा परीक्षण जरूरी है। यदि जैविक कार्बन तत्व एक प्रतिशत से कम है तो मुख्य खेत में 25-30 टन/है0 कार्बनिक खाद का उपयोग किया जाए और खाद को अच्छी तरह से मिलाने के लिए खेत में 2-3 बार जुताई की जाए। प्रमाणिक जैविक खेत तथा गैर जैविक खेत के बीच एक सुरक्षा पट्टी जरूरी रखी जाए जो गैर जैविक खेत से लगभग 7 मीटर की दूरी पर होनी चाहिए, ताकि प्रमाणिक जैविक खेत में निषिद्ध सामग्री के प्रवेश को रोका जा सके।

बुआई का समय

निचले पर्वतीय क्षेत्र – फरवरी-मार्च और अगस्त-सितम्बर
मध्य पर्वतीय क्षेत्र – मार्च – जुलाई
ऊचे पर्वतीय क्षेत्र – अप्रैल-जून
अनुमोदित किस्में
(अ) बौनी या झाड़ीदार किस्में – कंटेन्डर, पूसा पार्वती, वी.एल. बोनी-1, प्रीमियर, अर्का कोमल।
(ब) बेलनुमा या ऊंची किस्में – एस.वी.एम.-1, लक्ष्मी (पी-37), केन्टुकी वन्डर

कीट प्रबंधन

रोग का कारण प्रभाव रोकथाम(निवारण)
माईट शिशु व व्यस्क माईट पौधे की कोमल पत्तियों तथा फलों से रस चूसते हैं जिससे उनका हरापन नष्ट हो जाता है। पत्तियों की ऊपरी सतह पर अत्यंत छोटे-छोटे हल्के पीले रंग के चकत्ते बन जाते हैं। प्रकोप अधिक होने पर पौधा सूखकर नष्ट हो जाता है।
  • फसल बिजाई के समय जमीन में नीम के पत्तों से तैयार की गई खाद (5 क्विंटल/है0) या नीम के बीज से तैयार की गई खाद (1 क्विंटल/है0) का प्रयोग करने से दीमक का प्रकोप कम हो जाता है।
  • चूना और गंधक का मिश्रण जमीन में डालने से भी दीमक के प्रकोप में भारी कमी आती है।
  • लकड़ी से प्राप्त राख को पौधों के तनों के मूल में डालने से दीमक के प्रकोप में कमी आती है।
  • पशु-मूत्र को पानी के साथ 1-6 में मिलाकर बार-बार दीमक के घरों में डालने से इनका प्रसार रोका जा सकता है।
  • विवेरिया या मेटाराइजियम फफूद का कण अवस्था में (6 ग्राम/वर्ग मीटर)प्रयोग करें।
व्हाईट फलाई यह रस चूसकर पौधों को हानि पहुंचाती है।
  • • वरटी सीलियम 0.3 प्रतिशत घोल का सप्ताह के अन्तराल पर प्रयोग करें।
बीन बग शिशु और प्रौढ़ पत्तों की निचली सतह से रस चूसते हैं। अति प्रभावित भाग हल्के पीले सड़ जाते हैं और पत्ते गिर जाते हैं।
  • रोपण के बाद 45, 60 तथा 75वें दिन 10 प्रतिशत लहसून- मिर्च- अदरक के सत्त के छिड़काव की सिफारिश भी विकल्प के रूप में की जाती है।
  • 4 प्रतिशत नीम के पाउडर घोल का छिड़काव करें। 4 कि0ग्रा0 नीम बीज का पाउडर लें और 10 लीटर पानी में मिलाकर पूरी रात रखें। अगले दिन सुबह छान लें और 100 लीटर पानी में मिला लें और छिड़काव करें या 3 प्रतिशत नीम के तेल का छिड़काव करें।

