भूमि: उड़द की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में होती है। हल्की रेतीली, दोमट या मध्यम प्रकार की भूमि जिसमें पानी का निकास अच्छा हो उड़द के लिए अधिक उपयुक्त होती है।

तापमान: उड़द की बिजाई के लिए मुख्यतया 25-35 डिग्री C तापमान होना चाहिए |

उचित समय: 10 जून से 31 जुलाई के बिच का समय बढ़िया माना जाता है |

भूमि की तेयारी: मृदा की उर्वरता एवं उत्पादन के लिये उपलब्ध होने पर 15 टन अच्छी सडी गोबर की खाद व 10-15 कि.ग्रा. नत्रजन, 40-45 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 20 किग्रा. सल्फर की आवश्यकता होती है| फास्फोरस युक्त उर्वरकों जैसे सिंगल सुपर फास्फेट, डाई अमोनियम फास्फेट को अधिक पैदावार के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए

उच्चतम वैरायटी: वी.बी.जी-04-008, वी.बी.एन-6, माश-114, को.-06. माश-479, पंत उर्द-31, आई.पी.यू-02-43, वाबन-1, ए.डी.टी-4 एवं 5, एल.बी.जी-20

बीज उपचार: बिजाई के लिए मोटे बीज चुनें और उन्हें कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम प्रमि किलो बीज के साथ उपचार करें। रसायन के बाद बीज को टराईकोडरमा व्यराईड 4 ग्राम प्रति किलो बीज के साथ उपचार करें ।

बिजाई का तरीका: बुवाई पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 30 सेंटीमीटर रखते हुए करनी चाहिए तथा पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. उचित है |

बिजाई: बिजाई के समय भूमि और पानी के अनुसार बीज का चयन करे | बिजाई के समय 6 से 7 Kg बीज में की बिजाई करें|

सिंचाई: इसलिए अधिक समय तक वर्षा न होने पर तथा पूर्व पुष्पकरण अवस्था व दाना बनते समय फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए | अच्छी पैदावार के लिए उचित जल निकासी वाली जगह का होना बहुत जरूरी होता है | सिंचाई के साथ या बारिश के टाइम 25kg प्रति एकड़ यूरिया खाद डाले |

खरपतवार नियंत्रण: रासायनिक विधि द्वारा फसल में खरपतवार नियंत्रण पाने के लिए बीजो की रोपाई के तुरंत बाद खेत में पेन्डीमिथालीन उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता है | इसके अलावा प्राकृतिक विधि द्वारा खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए निराई – गुड़ाई विधि का इस्तेमाल किया जाता है |

रोग नियंत्रण: उड़द में फली छेदक कीट, पत्ती छेदक एवं सफ़ेद मक्खी का प्रकोप होता है इसके लिए मोनो क्रोटोफॉस, ट्रायजोफॉस , मोनोक्रोटोफास का पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें

अब फसल पकने का इंतजार करें –  जब पौधों की पत्तियां पीले रंग की और फलियों का रंग काला दिखाई देने लगे उस दौरान इसके पौधों को जड़ के पास से काट लिया जाता है | इसके पौधों को खेत में ही एकत्रित कर सुखा लिया जाता है | इसके बाद सूखी हुई फलियों को थ्रेसर के माध्यम से निकाल लिया जाता है|