भूमि: इसकी खेती अच्छे जल निकास युक्त सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। बैंगन की अच्छी उपज के के लिए, बलुई दोमट से लेकर भारी मिट्टी जिसमें कार्बिनक पदार्थ की पर्याप्त मात्रा हो, उपयुक्त होती है। भूमि का पी.एच मान 5.5-6.0 की बीच होना चाहिए तथा इसमें सिंचाई का उचित प्रबंध होना आवश्यक है। झारखण्ड की उपरवार जमीन बैंगन की खेती के लिए उपयुक्त पायी गई है।

तापमान: इसके लिए 21 से 30° के औसत तापमान की आवश्यकता होती है ।

उचित समय: पहली फसल के लिए अक्तूबर में पनीरी बोयें ताकि जो नवंबर तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाये।

दूसरी फसल के लिए नवंबर में पनीरी बोयें ताकि जो फरवरी के पहले पखवाड़े तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाये।

तीसरी फसल के लिए फरवरी मार्च में पनीरी बोयें ताकि जो अप्रैल के आखिर से पहले ही पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाये।

चौथी फसल के लिए जुलाई में पनीरी बोयें ताकि जो अगस्त तक पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाये।

भूमि की तेयारी: बैंगन कि अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत में पर्याप्त मात्रा में जीवांश का होना अत्यंत आवश्यक है। खेत में 20-25 टन सड़ी हुई गोबर कि खाद या कम्पोस्ट रोपाई के 3-4 सप्ताह पूर्व अच्छी तरह मिला देना चाहिए| खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी लगाकर पलेव कर दिया जाता है | पलेव के कुछ दिन बाद जब खेत की मिट्टी ऊपर से सूखी दिखाई देने लगे तब रोटावेटर लगवा कर जुताई कर दे, इससे खेत की मिट्टी में मौजूद मिट्टी के ढेले टूट जाते है औऱ मिट्टी भुरभुरी हो जाती है | इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है । इसके अतिरिक्त यदि आप रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहते है, तो उसके लिए आपको प्रति हेक्टेयर के खेत में तीन बोरे एन.पी.के. की मात्रा को आखरी जुताई के समय देना होता है | 

उच्चतम वैरायटी : स्वर्ण श्री, स्वर्ण शक्ति, पूसा हाइब्रिड – 5, स्वर्ण श्यामली आदि।

बीज उपचार : रोगों से बचाव के लिए बीज और पौधशाला की मिट्टी को कवक नाशी या थीरम आदि से उपचारित कर लेना चाहिए। बीज और पौधशाला को ट्राइकोडर्मा से भी उपचारित किया जा सकता है। 

नर्सरी त्यार करना : जिस स्थान पर नर्सरी डालनी है वहाँ पर सबसे पहले 1 से 1.5 मीटर लम्बी और 3 मीटर चौड़ी क्यारी बनाकर कुदाल से गुड़ाई करके मिट्टी को भुरभुरी कर लें | उसके बाद प्रति क्यारी 200 ग्राम DAP डालकर जमीन को समतल कर लें| फिर दबे हुए समतल जमीन पर लाइन खींचकर हाइब्रिड बैंगन के बीजों की बुआई करें | बीजों बुआई के बाद भुरभुरे मिट्टी से बीजों को ढक देना चाहिए. इतना करने के बाद जूट की बोरियों से या किसी लम्बे कपड़े से नर्सरी की जमीन को ढक देना चाहिए | यदि आपके नर्सरी की मिट्टी में नमी कम हो तो दवा छिड़कने वाली स्प्रे मशीन से पुआल के ऊपर बारिश की तरह हल्की पानी का छिड़काव कर देना चाहिए | इसके इतना करने के 1 सप्ताह के बाद आप नर्सरी के किसी कोने से देखें की बीजो में अंकुरण हुआ की नहीं | परन्तु यदि बीज अंकुरण की अवस्था में हों या अंकुरण हो गया हो तो पुआल और कपड़े को हटाकर नर्सरी में हवा लगने दें | फिर नर्सरी की हल्की सिंचाई कर दें एक एकड़ खेत की पनीरी तैयार करने के लिए 300-400 ग्राम बीजों का प्रयोग करें।

बिजाई का तरीका:

इन पौधों की रोपाई को समतल औऱ मेड दोनों पर ही कर सकते है | समतल भूमि में पौधों की रोपाई के लिए खेत में 3 मीटर की क्यारियों को तैयार कर लिया जाता है | इन क्यारियों में प्रत्येक पौधों के बीच में 2 फ़ीट की दूरी रखी जाती है |