बीज उपचार

फफूद रोग को नियंत्रित करने के लिए बुआई से पहले 24 घंटे के लिए बीज को ट्राइकोडर्मा से/4 ग्राम/कि0ग्रा0 बीज के साथ उपचारित किया जाए। यदि फसल पहली बार उगाई जा रही है तो बीज का उपचार राईजोबियम संवर्धन/600 ग्राम/है0 से किया जाए। बीजों पर सवर्धन को चिपकाने के लिए चावल के दलिया का इस्तेमाल किया जाए। उपचारित बीजों को बुआई से पहले छाया में 15-30 मिनट तक सुखाया जाए। पहाड़ों में बीजों को पंक्ति में या क्यारी में उगाया जाए। मैदानी क्षेत्र में बीजों को मेड़ों के साईड में उगाया जाए

मृदा प्रबंधन

फ्रेंचबीन के रोपण से पहले 2 माह तक पूरक फसलें उगाई जाएं। फ्रेंचबीन से पहले फलीदार फसलों को पूरक सहायक फसल के रूप में उगाने से बचा जाए क्योंकि यह ज्यादातर बीन और संबंधित कीटों तथा रोगों से काफी समीपस्थ होती है। मक्का और दानेदार अनाज की फसलें उत्कृष्ट परिचक्रण फसलें हैं और फसल अवशेष की जुताई हरी खाद के रूप में की जाए। यह लाभकारी है क्योंकि यह नाइट्रोजन को पौधों को उपलब्ध कराती है। अन्यथा वह मृदा में घुल कर बह जाती है। जमीन को खेती के लिए तैयार करते समय इसमें अच्छी तरह सड़ी-गली और प्रचुर कम्पोस्ट/फार्म यार्ड खाद/20 टन/है0 का इस्तेमाल किया जाए। कम्पोस्ट की प्रचुरतः जैव उर्वरक, एजोसपिरोलियम, फास्फोबैक्टीरिया तथा राइजोबियम/1 कि0ग्रा0 प्रत्येक एक टन में गोबर की खाद के साथ प्रयोग किया जाए और इसे ताड़ की भूसी या तेल- ताड़ के पत्तों से 2 सप्ताह तक ढक कर रखा जाए। नियमित रूप से पानी छिड़कें और प्रत्येक 10 दिन में एकत्र करें। दो सप्ताह बाद इस मिश्रण को कम्पोस्ट/एफ.वाई.एम. (19 टन) की संतुलित मात्रा में मिला दें और जमीन तैयार करते समय समस्त 20 टन का इस्तेमाल करें। 250 कि.ग्रा. नीम की खली के साथ 8 प्रतिशत तेल का इस्तेमाल करें।
फास्फोट पोषणता के लिए रौक फास्फेट या अस्थिचूर्ण (दोनों में लगभग 20 प्रतिशत पी) का उपयोग फास्फेट घुलनशील बैक्टीरिया (पी.एस.बी.) के साथ किया जाए। पोटाश पोषक तत्व के लिए लकड़ी के बुरादे या भेड़ अपशिष्ट का प्रयोग किया जा सकता है। बढ़वार को तेज करने के लिए संपूरक पोषक तत्व के रूप में कम से कम 3 बार पंचगव्य का उपयोग किया जाए।

संवर्धन क्रियाएं और खरपतवार प्रबंधन

खरपतवार निकालने का काम बुआई के बाद 20-25 दिन और 40-45 दिन में किया जाए। प्रत्येक बार खरपतवार निकालने के बाद खेतों में मिट्टी चढ़ाने का कार्य किया जाए। बेलदार किस्मों के लिए प्रत्येक पौधे के नजदीक 5-6 फीट ऊंची लकड़ी लगाई जाए और बेल को उस पर चढ़ने दें।

बीज दर और बीज की दूरी

बीज की दर बीज आकार के अनुसार अलग- अलग है – बौनी किस्मों में बीज की मात्रा 75 कि.ग्रा./है. है, जबकि बेल वाली किस्मों में बीज की दर 30 कि.ग्रा./है. है। बौनी किस्मों को आमतौर पर 45 सें.मी. की पंक्ति में बोया जाता है तथा पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 15 सें.मी. रखी जाती है। बेल वाली किस्मों का पंक्ति से पंक्ति 90 सें.मी. का अंतराल होता है, जबकि एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 15 सें.मी. रखी जाती है।