यदि पौधों की रोपाई मेड़ पर करनी हो तो उसके लिए दो से ढाई फ़ीट की दूरी रखते हुए मेड़ को तैयार कर लिया जाता है | इसके बाद पौध रोपाई में प्रत्येक पौध के मध्य दो फ़ीट तक दूरी अवश्य रखे | इन पौधों की जड़ो को 5 से 6 CM की गहराई में ही लगाए, इससे पौधे अच्छे से विकास करते है | पौधों को लगाने के लिए शाम का समय अधिक उचित माना जाता है |

सिंचाई : गर्मियों में हर 3-4 दिन बाद पानी लगाएं और सर्दियों में 12-15 दिन बाद पानी लगाएं। अधिक पैदावार लेने के लिए सही समय पर पानी लगाना बहुत जरूरी है। फसल को कोहरे वाले दिनों में बचाने के लिए मिट्टी में नमी बनाये रखें और लगातार पानी लगाएं। फसल में पानी खड़ा होने से रोकें, क्योंकि बैंगन की फसल खड़े पानी को सहने योग्य नहीं है।

उर्वरक : पौधा लगाने के 30 दिन बाद 25 Kg. यूरिया प्रति एकड़ तथा हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए | इसके 25 दिन बाद फिर 100 ग्राम DAP और 50 ग्राम पोटाश प्रति पौधा देकर पौधे को मिट्टी लगा देना चाहिए और हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए |

खरपतवार :

नदीनों को रोकने, अच्छे विकास और उचित हवा के लिए दो – चार गोडाई करें। काले रंग की पॉलिथीन शीट से पौधों को ढक दें जिससे नदीनों का विकास कम हो जाता है और ज़मीन का तापमान भी बना रहता है।

नदीनों को रोकने के लिए पौधे लगाने से पहले मिट्टी में फलूकलोरालिन 800-1000 मि.ली. प्रति एकड़ या ऑक्साडायाज़ोन 400 ग्राम प्रति एकड़ डालें। अच्छे परिणाम के लिए पौधे लगाने से पहले एलाकलोर 2 लीटर प्रति एकड़ की मिट्टी के तल पर स्प्रे करें।

रोग नियंत्रण :

हरी मक्खी : इनका प्रकोप पौधे लगने के शुरुआत में ही होता है | ये हरे रंग के बैंगन की हरी पत्तियों के निचे रहते हैं और पत्तियों से रस चूसने का काम करते हैं | जिससे पतीयाँ पिली होकर गिर जाती हैं | इनके रोकथाम के लिए इमिडाक्लोरोपिड 1ml प्रति 15 लीटर पानी में घोल बनाकर शाम के समय छिडकाव करना चाहिए.

सफ़ेद मक्खी : यह बहोत छोटे-छोटे सफ़ेद रंग के होते हैं. यह पत्तियों से रस तो चूसते ही हैं साथ ही वाइरस भी फैलाते हैं | इनसे बैंगन की फसल को बचाने के लिए रोगार 1.5ml प्रति 15 लीटर पानी में घोल तैयार करके स्प्रे करना चाहिए |

लाल माईट : ये लाल रंग के बहुत ही छोटे-छोटे होते हैं जो ध्यान से देखने पर ही दिखाई देते हैं | ये पौधे से रस चूसने के साथ झाला बना लेते हैं जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और पौधे की ग्रोथ भी रूक जाती है | इनसे फसल को बचाने के लिए ओमाईट 2ml प्रति 15 लीटर पानी या सुपर सोनाटा 1ml प्रति 15 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करना होता है.

झुलसा रोग : फसलों में झुलसा रोग उस समय लगता है जब तापमान बहुत हाई होता है या नमी बहुत अधिक होती है | इस रोग से फसल को बचाने के लिए मेरिवान 10ml प्रति 15 लीटर पानी या लूना 15ml प्रति 15 लीटर साफ पानी में मिलाकर छिडकाव करना चाहिए.फल और तना छेदक : इससे बैंगन की पैदावार पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. फल और तना छेदक कीट से बैंगन को बचाने के लिए डेलिगेट 1ml दवा को 15 लीटर पानी या ak-57 1.5ml प्रति 1 टंकी में घोल बनाकर स्प्रे करना चाहिए.

अब फसल पकने का इंतजार करें –  किस्मों के आधार पर बैंगन के पौधे रोपाई के तक़रीबन 50 से 70 दिन बाद पैदावार देना आरम्भ कर देते है | जब इसके पौधों में लगने वाले फलो का रंग आकर्षक दिखाई देने लगे तब उनकी तुड़ाई कर लेनी चाहिये | फलो की तुड़ाई शाम के समय करना उपयुक्त माना जाता है |