रोग प्रबंधन

राईजोक्टोनिया जड़ सड़न तथा अंगमारी इस रोग के लक्षण पौधों के तनों पर भूमि के साथ एक विशेष किस्म के लाल – भूरे रंग  के धंसे हुए धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पौधे कमजोर हो जाते हैं। यदि नमी पर्याप्त हो तो पत्तियों तथा फलियों पर झुलसे के लक्षण दिखाई देते हैं और यदि नमी कम हो तो उन भागों पर भूरे रंग के छोटे- छोटे धब्बे बन जाते हैं। रोगग्रस्त फलियों में पनपने वाले बीज भी इस रोग से प्रभावित होकर छोटे तथा सिकुड़े बन जाते हैं, जिन पर भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। बारिश का मौसम तथा 25° से. तापमान इस रोग की वृद्धि के लिए उपयुक्त है।
रोकथाम

  • बहुवर्षीय फसल चक्र अपनाएं।
  • रोगमुक्त बीज का प्रयोग करें।
  • बीज का बिजाई से पहले ट्राइकोडर्मा तथा राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें।
श्याम वर्ण इस रोग से फलियों पर विशेष प्रकार के गोल गड्ढे विकसित होते हैं, जिनके बीच का भाग हल्के भूरे रंग का तथा किनारे लाल से भूरे रंग के होते हैं। नमी वाले मौसम में यह धब्बे हल्के गुलाबी रंग के फफूद से ढक जाते हैं। बारिश व नमी वाले मौसम इस रोग के संक्रमण तथा वृद्धि के लिए उपयुक्त हैं।
रोकथाम

  • दो से तीन साल फसल चक्र अपनाएं।
  • स्वस्थ बीज का चयन करें।
  • बीज का बिजाई से पहले ट्राइकोडर्मा, राइजोबियम कल्चर तथा बीजामृत से उपचारित करें।
पत्तों का कोणदार धब्बा इस रोग से पत्तियों पर 3-5 कोण वाले भूरे रंग से लाल रंग के धब्बे बनते हैं, जो कि अनुकूल वातावरण में आपस में मिल जाते हैं तथा रोगग्रस्त पत्तियां समय से पूर्व पीली पड़कर जमीन पर गिर जाती हैं। फलियों की सतह पर गहरे – भूरे रंग के गोलाकर धब्बे बनते हैं, जो बाद में फली का आकार बढ़ने पर लंबाई तथा चौड़ाई में बढ़ जाते हैं। इन धब्बों पर मखमली रंग की फफूद की परत बन जाती है। रोगग्रस्त फलिया में बन रहे बीजों पर भी पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। ज्यादा तापमान तथा नमी वाला मौसम इस रोग के पनपने में सहायता करता है।
रोकथाम

  • रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  • 2-3 वर्ष का फसल चक्र चलाएं।
  • स्वस्थ बीज का चयन करें।
  • बिजाई से पहले बीज का उपचार ट्राइकोडर्मा, राइजोबियम कल्चर और बीजामृत से करें।
  • वर्षा ऋतु में पानी की निकासी पर पूरा ध्यान दें।
फ्लावरी लीफ स्पॉट इस रोग के लक्षण केवल पत्तों पर ही पाए जाते हैं। पत्तों की निचली सतह पर छोटे – छोटे आटे के रंग के चूर्णिल धब्बे पड़ जाते हैं। इन्हीं धब्बों की ऊपरी सतह पर पीले रंग के धब्बे बन जाते हैं। बाद में यह धब्बे पत्तों की दोनों सतह पर आकार में बढ़ जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पत्तियां समय से पहले पीली पड़ जाती हैं और जमीन पर गिर जाती हैं, जिससे पौधा कमजोर पड़ जाता है। वर्षा व नमी वाला मौसम इस रोग के फैलने में सहायता करता है।
रोकथाम –

  • रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  • तीन वर्ष का फसल चक्र चलाएं।
  • वर्षा ऋतु में पानी की निकासी पर पूरा ध्यान दें।
क्राऊन सड़न इस रोग के प्रकोप से पौधों के तनों पर जमीन के साथ भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं। रोगग्रस्त तने के चारों तरफ कावक का कपासीय कवक जाल भी देखा जा सकता है। कवक जाल की वृद्धि के साथ पत्तियां पीली होकर समय से पूर्व जमीन पर गिरने लगती हैं। रोगग्रस्त पौधों की जड़ों का विगलन हो जाता है। कवक जाल पर अनेक गोलाकार गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। अधिक तापमान तथा अधिक नमी इस रोग के फैलने में सहायता करती है।
रोकथाम
• बहुवर्षीय फसल चक्र चलाएं।
• रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को नष्ट कर दें।
जीवाणु अंगामरी इस रोग के मुख्य लक्षणों में छोटे जलसिक्त धब्बों का बनना तथा पत्तों पर शिराओं के मध्य भाग का पीला होना है। तनों पर लाल रंग की धारियां तथा गहरे धब्बे बनते हैं। फलियों पर छोटे जलसिक्त धब्बे बनते हैं जो कि स्पष्ट लाल, भूरे अथवा गहरे भूरे रंग के पतले भागों द्वारा घिरे होते हैं। बीजों का विशेष रूप से हाइलम क्षेत्र का रंग बदल जाता है। 24° सै. तापमान तथा 50 प्रतिशत से अधिक नमी इस रोग की वृद्धि के लिए उपयुक्त है।
रोकथाम

  • संक्रमित पौधों के अवशेषों तथा खरपतवारों को नष्ट कर दें।
  • बहुवर्षीय फसल चक्र अपनाएं।
  • स्वस्थ बीज का चयन करें।
  • बीज को बिजाई से पहले ट्राइकोडर्मा तथा बीजामृत से उपचारित करें।
  • रोग के लक्षण दिखाई देते ही पंचगव्य का छिड़काव करें।
सामान्य मौजेक यह बिजाणु बीन में सामान्य मौजेक तथा सड़न करता है, जिसके लक्षणों में पत्तों का मुड़ना या छाले पड़ना, हल्के और गहरे हरे धब्बों का बनना, शिराओं का पीला होकर मुड़ना तथा वृद्धि में रूकावट आना इत्यादि हैं। अंतरवाही संक्रमित पौधों में छोटी व कम फलियां लगती हैं तथा कई बार गहरे हरे धब्बों से ढक जाती हैं और स्वस्थ फलियों की अपेक्षा देर से पकती हैं।
रोकथाम

  • खेतों के चारों तरफ से धतूरा तथा मुकोह आदि खरपतवारों को निकालकर जला दें।
  • रोग व कीट नियंत्रण के लिए नीम तेल का छिड़काव 10-12 दिन के अंतराल पर करें।
  • स्वस्थ बीज का उपयोग करें तथा बिजाई से पहले बीज का उपचार ट्राइकोडर्मा तथा बीजामृत से करें।

फसल कटाई और भंडारण

पुष्पण समय पूरा होने के बाद 2 से 3 सप्ताह की अवधि में तुड़ाई के लिए फली तैयार हो जाती है। झाडी वाली फलियों के मामले में रोपण के बाद 50-60 दिन में फली तैयार होती है, जबकि पोल- बीन के मामले में 70-80 दिन बाद यह तोड़ने लायक हो जाती है। उत्पाद को हवादार कमरे में छाया में रखें।
पैदावार
फ्रेंचबीन  की औसत पैदावार 90-100 दिन में 8-10 टन/हैक्टेयर हरी फली है।
लिया गया लेख

फसल संरक्षण

फसल परिचक्रण रोग और सूत्रकृमि के प्रकोप को रोकता है और खरपतवार को समाप्त करता है। यह कीट चक्र को तोड़ने में भी मदद करता है।

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